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Thursday, November 17, 2016

इंसान का जीवन चक्र :


इंसान यदि गरीब घर में पैदा होता है तो इस बात की अत्यधिक सम्भावना रहती है कि वह जिंदगी भर रोजी रोटी कमाने में ही लगा रहेगा। यदि अमीर व्यवसायी घर में पैदा होता है तो इस बात की सम्भावना होती है कि वह जिंदगी भर कुछ न करते हुए भी ऐशो आराम में जिंदगी काटता रहेगा। लेकिन यदि आप आम मिडल क्लास फेमिली में पैदा हुए हैं तो आपके सामने एक मंज़िल होती है , पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करके , आम से खास बनने की।
ऐसे में आप पहले स्वयं अच्छी शिक्षा ग्रहण करते हैं , मेहनत करके किसी अच्छे प्रॉफेशन में प्रवेश कर अपना कॅरियर बनाते हैं और एक दिन ऊंचे मुकाम पर पहुँच जाते हैं। इस बीच आप शादी भी कर लेते हैं , बच्चे पैदा कर उनका लालन पालन और भी अच्छे से करते हैं। साथ ही घर में सभी आधुनिक सुविधाएँ जुटा पाने में समर्थ और सफल होते हैं।
अंत में यदि रिटायर होने से पहले आपने शहर में अपना अच्छा सा घर बना लिया है , बच्चे पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं , उनकी शादी कर आपने अपनी जिम्मेदारियां भी निपटा दी हैं , तो इसके बाद आपने जो भी धन जोड़ रखा है , वह फालतू और बेमतलब सा लगने लगता है। लेकिन भले ही खाने की भूख लगे या न लगे , फिर भी इंसान की पैसे की भूख नहीं मिटती। काले धन की बस यही कहानी है।
दफ़्तर जाना जब छूटा तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए !
तन पर दो वस्त्र हों और खाने को दो रोटी ,
फिर बस नीम्बू पानी चाहिए पीने के लिए !
नोटः काले धन पर पोस्ट्स की इतिश्री ! सभी को शुभकामनायें।

Monday, November 7, 2016

क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ...


एक बेहद ख़तरनाक़ यात्रा वृतांत :

यह इत्तेफ़ाक़ ही रहा कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदुषण वाले दिन हमें किसी काम से चंडीगढ़ / मोहाली जाना पड़ा। यूँ तो हमें लॉन्ग ड्राइव पर जाना सदा ही पसंद रहा है और गए हुए भी डेढ़ साल हो गया था।  लेकिन दिल्ली और हाइवेज पर फैली धुएं की चादर को देखकर हाइवे पर जाना बेहद खतरनाक हो सकता है , इसका आभास कई दिनों से अख़बारों में आने वाली ख़बरों से हमें भलि भांति था।  लेकिन काम की अत्यावश्यकता को देखते हुए जाना भी मज़बूरी ही थी। हालाँकि सुबह जाकर शाम तक वापस आना , एक ही दिन में खुद करीब ६००  किलोमीटर ड्राइव करना कोई आसान काम नहीं लगता। कोहरे की वजह से दृश्यता बहुत कम हो जाती है , और ऐसे में हाइवे ड्राइविंग बेहद खतरनाक हो जाती है।

इसलिए ज्यादा जल्दी न कर हम सुबह ७ बजे ही घर से निकले।  जैसा कि अनुमान था , जी टी रोड पर दिल्ली हरियाणा बॉर्डर तक काफी धुंधलका था लेकिन ड्राइव करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी।  लेकिन बॉर्डर पार करते ही , जैसे ही खुले खेतों के दर्शन हुए , धीरे धीरे धुंध बढ़ने लगी।  अब स्मॉग की जगह शुद्ध धुंध ने ले ली थी ।  सभी गाड़ियों वाले हेड लाइट्स और डिस्ट्रेस  सिग्नल ऑन कर चलने लगे। स्पीड कम होने लगी और दृष्टि भी। धुंध के झोंके गाड़ी की  ओर ऐसे आ रहे थे जैसे बारिश की बौछार आती हैं। कुछ समय बाद धुंध इतनी गहरी हो गई कि गाड़ी के शीशे के आगे भी कुछ नहीं दिख रहा था। दायीं लेन में चलते हुए साइड में डिवाइडर ज़रा सा दिख रहा था , जिसके सहारे हम धीरे धीरे गाड़ी चला पा रहे थे।  फिर एक के बाद एक एक्सीडेंट के नज़ारे दिखने लगे।

