1.
हर साल होली पर मिलते थे हर एक से गले,
इस साल गले मिलने वाले वो गले ही नहीं मिले।
कोरोना का ऐसा डर समाया दिलों में,
कि दिलों में ही दबे रह गए सब शिकवे गिले।
2.
कोरोना का कहर जब शहर में छाया ,
हमें तो वर्क फ्रॉम होम का आईडिया बड़ा पसंद आया।
किन्तु पत्नी को देर न लगी ये बात समझते ,
कि घर तो क्या हम तो ऑफिस में भी कुछ काम नहीं करते।
3.
हम भी वर्क फ्रॉम होम का मतलब तब समझे ,
जब पत्नी ने कहा कि अब ये सुस्ती नहीं चलेगी।
उठो और हाथ में झाड़ू पोंछा सम्भालो,
आज से कामवाली बाई भी वर्क फ्रॉम होम ही करेगी।
4.
लॉकडाउन जब हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।
तन पर दो वस्त्र हों और खाने को
दो रोटी ,
फिर बस अदरक वाली चाय चाहिए
पीने के लिए ।
पैंट कमीज़ जूते घड़ी सब टंगी पड़ी
बेकार ,
बस एक लुंगी ही चाहिए तन ढकने
के लिए ।
कमला बिमला शांति पारो का क्या
है करना ,
ये बंदा ही काफी है झाड़ू पोंछा
करने के लिए।
आदमी तो बेशक हम भी थे काम के 'तारीफ़',
किन्तु घर बैठे हैं केवल औरों
को बचाने के लिए।








