Monday, August 31, 2009

क्या हमेशा सच बोलना चाहिए ?????

एक सर्द रात में
घर पे फोन आया
बेटे ने उठाया
मैंने पूछा, बेटा कौन था
बोला उसी आंटी का फोन था
जो फोन पर भी मचाती है शोर
और घंटों करती है बोर


मैंने पूछा, क्या फरमा रही थी
बोला, मम्मी को बुला रही थी
मैंने बोल दिया, मम्मी बिजी हैं
रजाई में बैठी, हीटर पे हाथ सेक रही हैं
और दो घंटे से, एक के बाद एक
सास बहु के सीरिअल देख रही हैं

मैंने कहा, सही कहा भय्ये
हमेशा सच बोलना चाहिए

इस पर वो बोला
फ़िर वो कहने लगी
पापा को ही बुला दो
वो क्या कहीं कविता सुना रहे हैं
मैंने कहा आंटी, वो भी बिजी हैं
किचन में रोटियां बना रहे हैं

मैंने कहा, बेटा थोड़ा दिमाग का
इस्तेमाल कर लिया होता
अच्छा होता, यदि कोई और
बहाना लगा दिया होता

बेटा बोला, आप भी कमाल करते हैं
कभी कुछ, कभी कुछ कहते हैं
अभी अभी तो आपने बोला
हमेशा सच बोलना चाहिए !!!!

उसकी बात सुनकर मैं सोचने पर मजबूर हो गया, क्या वास्तव में हमें हमेशा सच बोलना चाहिए ?
क्या किसी की इज्ज़त बचाने को, मान रखने को, या खुशी प्रदान करने को , कभी कभी झूठ बोलना भी सही है?
हम डॉक्टर्स की जिंदगी में तो ऐसे लम्हे अक्सर आते रहते हैं, जब हमें बुद्धिमता का प्रयोग करते हुए , मरीज़ की भलाई की खातिर , कभी कभी झूठ बोलना पड़ता है। पर आम जिंदगी में भी क्या कभी सच न बोलना सही हो सकता है ?
ज़रा सोचियेगा और अपने विचार ज़रूर बताइयेगा।

Wednesday, August 26, 2009

नायग्रा---



अमेरिकन झरना उस पार
कनाडियन झरना ऊपर से






पुल आर पार












आस पास का नज़ारा








यह भी





चलो शो ख़त्म हुआ

Wednesday, August 19, 2009

कब खुलेंगी आँखें ?

दृश्य १:



साफ़ और चिकनी सतह वाली चौड़ी सड़कें, अपनी लेन में चलती एक से एक बड़ी कारें, कहीं कोई धुआं नहीं, न प्रदुषण, न किसी हार्न की आवाज़, न कोई यातायात के नियमों का उल्लंघन, रिहाईशी एरिया में चौराहे पर न कोई लाल बत्ती।






यह दृश्य है विकसित देश के एक शहर का, जहाँ हर पैदल आदमी एक वी आई पी है, जिन्हें देखकर गाडियाँ अपने आप उक जाती हैं।जहाँ चौराहे पर पहले आप, पहले आप के सिद्धांत का पालन किया जाता है।







दृश्य २:

टूटी फूटी सड़कें, जगह जगह खुदाई, कहीं आधा अधुरा निर्माण कार्य जो पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा, जबकि कॉमनवैल्थ गेम्स अब ज्यादा दूर नहीं. ट्राफिक में घुसी साइकलें, साइकल पर लदे तीन तीन गैस के सिलेंडर, जिग जैग दोड़ती मोटरसाइकलें, मोटरसाइकल पर दूध के ड्रम, साइकलरिक्शा, ऑटोरिक्शा, घोडागाडी, बैलगाडी, या बिना गाड़ी के बैल और गाय भैंसें , छोटे ट्रक, मोटे ट्रक, और इन सबके बीच में चिनघाद्ती, सरपट दोड़ती, मरती मारती ब्लूलाइन बसें.

यह हाल है भारत की राजधानी दिल्ली की सड़कों का। अब सड़कों का निर्माण तो शायद सरकार किसी तरह पूरा करा लेगी अगले साल तक लेकिन जनता में अनुशासन कहाँ से लायेंगे। हम दिल्ली वाले तो यातायात के नियमों का पालन करने में अपनी तौहीन मानते हैं. यहाँ रोंग साइड से ओवेर्टेक करना सही माना जाता है. आधे ड्राइवर तो ऐसे हैं की हार्न पर हाथ रख कर ही चलते हैं. और अगर आपने नहीं सुना तो ऐसे देखते हैं जैसे अंखियों से गोली मार देंगे.