उस समय हमारी हालत बिलकुल उस पॉयलेट जैसी हो गई थी जिसने कुछ दिन पहले ज़ीरो विजिबलिटी में विमान को सिर्फ अंदाज़े से हवाई पट्टी पर उतार दिया था और कोई नुकसान नहीं हुआ था।  अब तो हमें यह भी लगने लगा था कि ऐसा ही रहा तो वापस कैसे आएंगे।  रात होना तो निश्चित था , फिर अँधेरा और धुंध दोनों मिलकर कहर ढा देंगे।  खैर किसी तरह धीरे धीरे लगभग रेंगते हुए साढ़े तीन घंटे में जब करनाल पहुंचे तो कुछ कुछ दिखना शुरू हुआ।  लेकिन जो दिखाई दिया , वह तो और भी ज्यादा खतरनाक था। पूरे करनाल बाइपास पर जगह जगह एक्सीडेंट हुई गाड़ियां पड़ी थीं। अधिकांश बुरी तरह से टूटी फूटी हुई।  एक जगह तो करीब १०० मीटर तक गाड़ियों के पुर्जे बिखरे पड़े थे।  ऐसा लग रहा था , मानो वहां कोई रॉयट्स ( दंगे ) हुए हों। सिर्फ खून कहीं नहीं दिखा , यह देखकर हमने सोचा कि चलो शुक्र है कि शायद किसी को चोट तो नहीं लगी होगी।

करनाल के बाद वातावरण साफ होने लगा और अम्बाला तक जाते जाते बिलकुल साफ हो गया।  चंडीगढ़ और मोहाली तो ऐसे साफ चमक रहे थे जैसे वहां कभी कोहरा होता ही न हो। वहां कोई सोच नहीं सकता था कि हम कैसे रास्ते से निकल कर आये हैं। वापसी में फिर करनाल तक रास्ता साफ मिला।  लेकिन उसके बाद शाम भी ढल गई , अँधेरा बढ़ने लगा था और कोहरा भी।  लेकिन विजिबलिटी इतनी थी कि ड्राइविंग में कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई। हमने भी श्रीमती जी को हाइवे पर ड्राइविंग का शौक पूरा करने का पूरा अवसर देते हुए दोनों ओर आधा रास्ता ड्राइव करने दिया। अंतत: रात के साढ़े आठ बजे हम घर पहुँच गए।

आज सुबह जब अख़बार खोला तो पता चला कि उन एक्सीडेंट्स में दस लोगों की मौत हो गई और ३०-४० लोग घायल हुए।  और इतनी ही गाड़ियां चकनाचूर हो गई थी। घंटों ट्रैफिक जैम भी रहा। बस शुक्र रहा कि हम बाल बाल बचते हुए सकुशल घर पहुँच गए। वापसी में रास्ते में अनेकों जगह खेतों में आग लगी देखी जिनसे निकलता हुआ धूंआं प्रदुषण फैला रहा था। यह साफ ज़ाहिर था कि पंजाब हरियाणा का यह धुआं हवा की दिशा के कारण दिल्ली की ओर ही आ रहा था , जबकि चंडीगढ़ और मोहाली का क्षेत्र साफ बचा हुआ था। क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ? ज़रा सोचिये ज़रूर।              

   

Friday, November 4, 2016

क्या सल्फास की बिक्री पर कोई नियंत्रण होना चाहिए ?


