Thursday, December 31, 2015

जब साल सोलवां आएगा ---


१ जनवरी २००९ को हमने अपना ब्लॉग बनाया था और पहली पोस्ट डाली थी - नव वर्ष की शुभकामनायें।  आज सात साल पूरे हुए और ये ५०० वीं पोस्ट है।  ७ साल का ये सफ़र बहुत बढ़िया रहा , जिसमे हमें लेखन का अच्छा अनुभव हुआ , नए दोस्त मिले और अनेकों लाभदायक पोस्ट लिखने का अवसर मिला।  लेकिन अब हिंदी ब्लॉगिंग में लोगों की कम होती रूचि और फेसबुक / वाट्सएप आदि सोशल मिडिया के कारण ब्लॉग पर पाठकों के ना आने से ब्लॉगिंग में आकर्षण नहीं रहा।  अत : यह हमारी आखिरी पोस्ट है , जो अपने मन पसंद विषय हास्य व्यंग पर आधारित एक समसामयिक कविता के रूप में प्रस्तुत है :

आमचंद्र कह गए सभी से , जब साल सोलवां आएगा ,
पत्नी करेगी कार ड्राईव और , पति खड़ा रह जायेगा।

एक बात नहीं हैं समझे, ग़र पत्नी संग कार में बैठे ,
पति के संग से कैसे हवा में,  प्रदुषण बढ़ जायेगा ।

छूटे सारे वी आई पी ,  ग़र नहीं तू वी ओ पी भी ,
ईवन ऑड के चक्कर से भैया , फिर नहीं बच पायेगा।

बहुत करी है सबने मस्ती , दस बजे आते थे अक्सर ,
दफ़्तर में सरकारी अफ़सर , अब आठ बजे आ जायेगा।  

ग़र कभी हो पत्नी संग जाना , पेट दर्द का करो बहाना ,
सीट पर लेटो रोगी बनकर , चालान नहीं कट पायेगा।

एक तरीका और है भैया , ओढ़ दुपट्टा बन जाओ मैया ,
ग़र ना हो दाढ़ी रामदेव सी, कोई पकड़ नहीं पायेगा ।

ज़हर भरा दिल्ली की हवा में , धुँआ धुआं है सारी फ़िज़ा में ,
ग़र नहीं तू संभला 'तारीफ' ,  चैन से साँस नहीं ले पायेगा।

नोट : दिल्ली में वायु प्रदुषण चरम सीमा पर है।  उसे कम करने में सभी का सहयोग अपेक्षित है।

नव वर्ष २०१६ के सभी पाठकों को हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएं।  

Wednesday, December 23, 2015

पैसे के पीछे कभी तो दौड़ना छोड़िये ---


हालाँकि आजकल मनुष्य की औसत आयु ( लाइफ एक्सपेक्टेंसी एट बर्थ ) लगभग ७० वर्ष है , लेकिन मनुष्य की जिंदगी कब गुजर जाती है , पता ही नहीं चलता।  देखते देखते जवानी बीत जाती है , बच्चे बड़े होकर अपने काम धंधे पर लगकर अपनी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं।  अक्सर ६० वर्ष की आयु तक आते आते अधिकांश लोगों की सांसारिक जिम्मेदारियां पूर्ण हो जाती हैं।  और घर में रह जाते हैं सेवा निवृत पति पत्नी।  इस उम्र में इंसान के खर्च भी बहुत कम हो जाते हैं।  खाने पर , कपड़ों पर तथा अन्य खर्च कम से कम होते हैं।  ज़ाहिर है , इस समय तक इंसान की आवश्यकताएं न्यनतम रह जाती हैं।

