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Saturday, July 10, 2010

इश्क कभी किया नहीं ,हुस्न की तारीफ करनी कभी आई नहीं---

आजकल ग़ज़लें लिखने का शौक चढ़ा है दो तीन टूटी फूटी ग़ज़लें लिखी तो लगा कि बन गए ग़ज़लकार । फिर ख्याल आया कि जब तक रोमांटिक ग़ज़ल नहीं लिखी , तब तक असली ग़ज़लकार कैसे बनेंगे । कुछ ब्लोगर मित्रों ने भी उकसाया । बस यहीं मार खा गए । क्योंकि --


इश्क कभी किया नहीं ,हुस्न की तारीफ करनी कभी आई नहींफिर रोमांटिक ग़ज़ल क्या खाक लिखते

ऐसे में जो मन में आया , लिख दिया । भाई तिलक राज कपूर जी के लेख पढ़कर एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की । जब उन्हें सुनाया तो ज़ाहिर है, तकनीक में फेल हो गए । फिर उन्ही से आग्रह किया कि भाई इसका शुद्धिकरण आप ही कर दें । कपूर साहब ने अनुग्रहीत कर चुटकी में ग़ज़ल का रूप बदल सही शक्ल दे दी । प्रस्तुत हैं --यह ग़ज़ल -- दोनों रूपों में ।


पहले प्रेम भाव की अभिव्यक्ति पढ़ें , मूल रूप में


दिल को चुपके से , चुरा गया कोई
हम को हम से ही , मिला गया कोई ।

तन्हा थे हम भी , कितने बरसों से
नज़र मिली तो बस , लुभा गया कोई ।

दिल था सूखा सा , रेता सहराँ में
बरखा बादल बन , करा गया कोई ।

फंसी थी कश्ती , ग़म के भँवरों में
मांझी साहिल तक , तरा गया कोई ।

तम के घेरों में , पा रहे थे सकूं
मन में दीप जला , डरा गया कोई ।

अहं के साये में , जी रहा ` तारीफ`
इश्क के तीर चला , हरा गया कोई ।

अब देखिये और पढ़िए इसका शुद्धिकृत रूप , सही मात्रिक क्रम में ।



दिल में आकर बस जाता है

वो ही अपना कहलाता है।


बरसों से हम सोच रहे थे
पास
कोई* कैसे आता है।


दिल के इस सूखे सहरॉं में

तू बरखा जल बरसाता है।


कश्‍ती जब फँसती देखी तो

मांझी बन तू आ जाता है।


ग़म का जब अंधियार दिखा तो

उजियारा बन तू छाता है।


जब 'तारीफ़' भटकता देखा

राह सही पर वो लाता है ।


*यहाँ कोई को कुई पढ़ा जायेगा ।


अब आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा ।