Sunday, January 26, 2014

इंसान इंसान पर विश्वास करने लायक हो जाये तो यह संसार रहने लायक हो जाये ---


आजकल शहरों में चिड़ियाएं लगभग गायब ही हो चुकी हैं । लेकिन ऐसा लगता है कि इनकी जगह कबूतरों ने ले ली है।  कबूतरी रंग के ये कबूतर झुण्ड के झुण्ड नज़र आते हैं।  इनकी  बहुतायत से शहरी लोग भी परेशान हो गए हैं क्योंकि ये बालकनी में बैठ कर अपनी बीट से सारी बालकनी को गन्दा कर देते हैं।  इसलिए हमारे आस पास बहुत से घरों में लोगों ने बालकनी को शीशे लगाकर बंद कर दिया है।  लेकिन हमें तो खुला आसमान , खुली हवा और खुला वातावरण ही अच्छा लगता है।  इसलिए हमने अभी तक अपनी बालकनी को खुला ही रखा है।  हालाँकि , इसकी कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है।

जब भी घर बंद होता है , अक्सर जंगली कबूतर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं और घर की बालकनी को ही अपनी टॉयलेट समझ लेते हैं।  हमारे सामने कोई आ भी जाये और शांति से बैठ जाये तो हमारे समीप आते ही शंकित हो उड़ जाते हैं।  इन कबूतरों का हम जैसे शरीफ़ इंसान पर भी अविश्वास अक्सर हमें बहुत खटकता है। अपनी इस असफलता पर हमें बड़ा क्षोभ होता है।



लेकिन एक शाम को अँधेरा होने के बाद जब हमने बालकनी में झाँका तो इस कबूतर को आराम से बैठा पाया। 
सफ़ेद रंग का कबूतर हमारी बालकनी में पहली बार आया था।  इसलिए कौतुहलवश हम उसे देखने के लिए बाहर आ गए।  लेकिन इसने हमारी उपस्थिति को पूर्णतया अनदेखा कर दिया।  परन्तु हम इसके रूप पर मोहित हो चुके थे । इसलिए हमने अपना मोबाइल उठाया और फोटो खींचने की कोशिश की ,लेकिन उसमे अँधेरे की वज़ह से कुछ नहीं आया। एक दूसरे कैमरे में भी फलैश नहीं थी।  अंतत : हमें अपना विश्वासपात्र कैमरा ही निकालना पड़ा जिसमे फलैश थी।  हैरानी की बात यह रही कि हमारे फोटो खींचने पर उसे बिल्कुल भी कोई एतराज़ नहीं था और वह आराम से बैठा फोटो खिंचवाता रहा।     



बालकनी की रेलिंग पर यह सफ़ेद कबूतर इत्मीनान से बैठा था।  न हिल डुल रहा था न कोई प्रतिक्रिया थी।  हमारे बहुत पास जाने पर भी उसने बस हमें ज़रा सी गर्दन घुमाकर ही देखा और अनदेखा कर दिया।  उसका यह दुस्साहस हमें चिंतित करने लगा।  हमें लगने लगा कि कहीं यह बीमार तो नहीं ! एक डॉक्टर के रूप में हमें पक्षियों से मनुष्य को लगने वाली बीमारियों का भी भान था।  इसलिए थोडा सचेत होते हुए हमने उसे हाथ न लगाने का निर्णय लिया।  वैसे भी हमने कभी किसी पक्षी को आज तक हाथ नहीं लगाया था।

रात को ११ बजे जब हम सोने के लिए आये तो देखा वह कबूतर तब भी उसी जगह उसी मुद्रा में बैठा था। हमारे किसी भी हस्तक्षेप पर उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी।  अब हमें वास्तव में चिंता सी सताने लगी थी क्योंकि यह निश्चित सा लग रहा था कि आसमान में स्वतंत्र उड़ान भरने वाला यह सफ़ेद कबूतर भले ही अपने मालिक के घर का रास्ता भूल गया हो लेकिन यदि यह बीमार होने की वज़ह से हुआ था तो हमारे सर पर एक और बीमार की जिम्मेदारी आ पड़ी थी। हमारे सामने एक ऐसा रोगी था जिसके रोग के बारे में हमें कुछ भी पता नहीं था।

