एक महफिल में
कविता सुनाने की जब फरमाइश आई,
हमने अपनी बेस्ट हास्य कविता सुनाई।
पर उस दिन तो मैं ऐसा फंसा,
श्रोता एक भी ना हंसा।
हमने दर्जनों चुटकले भी सुनाए,
पर श्रोता ज़रा भी ना मुस्कराए।
भई हंसते भी कैसे, सब घबराए थे,
अपनी अपनी पत्नी संग जो आए थे।
और पत्नियां सब चुप बैठी थीं,
जाने किस टेंशन में ऐंठी थीं।
शायद पति ने झुमके दिला दिए सस्ते,
फिर बिना पत्नी की परमिशन के
भला कैसे हंसते।
हमने निर्णय लिया कि पहले महिलाओं को समझाएंगे,
फिर हम ही समझ गए कि भैया जो पत्नी के सामने हंस सके
ऐसे पति कहां से आयेंगे।
हमारी भी प्रॉब्लम ये कि हम हास्य कवि,
ठहाकों की फरियाद नहीं करते।
बाकी कवियों की तरह
तालियों के लिए हुंकार नहीं भरते।
कि जो सच्चा देशभक्त है
वो अगली पंक्ति पर तालियां जरूर बजाएगा।
हमने सोचा, अब मजा आएगा,
चलो बोलते हैं,
भाइयों बहनों चाचा काका,
अगले जोक पर ठोको ठहाका।
पर हाय रे किस्मत, जोक किसी को ना जँचा,
क्योंकि श्रोता फिर एक ना हंसा।
अब हमने महिलाओं की ओर रुख किया
और प्रश्न किया,
कृपया हाथ उठाएं जिस जिस के पति ने
लॉकडाउन में झाड़ू पोंछा लगाया,
पत्नियां भी सभी पतिव्रता निकली
एक ने भी हाथ नहीं उठाया।
खाली गया ये भी जो तंज था कसा,
क्योंकि श्रोता अब भी एक ना हंसा।
भई हंसते भी कैसे,
कोई अपनी या अपनों की बीमारी से ग्रस्त है,
कोई बेरोजगार है तो कोई जॉब के तनाव से त्रस्त है।
इस मृत्युलोक में सुखी लोग नज़र ही कहां आते हैं,
इसीलिए हम तो सबको यही समझाते हैं।
कि जब आप हंसते हैं तब अपना तनाव हटाते हैं,
जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं,
हंसना हंसना भी एक लाभकारी काम है दुनिया में,
इसलिए हम तो सदा हंसी की ही दवा पिलाते हैं।

