एक पंजाबी लड़के से एक बुढ़िया ने पूछा --ओये काके तेरे किन्ने बच्चे हैगे ?
लड़के ने कहा --बेबे ए व्ही हैगे कोई पंज सत मुंडे ते पंज सत कुड़ियां ।
बेबे --ओये मरजानिया , तेरा गुजारा किस तरां चलदा ए ? ओये तू करदा की ए ?
लड़का --कुछ नहीं बेबे , हाले ते मैं एही कर रह्याँ ।
यह पंजाबी लतीफ़ा मैंने करीब तीस साल पहले रेडियो पर सुना था ।इसे सुनकर यही याद आता है कि --पहले मुर्गी पैदा हुई या अंडा !
यानि देश की बढती आबादी का कारण बेरोज़गारी है या आबादी की वज़ह से बेरोज़गारी बढ़ रही है ?
कुछ भी हो पर यह काम हम बखूबी कर रहे हैं ।
बस इसी तरह काम करते करते हम १२१ करोड़ की संख्या पार कर गए हैं । अब तो लगता है कि सन २०२५ तक हम चीन को भी पछाड़ देंगे ।
ऐसा अनुमान ही नहीं विश्वास भी है ।
लेकिन विकसित देशों में ऐसा नहीं है । वहां किसी को फुर्सत ही नहीं होती , बच्चे पैदा करने की । बेचारे काम के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि उन्हें बच्चे पैदा करना भी एक बोझ ही लगता है ।
इसी का नतीजा है कि इन देशों में युवाओं की संख्या घटती जा रही है और एजिंग पोपुलेशन बढती जा रही है ।
प्रस्तुत है कुछ साल पहले अख़बार में छपी एक खबर के आधार पर लिखी एक रचना :
पता चला है कि
इंग्लेंड के आदमी और कुत्ते ,
काम में इतना मशगूल हो जाते हैं ,
कि मालिकों की तरह उनके कुत्ते भी,
बच्चे पैदा करना ही भूल जाते हैं।
अब तो ब्रिटिश सरकार को भी ,
ये सत्य सताता है,
कि वहां दोनों प्रजातियों में ,
बच्चे कम, और बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है।
इस विचार से हमारी सरकार तो,
बडी भाग्यशाली है,
क्योंकि यहाँ बच्चे और कुत्ते ,
दोनों के मामले में खुशहाली है।
और इस खुशहाली से ,
सरकार कुछ तो चिंतित नजर आ रही है,
पर ऐसा लगता है कि अमेरिकन सरकार को ,
इसकी चिंता ज्यादा सता रही है।
और जब ज्योर्ज बुश को ,
चिंता ने अधिक सताया,
तो एक वैज्ञानिक आयोग बैठाया,
और उन्होंने पता लगाकर बताया ,
कि धरती पर १.३ मिलियन बिलियन ,
मनुष्य रह सकते हैं।
यानी अभी हम और दो लाख गुना ,
लोगों का बोझ सह सकते हैं।
अब ये जान कर उनकी तो ,
जान में जान आई,
पर उनके सामान्य ज्ञान पर ,
हमको बड़ी हँसी आई।
हमें तो ये बात पहले ही पता थी,
तभी तो हम चैन से जिए जा रहे हैं,
और बेफिक्र होकर बेधड़क,
बच्चे पैदा किए जा रहे हैं।
नोट : साधन सीमित हैं , परिवार भी सीमित रखिये ।
लड़के ने कहा --बेबे ए व्ही हैगे कोई पंज सत मुंडे ते पंज सत कुड़ियां ।
बेबे --ओये मरजानिया , तेरा गुजारा किस तरां चलदा ए ? ओये तू करदा की ए ?
लड़का --कुछ नहीं बेबे , हाले ते मैं एही कर रह्याँ ।
यह पंजाबी लतीफ़ा मैंने करीब तीस साल पहले रेडियो पर सुना था ।इसे सुनकर यही याद आता है कि --पहले मुर्गी पैदा हुई या अंडा !
यानि देश की बढती आबादी का कारण बेरोज़गारी है या आबादी की वज़ह से बेरोज़गारी बढ़ रही है ?
कुछ भी हो पर यह काम हम बखूबी कर रहे हैं ।
बस इसी तरह काम करते करते हम १२१ करोड़ की संख्या पार कर गए हैं । अब तो लगता है कि सन २०२५ तक हम चीन को भी पछाड़ देंगे ।
ऐसा अनुमान ही नहीं विश्वास भी है ।
लेकिन विकसित देशों में ऐसा नहीं है । वहां किसी को फुर्सत ही नहीं होती , बच्चे पैदा करने की । बेचारे काम के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि उन्हें बच्चे पैदा करना भी एक बोझ ही लगता है ।
इसी का नतीजा है कि इन देशों में युवाओं की संख्या घटती जा रही है और एजिंग पोपुलेशन बढती जा रही है ।
प्रस्तुत है कुछ साल पहले अख़बार में छपी एक खबर के आधार पर लिखी एक रचना :
पता चला है कि
इंग्लेंड के आदमी और कुत्ते ,
काम में इतना मशगूल हो जाते हैं ,
कि मालिकों की तरह उनके कुत्ते भी,
बच्चे पैदा करना ही भूल जाते हैं।
अब तो ब्रिटिश सरकार को भी ,
ये सत्य सताता है,
कि वहां दोनों प्रजातियों में ,
बच्चे कम, और बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है।
इस विचार से हमारी सरकार तो,
बडी भाग्यशाली है,
क्योंकि यहाँ बच्चे और कुत्ते ,
दोनों के मामले में खुशहाली है।
और इस खुशहाली से ,
सरकार कुछ तो चिंतित नजर आ रही है,
पर ऐसा लगता है कि अमेरिकन सरकार को ,
इसकी चिंता ज्यादा सता रही है।
और जब ज्योर्ज बुश को ,
चिंता ने अधिक सताया,
तो एक वैज्ञानिक आयोग बैठाया,
और उन्होंने पता लगाकर बताया ,
कि धरती पर १.३ मिलियन बिलियन ,
मनुष्य रह सकते हैं।
यानी अभी हम और दो लाख गुना ,
लोगों का बोझ सह सकते हैं।
अब ये जान कर उनकी तो ,
जान में जान आई,
पर उनके सामान्य ज्ञान पर ,
हमको बड़ी हँसी आई।
हमें तो ये बात पहले ही पता थी,
तभी तो हम चैन से जिए जा रहे हैं,
और बेफिक्र होकर बेधड़क,
बच्चे पैदा किए जा रहे हैं।
नोट : साधन सीमित हैं , परिवार भी सीमित रखिये ।