सल्फास ( celphos ) पॉइज़निंग :

एलुमिनियम फास्फाइड अनाज को कीड़ों और चूहों से बचाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।  लेकिन यह आत्महत्या करने का सबसे सस्ता और आसान तरीका भी है। इसका कारण हैं आसानी से इसकी उपलब्धता।  शायद यही एक ऐसा ज़हर है जिसके लिए आपको न किसी डॉक्टर की प्रेस्क्रिप्शन चाहिए , न कोई लाइसेंस। गांवों में किसानों द्वारा सब घरों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। बस यही सत्य विनाश का कारण भी बनता है।

सल्फास की गोलियां खाने के बाद यदि बहुत जल्दी मेडिकल उपचार नहीं मिला तो रोगी का बचना लगभग असंभव होता है। इसका एक कारण यह भी है कि इसका कोई एंटीडोट नहीं होता।  यानि ज़हर उतारने की कोई दवा नहीं होती। ऐसे रोगी को तुरंत अस्पताल में भर्ती करना चाहिए जहाँ उसका गैस्ट्रिक लेवाज ( पेट की सफाई ) कर ज़हर को बाहर निकाल दिया जाता है, तभी बचने की सम्भावना होती है।  यदि १-२ घंटे की देरी हो गई तो रोगी भी गया ही समझो।

ऐसे रोगी की साँस और मुँह से एक बड़ी अज़ीब और गन्दी सी दुर्गन्ध आती है जिसे न सिर्फ सहन करना मुश्किल होता है , बल्कि दूसरों को भी प्रभावित कर सकती है।  यह सल्फास के द्रव से मिलने से उत्पन्न हुई फ़ॉस्फ़ीन गैस के कारण होता है जो ज़हर का काम करती है।  इसलिए ऐसे रोगियों को हेंडल करते हुए भी सावधान रहना चाहिए , विशेषकर कपड़ों पर लगा ज़हर भी आपको प्रभावित कर सकता है।

क्या सल्फास की बिक्री पर कोई नियंत्रण होना चाहिए ?


Wednesday, November 2, 2016

दीवाली कैसे मनाएं ताकि प्रदुषण से बच पाएं ---


पिछले एक सप्ताह से हम दीवाली पर ही लिखे जा रहे हैं। बेशक दीवाली एक ऐसा हर्ष उल्लास का पर्व है जिसे छोटे बड़े , गरीब अमीर और हर जाति और धर्म के लोग बड़े शौक और चाव से मनाते हैं। दशहरा से लेकर दीवाली तक बाज़ारों की रौनक , घरों की साफ़ सफाई और लोगों का आपस में मिलना और मिलकर उपहारों का आदान प्रदान जीवन में एक नया उत्साह और स्फूर्ति भर देता है।
दीवाली पर सारा जहाँ रौशन हो जाता है और बहुत खूबसूरत लगता है , भले ही बिजली की लड़ियाँ चाइनीज ही क्यों न हों। आखिर रात भर रंग बिरंगी लाइट्स की रिम झिम देखते ही बनती है। दीये और मोमबत्ती तो पल दो पल की रौशनी देते हैं , फिर अमावस्य का घनघोर अंधकार। इसलिए बिजली से चलने वाली विद्युत शमा से रौशन जहान एक रात के लिए तो ज़न्नत सा ही लगने लगता है।
लेकिन कुछ सही नहीं है तो वो है पटाखों और बमों से होने वाला वायु और ध्वनि प्रदुषण। सब कुछ जानते हुए भी पढ़े लिखे लोग भी स्वार्थ के वशीभूत होकर भावनाओं में बहकर अच्छे बुरे के ज्ञान को भूल जाते हैं और इस धरा को विष धरा बनाने पर तुल जाते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दशहरा की तरह हम दीवाली की आतिशबाज़ी भी निर्दिष्ट स्थान पर सामूहिक रूप से मनाएं। साथ ही इन सभी स्थलों पर बड़े बड़े एयर प्यूरीफायर लगा दें जिससे कि सारा प्रदुषण साथ साथ ही ख़त्म किया जा सके। इस तरह कम लागत में दीवाली पर शारीरिक और मानसिक दीवाला निकलने से बच पाएंगे हम।