अब दो दो चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच मंत्रणा शुरू हुई।  लेकिन दोनों ने से कोई भी पक्षी विशेषज्ञ न होने से हम स्वयं को अनपढ़ सा ही महसूस कर रहे थे।  श्रीमती जी ने कहा कि कहीं इसे बुखार तो नहीं, आप हाथ लगाकर देखिये । हमने कहा भाग्यवान, हाथ लगाकर तो हम इंसान का भी तापमान नहीं देखते , फिर इसका कैसे देखें।इस पर उन्होंने कहा कि चलिए किसी पक्षी हॉस्पिटल को ही फोन किया जाये।  हमने कहा कि पक्षियों के हॉस्पिटल में घायल पक्षियों का ईलाज किया जाता है और यह तो घायल भी नज़र नहीं आ रहा।  वैसे भी रात के ११ बजे हम कहाँ तलाश करते। एक विचार आया कि कहीं यह ठंड में न मर जाये , इसलिए इसे एक कपड़ा उढ़ा देते हैं।  लेकिन फिर लगा कि अभी तो किसी तरह रेलिंग पर पंजे गड़ाए बैठा है , फिर कहीं ऐसा नहो कि यह कपडे के बोझ से ही मर जाये।

आखिर यही सोचा कि इसे भगवान भरोसे ही छोड़ दिया जाये और हम राम का नाम लेते हुए सो गए।  लेकिन सोने से पहले एक प्लेट में खाने के लिए दाने और एक कटोरी में पानी अवश्य उसके पास रख दिया ताकि भूख प्यास लगे तो अपना पेट भर सके।  उस रात नींद भी उचटी सी ही आई।



सुबह ६ बजे जब नींद खुली और उसे वहीं बैठा पाया तो आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई।  थोड़ी रौशनी होने पर हमने उसका एक और फोटो लिया।  अब वह खुशमिज़ाज़ नज़र आ रहा था और पूरी तरह सजग और सचेत था । वहीँ बैठे बैठे वह नित्यप्रति क्रियाक्रम से निवृत हुआ।  लेकिन उसने दाना पानी दोनों को छुआ तक नहीं था।  उसने फोटो तो खिंचवा लिया लेकिन जब हमने उससे बात करने की कोशिश की तो उसने किसी अंजान को  मुँह लगाना उचित नहीं समझा और खिसक कर पोजिशन बदल ली।  ज़ाहिर था , उसे हमसे कोई लेना देना नहीं था।

लगभग ८ बजे उसने छलांग लगाई और खुले आसमान में उड़ान भर ली।  और हम सोचते ही रह गए उस बिन बुलाये मेहमान के  बारे में जो बिन बुलाया तो था लेकिन उसने हमारी मेहमाननवाज़ी को ठुकरा दिया था। हैरान हूँ कि उसे किस ने सिखाया होगा कि किसी अंजान व्यक्ति से लेकर कुछ नहीं खाना चाहिए -- कि मुफ्त का माल समझ कर भी नहीं -- कि किसी अंजान का विश्वास नहीं करना चाहिए !  सोचता हूँ कि क्या वह रतोंधी से ग्रस्त था जो रात होने पर देख नहीं पा रहा था ! या रात में रास्ता भटक गया था ! और यह भी कि वह पालतू था इसलिए हमसे घबरा नहीं रहा था। बेशक , इंसान अपने व्यवहार से पशु पक्षियों का भी मन जीत लेता है। बस इंसान इंसान पर विश्वास करने लायक हो जाये तो यह संसार रहने लायक हो जाये।

अंत में :



मायावती के नॉयडा स्थित हाथियों के पार्क में बैठा यह कुक्कुर हमें देख कर क्या सोच रहा है , यह सोचने की बात है।




Tuesday, January 21, 2014

पत्थरों के शहर मे सामाजिक परिवर्तन का प्रयास -- नॉयडा का राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल --


दिल्ली से नॉयडा जाने वाले  मार्ग पर सेक्टर १५-१६ के सामने सड़क और यमुना पुश्ते के बीच लगभग एक किलोमीटर से ज्यादा लम्बे ८२ एकड़ क्षेत्र में  बना है -- राष्ट्रीय दलित  प्रेरणा स्थल --जिसका उद्घाटन १४ अक्टूबर २०११ में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने  किया था । एक अरसे  तक विवादों में घिरा यह स्थल आखिर अब जनता के लिए खुल गया है।  मात्र १० रूपये का प्रवेश शुल्क देकर प्रवेश करते ही नज़र आता है यह राष्ट्रीय दलित स्मारक। पूरे क्षेत्र को तीन भागों में बांटा गया है जिसके ३६ एकड़ वाले में पहले खंड में बना है यह स्मारक जिसका डोम ४० मीटर ऊंचा है।  



गुलाबी रंग के पत्थरों से बना यह भवन दो चबूतरों पर बनाया गया है।



मुख्य गुम्बद के अंदर स्थापित हैं तीन मूर्तियां -- डॉक्टर भीम राव आंबेडकर , श्री कांशी राम और मायावती जी की कांस्य मूर्तियां।  



मुख्य गुम्बद के बाहर वाले कमरों में सामाजिक परिवर्तन हेतु संघर्षरत महापुरुषों की भव्य प्रतिमायें स्थापित की गई हैं।  चित्र में मायावती अपने मात पिता के साथ।   



पिछले  कक्ष से ।


साइड कक्ष से नज़ारा।



स्मारक के दोनों ओर दस दस हाथियों की प्रतिमाएं कतार में बनाई गई हैं जो स्वागत की मुद्रा में दिखाई गई हैं।




उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में कांस्य से बने ५२ फुट ऊंचे सुन्दर फव्वारे बने हैं।



यहाँ भी हाथियों की मूर्तियां बहुतायत में देखने को मिलती हैं।



फव्वारे से भवन की ओर।




प्रवेश द्वार के पास छोटी सी केन्टीन भी है जहाँ ५ से लेकर १५ रूपये में खाने पीने का  सामान उपलब्ध है।  ज़ाहिर है , यहाँ आम आदमी का पूरा ख्याल रखा गया है।   



पहले खंड से दूसरे और तीसरे खंड में जाने के लिए यह लगभग एक किलोमीटर लम्बी पगडंडी बनी है।  दूसरे खंड में हरियाली युक्त उपवन बनाया गया है।  



३३ एकड़ में बने तीसरे खंड में एक और प्रतीक स्थल बना है जिसके मध्य में १०० फुट ऊंचा ग्रेनाइट से बना स्तम्भ है।  इसके चारों ओर  ११ संतों की कांस्य की १८ फुट ऊंची प्रतिमाएं बनी हैं।



स्तंभ का  आधार।



इस स्थल के सामने बहुत सुन्दर और हरा भरा पार्क है।  दूर क्षितिज में नॉयडा की भव्य व्यवसायिक इमारतें नज़र आ रही हैं।



वापस प्रवेश द्वार पर लौटकर।  स्मारक के सामने बहुत बड़ा ग्रेनाइट में बना अहाता है जो शाम के समय शीशे की तरह चमक रहा था।

इस स्थल के निर्माण में अनुमानत: ७०० करोड़ रुपया खर्च हुआ बताते हैं।  बेशक इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत से भिन्न विचार सुनने को मिलेंगे।  लेकिन एक बात तय है कि मायावती जी ने अपने कार्यकाल में दलितों के संघर्ष और उनके प्रति सामाजिक रवैये में परिवर्तन की दिशा में सराहनीय कार्य किया है जिसे अंतत : सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी। हमारे लिए तो यह स्थान एक बढ़िया पर्यटक स्थल साबित हुआ।  लेकिन गर्मियों में निश्चित ही यहाँ आने के लिए बहुत साहस बटोरना पड़ेगा।  


Wednesday, January 15, 2014

सादा और अनुशासित जीवन , खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है ---



