Sunday, September 29, 2013

यहाँ आम आदमी भी आम से ज्यादा खास होता है ---


गत सप्ताह लखनऊ का दौरा कर, इस सप्ताह चंडीगढ़ में दो दिवसीय सी एम् ई कम वर्कशौप में शामिल होने का अवसर मिला जिसमे स्वास्थ्य सेवाओं से सम्बंधित कानूनी विषयों पर चर्चा और विचार विमर्श का कार्यक्रम था। सुबह ७ .१० की स्पाइस जेट की फ्लाईट ७ बजे ही हवा में थी और जहाँ पहुँचने का समय ८.१५ का था ,  वहीँ पौने आठ बजे ही चंडीगढ़ पहुँच गई थी। समय से पहले ही उड़ान भरने और गंतव्य स्थान पर पहुँचने को निश्चित ही समयानुकूल तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक सुखद अनुभव तो रहा।
दो दो की पंक्तियों में छोटी छोटी सीटों वाला यह विमान छोटा सा लेकिन बड़ा क्यूट सा था। साफ सुथरा विमान देखकर सचमुच बड़ी प्रसन्नता हुई। हालाँकि इसमें एयर हॉस्टेस की जगह सवा छै फुट की हाईट के दो ज़वान विमान परिचारिका का काम कर रहे थे। यदि उनकी ऊंचाई और एक आध इंच ज्यादा होती तो शायद विमान की छत से टकरा जाते। पौन घंटे की फ्लाईट में खाने की भी कोई विशेष आवश्यकता न होने से समय यूँ ही पेटी बंद करने और खोलने में कब निकल गया , पता ही नहीं चला।

वापसी में कालका शताब्दी से आने का कार्यक्रम था। प्रथम श्रेणी की टिकेट न मिलने के कारण चेयर कार से ही काम चलाना पड़ा। सोचा तो यही था कि ट्रेन की सीटें विमान की इकोनोमी श्रेणी की सीटों जितनी तो होंगी ही। साइज़ तो बेशक उतना ही था लेकिन सीटों पर चढ़े कवर्स की हालत देखकर बड़ा खराब लगा। ज़ाहिर है , हमारे देश में आम और खास में सदा ही अंतर रहा है। इस श्रेणी में यूँ तो सफ़र करने वाले निश्चित ही आम आदमी ही थे लेकिन शायद हमारे देश में असली आम आदमी वे होते हैं जो द्वितीय श्रेणी या अनारक्षित डिब्बों में यात्रा करते हैं।

ट्रेन का सफ़र मनोरंजक भी हो सकता है और कष्टदायी भी। साढ़े तीन घंटे के पूरे सफ़र में एक बच्चे और एक युवक ने तमाशा बनाये रखा। दो साल की बच्ची ने अपने मां पिताजी की नाक में दम कर दिया। कभी मां की उंगली पकड़ डिब्बे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की सैर , कभी पिता के साथ। उस पर तलवार की धार सी पैनी आवाज़ में चीं चीं करती बच्ची ने सचमुच हमें भी नानी याद दिला दी। कहने को तो बच्चे भगवान का ही रूप होते हैं और अच्छे और प्यारे भी लगते हैं , लेकिन असमय और अवांछित प्यार भी कहाँ हज्म होता है। उधर पीछे वाली सीट पर बैठा एक युवक जो बिजनेसमेन था , लगातार मोबाईल पर बात किये जा रहा था।  कुछ समय बाद वह खड़ा हो गया और द्वार के पास खड़ा होकर बात करता रहा। लगभग ढाई घंटे तक वह लगातार बात करता रहा। उसका और उसके फोन का स्टेमिना देखकर एक ओर हम हैरान भी थे , वहीँ दूसरी ओर उस पर दया सी भी आ रही थी क्योंकि फोन पर वह बिजनेस की परेशानियाँ भुगत रहा था। इस बीच बाकि यात्री तो तरह तरह के पकवानों का आनंद लेते रहे और वह बेचारा माल की सप्लाई , ट्रकों का प्रबंध और पैसे के इंतज़ाम की ही बात करता रहा। आखिर उसके फोन की बैटरी जब ख़त्म हो गई , तभी वह अपनी सीट पर बैठा। तब भी उसने मोबाइल को चार्जर पर लगाया और फिर बात करने लगा। न खाया , न पीया , बस बात ही करता रहा।

