आज से ऑटो एक्सपो ( वाहन मेला ) शुरू हो रहा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे कोई बच्चे पैदा करने का कैम्प लग रहा हो। आज जहाँ देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई आबादी है , वहीँ दिल्ली की समस्या वाहनों की बढ़ती संख्या से फैलता प्रदुषण है। लेकिन ऑटो मैनुफैक्चरिंग कंपनियों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होता है। उनके लिए तो सबसे बड़ी चिंता इस बात की रहती है कि कैसे वाहनों की बिक्री में वृद्धि दिखाएँ। यानि यदि गत वर्ष ५०००० वाहनों की बिक्री हुई तो इस वर्ष का लक्ष्य ६०००० होना चाहिए। यही कारण है कि दिल्ली में वाहनों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है। देखा जाये तो ऑटो कम्पनियाँ लोगों की आदत और शहर की हालत बिगाड़ने में लगी हुई हैं।
अब समय आ गया है कि जहाँ एक ओर बढ़ती आबादी को रोकने के लिए 'वन चाइल्ड नॉर्म ' यानि 'एकल बाल परिवार' आवश्यक है , वहीँ दूसरी ओर वाहनों की बिक्री पर भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए। प्रत्येक कंपनी को मार्किट शेयर अनुसार एक निश्चित संख्या तक ही वाहनों की बिक्री की अनुमति होनी चाहिए। भले ही पूर्व में परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो गया हो , लेकिन जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।
वर्ना जैसा कि किसी शायर ने कहा था कि :
होश आये भी तो क्योंकर तेरे दीवाने को ,
एक जाता है तो दो आते हैं समझने को।
यही सिलसिला चलता रहेगा। और सारे प्रयोग असफल होते रहेंगे।

