Wednesday, July 22, 2009

सीधे दिल से ---

९ जुलाई की शाम एक अलबेली शाम थी. उस दिन मेरा मिलने का प्रोग्राम था उन सज्जन से जिन्हें अब तक मैंने इन्टरनेट पर ही देखा और पढ़ा था. श्री समीर लाल जी न सिर्फ हिंदी ब्लॉग जगत के एक जाने माने ब्लोगर हैं बल्कि हर नए ब्लोगर को हमेशा प्रोत्साहन देते रहे हैं जिनमे से एक मैं भी हूँ. इसलिए ऐसे व्यक्ति के प्रति उत्सुकता उत्तपन होना तो स्वाभाविक था. अतै जिस समय मैं टोरंटो जाने का प्रोग्राम बना रहा था, उसी समय ये ये विचार मन में आया की मुझे उनसे ज़रूर मिलना चाहिए .



टोरंटो पहुचने पर पता चला की उनका निवास तो हमसे बहुत करीब था. और बस बात हुई और मामला तय.



किसी अजनबी से मुलाकात मेरे लिए तो एक नयी बात थी. इसलिए मन में थोडा कोतुहल था. घर ढूँढने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई. उन्हें घर के द्वार पर ही इंतज़ार करते पाया. और सच मानिए, घर से पहले हमने घर के मालिक को पहचान लिया. और उन्हें पहचान कर लगा की सही घर पर आ चुके हैं.



कार से उतारते ही लाल साहब ऐसे गले मिले जैसे बरसों से बिछडे दो दोस्त मिल रहे हों. हमें भी ये बिलकुल नहीं लगा की हम पहली बार मिल रहे हैं. यही तो फायदा है आजकल की संचार सुविधाओं का की सब दूरियां ख़त्म हो गयी हैं, बसरते की दिलों में दूरियां न हों.

तो भाई, लाल साहब के शानदार और करीने से सजाये गए महमान कक्ष में कुछ पल औपचारिकताओं के बिताने के बाद हम उनके आरामदायक एवम खूबसूरत फॅमिली लाउंज में आसीन हो गए. उसके बाद जो बातों और कविताओं का दौर शुरू हुआ तो कब तीन घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला.



बातों बातों में पता चला की जिस बात पर हमारे यहाँ पति पत्नी में अक्सर झगडे होते हैं, उसी को लाल साहब खूब एन्जॉय करते हैं. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ टी वी पर प्राइम टाइम पर आने वाले सास बहु के सीरिअल्स की, जिसकी वजह से पति लोग ११ बजे से पहले घर आने से डरते हैं. लेकिन पति पत्नी प्रेम का एक अच्छा उदाहरण मैंने वहां देखा क्योंकि जिस वक्त मिसेज लाल सीरिअल देख रही होती है उस वक्त मिस्टर लाल अपने ब्लॉग पर बैठ जाते हैं और इस तरह दोनों साथ बैठकर एक दुसरे के सामीप्य का लुत्फ़ उठाते हैं. मैं समझता हूँ की ये सभी पति पत्नी के लिए एक अच्छा सबक है जिंदगी का भरपूर आनंद उठाने का विशेषकर जिनके बच्चे बड़े होकर अपने काम धंधे पर लग गए हों.



हमारी छोटी सी महफ़िल पूरे शबाब पर थी पर घर से फ़ोन से पता चला की रात के १२ बज चुके हैं. खैर अनमने भाव से सभी डिनर के लिए उठे क्यांकि सभी को बहुत आनंद आ रहा था. लेकिन डिनर भी तो अपने आप में एक अनुभव था . मिसेज लाल ने इतना स्वादिष्ट और लज़ीज़ खाना बनाया हुआ था की हम तो उंगलियाँ चाटते रह गए. घर से २०,००० किलोमीटर दूर शुद्ध शाकाहारी हिन्दुस्तानी खाना खाकर तृप्ति हो गयी. शायद यही हम भारतियों की खूबी है की हम कहीं भी रहें अपनी संस्कृति और परंपरा को नहीं भूलते.