हम भी ढाई घंटे तक बच्ची के मात पिता और युवक के माथे पर पड़ी एक जैसी शिकन को देखते रहे और सोचते रहे कि जिंदगी भी कितनी कठिन हो सकती है। यह दृश्य तो ऐ सी चेयर कार का था, फिर जाने साधारण श्रेणी के डिब्बों के यात्रियों का क्या हाल होता होगा। यह सोचकर ही असहज सा महसूस होने लगता है।

              

Sunday, September 22, 2013

एक दिन अवध के नाम जहाँ लोग करते थे पहले आप , पहले आप --


आज से लगभग तीस वर्ष पहले जब पहली बार एयर इंडिया के महाराजा से हवाई यात्रा की थी तब स्वयं को एक वी आई पी जैसा महसूस किया था. यह एयरलाइन भी तब यात्रियों के साथ शाही मेहमान की तरह ही व्यवहार करती थी. सबसे पहले तो विमान में बैठते ही अत्यंत सुन्दर परियों सी एयर होस्टेस के दर्शन होते थे. फिर वो अपने सुन्दर हाथों से टॉफी परोसती थीं. हमें याद है जब पहली बार हमने हवाई यात्रा की और एयर होस्टेस जब एक ट्रे में इयर प्लग और टॉफियाँ लेकर आई तब हमने तो डरते डरते एक ही टॉफी उठाई, लेकिन साथ वाली सीट पर बैठे एक महानुभव ने जब मुट्ठी भरकर टॉफियाँ उठाई तब एयर हॉस्टेस ने उसे अजीब सी निगाहों से देखा था. उसके बाद आरंभिक औपचारिकताओं के बाद जब प्लेन उड़ान भर चुका और बेल्ट खोलने का संकेत हुआ तो फ़ौरन एयर हॉस्टेस प्लेट में कुछ लेकर हाज़िर थी. हमने सुना था कि एयर इंडिया वाले उड़ान के दौरान बहुत खातिरदारी करते हैं. लेकिन जब प्लेट में अनेक क्रीम रोल्स रखे नज़र आये तो यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि खाने की शुरुआत क्रीम रोल से ! लेकिन जब हाथ में आया तब समझ में आया कि वे सफ़ेद रंग के रोल्स खाने के क्रीम रोल्स नहीं बल्कि मूंह पोंछने के लिए गर्म गीले तौलिये थे. खैर , हाथ मूंह पोंछकर हम खाने के लिए तैयार थे और खाना भी खूब खिलाया गया. 

लेकिन अभी जब एक बार फिर एयर इंडिया से यात्रा करने का अवसर मिला तो लगा कि वक्त कितना बदल गया है. एयर हॉस्टेस तो अब भी थीं लेकिन आकर्षक सिर्फ साड़ियाँ ही थीं. खाने पीने के नाम पर बस एक दो सौ एम् एल की जूस की बोतल और दो बिस्कुट। दो सौ एम् एल की पानी की बोतल भी बस मांगने पर ही. वापसी में तो बिस्कुट की जगह २ ५ ग्राम भुनी हुई मूंगफली जिसे खाकर सभी ऐसे आनंदित हो रहे थे जैसे रेगिस्तान में बिसलेरी मिल गई हो. लगता है अब वो दिन भी दूर नहीं जब अगली बार भुने हुए चने खाकर ही संतोष करना पड़ेगा।                 
 


अगली सीट की बैक पर लगे मोनिटर में यह सन्देश उड़ान के पूरे समय आता रहा. लेकिन गंतव्य शहर आ गया पर कार्यक्रम आरम्भ नहीं हुआ. आखिर आते जाते दोनों समय द्वार पर हाथ जोड़े खड़ी एयर हॉस्टेस की मधुर मुस्कान से ही महाराजा होने का क्षणिक अहसास हुआ.

