Tuesday, September 27, 2016

ये रेहड़ी और खोमचे वाले .....


शाम के समय लोकल मार्किट के सामने मेंन रोड के फुटपाथ पर खड़े रेहड़ी और खोमचे वाले तरह तरह के पकवान बनाये जाते हैं जिनकी खुशबु वहां से गुजरने वाले लोगों को बेहद आकर्षित करती है। विशेषकर घी में तलती टिक्कियां , पकौड़े और चाऊमीन देखकर ही मुँह में पानी आने लगता है।  खाने वाले भी बहुत मिल जाते हैं , इसलिए धंधा धड़ल्ले से चलता है।

लेकिन सड़क से उड़ती धूल और गाड़ियों का धुआँ देखकर लगता है कि हम हाईजीन के मामले में कितने पिछड़े हुए हैं। अक्सर ये खोमचे वाले नालियों के ऊपर बैठे होते हैं।  एक गंदे से पीपे या जार में पीने का पानी भरा होता है जिसे लोग आँख बंद कर पी जाते हैं।  कड़ाही में डीप फ्राई होते पकौड़े तो फिर कीटाणुरहित हो सकते हैं लेकिन कुलचे छोले वाला छोले तो घर से ही बनाकर लाता है।  और वो किसी फाइव स्टार में नहीं बल्कि किसी अनाधिकृत कॉलोनी में झुग्गी झोंपड़ी में रहता होगा जहाँ न टॉयलेट की सुविधा होगी और न पीने के पानी की।

लेकिन हम हिंदुस्तानी लक्कड़ हज़म पत्थर हज़म होते हैं क्योंकि ज़रा ज़रा सा संक्रमण हमारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर देता है।  इसलिए छोटा मोटा संक्रमण हमें प्रभावित नहीं करता।  लेकिन विकसित देशों में रहने वाले लोगों में साफ सफाई होने के कारण एंटीबॉडीज न के बराबर होती हैं।  इसलिए उनको भारत जैसे देश में आते ही कुछ भी खाते ही दस्त लग जाते हैं , जिसे ट्रैवेलर्स डायरिया कहते हैं। लेकिन ऐसा ना समझें कि हम सुरक्षित हैं।  संक्रामक रोग सबसे ज्यादा हमारे जैसे देशों में ही होते हैं जिससे हर वर्ष लाखों लोग प्रभावित होते हैं।  आगे तो मर्ज़ी आपकी।    

Thursday, September 8, 2016

ताज़ -- कुछ बाहर से , कुछ अंदर से .....

किसी की पाक मोहब्बत की दास्ताँ है ये , या कुछ हट कर ख़ास कर दिखाने का ज़नून , यह हम नहीं जानते। लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि विश्व के सात अज़ूबों में यूँ ही नहीं शामिल कर लिया गया है ताज़महल को। ताज़ का अनुपम सौन्दर्य  सिर्फ अंदर ही नहीं ,  बल्कि बाहर से भी देखने वालों को भाव विभोर कर देता है।

यमुना किनारे बना ताज़ , यदि आगरा फोर्ट से देखा जाये , जहाँ से सुना है कि शाहजहाँ कभी देखा करता था , आज भी बहुत खूबसूरत नज़र आता है।


शाहजहां के पास तो बस दूरबीन ही होती होगी देखने के लिए , लेकिन आजकल हाई ज़ूम वाले कैमरे से एक किलोमीटर दूर बने किले से भी ताज़ की खूबसूरती की एक एक लकीर आसानी से देखी जा सकती है।




पर्यटकों के लिए लगाई गई रेलिंग से ताज़ जैसे सामने ही दिखाई देता है।




ताज़ और फोर्ट के बीच यमुना के किनारे किनारे अच्छी और गहरी हरियाली न सिर्फ देखने में अच्छी लगती है बल्कि ताज़ की प्रदुषण से भी रक्षा करती है।




हालाँकि आस पास बस्ती भी नज़र आती है लेकिन पेड़ों की हरियाली उन्हें छुपा लेती है।




ताज़ के अहाते में प्रवेश करते ही यह नज़ारा सदियों से एक जैसा ही दिखाई देता है।  सैंकड़ों सैलानी ताज़ की खूबसूरती को आँखों और कैमरे में कैद करने में लगे रहते हैं।



ठीक सामने बने डायना बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवाने के लिए तो जैसे लाइन ही लगी रहती है और आपका नंबर आने में घंटों में लग सकते हैं।



आजकल यहाँ मरम्मत का काम चल रहा है।



सूर्यास्त के साथ ही परिसर को खाली करने के लिए सुरक्षा गार्ड्स की सीटी बजने लगती है।




उधर यमुना के ऊपर सूर्यदेव पल पल रंग बदलते हुए नेपथ्य में विश्राम करने चले जाते हैं।




यही वो समय होता है जब आप सूर्य देव से आँख मिलाने का साहस कर सकते हैं।




धीरे धीरे सूर्य महाराज क्षितिज में पृथ्वी की गोद में समां जाते हैं , किसी और जहाँ को रौशन करने के लिए और हमें अगले एक और सुनहरे दिन का इंतज़ार करने हेतु छोड़ते हुए । और हम निकल पड़ते हैं , गार्ड की तेज होती सीटी के साथ निकास द्वार की ओर , मन में ताज़ और आस पास के वातावरण की मनमोहक छवि लिए हुए।