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Wednesday, June 3, 2026

अभिलाषा...

 अभिलाषा:

ए ज़िंदगी,

ज़रा आहिस्ता चल।

क्यों बेतहाशा भागती है,

बदहवास दौड़े जाती है।

ज़रा रुक, दम भर तो ठहर,

ऐसी भी क्या जल्दी है।

कुछ आराम कर लूं,

एक आध पड़ाव पार कर लूं,

एक रत्न अवार्ड जेब में धर लूं।

ए आई भी तो अभी आई है,

ज़रा रूबरू तो होने दे।

रईसों की भीड़ में शुमार तो होने दे।

क्यों बेवज़ह दौड़े जाती है,

अरमानों को पीछे छोड़े जाती है।

चल, ज़रूर चल,

पर ज़रा आहिस्ता चल,

ए ज़िंदगी। 

7 comments:

  1. वाह!!बहुत सुंदर सृजन

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  2. हम्म्म ! ग़मों की बारिश सही, ,मद्धम ज़रा आहिस्ता चल। बात तो ठीक ही है।

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  3. ज़िंदगी तो अपनी चाल से ही चलेगी आदमी को और तेज दौड़ना पड़ेगा

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  4. पसंद करने के लिए आप सभी का आभार।

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  5. आहिस्ता
    जिंदगी का सफर

    बहुत खूब

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