बेड टी घर पर , नाश्ता और लंच लखनऊ में , फिर डिनर वापस घर आकर. अक्सर ऐसा कार्यक्रम कॉर्पोरेट जगत में देखा जाता है. लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ , जीवन में पहली बार. गुजरे ज़माने में नवाबों की नगरी लखनऊ के बारे में सुना था कि यह कोई विशेष शहर नहीं। हालाँकि लखनवी तहज़ीब के बारे में बहुत सुना था. लेकिन पता चला कि सुश्री मायावती जी ने इस शहर की कायापलट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।       


गोमती नदी के किनारे बने डॉ भीम राव अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल द्वार से होकर नदी पार कर पहुँचते हैं धोलपुर पत्थर से बने  स्थल पर.



गोमती नदी के पार एक बहुत बड़े क्षेत्र में बना है यह पत्थरों का शहर जो निश्चित ही देखने में बड़ा चक्षु प्रिय लगता है. इस भवन में बना है एक ऑडिटोरियम।



नदी के किनारे किनारे यह सड़क जिसके दोनों ओर शाम के समय बैठकर निश्चित ही रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी से काफी राहत मिलती होगी।

इसी के दूसरी ओर कई दुकानें बनाई गई थी जो अब खाली पड़ी थी. पता चला यहाँ शाम को शानदार मेला सा लगता है. वास्तव में यह स्थान लखनऊ वासियों के लिए एक नया जीवन दान देने वाला लगता है.

बेशक इसे बनाने में सरकार या यूँ कहिये की पब्लिक फंड को भारी मात्रा में लगाया गया होगा। लेकिन अब इन्हें यूँ बेकद्री से पड़े देखकर आजकल की राजनीति पर क्षोभ ही होता है. राजनीतिक पार्टियों के  बीच फंसकर यदि कोई बेवकूफ़ बनता है तो वह आम जनता ही है. नेता लोग तो अपने व्हिम्स और फेंसी के तहत अपनी मनमर्जी करते हैं और जनता बेचारी खड़ी बस तमाशा देखती रह जाती है.


Sunday, September 15, 2013

रंग जो लाई हैं दुआएं , अब उतरने न पाए --

ब्लॉगिंग और फेसबुक की जंग में फेसबुक जीतता नज़र आ रहा है. इसका कारण है लगभग सभी ब्लॉगर्स का फेसबुक की ओर प्रस्थान करना।  हमने जान बूझकर फेसबुक पर भी अधिकांश ब्लॉगर्स को ही मित्र बनाया है. लेकिन सभी ब्लॉगर मित्र फेसबुक पर नहीं हैं , इसलिए उनके लिए प्रस्तुत हैं , फेसबुक पर प्रकाशित कुछ एकल पंक्तियाँ जो कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं :
   
* अब तो अडवाणी जी को भी समझ आ गया होगा कि भा ज पा में सिर्फ कुंवारे ही पी एम बन सकते हैं !

   यह अलग बात है कि यह फ़ॉर्मूला अब उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी भी अपना रहे हैं.  

* कभी कभी ऐसा लगता है , कि हम इस समाज में रहने योग्य ही नहीं !        
                                                                                                
  लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ !                                                             
                                                                                                
* लखनऊ में : पहले आप ! पहले आप !  दिल्ली में : पहले मैं ! पहले मैं !      
                                                                                               
  जाने दिल्लीवाले इतने मिमियाते क्यों हैं !                                          
                                                                                                                                                                                              
* टी वी पर देखा तो ये ख्याल आया : क्यों न डॉक्टरी छोड़कर हम भी कृपा       दृष्टि से ही उपचार करना शुरू कर दें !                                                   
                                                                                                 
 लेकिन सोचते हैं यदि कृपा नहीं आई तो पब्लिक क्या हस्र करेगी !                
                                                                                                
* यदि ज़रूरी मीटिंग के बीच पत्नी का फोन आ जाये तो आप क्या करेंगे ?   
                                                                                                क्या करेंगे जब एक ओर कुआँ हो और दूसरी ओर खाई !                        
                                                                                              
* अक्सर दंगों में मरने वाले मासूम ही होते हैं.                                      
                                                                                              
   नामासूम ना मालूम किस जहाँ में छुप जाते हैं !                                 
                                                                                              
* आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे !                                        
                                                                                              
   दुआ तो रंग ले आई. अब यही देखना है कि यह रंग कब तक टिकता है !    
                                                                                              