आप २५ वर्ष के युवा हों या ५० वर्ष के अधेड़ , मामला जब दिल का आता है तो सभी आयु वर्ग के लोग दिल के टूटने से घायल होते हैं।  जहाँ पहले अलग अलग आयु में दिल टूटने के कारण भी अलग अलग होते थे , वहीँ आजकल ये दूरियां मिट सी गई हैं और हर आयु में दिल की स्थिति नाज़ुक सी ही बनी रहती है।  
यानि आजकल  युवाओं को भी प्रौढ़ आयु वर्ग के रोग लगने लगे हैं।  यह आधुनिक जीवन शैली का ही परिणाम है कि आजकल युवाओं को भी ह्रदयाघात ( हार्ट अटैक ) होने लगे हैं।   

क्यों होता है हृदयाघात : 

कहते हैं पेड़ अपने फल नहीं खाते , नदियां अपना पानी नहीं पीती।  लेकिन यह भी सच है कि रसोइये को भी खाना खाना पड़ता है , डॉक्टर भी बीमार पड़ते हैं। दिल का मामला भी कुछ इसी तरह का होता है।  सारे शरीर को रक्त पहुंचाने वाले दिल को स्वयं के लिए भी रक्त की आवश्यकता होती है।  



यह काम जो नसें करती हैं उन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहते हैं।  हृदय से एओर्टा द्वारा रक्त सारे शरीर में जाता है।  इसी से निकलती हैं दो धमनियां जिन्हे दायीं और बायीं कोरोनरी आर्टरी कहते हैं।  ये अलग अलग शाखाओं में बंटकर सारे हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुंचाती हैं। यदि इनमे कहीं भी रुकावट पैदा हो जाये तो रक्त प्रवाह में बाधा आ सकती है जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त हृदय के उत्तकों तक नहीं पहुँच पाता । ऐसे में  ऑक्सीजन और ऊर्ज़ा के भूखे उत्तक चिल्लाने लगते हैं जिसे एंजाइना कहते हैं।

मूलत: एंजाइना हृदय की एक  पुकार है आपको याद दिलाने के लिए कि उसे भी खुराक चाहिए जो पूरी नहीं हो पा रही है।  यदि अब भी आपने नहीं सुना तो यह पुकार सदा के लिए शांत हो जाती है , हार्ट अटैक के रूप में।

एंजाइना के लक्षण : 

अक्सर छाती में बायीं ओर होने वाले दर्द को एंजाइना समझा जाता है।  लेकिन सिर्फ दर्द ही नहीं बल्कि किसी भी तरह की चुभन , जलन या भारीपन भी एंजाइना हो सकता है।  इसके अलावा बायीं ओर दांत में दर्द , कंधे में दर्द या बाजु में होने वाला दर्द भी एंजाइना हो सकता है।  पसलियों के बीच पेट के ऊपरी हिस्से ( एपीगेस्ट्रियम) में होने वाले दर्द या जलन को अक्सर एसिडिटी मान लिया जाता है जबकि यह भी एंजाइना हो सकता है।  दर्द के साथ यदि पसीना भी आ गया है या घबराहट होने लगी है या दिल में धड़कन महसूस हो रही है तो यह एंजाइना होने के स्पष्ट संकेत हैं।

कारण : 

हमारे शरीर की धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल का जमाव निरंतर होता रहता है।  यह बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। यूँ तो कॉलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक पदार्थ है लेकिन इसकी अत्यधिकता भी उतनी ही हानिकारक है।  धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल जमने से इनमे अवरुद्ध पैदा होता है जो रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है।  रक्त प्रवाह कम होने से शरीर के विभिन्न अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  लेकिन इसका सबसे ज्यादा कुप्रभाव  हृदय पर ही पड़ता है।  हृदय में यह एंजाइना के रूप में सामने आता है।  लेकिन यदि इस तरह की अवरुद्ध धमनी में अचानक कोई रुकावट आ जाये तो हार्ट अटैक हो जाता है। अक्सर ऐसा क्लॉट बनने से होता है।

कारक : 