सबसे खतरनाक ड्राइविंग करते हैं, मोटरसाइकल वाले. हेलमेट को हाथ में टांग, जो स्पीड दिखाते हैं, और हवा में बाल लहराते हैं, तो शायद वो सोचते होंगे की सारी कुंवारियों के दिल मचलकर उन्हीं पर आ गए हैं. दिल्ली वालों की एक और आदत है की रस्ते चलते गाड़ी में से कुछ भी सड़क पर फैंक देते हैं, जैसे. सड़क उनके पिताश्री की हो. अगर हो भी तो क्या सफाई उनके पिताश्री करेंगे? यानी सिविक सेंस तो है ही नहीं.
लेकिन सबसे गन्दी आदत लगती है, जब कोई सेठ सा दिखने वाला गाड़ी का शीशा नीचे करता है, और मुहँ से पूरा एक पाव, गधे की लीद जैसा, पान का अवशेष सड़क पर उगल देता है. यह सीन देखकर मुझे तो लगता है की इनसे तो गधे ही अच्छे, कम से कम वो ये काम मुहँ से तो नहीं करते.

दिल्ली वालों की ट्रैफिक सेंस देखकर मुझे एक पुरानी घटना याद आती है। एक बार दिल्ली की ट्रैफिक पुलिस ने सोचा की हमें पब्लिक में अपनी छवि सुधारनी चाहिए। तो इसके लिए तय हुआ की , एक शिष्टाचार सप्ताह मनाया जाये जिसमे पुलिस के सभी सिपाही जनता को श्रीमान जी कहकर बुलायेंगे। एक दिन एक चौराहे पर एक स्कूटर वाला जब आदत अनुसार स्टाप लाइन से आगे जा रुका तो वहां खड़े कांस्टेबल ने कहा -श्रीमान जी पीछे हो जाइए। बन्दे ने सुना ही नहीं और वहीँ खडा रहा। थोडी देर बाद पुलिस वाले ने फिर कहा -श्रीमान जी पीछे हो जाओ। लेकिन श्रीमान जी तो ठेठ दिल्ली वाले थे, कहाँ सुनने वाले थे. जब और थोडी देर तक स्कूटर वाला पीछे नहीं हटा तो उस हरयाणवी पुलिस वाले के सब्र का बाँध टूट गया और वो अपनी पर आकर बोला --अरै ओ श्रीमान जी के बच्चे, सा * * पाच्छे न होजा, न तै दिखै सै यो डंडा.कहने की जरूरत नहीं, इस बार स्कूटर वाला पीछे हो गया.

इसी तरह की एक घटना मेरे साथ पिछले साल हुई. इस बार ट्रैफिक पुलिस ने सोचा की दिल्ली वाले ट्रैफिक के नियमो का कितना उल्लंघन करते हैं , ये जानना चाहिए. तो हुआ यूँ की एक विशेष दिवस पर ट्रैफिक विभाग ने अपनी सारी पुलिस फोर्स एक ही रूट पर लगा दी और निर्देश दिए गए की आज किसी को भी नहीं छोड़ना है. जो भी यातायात के नियमों का उल्लंघन करेगा, उसका चालान ज़रूर कटेगा. अब अपनी किस्मत देखिये की उस दिन किसी ज़रूरी काम से मुझे ३० किलोमीटर दूर जाना पड़ा. अमर्जंसी थी इसलिए मैंने भी अंधाधुंध गाड़ी दौडाई. अगले ही दिन मेरे पास ट्रैफिक पुलिस का चालान आ गया ,जिसमे लिखा था--श्रीमान , आपने निम्नलिखित यातायात के नियमों का उल्लंघन किया है , जिसका विस्तृत विवरण इस प्रकार है :रेड लाईट जम्पिंग ---३० बार स्टाप लाइन क्रोसिंग --२० बार ओवरस्पीडिंग ----------४० बार टॉकिंग ओंन मोबाइल --१० बार रेड लाईट पर हार्न बजाना ---५० बार रोंग साइड से ओवरटेकिंग ---१० बार सीट बेल्ट नहीं लगाना -----३० बार
नियमित दर से कुल जुर्माना राशिः हुई --५०००० रूपये और एक ही दिन में इतने उल्लंघन करने के लिए विशेष जुरमाना --१००००इस तरह कुल राशिः --६०,००० रूपये नीचे लिखा था ,यदि आपने ये राशिः ९ अप्रैल तक जमा नहीं करायी तो हाई कोर्ट के आदेश अनुसार हर जुर्म पर ५०० रूपये अतिरिक्त लगकर ये राशिः हो जायेगी --१५०,००० रूपये. अब ये पढ़कर मेरे तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी. पसीना आ गया , हाथ कांपने लगे और शायद हार्ट अटैक ही आ जाता की, तभी मेरी आँख खुल गयी और मैंने जाना अरे ये तो सपना था !अब इस सपने से मेरी आँख तो खुल गयी, पर दिल्ली के दोस्तों आपकी कब खुलेगी ?ज़रा सोचियेगा ज़रूर.