* कितना आसां है आसाराम बन जाना।                                              
                                                                                              
   हम तो राम बनने की आस में जीते हैं !                                            
                                                                                              
* दुनिया में दिमाग वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन व्यापक दिमाग वाले   बहुत कम मिलते हैं.                                                                      
                                                                                               
   आखिर दिमाग की बात है , समझने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा।          
                                                                                              
* फेसबुक ही एक ऐसा माध्यम है जहाँ अक्सर लाइक का मतलब लाइक नहीं होता !                                                                                        
                                                                                               
फेसबुक ने हर हालात में हमें खुश रहना सिखा दिया है.                            
                                                                                               
* यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू पा ले, तो सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है।                                                                                           
                                                                                              
यह अलग बात है कि मोक्ष धाम में करने को कोई काम नहीं होता।             
                                                                                              
* बापू की ज़वानी का राज़ क्या है --- हम भी आश्चर्यचकित हैं !                 

आश्चर्यचकित तो इस बात से भी हैं कि अब बापुओं पर भी ज़वानी रहती है.  


और अंत में एक सवाल जिस पर आपने पूरा शब्द कोष ही सामने ला कर रख दिया --सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल को हिंदी में क्या कहेंगे ! इस पर चर्चा अगली पोस्ट में.    



नोट : ब्लॉगिंग और फेसबुक में जंग अभी जारी है.देखते हैं आगे क्या होता है !  



Thursday, September 12, 2013

काश किसी गुरु की कृपा हम पर भी होती ---


टी वी पर बाबाओं की धूम देख कर समझ नहीं आता कि हालात पर हसें या रोयें ! फिर सोचा चलो कविता ही रची जाये :


ज़वानों की  जुबानी सुनी, लाख तरकीबें अपनाई,
पर ज़वानी जो गई एक बार, फिर लौट कर ना आई !

दिल में थी आरजू कि लहराएँ अपनी भी जुल्फें,
हेयर कटिंग भी हमने तो हबीब के सैलून से कराई !

बालों को रंगाया कभी रोगन कभी मेहंदी से,
पर अब तो सर पर बाल ही कितने बचे हैं भाई !

गालों पर कराया फेसियल शहनाज़ का ,
लेकिन झुर्रियों में ज़रा सी कमी तक ना आई !

चेहरे पर लगाया वैदिक एंटी सन लोशन ,
काम बाबा रामदेव की ज़वानी क्रीम भी ना आई !

हसीनों संग करते थे कनअंखियों से आँख मिचोली ,
अब मोतिया बिंद से ही बंद है इन आँखों की बिनाई !

आसां नहीं है दुनिया में आसाराम बन जाना ,
हाथ मलते रह जाओगे ग़र गुरु कृपा ही ना आई !

खामख्वाह दम भरते हैं ज़वानी का ' तारीफ ' ,
साँस रुक जाती है जब लट्ठ लेकर सामने आती है ताई !

नोट : कृपया इसे शुद्ध हास्य के रूप में ही पढ़ें। अर्थ का अनर्थ निकालकर आत्मविश्वास न खोएं।  


Sunday, September 8, 2013

सच्चा मन का मीत --- एक वृद्धावस्था प्रेम वार्तालाप ....


कई साल पहले की बात है। बैठे बैठे यूँ ही विचार आया कि जब पति पत्नी ७० साल पार कर जाते हैं , तब उनका प्रेम वार्तालाप कैसा होता होगा ! कल्पना शक्ति का सहारा लेकर कुछ यूँ ख्याल आए :
  
  १ ) पति :

प्रिये याद करो वो दिन,
जब तुम्हारी एक हंसी पर, हम हुए थे फ़िदा ।
अब बदल गया वो मंज़र ,
अब ना मूंह में दांत रहे, ना वो हसीं अदा 

जिन आँखों में झलकते थे मोती,
अब मोतिया देता है दिखाई 

सुन लेती थी तुम दिल की धड़कन भी दूर से
अब कानों में मशीन लगी पर, आवाज़ भी  दे सुनाई 

काली लहराती सावन की घटा सी थी तुम्हारी जुल्फें
अब खोला करों  इनको , रामसे फिल्म्स की नायिका देती हो दिखाई 


२ ) पत्नी :  ( एक के बदले तीन ) :


