Sunday, March 15, 2015

महिला स्वास्थ्य की अनदेखी -- एक विचारणीय विषय !


किसी भी देश के विकास का एक अच्छा सूचकांक वहां की महिलाओं और बच्चों का स्वास्थ्य  होता है ! हमारा भारत देश एक विकासशील देश है ! ज़ाहिर है , अभी यहाँ विकसित देशों की तरह नागरिकों को सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं ! निश्चित ही इसका प्रभाव महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर अवश्य पड़ता है ! लेकिन हमारे देश मे महिलाएं दो वर्ग मे बंटी हैं , एक जो आर्थिक रूप से उच्च आय वर्ग की हैं और दूसरी जो निम्न और निम्न मध्य आय वर्ग मे आती हैं ! आर्थिक रूप से संपन्न महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि अब हमारे देश मे भी सर्वोत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं ! वे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी होती हैं और स्वतंत्र भी ! लेकिन निम्न और मध्य निम्न वर्ग मे अभी भी महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहती हैं जिसका परिणाम उन्हे विभिन्न प्रकार से अस्वस्थ रहकर भुगतना पड़ता है ! 

सतही तौर पर देखें तो लगता है कि अपने स्वास्थ्य की अनदेखी के लिये महिलाएं स्वयम् ही जिम्मेदार हैं ! लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि महिलाओं के खराब स्वास्थ्य के लिये हमारे समाज मे फैली कुरीतियाँ , गलत धारणाएं , अवमाननाएं और कुंठित सोच ज्यादा जिम्मेदार हैं ! एक महिला के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य प्रजनन माना जाता है , लेकिन अक्सर यही उसके खराब स्वास्थय का कारण भी बनता है ! आज भी एक लाख गर्भवती महिलाओं मे से हर वर्ष करीब ३६० महिलाएं गर्भ के कारण अकाल  मौत के मूँह मे चली जाती हैं ! आधे से ज्यादा गर्भवती महिलाओं को रक्त की कमी पाई जाती है ! 21वीं सदी मे भी हमारे देश मे आधे से ज्यादा प्रसव अशिक्षित दाइयों द्वारा कराये जाते हैं ! निम्न वर्ग मे कुपोषण , संक्रमण , और उचित मात्रा मे भोजन  मिल पाने के कारण गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य निम्न स्तर का ही रह जाता है ! उचित स्वास्थ्य सेवाएं न मिल पाने के कारण न सिर्फ गर्भवती माँ , बल्कि अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ! 

इसके अतिरिक्त महिलाओं के स्वास्थ्य पर परिवार की सोच का भी बहुत प्रभाव पड़ता है ! अक्सर घर मे बड़े बूढ़े विशेषकर सास का हुक्म पत्थर की लकीर होता है ! एकल परिवारों मे भी पुरुष प्रधान समाज की छाप साफ नज़र आती है ! एक गृहणी अपनी मर्ज़ी से न जी पाती है , न अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रह सकती है ! यहाँ तक कि डॉक्टर के पास जाने के लिये भी उसे अपनी सास या पतिदेव की अनुमति चाहिये होती है ! उसे कब और कितने बच्चे पैदा करने हैं ,  अक्सर इसका निर्णय भी स्वयम् उसका नहीं होता ! कई बार देखा गया है कि डॉक्टर की सलाह के बावज़ूद गर्भवती महिला प्रसव के अंत समय तक अस्पताल नहीं जाती और घर बैठी रहती है क्योंकि घरवालों ने इज़ाज़त नहीं दी ! अक्सर इस लापरवाही के परिणाम भयंकर हो सकते हैं जिसमे माँ और बच्चे दोनो को ख़तरा हो सकता है ! लेकिन यहाँ डॉक्टर से ज्यादा सास की सोच , समझ और हुक्म ज्यादा अहम साबित होता है जिसकी हानि महिला को उठानी पड़ती है ! 

जब तक हमारा समाज शिक्षित नहीं होगा , जब तक हमारे अंध विश्वास , गलत धारणाएं और पुरानी कुतर्कीय मान्यताएं समाप्त नहीं होंगी , तब तक हमारे देश की महिलाएं पीड़ित होती रहेंगी और स्वास्थ्य के क्षेत्र मे महिलाओं का दर्ज़ा निम्न स्तर पर बना रहेगा !  जब तक हमारी युवा माएं सुरक्षित नहीं होंगी , हमारा ये विकासशील देश , विकासशील ही बना रहेगा , कभी पूर्णतया विकसित देश नहीं कहलायेगा !