Thursday, August 23, 2018

बारौठी , एक हरियाणवी रिवाज़ जो अब लुप्त हो गई है ---


बारौठी :

शहर और हरियाणवी गांवों की शादियों में बहुत अंतर होता है। हालाँकि अब शहरों में रहने वाले हरियाणवी लोग भी गांव की रीति रिवाज़ों को छोड़ कर शहरी ढंग से शादियां करने लगे हैं। लेकिन यू एस से आये लड़के के परिवार को सांकेतिक रूप में सब रीति रिवाजों को निभाने की इच्छा थी।  इसलिए शहर के परिवेश में पारम्परिक रूप से सभी रस्में निभाई गईं।  फिर भी एक रिवाज़ रह गई जिसे बारौठी कहते हैं क्योंकि इसके लिए गुंजाईश ही नहीं थी। आइये बताते हैं कि बारौठी क्या होती थी :

पुराने ज़माने में लड़का और लड़की शादी से पहले ना तो एक दूसरे से मिल पाते थे , और ना ही देख पाते थे।  जो घर के बड़ों ने तय कर दिया, वही मंज़ूर होता था। लेकिन शादी के दिन बारात आने के बाद सबसे पहला काम यही होता था कि लड़का लड़की एक दूसरे को देख लें और स्वीकृति प्रदान कर दें।  हालाँकि यह भी केवल सांकेतिक रूप में और औपचारिकता निभाने के लिए ही होता था क्योंकि आज तक हमने कभी नहीं सुना कि किसी ने किसी को शादी वाले दिन देखकर नापसंद किया हो।  दूल्हा बैंड बाजे के साथ दुल्हन के घर जाता था , जहाँ उसे द्वार पर रोक दिया जाता था।  सामने दुल्हन के घर की सभी महिलाएं स्वागत में खड़ी होती थी और दूल्हे के पीछे एक चादर तान दी जाती थी ताकि बाकि सब लोग न देख पाएं।  इसी बीच अचानक चुपके से दुल्हन आकर एक झलक दूल्हे की देख लेती थी।  अक्सर दूल्हे को पता भी नहीं चलता था कि लड़की कब देखकर चली गई।  लड़की दूल्हे पर चावल के कुछ दाने फेंककर घर के अंदर चली जाती थी।  इसका मतलब यह होता था कि दुल्हन ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी।  इसके बाद दूल्हा घर में प्रवेश करता था जहाँ उसे एक चारपाई पर बिठाकर घर की औरतें मिठाई खिलाकर दूल्हे का मुंह मीठा कराती।  इस तरह स्वीकृति के बाद बाकि सब रस्में बाद में निभाई जाती थी।

लेकिन शहरों में यह रिवाज़ निभाना संभव ही नहीं हो सकता क्योंकि पंडाल के द्वार पर घर के सब लोग बारात और दूल्हे का स्वागत करते हैं और दूल्हा सीधा स्टेज पर पहुँच जाता है जहाँ थोड़ी देर बाद दुल्हन भी पहुँच जाती है। वैसे भी आजकल या तो लड़का लड़की पहले से ही एक दूसरे को जानते हैं या आयोजित (अरेंजड मैरिज) में भी प्रेमालाप (कोर्टशिप) से अच्छी जान पहचान हो जाती है। अब तो शादी से पहले लड़का लड़की मिलकर अपनी विवाह पूर्व (प्री मेरीज) फिल्म भी बनवाने लगे हैं। इसलिए सभी हो हल्ले के बीच एक यही रिवाज़ है जो अब देखने में नहीं आती।   

5 comments:

  1. आज की पोस्ट डॉक्टर अमर की स्मृति में जिनकी आज पुण्यतिथि है।

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, छाता और आत्मविश्वास “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-08-2018) को "जीवन अनमोल" (चर्चा अंक-3074) (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. रोचक जानकारी

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