कभी रात रात भर करते थे मीठी बातें,
अब बात बात पर करते हो लड़ाई 

दिखाते थे नाईट शो में जेम्स बांड की फ़िल्में 
अब चुपके से अकेले में देखते हो जलेबी बाई  

रोज सुबह शाम लगाते थे जिसके चक्कर
अब उस गली का नाम तक याद नहीं 

उड़ाते थे गुलाब जामुन , ज़लेबी कभी हलवा
अब करेले के सिवाय कुछ सवाद नहीं 

कभी शेरों के शिकार की सुनाते थे दास्ताँ
अब सत्यम के शेयरों में सब गँवा कर बैठे हो 

दावा करते थे खाने का सीने पे गोलियां
मियां अब गोलियां खाकर ही जीते हो 

जिन सांसों में समाई थी यौवन की खुशबु
अब गार्लिक पर्ल्स की गंध आती है 

और ये साँस भी मुई अब तो 
बिना इन्हेलर के कहाँ आती है ।

कभी दिल की नस नस में बसे थे हम
सुना है अब वहां स्टेंट निवास करते हैं.

फिर भी सनम हर हाल में हम तो
बस तुम्ही पर विश्वास रखते हैं.  

३ ) 

जीवन के सब उपवन , जब मुरझा जाते हैं
तब पति पत्नी ही बस , इक दूजे संग रह जाते है 

यौवन की तपन हो या , वृधावस्था की शीत 
हर पल साथ निभाए जा , सच्चा मन का मीत 

   

Wednesday, September 4, 2013

विवाहित पुरुष को पत्निव्रत होना और सन्यासी को पूर्ण रूप से स्त्री से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ----


मनुष्य समेत सभी जीवों के जीवन में दो ही ऐसी मूल आवश्यकताएं हैं जिन पर जीवन पूर्णतया आश्रित रहता है. एक भोजन और दूसरा यौन क्रिया ( सेक्स । जहाँ भोजन मनुष्य को जीवित रखता है और उसे जीवित रहने के लिए समर्थ बनाता है , वहीँ यौन क्रिया जीवन का स्रोत है और पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों की नस्ल को बनाये रखता है. लेकिन यौन क्रिया एक ऐसा विषय है जिस पर हमारे समाज में खुल कर बात करने में अभी भी संकोच होता है. इसका एक कारण तो यह है कि यह विषय एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मामला समझा जाता है. हालाँकि जब इसका दुरूपयोग होता है तब यह व्यक्तिगत मामला एक सार्वजानिक विषय बन जाता है जिसके परिणाम भी भयंकर होते हैं. इसलिए आज इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि आज की युवा पीढ़ी को यौन शिक्षा प्रदान की जाये।

बच्चों के शारीरिक विकास में यौन विकास सबसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है. इस आयु अवस्था में न सिर्फ बच्चे के शरीर में परिवर्तन दिखाई देते हैं बल्कि उसकी सोच और आचरण में भी बदलाव नज़र आता है. इसका कारण है शरीर में सेक्स हॉर्मोन्स का बढ़ना। लड़कों में टेस्टोस्टिरोंन और लड़कियों में इस्ट्रोजन हॉर्मोन्स को सेक्स हॉर्मोन कहा जाता है.

टेस्टोस्टिरोंन : यह मेल सेक्स हॉर्मोन है जिससे शरीर में यौन अंगों का विकास होता है जिन्हें सेकंडरी सेक्स केरेक्टर्स कहते हैं. यही ज़वानी के लक्षण भी कहे जा सकते हैं. यही वह हॉर्मोन है जिससे यौन इच्छा ( लिबिडो ) बनी रहती है और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) भी. हालाँकि रक्त में इसका स्तर एक आयु के बाद कम होने लगता है , लेकिन अक्सर लम्बी आयु के बाद भी शरीर में टेस्टोस्टिरोंन पर्याप्त मात्रा में रहता है जिससे वृधावस्था में भी पोटेंसी बनी रहती है.

