Wednesday, February 17, 2016

पत्नी वो होती है जो ---


पत्नी वो होती है जो ,
बोल बोल कर, पति की बोलती बंद कर दे ,
फिर बोले कि आप कुछ बोलते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो  ,
पहले बच्चे को खिला खिला कर बीमार कर दे ,
फिर डॉक्टर से कहे कि ये कुछ खाता क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शॉपिंग तो पति के कार्ड से  करे, उनके कार्ड से ही सारे बिल भरे ,
फिर पति से शिकायत करे कि आप कुछ खर्च करते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
शादी  या पार्टी के लिए सजने संवरने में खुद घंटों लगाये ,
पर लेट होने पर पति से कहे कि आप जल्दी तैयार होते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
बीस रूपये की सब्ज़ी खरीदे , और दस की हरी मिर्च धनिया मुफ्त ले ,
फिर पति से कहे कि खाली हाथ खड़े हो, आप कुछ पकड़ते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
ऑड दिन भी ईवन नंबर की गाड़ी चलाये , पति को करे बाय ,
और कहे कि आप एक ऑड नंबर की गाड़ी खरीदते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
घर पर रहे तो पति से कहे , ये मत खाना वो मत खाना ,
पर मायके से आये तो कहे कि आप पीछे से कुछ खाते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिंदगी होती है पर जीने नहीं देती, नशा होती है पर पीने नहीं देती ,
लेकिन जब पति पीकर घर आये तो कहे कि आप समझते क्यों नहीं !

पत्नी वो होती है जो ,
जिसकी सब बातें मांफ होती हैं, जो चुपके से कान में कहती है ,
मैं बहुत बोर करती हूँ ना , पर आप कभी बोर होते क्यों नहीं ! !



Monday, February 8, 2016

दिन महीने साल गुजरते जायेंगे -- हमारी आस्थाएं ...


हमारी आस्थाएं :

मथुरा से करीब २० किलोमीटर दूर है गोवर्धन।  श्रीकृष्ण जी से सम्बंधित एक छोटा सा क़स्बा जहाँ स्थित है गोवर्धन नाम का पहाड़ , जिसे कहते हैं कभी श्रीकृष्ण जी ने अपनी छोटी उंगली पर उठाया था।  अब यहाँ एक छोटी सी पहाड़ी सी ही है जिसके चारों ओर भक्तजन २१ किलोमीटर की पैदल परिक्रमा कर पुण्य कमाते हैं।
किसी काम से यहाँ जाना हुआ तो हमने भी सोचा कि चलो गाड़ी में बैठकर ही एक चक्कर लगा लिया जाये क्योंकि परिक्रमा करने के लिए पैदल ही एक तरीका नहीं है बल्कि लोग रिक्शा , ऑटो और कार में बैठकर भी परिक्रमा करते हैं। हालाँकि परिक्रमा का असली तरीका है पेट के बल लेटकर कैटरपिलर की तरह चलते जाना।  मेन रोड से परिक्रमा एक गली में शुरू होती है जो पहाड़ी के साथ साथ जाती हुई अनेकों गावों से गुजरती हुई एक इलिप्टिकल सर्कल के रूप में उसी सड़क में आ मिलती है।  सड़क के शुरू में लगभग १०० मीटर तक भिखारियों और साधु बाबाओं की कतार लगी थी। आगे कुछ आश्रम और  धर्मशालाएं दिखी जहाँ रुकने का इंतज़ाम था।  लेकिन एक किलोमीटर के बाद ही एक गांव में ट्रैफिक जैम हो गया।  गांव की कीचड में मुश्किल से गाड़ी रिवर्स कर हम वापस आ गए मेन बाजार में जहाँ सड़क पर ही बने एक मंदिर में भक्तजनों ने हाथ जोड़े और फिर तलाशने लगे खाने के लिए कोई अच्छा सा रेस्ट्रां।

एक धार्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्द होने के कारण यहाँ देश और विदेश से भी सैलानी और आस्थापूर्ण भक्त मंदिरों में दर्शन करने के लिए आते हैं।  इसलिए सड़क पर भिखारियों और साधुओं का जमावड़ा बना रहता है।  धूलभरा यह क़स्बा कहीं से भी विकसित नहीं लगता।  लेकिन एक दुकान पर लगी भीड़ देखकर यह तो समझ में आ गया कि वह यहाँ का सबसे मशहूर ढाबा था।  खाने में पूड़ी और कचौड़ी धड़ल्ले से बिक रही थी।  वैसे देसी घी में बनी कचौड़ी वास्तव में बहुत स्वाद थी।  बस खाने के लिए आदिवासी बनना पड़ा।  दुकान के अंदर भी घी का धुआं और अँधेरा था।  बाहर सड़क पर मथुरा के मशहूर पेड़े जगह जगह बनाये जा रहे थे।

सूटेड बूटेड दिल्ली के शहरी बाबू को देखकर भिखारी भी मक्खियों की तरह मंडरा रहे थे।  किसी तरह वहां से निपटकर हम अपनी गाड़ी में बैठे और चल दिए अपने गंतव्य की ओर यह सोचते हुए कि हमारा देश कितना आस्थाओं का देश है जो आज भी विकास से दूर पौराणिक धार्मिक गाथाओं के वशीभूत होकर जी रहा है।
ढाबे में बैठे इस युवक को यंत्रवत पूड़ी सब्ज़ी डोंगे में डालते हुए , जम्हाई लेते हुए ग्राहकों को देते हुए देखकर लगा कि ये बेचारा तो लगता है सारी जिंदगी यही काम करता रहेगा। शायद दिन महीने साल गुजरते जायेंगे , भक्तजन यहाँ यूँ ही आते जायेंगे।


Wednesday, February 3, 2016

जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है ---


आज से ऑटो एक्सपो ( वाहन मेला ) शुरू हो रहा है।  वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे कोई बच्चे पैदा करने का कैम्प लग रहा हो। आज जहाँ देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई आबादी है , वहीँ दिल्ली की समस्या वाहनों की बढ़ती संख्या से फैलता प्रदुषण है।  लेकिन ऑटो मैनुफैक्चरिंग कंपनियों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होता है।  उनके लिए तो सबसे बड़ी चिंता इस बात की रहती है कि कैसे वाहनों की बिक्री में वृद्धि दिखाएँ। यानि यदि गत वर्ष ५०००० वाहनों की बिक्री हुई तो इस वर्ष का लक्ष्य ६०००० होना चाहिए। यही कारण है कि दिल्ली में वाहनों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है। देखा जाये तो ऑटो कम्पनियाँ लोगों की आदत और शहर की हालत बिगाड़ने में लगी हुई हैं।

अब समय आ गया है कि जहाँ एक ओर बढ़ती आबादी को रोकने के लिए 'वन चाइल्ड नॉर्म ' यानि 'एकल बाल परिवार' आवश्यक है , वहीँ दूसरी ओर वाहनों की बिक्री पर भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए।  प्रत्येक कंपनी को मार्किट शेयर अनुसार एक निश्चित संख्या तक ही वाहनों की बिक्री की अनुमति होनी चाहिए। भले ही पूर्व में परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो गया हो , लेकिन जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।

वर्ना जैसा कि किसी शायर ने कहा था कि :

होश आये भी तो क्योंकर तेरे दीवाने को ,
एक जाता है तो दो आते हैं समझने को।  

यही सिलसिला चलता रहेगा।  और सारे प्रयोग असफल होते रहेंगे।