Saturday, August 15, 2009

जय हिंद

आज हम भारत की स्वतंत्रता की ६२ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। इस अवसर पर मैं सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई एवम शुभकामनायें देता हूँ। मित्रो आज हम याद करते हैं उन नेताओं को, वीर सैनिकों को, और देश के उन शहीदों को , जिन्होंने हमारे सुनहरे भविष्य के लिए अपना वर्तमान देश पर न्यौछावर कर दिया। जिनके खून से सींचकर हमें ये आज़ादी मिली , आज दिन है उनको श्रधांजलि देने का तथा साथ ही प्रण करने का कि हम उनके द्वारा किए गए बलिदान को व्यर्थ न होने देंगे और देश की आज़ादी और एकता को बनाये रखेंगे।

दोस्तों, अंग्रेजों से तो भारत आजाद हो गया लेकिन अभी भी कई गुलामी की जंजीरें है जो हमें जकडे हुए हैं।

अभी देश को आजाद कराना है --

मंहगाई ,प्रदुषण और भृष्टाचार से ,
युवाओं के बदलते आचार और व्यवहार से।

आतंकवाद और अलागवाद से,
सीमाओं के विवाद से।

जात पात के झगडों से,
धर्म के लफडों से।

बेहिसाब बढती आबादी से,
पर्यावरण की बर्बादी से।

गरीबों को कुपोषण से,
शरीफों को शोषण से।

अभी तो आज़ादी दिलानी है ---

भूखों को भूख से,
घूसखोरों को घूस से।

देश को नकली नोटों से,
चुनावों को फर्जी वोटों से।

गंगा-यमुना को गंदगी से,
बाल मजदूरों को बंदगी से।

अभी तो हाथ में जाम है, पर यारों कितने काम हैं।
किसी ने ठीक ही कहा है,
दा वुड्स आर लवली, डार्क एंड डीप,
बट आई हैव प्रोमिसिस तो कीप ,
एंड माइल्स टू गो , बिफोर आई स्लीप।
माइल्स टू गो , बिफोर आई स्लीप।
जय हिंद !


Sunday, August 9, 2009

जानिए, कहीं आप मोटापे के शिकार तो नहीं --

बड़े खाते पीते घर का लगता है.
या फिर, बड़ा हैल्दी है.कुछ इसी तरह की बातें सुनने को मिलती हैं, किसी मोटे आदमी को देखकर.
आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग है जो मोटा होने को तगड़ा होना समझतेहैं और पतला होने को कमजोर होना.
लेकिन जो लोग मोटापे के शिकार होते हैं, ज़रा उनसे पूछ कर देखिये की उनके दिल पर क्या बीतती है. तो आइये देखते है की मोटापा किसे कहते है और चलिए इसी बहाने अपना भी निरीक्षण हो जायेगा.

मोटापा क्या है?

यूँ तो हमारे शरीर में १८-२३ % फैट यानि चर्बी होती है, लेकिन यदि चर्बी की मात्र इससे ज्यादा बढ़ जाये तो इसे ओबेसिटी या मोटापा कहते हैं. वैसे तो चर्बी हमारे शरीर में त्वचा के नीचे और पेट के अन्दर मौजूद रहती है और एक रक्षा कवच का काम करती है. यह एक अच्छा ऊर्जा श्रोत भी है. लेकिन जरूरत से ज्यादा होने पर मुसीबत की जड़ भी बन सकती है.
पुरुषों में एक्स्ट्रा फैट का जमाव पेट और कमर के इर्द गिर्द होता है, इसलिए ऐसी फिगर को एप्पल शेप्ड कहा जाता है. महिलाओं में यह हिप्स और जांघों पर जमा होता है, इसको पीअर शेप्ड कहते हैं.

मोटापे से क्या हानियाँ हो सकती हैं?

