Sunday, May 31, 2009

क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---

आज विश्व भर में विश्व तम्बाकू रहित दिवस मनाया जा रहा है। क्यों न जो लोग धूम्रपान करते हैं , आज के दिन प्रण करें कि आज के बाद वो कभी धूम्रपान नही करेंगे। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ प्रदुषण पर तो नियंत्रण किया जा रहा है, वहीं धूम्रपान पर अभी तक विशेष प्रभाव नही पड़ा है।
तम्बाकू और धूम्रपान से सम्बंधित कुछ तथ्य :-

* सबसे पहले कोलंबस ने १४९२ में दक्षिण अमेरिका के निवासियों को धूम्रपान करते देखा था।
*भारत में इसका सेवन १६ वीं शताब्दी में शुरू हुआ।
*विश्व में ११० करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं।
*विश्व में प्रतिवर्ष ५०,००० करोड़ सिग्रेट और ८००० करोड़ बीडियाँ फूंकी जाती हैं।
*धूम्रपान से हर ८ सेकंड में एक व्यक्ति की म्रत्यु हो जाती है।
* ५० लाख लोग हर साल अकाल काल के गाल में समां जाते हैं।
*सिग्रेट के धुएं में ४००० से अधिक हानिकारक तत्व और ४० से अधिक कैंसर उत्त्पन करने वाले पदार्थ होते हैं।
*भारत में ४०% पुरूष और ३% महिलायें धूम्रपान करती हैं।
*भारत में मुहँ का कैंसर विश्व में सबसे अधिक पाया जाता है और ९०% तम्बाकू चबाने से होता है।

धूम्रपान और तम्बाकू से होने वाली हानियाँ :-

*हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, कोलेस्ट्रोल का बढ़ना, तोंद निकलना, मधुमेह , गुर्दों पर दुष्प्रभाव ।
*स्वास रोग _ टी बी , दमा, फेफडों का कैंसर ,गले का कैंसर आदि।
* पान मसाला और गुटखा खाने से मुहँ में सफ़ेद दाग, और कैंसर होने की अत्याधिक संभावना बढ़ जाती है।

लोग धूम्रपान करते क्यों हैं?

* दोस्तों के साथ मस्ती
*घर के लोगों का धूम्रपान करना
*फिल्मों और टी वी का असर
* अंधाधुन्द और प्रभावकारी प्रचार
* ग़लत धारणाएं --
कहते है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए।
* बिना बीडी पिए लैट्रिन नही आती।
*पेट में गैस बन जाती है।
*नींद नही आती।
*ज्यादातर लोग खाने के बाद सिग्रेट जरूर पीते हैं।
* ज्यादा खुशी और ज्यादा ग़म में भी धूम्रपान की मात्रा बढ़ जाती है।
ये सब ग़लत धारणाएं हैं जिनका धूम्रपान से कोई सम्बन्ध नही होता।
आख़िर इसे कैसे छोड़ा जाए?
सिग्रेट छोड़ना बहुत ही आसान भी है और मुश्किल भी।अपनी लिखी हुई एक कविता की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :

शाहरुख़ खान के लिए भी इक बात समझ में आई है,
कि भैय्या, एब्स तो ठीक है, पर ये सिग्रेट का ऐब छोड़ दो , इसी में भलाई है।

वैसे भी सिग्रेट छोड़ना है इतना आसान ,
जरा मुझे ही देखो, मैं जाने कितनी बार कर चुका हूँ ये काम।

दोस्तों धूम्रपान छोड़ने के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।
जरा सोचिये , बड़े बड़े शहरों में जहाँ बहुत सा धुआं हम पहले ही साँस के साथ खींचते हैं, फ़िर भला सिग्रेट के धुएं की
कहाँ जरूरत रह जाती है। एक बार छोड़ कर देखिये , आप कितना परिवर्तन महसूस करेंगे अपनी जिंदगी में।
याद रखिये :

पहले हम सिग्रेट जलाते हैं, फ़िर सिग्रेट हमें जलाती है।
पहले हम गुटखा चबाते हैं, फ़िर गुटखा हमें चबाता है।

Thursday, May 28, 2009

एक प्रयास

आबादी की रेस में, देश ये सरपटभागे
होंगे हम पच्चीस में, चीन से भी आगे।

मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे, भक्तजन शीश नवायें
antarman में झांकिए, आत्मबोध हो जाये।

स्वार्थ में सब डूबकर, मांगे मन की मुराद
मैं maangu संसार में, सुख शान्ति का प्रसाद।

