Tuesday, May 31, 2016

विश्व तम्बाकू रहित दिवस --कैसे मनाएं !


आज विश्व तम्बाकू रहित दिवस के अवसर पर :

आज का दिन विशेष कर ऐसा दिवस है जिसे बस एक दिन मनाकर काम नहीं चल सकता। सिर्फ एक दिन धूम्रपान न करने से कुछ नहीं बदल सकता।  क्योंकि ऐसा तो सभी धूम्रपान करने वाले स्वयं ही करते रहते हैं।

सिगरेट छोड़ना है इतना आसान ,
ज़रा मुझे ही देखो ,
मैं जाने कितनी बार कर चुका हूँ ये काम।

आज के दिन का नारा होना चाहिए -- धूम्रपान रहित जीवन।
इस अवसर पर डॉक्टर्स भी तरह तरह की अपील करते हैं।  एक अपील हमारी भी है एक डॉक्टर कवि के रूप में ।  आईये देखते हैं कि क्यों बचना आवश्यक है धूम्रपान , गुटखा और पान मसाला से :

धूम्रपान :

सिगरेट पीते थे हमदम , हम दम भर कर ,
अब हरदम हर दम पर दम निकलता है ।

गुटखा :

गुटखा खाते थे सनम , मुँह में चबा चबा कर ,
अब खाना खाने को भी, मुँह ही नहीं खुलता है।

पान मसाला :

मत समझो कि दाने दाने में है केसर का दम ,
सच यह है कि दाने दाने में है कैंसर का डर ।

हम तो सरकार से अपील करते हैं कि इन पंक्तियों को सिगरेट के पैक पर , गुटखा और पान मसाला के पैकेट के साथ छापकर लोगों को चेतावनी दें।
हालाँकि असली समाधान तो बीड़ी सिगरेट , गुटखा , पान मसाला और खैनी आदि पर पूर्ण प्रतिबंद ही है। लेकिन क्या सरकार ऐसा कर पायेगी ?


Thursday, May 26, 2016

सोच बदलो , देश बदलो --


सामने एक शानदार गाड़ी चली जा रही थी। अभी हम उसकी खूबसूरती और शान ओ शौकत की मन ही मन प्रसंशा कर ही रहे थे कि अचानक उसकी एक खिड़की खुली और सड़क पर एक पानी की खाली बोतल फेंक दी गई। बोतल जैसे ही हमारी गाड़ी के पहिया के नीचे आई , एक जोर की आवाज़ आई जैसे टायर फट गया हो। हमने घबराकर गाड़ी साइड में लगाकर देखा तो पाया कि पहिया तो सभी सही थे लेकिन वो बोतल पहिया के नीचे आकर फट गई थी। आवाज़ उसी की थी।

हम अक्सर सैकड़ों पर फैली गंदगी , कूड़ा करकट , खुले में पेशाब करने की लोगों की आदत , खुले आम चलते चलते सड़क पर थूकना , पान की पीक किसी भी कोने में मार देना , और साईकिलरिक्शाओं का ट्रैफिक में कहीं भी घुसकर ट्रैफिक को अस्त व्यस्त करने के लिए ग़रीबों , असहाय , देहाती और अनपढ़ लोगों को दोष देते हैं। बेशक ये सारी प्रॉब्लम्स ऐसे ही लोगों के कारण हैं। इसीलिए शहरों में जहाँ भी अनाधिकृत झुग्गी झोंपड़ी या कॉलोनी बस जाती हैं , उस क्षेत्र में ये समस्याएं बहुतायत में पाई जाती हैं।

लेकिन सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब पढ़े लिखे , अमीर , सामर्थ्य वाले शहरी लोग भी नागरिक सुविधाओं का दुरूपयोग करते हुए दायित्वहीन व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं। कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देना , यातायात के नियमों की धज्जियाँ उड़ाना , ज़रा सी बात पर रोड रेज़ में मरने मारने पर उतर आना , पर्यवरण की ओर पूर्ण उदासीनता और लापरवाही आदि इन तथाकथित सांभ्रान्त , सुशिक्षित और सभ्य समाज के लोगों की स्वार्थी प्रकृति को दर्शित करता है। इन्ही के सुकुमार बच्चे शहर के सबसे बेहतरीन विधालयों में पढ़ते हैं जहाँ उन्हें सिखाया जाता है कि कोई भी प्लास्टिक की वस्तु बाहर न फेंकें ताकि पर्यावरण को हानि न पहुंचे। लेकिन ये स्वयं अपने पद , पैसे और पहुँच के अहंकारवश शहर और देश के वातावरण को दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। शायद इसीलिए हमारा देश स्वतंत्रता के ६८ वर्ष बाद भी विकासशील देश की श्रेणी में ही आता है और ऐसा लगता है कि अनन्त तक इसी श्रेणी में रहने वाला है।
सोच बदलो , देश बदलो।

Monday, May 23, 2016

एक ग़ज़ल ---

१)

भरी जवानी में धर्म कर्म करने लगे हैं ,
मियाँ जाने किस जुर्म से डरने लगे हैं !

