Friday, June 13, 2014

दिन अब भाईचारे के आने लगे हैं ----


आज प्रस्तुत है , एक पुरानी ग़ज़ल नये रूप मे : 


अच्छे दिन अपने शायद आने लगे हैं , 
बच्चे वॉट्स एप पर बतियाने लगे हैं !


हाथों मे जब से स्मार्ट फुनवा आ गया है, 
बच्चे मात पिता को  समझाने  लगे  हैं ! 

जब  से  जाना  है  महमां  घर आ गये हैं ,
वो घर  जाने  से  ही  कतराने  लगे  हैं  

खुद की छवि जब से आईने मे दिखी है , 
अपने  साये से हम  कतराने लगे  हैं !  


जिंदगी  भर  काला  धन्धा  करते  रहे  जो ,
स्विस  बैंकों  मे  पैसा  रखवाने   लगे   हैं !  

ज़ालिम पर जब कोई भी ज़ोर ना चला तो , 
उसको ही सज़दा कर घर जाने लगे हैं ! 

गूंगे बहरों की बसती मे भी "तराने" , 
अब तो हम भी प्यार भरे गाने लगे हैं ! 


फ़िक्र  ना  कर  तू  रामा  है  या  है रहीमन,   
दिन  अब  भाईचारे   के  आने  लगे   हैं ! 

14 comments:

  1. वाह....

    गूंगे बहरों की बसती मे भी "तराने" ,
    अब तो हम भी प्यार भरे गाने लगे हैं !
    बहुत बढ़िया !!!

    सादर
    अनु

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  2. सटीक .... विचारणीय भी

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. ये पुरानी नहीं----आज के दौर की शानदार गजल है

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  5. सुंदर ग़ज़ल

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  6. फ़िक्र ना कर तू रामा है या है रहीमन,
    दिन अब भाईचारे के आने लगे हैं !

    बहुत बढ़िया बिंदास भाव आभार

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  7. समय बड़ा बलवान है डॉ. साहब!

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  8. सटीक व्यंगात्मक गज़ल।

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  9. सुन्दर रचना...

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  10. अरे गज़ब ...एक दम सटीक अभिव्यक्ति।

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  11. हा हा हा हा ....बहुत बढ़िया जी

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  12. हाथों मे जब से स्मार्ट फुनवा आ गया है,
    बच्चे मात पिता को समझाने लगे हैं ! ..
    वाह ... बहुत ही उम्दा ... हर शेर सच के करीब है ... मज़ा आ गया ग़ज़ल पढ़ के ...

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