Wednesday, October 26, 2016

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ---

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ रक्षा की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई !
हमको तो दीवाली की सफाई मार गई ! -----

तीन तीन नौकरों की मेहनत लगी थी ,
साथ में मशीनों की मशक्कत लगी थी ।
वक्त की पाबन्दी की दिक्कत सच्ची थी ,
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी।
नौकरों को भी भागने की जल्दी मची थी। ----

नकली फूलों से धूल की धुलाई मार गई,
कई फालतू सामान की फेंकाई मार गई।
खाली खड़े खड़े टांगों की थकाई मार गई,
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।
ऐसे में अपनी कामवाली बाई भाग गई।----

वैसे तो हम मोदी जी के भक्त बड़े थे ,
स्वच्छता अभियान के भी पीछे पड़े थे।
पॉलिटिक्स में 'आप' के ना साथ कड़े थे,
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।
लेकिन लेकर हाथ में हम झाडू खड़े थे।----

डर के करते लाइट्स की सफाई मार गई,
गमलों में सूखे पौधों की छंटाई मार गई।
घर भर के साफ पर्दों की धुलाई मार गई ,
अफसर को बनाके नौकर लुगाई मार गई।
अफसर को बनाके नौकर लुगाई मार गई।

किताबों पे देखा कि काफी धूल चढ़ी थी,
मिली वो चीज़ें जो अर्से से खोई पड़ी थी।
क्या रखें क्या फेंकें ये मुसीबत बड़ी थी ,
उस पर डंडा लेकर बीवी सर पर खड़ी थी।
उस पर डंडा लेकर बीवी सर पर खड़ी थी।

अपने लिखे नोट्स की लिखाई मार गई,
वो लव एन्ड बेल्ली की बिकाई मार गई।
अपनी ग्रेज एनेटॉमी से जुदाई मार गई ,
फिर कबाड़ी की तराज़ू की तुलाई मार गई।

बाजारों में नारियों की भीड़ बड़ी थी।
दुकानें भी सामानों से भरी पड़ी थी।
चीनी बहिष्कार की ये शुभ घड़ी थी।
मेड इन इंडिया चेपियों की लगी झड़ी थी।  

वाट्सएप के लेखों की लंबाई मार गई,
आभासी संदेशों की बधाई मार गई ।
दोस्तों के फोन्स की जुदाई मार गई ,
जूए में हारे लाखों की हराई मार गई।

दफ्तर में हम जब बड़े अफ़सर होते थे ,
दीवाली पर कमाई के अवसर होते थे ।
जाने अनजाने लोग गिफ्ट्स लाते थे ,
खुद बॉस और मंत्री जी के घर जाते थे ।

अब बिछड़े गिफ्ट्स की कमाई मार गई ,
दफ्तर में होते जश्न की जुदाई मार गई।  
लोगों से बिछड़े ग़म की तन्हाई मार गई ,
रिटायर होकर दफ्तर से विदाई मार गई।

किसी को तो धर्म की लड़ाई मार गई ,
किसी को गौ रक्षा की दुहाई मार गई।
किसी को प्याज की महंगाई मार गई ,
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई !
हमको बस दीवाली की सफाई मार गई ! -----







Saturday, October 1, 2016

विश्व बुजुर्ग दिवस पर एक पेशकश ---


यह आधुनिक और विकसित जीवन की ही देन है जो बच्चे स्कूल की शिक्षा ख़त्म होते ही घर छोड़ने पर मज़बूर हो जाते हैं , और फिर कभी घर नहीं लौट पाते।
अक्सर सुशिक्षित समाज में मात पिता बुढ़ापे में अकेले ही रह जाते हैं। आज विश्व बुजुर्ग दिवस पर एक रचना , पिता का पत्र पुत्र के नाम :


