यदि बुखार हो जाये तो हम तुरंत दवा लेने लगते हैं। लेकिन जब लम्बे समय तक दवा लेने के बाद भी बुखार न उतरे और सारे टेस्ट भी सामान्य आयें तो डॉक्टर सारी दवाएं बंद कर देते हैं और बुखार उतर जाता है। इसे हम ड्रग फीवर कहते हैं।
कुछ ऐसा ही हो रहा है गैंग रेप के विरुद्ध आन्दोलन में। गुंडागर्दी के विरुद्ध आक्रोश का प्रदर्शन करते करते कहीं न कहीं हम स्वयं ही पथ भ्रष्ट हो गए हैं। राजपथ पर होने वाले दैनिक प्रदर्शन में अब असामाजिक तत्वों का प्रवेश हो चुका है। जो आन्दोलन एक पीड़ित को न्याय दिलाने और सुस्त प्रशासन को जगाने के लिए स्वत: आरम्भ हुआ था , अब एक तमाशा बन कर रह गया है। मासूम भीड़ में भेड़िये भी घुस गए हैं। जिस अत्याचार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं , वही स्वयं भी कर रहे हैं। बेशक गैंग रेप की इस घटना का मुख्य कारण दिल्ली की सड़कों पर सुरक्षा की कमी है, लेकिन क्या अकेली पुलिस को दोष देना सही है ? क्या हमें आत्म निरीक्षण नहीं करना चाहिए ?
कारों के शीशे तोड़ना, बसों में आग लगाना , और पब्लिक प्रोपर्टी को हानि पहुंचाकर न्याय नहीं हासिल किया जा सकता। दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर की क्या गलती थी जो भीड़ ने पैरों तले रौंदकर उसकी जान ले ली ? क्या यह वहशीपन नहीं है ? उसे कौन न्याय दिलाएगा ? कितनी ही लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ हो रही है , क्या नज़र नहीं आता ?
अब समय आ गया है , यह पागलपन बंद होना चाहिए। गैंग रेप की पीड़ित युवति अभी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। आवश्यकता है उसकी जिंदगी की दुआ मांगने की। जनता की दुआ में ताकत होती है। डॉक्टर अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में तोड़ फोड़ का खेल छोड़कर हमें सकारत्मक कार्य करते हुए शांति बनाये रखकर ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि इस बहादुर लड़की की जिंदगी बच जाये।