लेकिन देखा गया है कि फिर भी इंसान की पैसे की भूख कम नहीं होती। धन कमाने की होड़ ऐसे लगी रहती है जैसे  अगले जन्मों के लिए भी अभी से जोड़ कर रख लेंगे।  भले ही मनुष्य की जिंदगी की अवधि बढ़ गई है लेकिन जिम्मेदारियां पूर्ण होने के बाद जो भी धन कमाया जाता है, वह अक्सर आवश्यकता से अधिक ही होता है और स्वयं के काम आने की सम्भावना बहुत कम ही होती है।  लेकिन लालच की प्रवृति मनुष्य को यह समझने नहीं देती और हम अंधाधुंध पैसे के पीछे दौड़ लगाते रहते हैं।  

बहुत कम लोग होते हैं जो पैसा कमाते भी हैं और उसका उपयोग भी कर पाते हैं।  ज्यादातर तो जोड़ जोड़ कर खुश होते रहते हैं, या जगह जगह प्रॉप्रटी बनाकर गर्वान्वित महसूस करते रहते हैं।  अक्सर ये प्रॉपर्टीज भी यूँ ही खाली पड़ी रहती हैं , और उनके रख रखाव का काम और बढ़ जाता है।  बच्चे अक्सर बड़े होकर बाहर निकल जाते हैं और रह जाते हैं बुजुर्ग जिनके जब तक हाथ पैर चलते हैं , वे चिपटे रहते हैं धन दौलत से।  फिर एक दिन सब यहीं रह जाता है, अंजान बेकद्र सा।

लेकिन इंसान की समझ में यह बात नहीं आती।  बहुत कम लोग अपनी जिंदगी से संतुष्ट नज़र आते हैं।  काश हम यह समझ सकें तो आधा भृष्टाचार तो स्वयं ही समाप्त हो जाये।  लेकिन भृष्टाचार को ख़त्म कौन करना चाहता है , यह तो जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है।  जब तक इंसान की सोच नहीं बदलेगी ,तब तक यह यूँ ही पनपता रहेगा और हम जीते रहेंगे एक मृग मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए।      

Sunday, December 20, 2015

ऑटोग्राफ प्लीज़ ---



कल एक कवि सम्मेलन में हमने, कविता जैसा कुछ सुनाया ,
श्रोताओं का तो पता नहीं भैया, पर अपुन को बड़ा मज़ा आया।
हम बन गए प्रोफेशनल कवि , कुछ ऐसा होने लगा अहसास ,
जब आयोजक ने हमारे हाथ में, एक मोटा लिफाफा थमाया।

हमने सोचा अच्छा है , चलो इस गरीब का भला हो जायेगा ,
कुछ नहीं तो लिफाफा ही ,किसी शादी में काम आ जायेगा।
लेकिन नोट दिखे तो ये सोच कर फ़ौरन जेब के किये हवाले ,
कुछ हाथ नहीं लगेगा, ग़र श्रीमती जी को पता चल जायेगा।


उधर कवि सम्मेलन के बाद कुछ युवाओं ने कर दिया घेराव ,
किसी ने लेखन के टिप्स मांगे, किसी को था ऑटोग्राफ का चाव।  
अभी तक तो साइन और सिग्नेचर ही सदा करते आये थे हम ,
अब ऑटोग्राफ कहाँ से लाएं , ये सोचकर ही होने लगा तनाव।

एक युवक बोला ,
सर बहुत ठण्ड लगती है ,सर्दी में नहाने का कोई उपाय बतायें ,
हमने कहा इतनी मज़बूरी है तो आप स्वेटर पहन कर नहायें।
वो बोला सर कमाल है , यह कैसा दिया अज़ीबो ग़रीब ज़वाब है ,
हमने कहा जब सवाल ही ग़रीब है तो अमीर ज़वाब कहाँ से लायें।

अरे नर्म नौनिहालो तुम्हे गर्म पानी से भी नहाने में लगता है डर ,
ज़रा उनकी तो सोचो जो सियाचिन की ऊंचाइयों पर रहते हैं बेघर।
माइनस २० डिग्री में भी डटे रहते है प्रहरी बर्फ की चादर ओढ़कर ,
गोलियों की बरसात में भी सीमाओं की रक्षा करते है होकर निडर।