स्वप्नदोष : युवावस्था में इस हॉर्मोन की मात्रा अधिक होने से लिबिडो और पोटेंसी दोनों चरम सीमा पर होते हैं. यह सत्य युवाओं के लिए समस्या भी बन जाता है. युवावस्था आने पर वीर्य का निर्माण भी होने लगता है जो एक निरंतर प्रक्रिया है. शरीर के यौन अंगों में वीर्य को संग्रह करने की क्षमता सीमित होती है. इसलिए समय समय पर वीर्य स्खलन आवश्यक होता है. विवाह पूर्व ऐसा संभव नहीं हो पाता। इसलिए एक अवधि के बाद वीर्य स्खलन स्वत: ही सोते समय हो जाता है , जिसे स्वप्नदोष कहते हैं. अक्सर यह युवाओं के लिए बड़ा चिंता और शर्म का विषय बन सकता है. इसलिए यह जानना आवश्यक है कि स्वप्नदोष कोई रोग नहीं होता बल्कि एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे कोई हानि नहीं होती और जो विवाहोपरांत स्वयं समाप्त हो जाती हैं।

हस्त मैथुन : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे इच्छानुसार वीर्य स्खलन कर कामोत्तेजना से क्षणिक राहत पाई जा सकती है. यह विशेषकर विवाह पूर्व या किसी भी कारणवश अकेले रहने पर विवश व्यस्क व्यक्ति के लिए एक आसान और हानिरहित तरीका है. युवावस्था में लगभग सभी लोग हस्त मैथुन करते हैं , यह एक सत्य है. लेकिन युवावस्था में अक्सर आत्मग्लानि होती है जिससे कई मानसिक विकार पैदा हो सकते हैं जिनका नाज़ायज़ फायदा तथाकथित सेक्सोलॉजिस्ट उठाते हैं और जो युवाओं को गुमराह कर पैसा बनाते हैं. सच तो यह है कि यह भी एक स्वाभाविक और हानिरहित प्रक्रिया है. हालाँकि कभी कभी यह एक लत का रूप धारण कर सकती है जिससे पढाई या काम में ध्यान भंग हो सकता है. आखिर , अति हर बात की ख़राब होती है.

लिबिडो ( यौन इच्छा ) और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) :  

जब तक हॉर्मोन की कमी नहीं होती , जो कि बहुत कम ही होती है , तब तक ये दोनों गुण विद्धमान रहते हैं. हालाँकि , लिबिडो और / या पोटेंसी कम होने के कारण विभिन्न और भिन्न हो सकते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि इच्छा है पर क्षमता नहीं और यह भी संभव है कि क्षमता तो है पर इच्छा नहीं। यह बहुत सी स्थितियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि सेक्स एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विषय है और प्रत्येक मनुष्य की यौन इच्छा और यौन क्षमता भिन्न होती है. इसका सामान्यीकरण करना सही नहीं कहा जा सकता।

ब्रह्मचर्य : पहले कहा जाता था कि २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यहाँ यह समझा जाता था कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है , वीर्य स्खलन न होने देना। वीर्य को एक दुर्लभ स्वास्थ्य खज़ाना माना जाता था. लेकिन यह न सच है , न संभव। इस भ्रांति को दूर करते हुए यह मानना चाहिए कि प्रत्येक काम का एक समय होता है और उचित समय पर ही किया गया काम लाभदायक होता है. ब्रह्मचर्य की वास्तविक परिभाषा गीता में दी गई है जिसके अनुसार -- विवाहित पुरुष को पत्निव्रत होना और सन्यासी को पूर्ण रूप से स्त्री से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहा गया है. हालाँकि पहली स्थिति में तो यह संभव है लेकिन दूसरी स्थिति में ब्रह्मचर्य का पालन करना इस मृत्यु लोक में संभव नहीं लगता। यह वर्तमान में हो रही साधु बाबाओं द्वारा बलात्कार की घटनाओं को देखकर साफ ज़ाहिर होता है.

यौन इच्छा एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर  काबू पाना न सिर्फ आसान नहीं होता बल्कि इसे अनुचित रूप से दबाने से मानसिक विकार पैदा होते हैं. इसीलिए ओशो रजनीश द्वारा सुनाये गए प्रवचन तर्क संगत लगते हैं. यौन इच्छा की आपूर्ति स्वाभाविक रूप से होती रहनी चाहिए। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में इच्छाओं पर काबु पाना भी आवश्यक है वर्ना इन्सान और हैवान में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।