हृदयाघात में फैमिली हिस्ट्री बहुत महत्त्वपूर्ण है।  यानि यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु हृदयाघात से हुई है या निकट सम्बन्धियों में हृदय रोग है तो आप भी रिस्क पर हैं।  इसके अलावा निष्क्रिय जीवन शैली , मोटापा , हाई बल्ड प्रेशर , डायबिटीज , हाई कॉलेस्ट्रॉल , धूम्रपान ,  मानसिक तनाव आदि ऐसे कारक हैं जो हृदयरोग को बढ़ावा देते हैं।

रोकथाम : 

नियमित व्यायाम , आहार नियंत्रण , नियंत्रित वज़न , बल्ड प्रेशर और शुगर कंट्रोल और तनाव रहित जीवन जीने से हृदयाघात की सम्भावना निश्चित रूप से कम हो जाती है। नियमित रूप से ४५ मिनट की पैदल  यात्रा सबसे बढ़िया व्यायाम है।  खाना उतना ही खाया जाये जितना आवश्यक है।  यानि सिर्फ जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जीयें ।  मोटा होना सेहतमंद नहीं सेहतबंद होने की निशानी है।  धूम्रपान से हीरो नहीं ज़ीरो होने का रास्ता खुलता है। अंतत : घर का बना खाना ही सर्वोत्तम है, पिज़्ज़ा, बर्गर , मोमोज , नूडल्स आदि तत्काल आहार सेवा जीवन का अंतकाल है।   

उपचार : 

फिर भी यदि एंजाइना हो ही जाये तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।  सबसे पहले ई सी जी किया जायेगा , लेकिन एंजाइना होने पर एंजिओग्राफी लगभग आवश्यक हो जाती है।  इस टेस्ट से धमनी में रुकावट की स्थिति और गम्भीरता का पता चलता है।  यदि रुकावट चिकित्सा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पायी जाती है तो स्टेंट डालना आवश्यक होता है।

हार्ट अटैक : 

हार्ट अटैक होने पर तुरंत पास के हॉस्पिटल में जाना चाहिए। ऐसे में एक एक मिनट कीमती होता है।  अक्सर हार्ट अटैक धमनी में क्लॉट बनने से अचानक हुई रुकावट के कारण होता है।  ऐसे में इंजेक्शन द्वारा क्लॉट को विघटित करने का प्रयास किया जाता है।  इसे थ्रोम्बोलाइजेशन कहते हैं।  क्लॉट के घुलने से बंद हुई धमनी खुल जाती है और रक्त प्रवाह होने लगता है।  इस तरह हृदय की मांसपेशियाँ मृत होने से बच जाती हैं।  यह कम एक घंटे में हो जाये तो सर्वोत्तम है , हालाँकि ३ घंटे तक भी फायदा होने की सम्भावना रहती है। लेकिन जितना जल्दी किया जायेगा ,  फायदा भी उतना ज्यादा होगा।

आधुनिक अस्पतालों में जहाँ एंजिओग्राफी की सुविधा होती है वहाँ तुरंत स्टेंट डालकर धमनियों को खोल दिया जाता है।  यह एक बढ़िया ईलाज़ है और आजकल बहुत उपयोग में लाया जा रहा है।  लेकिन दो से ज्यादा धमनियों में ब्लॉक होने पर बाईपास सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। हालाँकि , उम्र भर दवाईयों का दास तो फिर भी होना ही पड़ता है।

इसलिए रोकथाम में ही भलाई है।  सादा और अनुशासित जीवन ,  खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है।   


Sunday, January 5, 2014

सड़क पर लगे बेरीकेड -- आपका इम्तिहान !


आज एच टी में करन थापर का पुलिस बेरिकेडिंग पर लिखा दिलचस्प लेख पढ़कर हमें अपनी सालों पहले लिखी एक हास्य व्यंग कविता याद आ गई। लीजिये आप भी पढ़िए और देखिये कितनी समानताएं हैं दोनों में।  


सड़क पर पुलिस के बैरिकेड गड़े थे ,
ट्रैफिक जाम में फंसे हम बेचैन खड़े थे ।

मैंने एक पुलिसवाले से पूछा, भई कितने आतंकवादी पकड़े ?
वो बोला -एक भी नहीं , सुबह से ख़ाली खड़े हैं ठण्ड में अकड़े ।