मेरा मेरा सब कहें, तेरा कहे न काय
तेरा मेरा व्यर्थ है, सब यहीं रह जाय।

ख़ुशी बांटना औरों में, है सर्वोत्तम दान
होठों पे मुस्कान हो, तो हर मुश्किल आसान।

बीते दुखों को भूलिए, सफल हों सब काज
बीते दिनों की याद में, व्यर्थ करो न आज ।

Friday, May 15, 2009

हम तैयार हैं ---

दिल्ली जैसे बड़े शहर में गाड़ी रखना जितना आसान है ,गाड़ी साफ़ रखना उतना ही मुश्किल है। इस धूल भरे मौसम में जहाँ दो चार बूँदें गिरी नही कि अच्छी खासी नई कार पुरानी खटारा मोडल लगने लगती है। ऐसे में कार साफ़ करने वाला मुंडू भी गायब हो जाता है। इस मामले में बेवकूफ से दिखने वाले मुंडू बड़े बुद्धिमान निकलते हैं। जिस दिन भी हल्की सी बारिस होती है, वो छुट्टी मार जाते हैं। जरा सोचिये आप सज धज कर ऑफिस के लिए तैयार होकर निकलते हैं और गाड़ी एकदम गन्दी। ऐसे में आप क्या करेंगे? मन मसोसकर उसी हालत में गाड़ी लेकर चल देंगे और क्या। भाई कम से कम अन्दर से तो साफ़ है न। फ़िर गाड़ी बाहर से कितनी ही गन्दी क्यों न हो , कम से कम आपको तो नही दिखेगी न। दूसरों को दिखती है तो दिखे, हमें क्या।
अब मैंने तो इस समस्या का एक समाधान निकाल लिया है। चौराहे पर लाल बत्ती पर रूककर जब हम बत्ती हरी होने का इंतज़ार करते हैं, उस समय जो बाल भिखारियों का दल बेहद गन्दा और मैल भरा कपड़ा लेकर गाड़ी के शीशे साफ़ करने लगता है ,या यूँ कहिये कि गन्दा करता है ,और हम उन्हें भगाने के हर हथकंडे इस्तेमाल करते हैं लेकिन सब फ़ेल हो जाते हैं। अब मैंने उन्हें भगाना बंद कर दिया है। अब मैं उन्हें गाड़ी साफ़ करने देता हूँ और जब वो भीख मांगने आते हैं तो मैं कहता हूँ --सारी गाड़ी साफ़ करो तब दूँगा। इस पर वो बड़े जोश के साथ साफ़ करने लग जाते हैं और बत्ती हरी होने से पहले गाड़ी साफ़।
दोस्तों, आजमा कर देखिये, बड़ा कारगर तरीका है, १ से ५ रु में गाड़ी साफ़ कराने का । लेकिन इसमे एक रिस्क भी है। दिल्ली में लाल बत्ती पर भिखारियों को भीख देना कानून में जुर्म है। अब ये बात अलग है कि इस कानून के अर्न्तगत आज तक किसी को सजा नही हुई है या चालान कटा है। वैसे भी हमारे यहाँ कई कानून तो खाली पेपर पर ही होते है। इसलिए आप चाहें तो धड़ल्ले से कानून तोड़ते हुए अपनी गाड़ी साफ़ करा सकते हैं।
दिल्ली के भिखारी बहुत ही सक्षम , जागरूक एवम परिश्रमी होते हैं। अगले वर्ष दिल्ली में कॉमनवैल्थ गेम्स होने वाले हैं। अब भले ही सड़कें , स्टेडियम और खिलाड़ियों के लिए आवास तैयार नही हुए हों, पर दिल्ली के भिखारियों की तैयारी पूरी है। पता चला है कि उन्हें विदेशियों से भीख मांगने के तौर तरीकों की ट्रेनिंग देने के लिए जगह जगह अकादमी खुल गयी हैं। जहाँ उन्हें अपनी संस्कृति का ध्यान रखते हुए भीख मांगने के आधुनिक तरीकों में पूरी तरह से ट्रेन किया जाएगा, जिससे कि हमारे विदेशी महमानों को कोई असुविधा न हो और विदेशों में भारत की छवि भी निखर कर सामने आए।
सुना है , इसके लिए अकादमी में पंजीकृत बच्चों को इंग्लिश, फ्रेंच , जर्मन व् रसियन जैसी सभी विदेशी भाषाओँ का ज्ञान दिया जाएगा। मैं तो ये सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूँ कि हमारी प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जायेंगे जब हमारे विदेशी महमान चौराहों पर बाल भिखारियों को उन्ही की जुबान बोलते हुए पायेंगे। वैसे हम बेकार में अपने बच्चों को विदेशी भाषाएँ सिखाने के लिए हजारों, लाखों रूपये खर्च करते हैं। क्यों न इन्ही अकादिमियों को ज्वाइन कर लिया जाए और मुफ्त में अपना सी वी इम्प्रूव कर लिया जाए।
कहिये यह विचार कैसा रहेगा ?