मोटापे से न सिर्फ हमारे शरीर पर एक्स्ट्रा बोझ रहता है जो हमें ढोना पड़ता है बल्कि तरह तरह की बीमारियाँ होने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इनमे प्रमुख हैं :
डायबिटीज़ यानि मधुमेह
उच्च रक्त चाप
कॉलेस्ट्रोल का बढ़ना
हार्ट अटैक की सम्भावना
स्ट्रोक
इन भयंकर बीमारियों के इलावा अधिक वज़न वाले व्यक्तियों को अक्सर जोडों में दर्द ,विशेषकर गुटनों में ,
पित की थैली में पथरी और साँस का फूलना जैसी तकलीफें भी होने लगती हैं.

कैसे पता करें की आप मोटे तो नहीं?

१. सबसे आसान तरीका : कमर का नाप
पुरुषों में ४० इंच और महिलाओं में ३५ इंच से ऊपर खतरे की घंटी बजनी चाहिए .
अगर आपकी कमर का नाप इससे ऊपर है तो आप हाई रिस्क के दायरे में है.

२. हाईट और वेट :
अपनी हाईट को सेंतिमेटर में नापें और उसमे से १०० घटा दें. यह आपके नार्मल वेट की उप्परी सीमा है.
यानि अगर आपकी हाईट १७० सीएम है तो १०० घटाने पर आया ७०.
यदि आपका वज़न ७० केजी से ऊपर है तो आप ओवरवेट हैं.

३. वेस्ट / हिप रेशो :
आपके कमर के नाप और हिप्स के नाप का अनुपात एक अच्छा तरीका है.
इसके लिए कमर के नाप को हिप्स के नाप से विभाजित करिए.
यह अनुपात महिलाओं में ०.८ और पुरुषों में १.० से कम होना चाहिए.
इससे ज्यादा का मतलब है की आप को संभलने की ज़रुरत है.
४. सबसे बढ़िया तरीका है बी ऍम आई यानि बोडी मास इंडेक्स .
इसको निकालने का तरीका है :

वज़न (किलोग्राम)/ हाईट (वर्ग मीटर )
उदहारण :
मान लीजिये आपका वज़न ७० किलोग्राम है और आपकी हाईट १.७० मीटर है.
तो आपका बी ऍम आई हुआ
७०/ १.७ x १.७ = २४.२
आइये अब देखते हैं की नोर्मल बी ऍम आई कितनी होती है ?
१९ से २५ --नोर्मल
२५ से ३० --ओवरवेट
३० से ज्यादा ---ओबीज यानि मोटापा
तो भाई अगर आपकी बी ऍम आई ३० से अधिक है तो इसका मतलब ये हुआ की आपकी हालत गालिब जैसी है की:
मुफ्त की पीते थे लेकर और जानते थे
की रंग लाएगी अपनी फाकामस्ती एक दिन
और अगर ४० से ऊपर है तो फिर आप एक ऐसे अटम बम पर बैठे हैं जिसकी चाबी एक आतंकवादी के हाथ में है. न जाने कब उसकी खोपडी घूम जाये और ---

क्या है इसका उपाय?

दोस्तों यदि आप मोटापे के शिकार है तो घबराइये नहीं. आज से ही सेहत पर ध्यान देना शुरू करदें. वजन घटाने के दो ही तरीके हैं :
१. डाईटिंग यानि खाने पर कंट्रोल
२. शारीरिक गतिविधियाँ बढ़ाना यानि व्यायाम

डाईटिंग का मतलब भूखा रहना नहीं है. इसका मतलब है की आप खाने में ऐसे पदार्थ खाएं जिनसे कैल्रीस कम मिलें जैसे की हरी सब्जियां, सलाद , डालें वगरह.
मोटापा कम करने के लिए घी और मीठे से बनी चीजों का सेवन कम से कम करना चाहिए.
जितना खाना आप रोजाना खाते है, उससे थोडा कम खाइए.
दिन में कम से कम तीन बार भोजन करिए लेकिन थोडी मात्र में.
जंक फूड्स से बचिए.
खाने की प्लेट भरने से सोचिये की देश में कितने लोग भूखे सोते हैं.

व्यायाम :

अक्सर देखने में आता है की हम १०० मीटर दूर मार्केट जाने के लिए भी कार का इस्तेमाल करते हैं.
एक या दो फ्लोर चढ़ने के लिए लिफ्ट का प्रयोग करते हैं.
सच पूछिए तो ये ऐशो आराम की जिंदगी ही हमारी सबसे बड़ी दुश्मन है.
इसलिए दोस्तों जहाँ तक हो सके थोड़े हाथ पैर ज़रूर हिलाइए.

