आज महिला दिवस के अवसर पर , एक छोटी सी रचना , नारी के विभिन्न रूपों को समर्पित :
मात पिता को पुत्री
बेटा बन कर संभालती
सेवाभाव में न हारी ,
ऐसी होती है नारी।
कौर बांटे भाई से
त्याग की बने मूर्ती
रहे फ़र्ज़ पर बलिहारी ,
ऐसी होती है नारी।
पति प्रेम में प्रेयसी
समर्पण की है प्रतिमूर्ति
कभी शोला कभी चिंगारी ,
ऐसी होती है नारी।
ममतामयी आँचल की छाया
कोमल अहसास जो बिखेरती
सुख दुःख में वारी ,
ऐसी होती है नारी।
आज के दिन यदि हम अपने रिश्तों को मज़बूत कर सकें , तो शायद यही सच्चा महिला दिवस सैलीब्रेशन होगा।
मात पिता को पुत्री
बेटा बन कर संभालती
सेवाभाव में न हारी ,
ऐसी होती है नारी।
कौर बांटे भाई से
त्याग की बने मूर्ती
रहे फ़र्ज़ पर बलिहारी ,
ऐसी होती है नारी।
पति प्रेम में प्रेयसी
समर्पण की है प्रतिमूर्ति
कभी शोला कभी चिंगारी ,
ऐसी होती है नारी।
ममतामयी आँचल की छाया
कोमल अहसास जो बिखेरती
सुख दुःख में वारी ,
ऐसी होती है नारी।
आज के दिन यदि हम अपने रिश्तों को मज़बूत कर सकें , तो शायद यही सच्चा महिला दिवस सैलीब्रेशन होगा।