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Sunday, May 15, 2011

क्या दोहरी मानसिकता की शिकार है आधुनिक सोच ?

एक दिन एक अभिन्न मित्र का फोन आया --भाई आज शाम को एक पार्टी रखी है । आपको आना है ।
मैंने कहा --भाई ज़रूर आयेंगे ।
फिर वो बोला --भाभी जी को भी साथ लाना
मैंने चुस्की लेते हुए कहा --भाभी जी ?-- किस की भाभी जी ?
वो थोड़ा सोच में पड़ा और बोला --भई मेरी और किस की ।
मैंने कहा -भई तेरी तो सैंकड़ों भाभियाँ हैं । ये बताओ कौन सी।
अब तो वो परेशान हो गया । फिर सोच कर बोला --यार तेरे वाली ।
मैंने कहा --यार कभी मेरी बोलता है , कभी तेरी । भाई तू पहले फैसला करले , फिर बताना ।
वो इतना कन्फ्यूज हुआ , उसने पार्टी ही कैंसिल कर दी

उपरोक्त घटना मज़ाक में की गई एक सच्ची घटना है । लेकिन इसके पीछे भी इतिहास और संस्कृति का एक ऐसा यथार्थ छुपा है जिसे शायद बहुत कम लोग जानते होंगे ।

आज़ादी से पहले पंजाब और हरियाणा कभी संयुक्त पंजाब का हिस्सा होते थे । १९४७ में पाकिस्तान बना तो एक हिस्सा वहां चला गया । बाद में भारत के पंजाब के दो हिस्से कर दिए गए --हरियाणा और पंजाब ।

ज़ाहिर है यह विभाजन भाषा के आधार पर किया गया था । पंजाबी बोलने वाले पंजाब का हिस्सा हो गए और हरियाणवी बोलने वाले हरियाणा में आ गए ।

लेकिन यह अंतर सिर्फ भाषा में ही नहीं था । हालाँकि बहुत से रीति रिवाज़ अभी तक मिलते हैं लेकिन कुछ ऐसी भी बातें हैं जो एकदम भिन्न हैं ।

यह भाभी जी वाला किस्सा भी उनमे से एक है ।

दरअसल यहाँ शहर में सिर्फ पंजाबी ही नहीं बल्कि आम तौर पर सभी शहरी लोग किसी दूसरे की पत्नी को भाभी जी कह कर बुलाते हैं । ५०-६० साल का प्रौढ़ भी ३०-३५ साल के दोस्त की पत्नी को भाभीजी कह कर ही बुलाएगा ।

लेकिन आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि हरियाणा में कोई किसी को भाभी जी कह कर नहीं बुलाता

पहले तो वहां भाभी कहलाने का हक़ सिर्फ बड़े भाई की पत्नी को होता है छोटे भाई के लिए । यानि वहां सिर्फ देवर भाभी का रिश्ता होता है । और देवर भी भाभी को भाभी जी कह कर नहीं बुलाते
सीधे
नाम लेकर ही बुलाते हैं ।

साथ ही जेठ ( ज्येष्ठ भ्राता ) के लिए छोटे भाई की पत्नी बहु -बेटी समान होती है उनके साथ उसी तरह व्यवहार किया जाता है ।

मुझे हरियाणवी संस्कृति में यही बात सबसे अच्छी लगती है कि वहां अभी भी लोग एक अनुशासित पारिवारिक ढांचे में रहते हैं । जहाँ बड़ों का सम्मान किया जाता है । छोटों को संरक्षण दिया जाता है । समाज की भलाई के लिए बनाये गए नियमों का पालन किया जाता है ।

हरियाणा में आज भी गाँव की कोई बेटी किसी भी गाँव में ब्याही गई हो , सारे गाँव वालों के लिए वह बेटी ही होती है यदि उस गाँव में किसी शादी में जाना हो तो सारे बाराती लड़की को एक रुपया देकर सम्मानित करते हैं


लेकिन अफ़सोस कि जिस तरह हमारे शहरों में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव बढ़ता जा रहा है , उसी तरह हरियाणा के गावों में शहरी चाल चलन का प्रभाव पड़ता जा रहा है ।

इससे युवा पीढ़ी भ्रमित होकर अपनी परंपरा और संस्कृति को भूलती जा रही है

और यहाँ शहर में बैठे हम बुद्धिजीवी लोग दोहरी मानसिकता का शिकार होकर अपनी युवा पीढ़ी को पाश्चात्य विकारों से तो बचने की सलाह देते हैं । लेकिन गाँव में रह रहे अपने कजंस को उसी राह पर चलते देख कर न सिर्फ आँखें बंध कर लेते हैं बल्कि इंसानियत और कानून की दुहाई देने लगते हैं ।

क्या ये दोहरे मांपदंड सही हैं ?