वही लाल किला , जिसके लिए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज को ललकारा था -चलो दिल्ली।
जहाँ आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिक पहुंचे तो सही , लेकिन कैदी बनकर , और उनपर मुकदमा चला । लेकिन सबको बरी कर दिया गया इस शर्त के साथ कि उनको आज़ाद हिंद की सेना में नहीं रखा जायेगा ।
यहीं से स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु ने १५ अगस्त १९४७ को ,स्वतंत्र भारत का तिरंगा पहली बार फहराया और देश को संबोधित किया ।
यहीं से हर साल देश के प्रधान मंत्री १५ अगस्त को ध्वज फहराकर देश को संबोधित करते हैं।
इतेफाक ही है कि इसी लाल किले को हमने पहली बार कुछ ही साल पहले देखा । पिछले महीने दूसरी बार जाने का अवसर मिला सबके साथ ।
प्रस्तुत है --लाल किले का भ्रमण , आपके लिए सचित्र ।
पूरब में रिंग रोड और यमुना नदी --पश्चिम में चांदनी चौक और जामा मस्जिद । यहाँ तक पहुँचाने के लिए आप दरियागंज से होते हुए जायेंगे ।
दरिया गंज से लाल किले की ओर ।चांदनी चौक के सामने चौराहे से जाते हैं किले की ओर ।
इसके बाएं तरफ से प्रवेश द्वार से होकर , जहाँ सुरक्षा जांच के बाद आप पहुँच जाते हैं एक और प्रवेश द्वार पर जहाँ से एक गलियारे से होते हुए आप पहुंचेंगे इस प्रांगन में , जहाँ नज़र आएगा --दीवाने आम ।
दीवाने आम --जहाँ बादशाह जनता के दर्शन के लिए बैठते थे ।
सामने दिख रहा है वो छतरी नुमा प्लेटफोर्म जहाँ बादशाह का सिंघासन होता था । इसके चारों ओर स्वर्ण ज़डित रेलिंग होती थी ।
सिंघासन के तीन तरफ जनता के बैठने के लिए स्थान था , जिसके बाहर चांदी की रेलिंग लगी होती थी। यह भवन तीन तरफ से खुला है।दीवाने आम के पीछे शाही निवास होता था। इस तस्वीर में बायीं तरफ दिख रहा है --दीवाने ख़ास। दायीं तरफ रंग महल है । आगे की तरफ ताल है जिसमे फव्वारे लगे हैं। सबसे बायीं तरफ हमाम घर होता था । जिसमे ठंडा और गर्म स्नान की सुविधा थी।

रंग महल पास से ।
रंग महल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे । यह शाही निवास का ही हिस्सा था । शाहजहाँ के समय में इसको इम्तियाज़ महल कहा जाता था । इसके बेसमेंट में शाही निवास होता था। इसके बीचों बीच एक जल धारा बहती थी , जो ठंडक प्रदान करती थी।
रंग महल में जल धारा --नहर-ए-वहिश्त । पूर्व की ओर का एक द्रश्य। रिंग रोड और किले के बीच का क्षेत्र अब एक खूबसूरत पार्क के रूप में विकसित किया गया है।

यह है -दीवाने ख़ास का अन्दर का नज़ारा । दीवारों पर बहुत खूबसूरत पेंटिंग और सोने की नक्कासी थी । दूर नज़र आ रहा है वो स्थान जहाँ मयूर सिंघासन होता था जिसमे प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा लगा था । वह आज भी अंग्रेजों के पास है।
दीवाने ख़ासदीवाने ख़ास के सामने पार्क में अब लाईट एंड साउंड शो होता है। जिसे आप बेंचों पर बैठकर देख सकते हैं।
लाईट एंड साउंड शो --यहाँ पर । किले के बायीं तरफ के हिस्से में बड़े बड़े खूबसूरत पार्क हैं। जिनके बीचों बीच जल धाराएँ बनी हैं। इनमे फव्वारे भी बने हैं। दोनों छोर पर बैठकर देखने के लिए शाही गैलरी बनी हैं , जहाँ बैठकर शाही खानदान शाम को सुन्दर नजारों का लुत्फ़ उठता होगा।

बीच में यह एक जल श्रोत ( कुआँ ) है , जिससे पानी का प्रवाह नियंत्रित किया जाता था । पूरे पार्क में जल धाराएँ और फव्वारे कितना शकून प्रदान करते होंगे । हम तो यह फिल्मों में ही देख पाते हैं।

अंत में बायीं तरफ बने ये आलिशान भवन शायद अंग्रेजों ने बनाये होंगे --अपने अफसरों के लिए । इसी छोर पर दायीं तरफ एक कैंटीन भी है जो अंग्रेजों के ज़माने से बनी है। हमने तो यहाँ जाने की हिम्मत ही नहीं की।
यहाँ आकर पहली बार एहसास हुआ कि फिल्मों में जो शाही ठाठ बाठ दिखाए जाते हैं , वो वास्तव में सच में ही होते होंगे ।यह भी एक हैरानी की बात लगती है कि जब बिजली भी नहीं थी , तब भी फव्वारे कैसे चलते होंगे ।
कैसे पानी यमुना से होकर महल में प्रवाहित होता होगा !
और बिना खिड़की दरवाज़ों के महल में आंधी आने पर क्या होता होगा !
ऐसे बहुत से सवाल ज़हन में उठने लगते हैं , ऐसी एतिहासिक जगह आकर।

