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Saturday, January 14, 2012

दिल्ली का दिल --कनॉट प्लेस का सेन्ट्रल पार्क---.

देश का दिल --दिल्लीदिल्ली का दिल --नॉट प्लेस ( सी पी ) । और सी पी का सेंटर --सेन्ट्रल पार्क कभी यह सिर्फ एक पार्क होता था । अब यह एक सांस्कृतिक केंद्र भी है जिसके ओपन एयर थियेटर में तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।

इस के ठीक नीचे है राजीव चौक मेट्रो स्टेशन जहाँ रोज लाखों लोग मेट्रो से इधर उधर होते हैं ।


पालिका पार्किंग में गाड़ी पार्क कर बाहर आते ही भीड़ का एक मेला सा नज़र आता है ।
पार्क में एंट्री के लिए भी लाइन लगानी पड़ती है और सुरक्षा जाँच के उपरांत ही प्रवेश कर पाते हैं ।


ओपन एयर थियेटर ।



दूर नज़र आ रही है सिविक सेंटर की बिल्डिंग --दिल्ली की सबसे ऊंची बिल्डिंग ।



ओपन एयर थियेटर के चारों ओर यह लेक नहीं बल्कि फव्वारे हैं जो उस समय बंद थे ।



प्रष्ठभूमि में बाराखंबा रोड की बिल्डिंग्स।



सर्दियों की सुहानी धूप का मज़ा लेते हुए लोग घास पर ही लेट लगा रहे हैं । लेट कर भी पेट भरपेट नज़र आ रहा है ।



यहाँ हरियाली भी बहुत है ।



नॉट प्लेस का इन्नर सर्कल । गाड़ियों और नर नारियों की भरमार ।



अंग्रेजों के ज़माने में बनाये गए भवनों का हाल ही में नवीनीकरण किया गया है ।



सब उल्टा पुल्टा । कुछ समझ आया ?



इस्कॉन ग्रुप के ये भक्त गर्दन में माइक लगाये गाते और बजाते हुए जनता का मनोरंजन कर रहे थे । थोड़ी देर में जो मज़मा लगा तो पुलिस को आकर इन्हें हटाना पड़ा ।



ये गुब्बारे वाला भी भीड़ का मज़ा ले रहा था ।



यहीं पर हमें एक जीते जागते गाँधी जी के दर्शन हुए । लाठी धोती समेत यह बुजुर्ग बड़े शौक से मुस्कराते हुए फोटो खिंचवा रहे थे ।



विंडो शॉपिंग के लिए सजावट ।



शाम होने लगी तो हम भी चल पड़े पार्किंग की ओर ।



शाम के धुंधलके में एल आई सी की बिल्डिंग --एक अनोखा इंजीनियरिंग मार्वेल

राष्ट्रमंडल खेलों के चक्कर में नॉट प्लेस की अच्छी तरह से मरम्मत की गई है । बेशक अब यहाँ की कायापलट ही हो गई है । रिनोवेशन के बाद पहली बार यहाँ जाना हुआ । सी पी का बदला हुआ स्वरुप बहुत मनभावन लगा ।

लेकिन एक और रियलाइजेशन जो हुआ वो था यहाँ का बदला हुआ वातावरण देख करपहले जहाँ सी पी के सेन्ट्रल पार्क में आवारा , चरसी , सट्टेबाज़ और असामाजिक तत्त्वों का बोलबाला रहता था वहीँ अब यहाँ नई पीढ़ी का साम्राज्य नज़र आया

हमारी उम्र के लोग तो इक्का दुक्का ही नज़र आये । अधिकतर युवा लड़के लड़कियां खुले आम इश्क फरमाते नज़र आ रहे थे ।

७०-८० के दशक में दिल्ली में छेड़खानी की वारदातें बहुत कॉमन थी । इसलिए इस तरह खुला प्रेम प्रदर्शन कोई सोच भी नहीं सकता था । लेकिन अब पब्लिक पार्कों में भी जिस तरह युवा मौज मस्ती करते नज़र आते हैं, और लोग बेपरवाह अपनी धुन में मस्त रहते हैं ,उससे तो यही प्रतीत होता है कि सचमुच ज़माना बदल गया है ।


नोट : सर्दियों के मौसम में नर्म सुहानी धूप का मज़ा लेते हुए सी पी की सेल का फायदा उठाते हुए यहाँ शॉपिंग करने का अपना ही मज़ा है .