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Thursday, February 3, 2011

जिंदगी की डगर पर एक सफ़र , समीर लाल जी के साथ--देख लूँ तो चलूँ.

देख लूँ तो चलूं --आखिर समीर लाल जी की उपन्यासिका पढने का अवसर मिल ही गया । वास्तव में यह लघु उपन्यास कम और जिंदगी की डगर पर चलना सिखाने वाली एक सार्थक पुस्तिका ज्यादा है । इसकी भूमिका में ही श्री पंकज सुबीर ने सही लिखा है कि इसे पढ़कर आपको लगेगा जैसे आप अपने ही जीवन की कहानी पढ़ रहे हैं ।
मुझे भी पढ़ते हुए यही लगा कि जैसे जीवन के अनुभव मेरे हों और शब्दों में ढाला हो समीर लाल जी ने ।

कनाडा में एक लम्बे अरसे से रह रहे समीर लाल जी ने निश्चित ही दोनों देशों की जिंदगी को करीब से देखा और समझा है

लेकिन इस पुस्तिका की विशेष बात यह है कि इसमें एक एक घंटे के सफ़र की दास्तान को इतने मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत किया गया है कि आप इसे ही एक सांस में पढ़ डालेंगे ।

कई वृतांत तो ऐसे हैं जिन्हें आपने उनके ब्लॉग पर भी पढ़ा होगा लेकिन एक धाराप्रवाह रूप में पढ़कर आपको पता भी नहीं चलेगा कि कैसे कहानी में फिट हो गया ।
आइये आपको इसे पढवाते हैं संक्षिप्त में, एक एक भाग में :

भाग :
यह कहानी है एक मित्र के गृह प्रवेश में अकेले जाने की , जो मात्र एक घंटे की दूरी पर है ।
हाईवे पर सूअरी और सुंदरी के साथ सफ़र की दास्तान को बड़े मनोरंजक रूप में प्रस्तुत किया गया है ।

भाग :
मित्र ने घर एक गाँव में बनाया है । यहाँ बताया है कि किस तरह वहां सभी को अपना देश और गाँव याद आता है । कवियों की कविताओं में भी बस गाँव ही बसे रहते हैं जबकि वे खुद पीछे छोड़ कर आए हैं ।

विदेश जाते समय मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों और भावनाओं को बड़ी खूबी से सुनाया है समीर जी ने ।
हालाँकि गाँव यदि ऐसा हो तो किसे तकलीफ होगी --



भाग :

टिम हॉरटन्स की कॉफ़ी पीते हुए वहां काम करने वाले १४-१५ साल के बच्चों को देखकर लगता है जैसे बाल श्रम या बाल शोषण जैसी बात यहाँ कोई नहीं जानता । यह अलग बात है कि जिसे हम बाल श्रम कहते हैं , उसे वहां चाइल्ड डेवलेपमेंट कहते हैं ।

भाग :

यहाँ एक एनोरेक्षिक ( डाइटिंग पर ) नवयौवना के आहार का आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया है समीर लाल जी ने ।
मानो कह रहे हों --

वे कम खाते हैं शौक से
हम खाकर भी मरते हैं भूख से

भाग :
यहाँ वहां की गोरी मेमों और लंगूर से दिखने वाले मर्दों पर गहरा कटाक्ष है ।
ऐसा लगता है कि हम हिन्दुस्तानी गोरी चमड़ी से बहुत प्रभावित रहते हैं । तभी तो गीतों में भी लड़की अक्सर गोरी ही होती है न कि काली ।
लेकिन ऐसा भी नहीं है --सांवली लड़की को भी शायरों ने बहुत सराहा है ।

भाग में समीर जी ने जर्मनी में समलैंगिक परेड का बड़ा रोचक वर्णन किया है जिसे आप खुशदीप सहगल के ब्लॉग पर पढ़ ही चुके हैं ।