लाल दंपत्ति से मिलकर यही लगा की हमारे अप्रवासी भारतीय मित्र कहीं न कहीं हम स्वदेश में रहने वालों से ज्यादा भारतीय हैं. शायद अपनेपन की क़द्र वही जानते हैं जो अपनों से दूर रहते हैं. यहाँ दिल्ली में रहकर हम कितने स्वकेंद्रित हो गए हैं, इसका अंदाजा आप मेरी एक कविता की इन चाँद पंक्तियों से लगा सकते हैं:



मेरी दिल्ली मेरी शान,


पर कैसी दिल्ली, कैसी शान


यहाँ पडोसी पडोसी अनजान


पर ऊपर सबकी जान पहचान


झूठी आन बान,


शान बने वी आई पी महमान


और तेरी गाड़ी मेरी गाड़ी से बड़ी कैसे,


सब इस बात से परेशान


फिर भी मेरी दिल्ली मेरी शान.



विदेश में रहकर भी श्री समीर लाल पूर्ण रूप से शुद्ध भारतीय हैं. यहाँ घटित होने वाली सभी घटनाओं से वे भली भांति परिचित रहते हैं. उनकी भारतीयता और देश प्रेम देखकर तो नतमस्तक होने का दिल चाहता है. उनको शत शत प्रणाम.



सम्बंधित लेख कृपया यहाँ भी देखें:


उड़नतश्तरी.ब्लागस्पाट.कॉम १३ जुलाई



नोट: की की त्रुटी मेरी नहीं कंप्यूटर की है.

8 comments:

  1. सुन्दर! मजेदार संस्मरण!

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  2. badhaai ho taral saheb,
    sachmuch ..aapki bhent atyant pyaari aur bhaavbhini rahi hogi.........ye apne lal saaheb hain hi badi pyaari cheej.......

    badhaai !

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  3. Dilchasp sansamaran..Samir lal ji Hindi Blog men naye pratiman sthapit kar rahe hain.

    मेरे ब्लॉग "शब्द सृजन की ओर" पर पढें-"तिरंगे की 62वीं वर्षगांठ ...विजयी विश्व तिरंगा प्यारा"

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  4. लाल दंपत्ति से मिलकर यही लगा की हमारे अप्रवासी भारतीय मित्र कहीं न कहीं हम स्वदेश में रहने वालों से ज्यादा भारतीय हैं. शायद अपनेपन की क़द्र वही जानते हैं जो अपनों से दूर रहते हैं. यहाँ दिल्ली में रहकर हम कितने स्वकेंद्रित हो गए हैं, इसका अंदाजा आप मेरी एक कविता की इन चाँद पंक्तियों से लगा सकते हैं:
    मेरी दिल्ली मेरी शान,
    पर कैसी दिल्ली, कैसी शान

    यहाँ पडोसी पडोसी अनजान
    पर ऊपर सबकी जान पहचान

    झूठी आन बान,
    शान बने वी आई पी महमान

    और तेरी गाड़ी मेरी गाड़ी से बड़ी कैसे,
    सब इस बात से परेशान

    फिर भी मेरी दिल्ली मेरी शान.

    आपके विचार से हालातों को देखकर सहमत होना ही पड़ेगा, किन्तु आर्श्चय इस बात पर कि जो संस्कार हम अपने देश में रह कर त्याग रहे हैं वही संस्कार विदेशों में रह रहे भारतीय बखूबी निभा रहे हैं.......
    कितना बदल गया देश में देश का इन्सान
    "संस्कार-झलक" परदेश में पा रहा इन्सान
    फिर भी समवेत गाते रहे मेरा भारत महान

    मिलन और यात्रा के बहाने ही सही एक उच्च स्तरीय विषय पर प्रश्न उठाने का हार्दिक आभार.

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  5. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मैं ऑस्ट्रेलिया में रहती हूँ ज़रूर पर भारतीय हूँ और जमशेदपुर में पली बड़ी हूँ इसलिए लिखने का शौक रखती हूँ!
    बहुत बहुत बधाई! दिलचस्प और मज़ेदार संस्मरण!

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  6. bahut achcha laga samir ji ke baare me padhkar....
    kash indiya me bhi sb isi tarah....

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  7. mere blog par bhi aapni amulya tipdi den...

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  8. आपने सही कहा..श्री समीर लाल जी न सिर्फ हिंदी ब्लॉग जगत के एक जाने माने ब्लोगर हैं बल्कि हर नए ब्लोगर को हमेशा प्रोत्साहन देते रहे हैं...मैं भी उन्हीं में से एक हूँ और उनके दिल्ली प्रवास के दौरान उनसे मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ था ...

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