Tuesday, April 29, 2014

क्या स्वर्ग या नर्क मे आत्माओं का जमावड़ा है ---एक सवाल !


हाल ही मे हुई एक धार्मिक चर्चा मे शामिल हुए तो कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह गए : 

सनातन धर्मानुसार आत्मा अमर है ! आत्मा का पुनर्जन्म होता रहता है जिससे उसका संसार मे आवागमन चलता रहता है ! 
करोड़ों मे से कुछ ही आत्माएं मोक्ष को प्राप्त होती होंगी ! ज़ाहिर है , बाकी सब आत्माएं आती जाती रहती हैं ! 

यदि आत्मा अमर है तो एनेर्जी ( ऊर्जा ) की तरह वह न तो पैदा की जा सकती है , न ही नष्ट हो सकती है ! सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तित हो सकती है ! 

लेकिन सवाल यह उठता है कि फिर इतनी नई आत्माएं आती कहाँ से हैं ! अकेले हमारे देश मे ही हर वर्ष करीब २ करोड़ लोगों का जन्म होता है ! ये अतिरिक्त आत्माएं कहाँ से आती हैं ? 
दूसरे , स्विड्न और स्पेन जैसे देशों मे , जहां जनसंख्या की वृद्धि दर शून्य से भी कम है , यानि जितने लोग मरते हैं , उनसे कम पैदा होते हैं , वहां की आत्माएं कहाँ जाती हैं ? 
यदि सभी देशों का लेखा जोखा भी मिला दिया जाये तो भी सच यही निकलता है कि पूरे संसार मे जनसंख्या बढ़ रही है ! 
फिर ये आत्माएं कहाँ से आती हैं ? 
क्या स्वर्ग या नर्क मे आत्माओं का जमावड़ा है , जहां से समय समय पर भगवान जी छटनी कर आत्माओं को पृथ्वी पर भेजते रहते हैं ? 

क्या है इन सवालों का ज़वाब ?

Saturday, April 12, 2014

कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया ....


पिछले आम चुनाव मे हम वोट डालने से वंचित रह गए थे . लेकिन कुछ महीने पहले हुए दिल्ली के विधान सभा चुनाव मे लोगों का उत्साह देखकर हम भी आश्वस्त हो गए थे कि अब घर बैठे रहने का समय नहीं रहा . और कुछ हो ना हो , 'आप' के चुनावी मैदान मे आने से दिल्ली और सम्पूर्ण देश मे चुनावों मे वोटों की % संख्या तो निश्चित ही बढ़ गई है . इसलिये इस बार हमने भी द्रढ निश्चय और पक्का इरादा बना लिया था कि अपने मताधिकार का पूर्ण उपयोग करेंगे . 

लेकिन एक छोटी सी समस्या आ रही थी कि वोट किसे दिया जाये . क्या पार्टी के नाम पर वोट दें , या पी एम उम्मीदवार के नाम पर . या फिर व्यक्ति विशेष के गुणों के आधार पर वोट दी जाये . इस बार सवाल ज़रा कठिन सा लग रहा था . आखिर देश के भविष्य का सवाल था . देश को चलाने के लिये एक स्थायी सरकार चाहिये , एक योग्य प्रधान मंत्री और उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत चाहिये . लेकिन हमारे इकलौते वोट से तो हार जीत का फैसला होना नहीं था . उस पर श्रीमती जी का भी पता नहीं था कि किसे वोट देंगी . अब डर यही था कि यदि हम दोनो ने अलग अलग वोट दिये तो दोनो की वोट ही आपस मे कट जाएंगी . 

जब श्रीमती जी से हमने इसका ज़िक्र किया तो उन्होने मानव अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि अपनी मर्ज़ी से वोट देने का अधिकार उन्हे भी प्राप्त है . आखिर स्वतंत्र भारत मे उन्हे भी तो यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वो अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकें . हमने कहा भाग्यवान , आपको पूर्ण अधिकार है लेकिन हम तो बस यह कह रहे थे कि कृपया आप हमारी वोट ना काटें . यह तभी संभव है जब आप उन्ही को वोट दें जिन्हे हम चाहते हैं . और क्योंकि उन्होने स्वयं अभी तक यह निर्णय नहीं लिया था कि किसे वोट दें , इसलिये बेहतर तो यही था कि हमारी बात मान लें . 