याद रखिये की ५ से १० % तक भी वजन का घटना बहुर लाभदायक हो सकता है.
यह कतई ज़रूरी नहीं की आपका वजन आइदिअल हो. इसलिए आज से ही शुरू हो जाइए और देखिये बीमारियाँ आपसे कैसे दूर भागती हैं.

मंडे की मंडी पर मंदी की मार

एक् सुबह जब हमने अखबार उठाये

हैद्लाइन्स पढ़कर मन ही मन मुस्कराए.

लिखा था,

महंगाई दर शून्य से नीचे चली जा रही है

हमने सोचा, मतलब

मंदी की मार में कमी आ रही है.

मैंने खुश होकर पत्नी से कहा,

देखो, सावन की काली घटा चढी है

ज़रा कुछ चाय पकोडे खिलाओ.

पत्नी बोली, टोकरी खाली पड़ी है

पहले सब्जियाँ खरीदकर लाओ.

आज लगती है मंडे की मंडी

सब्जियां मिलती हैं वहां सबसे मंदी.

तो भई मन में पकोडों की तस्वीर बनाये

हम चल दिए मंडी थैला उठाये.

मंडी में जब मैंने नज़र घुमाई

और फूल सी फूलगोभी नज़र आई.

तो मैंने सब्जीवाले से पूछा

भैय्या गोभी क्या भाव ?

वो बोला १५ रूपये

मैं ने पुछा, किलो ?

वो बोला नहीं, पाव.

ये सुनकर हमतो झटका खा गए

३४००० फीट से सीधा, धरा पर आ गए.

फिर शर्माए से बोले,

अच्छा बीन्स का रेट बतलाओ

वो बोला, ये भी १५ में ले जाओ.

मैंने पूछा,

क्या आज सारी सब्जियां १५ रूपये पाव हैं ?

वो बोला नहीं, ये १०० ग्राम का भाव है।

सब्जियों का रेट सुन मन हिम्मत खोने लगा

उधर अपनी आई क्यु पर भी शक होने लगा।

इसी उधेड़बुन में हमें

हरे हरे से नींबू नज़र आ गए

लेकिन हम तो वहां भी चक्कर खा गए.

मैंने साहस बटोरकर कहा,

बस इनका रेट और बतला दो

वो खीजकर बोला,

बहुत हो गया बाबूजी , अब कुछ ले भी लो

अच्छा चलो, २५ के ढाईसौ ले जाइए

मैंने कहा भाई, मुझे तो बस ५ ही चाहिए।

बाबूजी, इतने में कैसे काम चलेगा

५ ग्राम में तो एक टिंडा भी पूरा नहीं चढेगा.

अब हम समझे,

सब्जीवाला तो शोर्टकट मार रहा था,

पर अपनी तो इज्ज़त उतार रहा था।

अब तो हम मन ही मन बड़े शर्मिंदा थे,

क्योंकि अब समझ चुके थे

की वो नींबू नहीं टिंडा थे.

फिर भी इज्ज़त तो बचानी थी

इसलिए जिद भी दिखानी थी.

सो अकड़कर कहा, मुझे तो पांच टिंडे ही चाहिए

२५ रूपये लेकर वो बोला,

ठीक है, ले जाइए.

मैंने महंगाई को कोसा,

फ़िर मन ही मन सोचा

भई पांच रूपये का मिला एक टिंडा !

अरे ये टिंडा है या,

शतुरमुर्ग का अंडा.

खैर कुछ अदरक, धनिया, आलू, टमाटर

और मटर की छोटी छोटी पोटलियाँ बनवाकर.

जब घर पहुंचे तो पत्नी बोली

ये क्या, खली पड़ी है सारी झोली.

अजी सब्जियां खरीदने गए थे,

ये क्या लेकर आये हैं?

मैंने कहा भाग्यवान,

रूपये तो बस ५०० लेकर गए थे

हमारी सौदेबाजी देखिये,

फिर भी पूरे ५० बचाकर लाये हैं.

प्रिये

मंडे की मंडी पर,

पड़ गई है मंदी की मार

इसलिए सब्जियां खरीदने को अगले मंडे

रूपये देना पूरे हज़ार।

भले ही महंगाई दर शून्य से नीचे ढह गई है,

लेकिन सब्जियाँ अब केवल दर्शनार्थ रह गयी हैं