जो कहते थे दुनिया में नहीं है ईश्वर कहीं ,
मुसीबत पड़ी तो रामा रामा करने लगे हैं। 


वो ना डरते थे करने से दुष्कर्म कभी , 
अब जिन्दा ही पल पल मरने लगे हैं।  

सब लेकर जायेंगे जैसे , जो धन कमाया ,
बक्सों में सारा ऐसे , सामां भरने लगे हैं।

रहते आये थे सदा कूलर ऐ सी की छाया में ,
जब गर्म लू लगी तो झरने से झरने लगे हैं।

आया वो हूनर जब हाथों में 'तारीफ़' के ,
दुःख दर्द हम रोगियों के हरने लगे हैं । 

२) 

जब मोह भंग हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर लंगोटी हो और खाने को दो रोटी ,
बस एक पिंट बीयर चाहिए पीने के लिए ।

लत्ते, कपड़े, घड़ी, गॉगल्स, गिफ्ट में देते हैं लोग , 
रिटायर्ड बन्दे को क्या चाहिए तन ढकने के लिए ।  

सुबह से बैठे थे खाली , कुछ नहीं था करने को ,
मैडम एक गठरी कपडे दे गई प्रैस करने के लिए।

अब नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजर करने के लिए ।  

बड़े काम के थे , नाकाम नहीं आज भी 'तारीफ़', 
बस जौहरी की नज़र चाहिए, परखने के लिए।   

Tuesday, May 17, 2016

एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल ---


प्रस्तुत है , एक सेवानिवृत पति की दिनचर्या का हाल :

सुबह :

पत्नी : अज़ी सुनते हो , आज कामवाली बाई नहीं आएगी और डस्टिंग करने वाली भी अभी तक नहीं आई।  अब आप सम्भालो , मेरा टाइम हो गया ऑफिस का। ज़रा जल्दी से मेरा लंच पैक कर दो।  

पति : ठहरो , मैं ऐ टी एम से पैसे निकाल लाऊं ।  

पत्नी : अरे आप तो रिटायर्ड आदमी हैं।  अब आपको पैसों की क्या ज़रुरत है ? दस बीस रूपये चाहिए तो मेरे पर्स से निकाल लिया करो। वैसे भी आप ने क्या खर्च करना है , हमेशा से कंजूस के कंजूस ही तो रहे हो।
 
पति : हमें दो शर्ट और दो पैंट खरीदनी हैं।  सारी पुरानी हो गई।

पत्नी : ओहो ! आप भी अब कौन से नए रह गए हैं। और क्या करना है नए कपड़ों का ! आपने कौन सा ऑफिस जाना है ! वैसे भी गर्मी का मौसम है , कहाँ जाओगे इस मौसम में।  घर में बैठो आराम से नेकर और बनियान पहनकर।  

पति : अच्छा ब्रेड तो ले आऊं नाश्ते के लिए।

पत्नी : ठीक है।  लेकिन सारे दिन घर में रहते हो।  अब ये मत करना कि बैठे बैठे सारे दिन खाते ही रहो।  वेट बढ़ जायेगा , पेट बढ़ जायेगा , बी पी बढ़ जायेगा और शुगर भी बढ़ जाएगी।  फिर घूमोगे डॉक्टरों के चक्कर लगाते।
अच्छा सुनो , बाहर कपडे सूख रहे हैं, थोड़ी देर में उतार लेना और धोबी को प्रैस के लिए दे देना। लेकिन सीधे करके देना।  और सुनो , ये करना , वो करना , बहुत काम पड़े हैं , बस टाइम वेस्ट मत करना।

फिर शाम को ऑफिस से आने के बाद :

आप तो कमाल हो जी। मैं ऑफिस गई , तब भी आप अख़बार पढ़ रहे थे , अब आई हूँ तब भी अख़बार ही पढ़ रहे हो। आखिर ऐसा क्या है इस मुए अख़बार में !
अच्छा बताओ , दिन भर क्या किया आपने ?
अरे ये क्या , फ्रिज में सब कुछ वैसा का वैसा ही रखा है।  आपने तो कुछ खाया ही नहीं।  हे भगवान , मैंने कहा था ये दाल ख़त्म कर देना , खराब हो जाएगी।  लेकिन आपको तो कोई फ़िक्र है ही नहीं।  
और कपडे ! वहीँ बाहर जल रहे हैं धूप में। आपके भरोसे तो कुछ भी छोड़ना बेकार है। कितने बेकार बेकाम आदमी हो , पता नहीं सरकार कैसे झेल रही थी आपको।  मुफ्त में तनख्वाह दे रही थी।
जब देखो तब अख़बार या मोबाईल पर फेसबुक और वाट्सएप। इसके अलावा तो कोई काम ही नहीं है आपको। अब तो उठ लो , मुझे पानी ही पिला दो।