माना कि आज की युवा पीढ़ी के लोग हमें रूढ़िवादी समझते हैं ,
लेकिन जिन्हे जीवन का अनुभव है वो बात यथार्थवादी करते हैं।  
पथभ्रष्ट मत हो जाना पश्चिमी सभ्यता की नकल करते करते ,
हम भारतीय विपरीत परिस्थितयों में भी सदा आशावादी रहते हैं।



Wednesday, December 9, 2015

ये ऑड ईवन का चक्कर तो अफ़्सर से आम बना देगा ---


प्रस्तुत है, दिल्ली में बढ़ते प्रदुषण को रोकने के लिए कारों पर लगे प्रतिबन्ध पर एक हास्य व्यंग कविता :


जब से ईवन ऑड की खबर आई है ,
अपने तो मन पर मुर्दनी सी छाई है।
बिन गाड़ी अब ऑफिस कैसे जाएंगे ,
ये सोचकर श्रीमती जी भी घबराई हैं।


कभी कहते थे कि महंगाई ने मार डाला ,
फिर शादी की तो लुगाई ने मार डाला।
दोनों को नियति समझ किया स्वीकार ,
पर अब प्रदुषण की बुराई ने मार डाला।


गाड़ियां तो हैं पर दोनों  की दोनों ईवन,
ड्राईविंग में भी हम रहे सदा नंबर वन।
जो एक गाड़ी को ऑड से स्वैप करले ,
ढूंढ रहे हैं हम बेसब्री से ऐसा इक जन।


आम आदमी तो फिर साईकिल से काम चला लेगा ,
मिडल क्लास गाड़ी छोड़ मोटरसाईकिल उठा लेगा।
हम चिकने चुपड़े खाए अघाये भारी भरकम कहाँ जाएँ ,
ये ऑड ईवन का चक्कर तो अफ़्सर से आम बना देगा।


अब तो सन्डे के सन्डे ही  गाड़ी निकाल पाएंगे ,
या मूंह अँधेरे निकलेंगे, अँधेरे में ही घर आएंगे।
ग़र इमरजेंसी में भी निकाली गलत नंबर की गाड़ी ,
तो पी यू सी होते हुए भी लुटने से नहीं बच पाएंगे।


या तो दफ़्तर एक दिन छोड़कर जाना पड़ेगा,
या फिर दफ़्तर में ही बिस्तर लगाना पड़ेगा ।
ग़र ऑड दिनों में ईवन नंबर की गाड़ी निकाली,
तो अनजान लोगों को गाड़ी में बिठाना पड़ेगा।


हम जानते थे कि एक दिन अच्छे दिन ज़रूर आएंगे ,
जब समस्याओं को हम मिल जुल कर सुलझाएंगे।
पहले हम ऑफिस जाते थे अलग अलग गाड़ियों में ,
अब श्रीमती जी ड्राईव करेंगी और हम बैठकर जायेंगे ।


Wednesday, December 2, 2015

हम नहीं सुधरेंगे ---


सर पर हेलमेट नहीं पर मोबाईल पर स्क्रीन गार्ड लग जाये ,
सर भले ही फट जाये पर मोबाईल पर खरोंच कभी ना आये।

बना लो जितने स्पीड ब्रेकर , हम ब्रेकर को ही ब्रेक कर जायेंगे ,
ब्रेक में से गाड़ी निकाल लेंगे पर गाड़ी में ब्रेक नहीं लगाएंगे ।

सडकों पर ज़ेबरा क्रॉसिंग बनाना सरकार मज़बूरी तुम्हारी है ,
हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं , सारी सड़क ही हमारी है।

जितने मर्ज़ी ओवरब्रिज बना लो , लगा दो रेलिंग छै फुट ऊंची ,
रेलिंग कूद कर फांद जायेंगे , या बिल बना लेंगे खोदकर मिटटी।