मैंने कहा तो फिर इसे हटाओ, क्यों बेकार समय की बर्बादी करते हो ।
वो बोला -चलो थाने, मुझे तो तुम्ही कोई आतंकवादी लगते हो ।

मैंने कहा --थाने क्यों चलूँ  ,मैंने क्या जुर्म किया है ?
वो बोला -नहीं किया तो करो, मैंने कब मना किया है ।

पर ज़नाब जुर्माना तो देना पड़ेगा ,
तुमने इक पुलिसवाले का वक्त घणा लिया है ।

अरे यदि तुमने मुझे बातों में ना जकड लिया होता ,
तो अब तक मैंने एक आध आतंकवादी तो ज़रूर पकड़ लिया होता ।

अब कैसे करूँगा मैं भरे पूरे परिवार का भरण पोषण ,
जब आतंकवादी ही न मिला, तो कैसे मिलेगा आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन ।

अच्छा मोबाईल पर बात करने का निकालो एक हज़ार रूपये जुर्माना ।
मैंने कहा -मेरे पास तो मोबाईल है ही नहीं,मैं तो ऍफ़ एम् पर गुनगुना रहा था गाना ।

तो फिर ये बताओ आपने गाड़ी पचास के ऊपर क्यों चलाई ?
मैंने कहा -ये खटारा ८६ मोडल चालीस के ऊपर चलती ही कहाँ है भाई ।

रेडलाईट के १०० मीटर के अन्दर हॉर्न तो ज़रूर बजाया होगा ।
मैंने कहा -हॉर्न तो तब बजाता जब हॉर्न कभी लगवाया होता ।

फिर तो चलान कटेगा गाड़ी में हॉर्न ही नहीं है ,
मैंने कहा --सामने से हट जाओ, इसमें ब्रेक भी नहीं है ।

इस पर वो बोला - आपकी गाड़ी के शीशे ज़रुरत से ज्यादा काले हैं ।
मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा ज़नाब, आप भी इन्स्पेक्टर बड़े निराले हैं ।

ज़रा आँखों से काला चश्मा हटाओ, और आसमान की ओर नज़र घुमाओ।
अरे यह तो कुदरत की माया है, काले शीशे नहीं , शीशे में काले बादलों की छाया है ।

थक हार कर वो बोला, अच्छा कम्प्रोमाइज कर लेते हैं ।
चलो सौ रूपये निकालो, जुर्माना डाउनसाइज कर देते हैं ।

पर सौ रूपये किस बात के, यह बात समझ नहीं आई ?
वो बोला दिवाली का दिन है, अब कुछ तो शर्म करो भाई ।

अरे घर से बार बार फोन करती है घरवाली।
दो दिन से यहाँ पड़े हैं, हमें भी तो मनानी है दिवाली ।

मैंने कहा -यह बात थी तो हमारे अस्पताल चले आते ।
और हम से दो चार दिन का नकली मेडिकल ले जाते ।

यह कह कर तो मैंने उसका गुस्सा और जगा दिया ।
वो बोला मैं गया था, लेकिन आपके सी एम् ओ ने भगा दिया ।

और अब जो खाई है कसम , वो कसम नहीं तोडूंगा।
और मां कसम उस अस्पताल के डॉक्टर को नहीं छोडूंगा ।

और जब मुक्ति की कोई युक्ति समझ न आई ।
तो अगले साल का प्रोमिस देकर ही जान छुड़ाई ।


अगले दिन मैं घर से बिना सीट बेल्ट बांधे ही निकल पड़ा था ।
वो पुलिसवाला उसी जगह उसी चौराहे पर मुस्तैद खड़ा था ।

पर उस दिन वो निश्चिंत था , अपनी धुन में मस्त था ।
उसने मुझे न टोका , न गाड़ी के सामने आकर रोका ।

क्योंकि भले ही कोई आतंकवादी न मिला हो
इस वर्ष दिवाली पर कोई बम नहीं फूटा ।

हमारे पुलिस वाले कितनी विषम परिस्थितियों में काम करते हैं । 
इसके लिए हम इनको कोटि कोटि सलाम करते हैं ।