अगले दिन छुट्टी के दिन डॉक्टर के पास :

डॉक्टर साहब , मेरे पति सारी रात नींद में बड़बड़ाते हैं , कोई अच्छी सी दवा दीजिये।
डॉक्टर : ये दवा लिख रहा हूँ , केमिस्ट से ले लेना।  रोज एक गोली सुबह शाम लेनी है।  आपके पति बड़बड़ाना बंद  कर देंगे।
पत्नी : नहीं नहीं डॉक्टर साहब , आप तो कोई ऐसी दवा दीजिये कि ये साफ साफ बोलना शुरू  दें।  पता तो चले कि ये नींद में किसका नाम लेते हैं।
डॉक्टर : बहन जी , ये दवा आपके पति के लिए नहीं , आपके लिए है। आप उन्हें दिन में बोलने का मौका दें , वे नींद में बड़बड़ाना अपने आप बंद  कर देंगे।  

नोट : यह गर्मी में टाइम पास के लिए लिखा गया हास्य व्यंग है।  इसका किसी जीवित या अजीवित व्यक्ति से कोई  सम्बन्ध नहीं है।



Friday, May 13, 2016

रोते हुए जाते हैं सब , हँसता हुआ जो जायेगा ---


सेवा निवृति एक ऐसा अवसर होता है जिसमे ख़ुशी भी शामिल होती है और थोड़ा रंज भी।  ख़ुशी एक लम्बे व्यवसायिक जीवन के सफलतापूर्वक पूर्ण होने की। और रंज सफलता की ऊँचाई पर पहुंचकर कुर्सी छोड़ने का। अक्सर  ऐसे में सेवा निवृत होने वाला व्यक्ति भावुक हो जाता है और कभी कभी लोग रोने भी लगते हैं।  लेकिन हमारे अस्पताल में पिछले दस सालों में सेवा निवृत होने वाले सभी अधिकारीयों को हमने हँसते हँसते विदा किया।  इसी क्रम को बनाए हुए ३० अप्रैल को जब हम स्वयं सेवा निवर्त हुए तो हमने उसी ख़ुशी के वातावरण को बनाए रखा।  हमारे साथ हमारे एक और साथी डॉकटर को भी विदा किया गया जिन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृति ली थी।  




मंच पर चिकित्सा अधीक्षक और अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक के साथ हम दोनों।



गंभीर रूप में बस यही एक पल था जब हम हँसते हुए नज़र नहीं आ रहे थे।  लेकिन स्वागत सम्मान समारोह आरम्भ होने के बाद एक भी क्षण ऐसा नहीं था जिसमे लोगों के चेहरे पर मुस्कान न रही हो।  फूल भेंट करने वालों में सभी उच्च अधिकारीगण शामिल हुए।




प्रिंसिपल स्कूल ऑफ़ नर्सिंग।



अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक।



पूर्व चिकित्सा अधीक्षक एवम विभाग अध्यक्ष ई एन टी।



पूर्व चिकित्सा अधीक्षक एवम विभाग अध्यक्ष शल्य चिकित्सा।



डायरेक्टर फैमिली वेलफेयर।



एडिशनल सेक्रेटरी स्वास्थ्य मंत्रालय।



विभाग अध्यक्ष मनो रोग।



हमारे एक पुराने साथी जो सेवा निवृत हो चुके हैं।



अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक।



नर्सिज यूनियन की सदस्या अधिकारीगण।



कर्मचारी यूनियन के सदस्य।



सीनियर प्रोफ़ेसर और हमारे कॉलेज के सबसे पहले बैच की हमारी सीनियर सहपाठी।



हॉल का एक दृश्य।



दूसरी ओर वरिष्ठ डॉक्टर्स।



कार्यक्रम का सञ्चालन करते हुए भारत भूषण जो सदा हमारे साथ मंच पर सहयोगी रहे और अपनी आवाज़ से सबको मंत्रमुग्ध करते थे।



हम दोनों के परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
अपने विदाई भाषण में हमने उपस्थित सभी कर्मचारियों और अधिकारीयों को विशेष रूप से दो बातों को याद रखने का आह्वान किया।
एक तो ये कि एक अच्छा स्वास्थयकर्मी होने के लिए तीन गुणों का होना आवश्यक है -- avilability , affability , ability . यानि आपकी उपस्थिति , मृदु व्यवहार और आपकी योगयता।
दूसरा अपने कर्मों को इस कद्र सुधारना चाहिए कि जाते समय बुरे कर्मों का बोझ साथ ना हो।
कवि नीरज की इन पंक्तियों के साथ हमने अपने अभिभाषण को समाप्त किया :

जितना कम सामान रहेगा ,
उतना सफ़र आसान रहेगा।
जितना भारी बक्सा होगा ,
उतना ही तू हैरान रहेगा।