Wednesday, May 13, 2009

हँसना जरुरी है ---

भाग -२

मित्रो, हंसने के लिए स्वाभाविक होना अति आवश्यक है , साथ ही जिंदगी के प्रति अपना रवैया बदलना भी जरुरी है। जीवन की छोटी छोटी बातों से , घटनाओं से, कुछ न कुछ हास्य निकल आता है, जिसे फ़ौरन पकड़ लेना चाहिए और उसे हँसी में तब्दील कर देना चाहिए। ऐसा करके न सोर्फ़ आप हंस सकते हैं बल्कि दूसरों को भी हंसा सकते हैं। याद रखिये जो लोग हँसते हैं , वो अपना तनाव हटाते हैं, लेकिन जो हंसाते हैं वो दूसरों के तनाव भगाते हैं। यानी हँसाना एक परोपकारिक कार्य है। तो क्या आप यह सवोप्कार एव्म परोपकार नही करना चाहेंगे?

जिंदगी का मंत्र --

हर हाल में जिंदगी का साथ निभाते चले जाओ,
किंतु हर ग़म , हर फ़िक्र को , धुएँ में नही ,हँसी में उडाते जाओ।

आप पिछली बार दिल खोलकर कब हँसे थे , जरा सोचियेगा जरूर!

Tuesday, May 12, 2009

हँसना जरुरी है ----

ऐसा प्रतीत होता है कि आजकल के भाग दौड़ और तनावपूर्ण जीवन में लोग हँसना ही भूल गए हैंतभी तो अधिकतर लोगों के माथे पर भ्रकुटी तनी हुई और चेहरा गंभीर ग़मगीन नज़र आता हैविशेष रूप से व्यावासिक जीवन में जो जितना सफल होता है, वह उतना ही ज्यादा गंभीरता का मुखोटा ओढे रहता हैइसीलिए आजकल भारत जैसे विकासशील देश में भी हृदय रोग , मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसी भयंकर बीमारियाँ पनपने लगी हैं


हँसना स्वास्थ्य के लिए कितना लाभदायक है , यह बात हमारे धार्मिक गुरुओं के अलावा डॉक्टरों से बेहतर और कौन समझ सकता हैठहाका लगाकर हँसना एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे सिर्फ़ शरीर का प्रत्येक अंग आनंदविभोर होकर कम्पन करने लगता है, बल्कि दिमाग भी कुछ देर के लिए सभी अवांछित विचारों से शून्य हो जाता हैइसीलिए हंसने को एक अच्छा मैडिटेशन माना गया है


लेकिन आज के युग में हँसना भी एक कृत्रिम प्रक्रिया बन गया हैठहाका लगाकर हंसने के लिए आवश्यकता होती है एक सौहार्दपूर्ण वातावरण की , जो केवल व्यक्तिगत मित्रों के साथ ही उपलब्ध हो पाता हैऔर आज के स्वयम्भू समाज में अच्छे मित्र भला कहाँ मिल पाते हैंइसीलिए आजकल खुलकर हँसना दुर्लभ होता जा रहा है


देखिये ये कैसी विडम्बना है कि---


वहां गाँव की उन्मुक्त हवा में , किसानों के ठहाके गूंजते हैं ,

यहाँ शहर में लोग हंसने के लिए भी, कलब ढूँढ़ते हैं


आजकल शहरों में जगह जगह लाफ्टर कलब बन गए हैं ,जहाँ लाफ्टर मैडिटेशन कराया जाता हैलेकिन मुझे तो लगता है कि इस तरह की कृत्रिम हँसी सिर्फ़ मन बहलाने का एक साधन मात्र हैवास्तविक हँसी तो नदारद होती हैजरा गौर कीजिये , एक पार्क में २०-३० लोगों का समूह , एक घेरे में खड़े होकर , झुककर ऊपर उठते हैं , हाथ उठाते हैं, और मुहँ से जोरदार आवाज निकलते हैंउन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे लाफ्टर मैडिटेशन नहीं, बल्कि बाबा रामदेव का बताया हुआ kabj दूर करने का आसन कर रहे होंusme आवाज तो होती है, मगर हँसी नही होती