जीवन के चमन मुर्झा जायें , और हर अंग शिथिल पड़ जायें ।
तुम मुझे सँभालने काम छोड़कर ,  कहीं रहो, पर आ जाना ----

दुनिया का दस्तूर है ये , आखिर घर छोड़ा जाता है ,
पर बिना बच्चों के भी ,  आँगन सूना हो जाता है ।
तुम घर का अहसास दिलाने , इक दिन सूरत दिखला जाना ----

मात पिता का सारा जीवन , पालन में निकल जाता है ,
सपने पूरे होने तक यौवन , हाथों से फिसल जाता है ।
तुम यौवन का संचार कराने , शक्ति बन कर आ जाना -------

जाने कितने व्रत रखे थे  , जाने कितनी मन्नत मांगी थी ,
तेरी खातिर तेरी माता भी , जाने कितनी रातें जागी थी ।
जीवन के अंतिम क्षण पर , तुम अपना फ़र्ज़ निभा जाना ------

जीवन के चमन मुर्झा जायें , और अंग शिथिल पड़ जायें ।
तुम मुझे सँभालने काम छोड़कर ,  कहीं रहो घर आ जाना ----


( जब आँचल रात का लहराये -- इस ग़ज़ल / गीत पर आधारित )

Tuesday, September 27, 2016

ये रेहड़ी और खोमचे वाले .....


शाम के समय लोकल मार्किट के सामने मेंन रोड के फुटपाथ पर खड़े रेहड़ी और खोमचे वाले तरह तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनकी खुशबु वहां से गुजरने वाले लोगों को बेहद आकर्षित करती है। विशेषकर घी में तलती टिक्कियां , पकौड़े और चाऊमीन देखकर ही मुँह में पानी आने लगता है।  खाने वाले भी बहुत मिल जाते हैं , इसलिए धंधा धड़ल्ले से चलता है।

लेकिन सड़क से उड़ती धूल और गाड़ियों का धुआँ देखकर लगता है कि हम हाईजीन के मामले में कितने पिछड़े हुए हैं। अक्सर ये खोमचे वाले नालियों के ऊपर बैठे होते हैं।  एक गंदे से पीपे या जार में पीने का पानी भरा होता है जिसे लोग आँख बंद कर पी जाते हैं।  कड़ाही में डीप फ्राई होते पकौड़े तो फिर कीटाणुरहित हो सकते हैं लेकिन कुलचे छोले वाला छोले तो घर से ही बनाकर लाता है।  और वो किसी फाइव स्टार में नहीं बल्कि किसी अनाधिकृत कॉलोनी में झुग्गी झोंपड़ी में रहता होगा जहाँ न टॉयलेट की सुविधा होगी और न पीने के पानी की।

लेकिन हम हिंदुस्तानी लक्कड़ हज़म पत्थर हज़म होते हैं क्योंकि ज़रा ज़रा सा संक्रमण हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर देता है।  इसलिए छोटा मोटा संक्रमण हमें प्रभावित नहीं करता।  लेकिन विकसित देशों में रहने वाले लोगों में साफ सफाई होने के कारण एंटीबॉडीज न के बराबर होती हैं।  इसलिए उनको भारत जैसे देश में आते ही कुछ भी खाते ही दस्त लग जाते हैं , जिसे ट्रैवेलर्स डायरिया कहते हैं। लेकिन ऐसा ना समझें कि हम सुरक्षित हैं।  संक्रामक रोग सबसे ज्यादा हमारे जैसे देशों में ही होते हैं जिससे हर वर्ष लाखों लोग प्रभावित होते हैं।  आगे तो मर्ज़ी आपकी।