वैसे हमने भी जिंदगी मे कई चुनाव लड़े हैं और लड़वाये भी हैं . इसलिये वोट मांगने का अनुभव हमे भी बहुत रहा है . लेकिन पत्नी से वोट मांगना वास्तव मे बड़ा मुश्किल और एक चुनौतीपूर्ण काम था . फिर भी , हमने अपने सारे अनुभव का उपयोग करते हुए और घर मे ही चुनाव प्रचार करते हुए आखिर श्रीमती जी को मना ही लिया कि वो हमारे कहे अनुसार ही वोट देंगी . सरकार ने चुनावी दिन को छुट्टी का दिन घोषित कर दिया था , लेकिन उसे छुट्टी मे परिवर्तित करना हमारे हाथ मे था . इसलिये हमने निर्णय लिया कि सुबह सैर करने के पश्चात ७ बजे मतदान केन्द्र खुलते ही सबसे पहले वोट डालकर हम निवृत हो जायेंगे . वैसे भी यह आवश्यक नहीं कि नहा धोकर ही वोट डाली जा सकती थी . लेकिन केन्द्र पर जाकर देखा कि हमारे पड़ोसी तो हमसे भी पहले वोट डाल कर जा चुके थे . फिर भी , वोट डालकर ९ बजे तक हमने भी अपनी स्याही सुसज्जित उंगली का फोटो फ़ेसबुक के कहने पर फ़ेसबुक पर डाल कर अपनी देशभक्ति की अमिट छाप अंकित करा दी . 
अब कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया

Sunday, April 6, 2014

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता -- भूली बिसरी यादें ...


तब हम नए नए डॉक्टर बने थे . ऊर्जा , जोश और ज़वानी के उत्साह से भरपूर दिल , दिमाग और शरीर मे जैसे विद्युत धारा सी प्रवाह करती थी . काम भी तत्परता से करते थे . सीखने की भी तमन्ना रहती थी . उन दिनों ६ महीने का पहला जॉब सर्जरी डिपार्टमेंट मे किया था . सप्ताह मे दो दिन ओ पी डी होती थी, दो दिन वार्ड मे काम और दो दिन ओ टी जाना होता था . ऐसी ही किसी एक ओ पी डी मे एक दिन एक युवा लड़की अपनी मां के साथ दिखाने आई . सांवली सलोनी सी , घबराई सी , उम्र यही कोई १८ वर्ष . सिख परिवार से थी . उसके एक स्तन मे गांठ थी जिसके उपचार के लिये आई थी . हमने उसे एग्जामिनेशन रूम मे जाकर स्तन दिखाने के लिये कहा तो वह रोने लगी . हालांकि साथ ही उसकी माँ भी खड़ी थी और एकांत का भी पूरा ध्यान रखा गया था , लेकिन लड़की थी कि कपड़े हटाने को तैयार ही नहीं थी . ऐसे मे किसी भी डॉक्टर को गुस्सा आ सकता था क्योंकि ओ पी डी मे भीड़ बहुत थी और एक एक मिनट कीमती था . 

लेकिन समझा बुझा कर आश्वस्त करने की पूरी कोशिश के बावज़ूद भी जब उसने रोना बंद नहीं किया तो हमे जाने क्यों उससे सहानुभूति सी हुई . हमने उसे वहीं रुकने के लिये कहा और बाहर आकर अपने सीनियर कन्सल्टेंट को सारी बात बताई और उनसे अनुरोध किया कि वो खुद लड़की को देख लें . सफेद बालों वाले कन्सल्टेंट लगभग बुजुर्ग से थे और शक्ल से भी शरीफ दिखते थे . उन्होने उसका मुआयना किया और उसे आपरेशन के लिये भर्ती कर लिया . आपरेशन सही सलामत हो गया और जैसा कि अनुमान था , कोई गंभीर रोग भी नहीं निकला 


लेकिन जाने क्या हुआ कि उसके बाद ना सिर्फ वो लड़की बल्कि उसका सारा परिवार हमारा भक्त सा बन गया . लड़की ने तो किसी और डॉक्टर को हाथ लगाने से भी मना कर दिया . अब उसकी सारी देखभाल हमे ही करनी पड़ रही थी . अन्तत : पूर्णतया ठीक होने पर उसे छुट्टी दे दी गई . लेकिन उसके बाद फॉलोअप मे वह हमारे पास ही आती रही और उसका पूरा परिवार भी आत्मीयता दिखाता रहा . ऐसा लगता था जैसे वे हमारे एक सामान्य से व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए थे . 

१३ अप्रैल १९८४ को हमारी शादी हो गई . फिर भी यदा कदा उनका आना जाना चलता रहा था हालांकि अब हम भी काम मे बहुत व्यस्त हो गए थे . फिर ३१ अक्टूबर १९८४ को सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए . उसके बाद उसकी और उनके परिवार की हमे कभी कोई खबर नहीं मिली . आज भी जब कभी याद आ जाती है तो उसका मासूम सा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है . राम जाने ---