यहाँ भी समलैंगिक विवाह का प्रचलन होने लगा है ।
कैसा ज़माना आ गया है । पहले मां बेटे से कहती थी --बेटा शादी किसी सुन्दर , सुशील और गृह कार्य में दक्ष लड़की से ही करना ।
लेकिन हमारे कंजर्वेटिव समाज में आज माएं यही कहती हैं कि बेटे शादी तो लड़की से ही करना

भाग :
में विदेश में रहने वाले लोगों के मात पिता के कशमकश को दिखाया गया है ।
जाने वाले चले जाते हैं । फिर आते हैं मेहमान बनकर । बूढ़े मां बाप बस राह ही तकते रहते हैं उनके आने की ।

भाग : यहाँ मृत्यु पर होने वाले दिखावे और आडम्बरों को बखूबी बताया गया है , यहाँ भी और वहां भी ।

भाग : जगह कोई भी हो , मर्द बाज़ नहीं आते अपनी हरकतों से । हाइवे पर भी साथ वाली गाड़ी में झांककर देखते हैं कि लड़की कैसी है जैसे उससे चक्कर ही चला लेंगे ।

समीर जी कहते हैं कि जिंदगी हो या कार --साइड मिरर में देखकर नहीं चला करती

भाग १० :

आर्ट ऑफ़ लिविंग पर गहरा कटाक्ष । कहते हैं जिस उम्र में आर्ट ऑफ़ डाइंग सीखनी चाहिए , उसमे आर्ट ऑफ़ लिविंग सीखकर क्या करेंगे
बात तो पते की कही है ।

भाग ११ :
देश भारत हो या कनाडा --ड्राईवर डरते हैं तो बस ट्रेफिक पुलिस से ।
वहां के हैवेज पर १२० की स्पीड पार करते ही फ़ौरन चलान कट सकता है ।
लेकिन जब हाइवे ऐसे खुले हों तो किसका दिल नहीं करेगा गाड़ी दौड़ाने का ।



सड़क के दोनों ओर घने जंगल से निकलकर जंगली जानवर बेचारे कुत्ते की मौत मर जाते हैं ।

भाग १२ :

जिसे देखो बस भागा ही जा रहा है । वहां दौड़ने के लिए हाइवेज जो बने हैं । यहाँ की तरह नहीं कि सड़क किनारे बना दिए मंदिर या दरगाह और रोक दिया ट्रेफिक ।

भाग १३ :
लेकिन फिर भी एक शून्य सा लगता है । गलियों में , घरों के बाहर , लोगों के मन में भी ।
कोई शोर नहीं , कोई परिंदा नहीं , यहाँ तक कि एक कुत्ता भी नहीं ।


ऐसी ही होती हैं वहां की गलियां । एक दम सुनसान ।

भाग १४ :

गोरों का असर यहाँ ही नहीं , वहां भी लोगों के दिलो दिमाग पर छाया रहता है । यह बात किसी भी पार्टी या भोज में देखी जा सकती है । मित्र के घर पर भी एक गोरे के साथ सभी बड़े चाव से बात कर रहे थे जैसे वह एक आम आदमी नहीं बल्कि बिल क्लिंटन हो ।
हम तो सोचे थे कि बस हम ही स्टार स्ट्रक हैं

भाग १५ :
अंत में समीर जी एक अनजानी वो का ज़िक्र करते हैं ।
हम भी सोच रहे थे कि अब तक लिंडा का ज़िक्र कैसे नहीं आया । वही लिंडा जिस पर जून २००८ में लिखा लेख पढ़कर हम पहली बार समीर जी से प्रभावित हुए थे और उनसे मिलने का विचार बनाया था ।

शायद पूरी कहानी में लिंडा ही एक काल्पनिक पात्र है


नोट : यह समीर लाल जी के लघु उपन्यास की समीक्षा नहीं हैपढ़ते हुए कहीं कहीं एक एक बात सत्य प्रतीत हुईक्योंकि २००८ में अपने तीन सप्ताह के कनाडा भ्रमण में हमने भी यहीं बातें देखी और महसूस की थी जिन्हें श्री समीर लाल जी ने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है