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Monday, September 6, 2021

और, और, थोड़ा और --

 


रोज़ सोचते हैं 

कल बदल लेंगे, 

रोज़ थोड़ा और निकल आता है।  

इस और और के चक्कर में,

इंसान का सारा 

जीवन ही निकल जाता है।  


और अनंत है 

असंतुष्टि का घर है, 

किंतु यह बात 

जाने क्यों 

नादाँ इंसान 

समझ नहीं पाता है।  


जो इंसान 

इस और को  

काबू कर संतुष्टि पा ले, 

वही इंसान 

सही मायने में 

सात्विक कहलाता है।   

 

15 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 07 सितम्बर 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(०७ -०९-२०२१) को
    'गौरय्या का गाँव'(चर्चा अंक- ४१८०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. वाकई थोड़े थोड़े मे जीवन निकल जाता है ।

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  4. अलबत्ता कल तो कभी आता नहीं, पर एक कल आज बन कर ऐसा आता है..और सब यहां ही धरा का धरा रह जाता है !

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  5. बहुत बहुत सुन्दर सटीक व सराहनीय रचना |

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  6. शब्दशः सत्य ।

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  7. जी सही दृष्टि, बुद्ध बनने के लिए दृढ़ता से अंदर उतर कर अवलोकन आवश्यक है।
    यथार्थ रचना।

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  8. ये कल ही तो नहीं आता । रोज़ रोज़ करते वक़्त निकल जाता है ।
    बेहतरीन रचना ।

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  9. बहुत ही सुंदर और सटीक रचना!

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  10. पसंद करने के लिए आप सभी का बहुत बहुत आभार।

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  11. ये कल ही तो नहीं आता । रोज़ रोज़ करते वक़्त निकल जाता है । बेहतरीन रचना ।
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