Sunday, February 24, 2013

गंगू तेली हो या राजा भोज, सबके लिए एक भोज ---





कामकाज़ी लोग रोज़ सुबह भागते भागते निकलते हैं। हम भी नाश्ते में दो सूखे टोस्ट खाकर काम पर चल देते हैं। लेकिन इतवार छुट्टी का दिन होता है। इसलिए उस दिन अपनी पसंद से शाही अंदाज़ में नाश्ता किया जाता है। हालंकि छुट्टी होने के कारण उठना देर से होता है , फिर आराम से बैठकर पहले घंटों अख़बार छाना जाता है , फिर ब्लॉगिंग और अब तो ना ना करते फेस्बुकिंग भी होने लगी है। ज़ाहिर है, इतवार को न नाश्ता होता है , न लंच , बल्कि 12 बजे के बाद ब्रंच ही हो पाता है।


रविवार के दिन अक्सर हमारा पसंददीदा खाना होता है -- आलू के दो भारी परांठे , साथ में दही तरल मलाई मिलाकर , एक प्लेट में टोमेटो सॉस , उसमे टाबेसको सॉस का छींटा उसे तीखा बनाने के लिए , साथ में शहद सा मीठा मेपल सिरप। परांठे पर कभी कभी मक्खन या मलाई की परत भी चलती है। इन सबके बाद अंत में गर्मागर्म दूध के साथ इतवार का ब्रंच पूरा होता है।

लेकिन महीने में एक या दो बार एक अलग किस्म का नाश्ता भी होता है। इसे ब्रेड पोहा कह सकते हैं।





ज़रा सोचिये , ब्रेड के जो पीस बच जाते हैं , विशेषकर ऊपर नीचे वाले मोटे पीस , उनका आप क्या करते हैं। अक्सर हम इन्हें फेंक दिया करते थे या फिर किसी पशु को खिला देते थे। लेकिन फिर एक दिन एक पत्रिका में पढ़कर हमें यह ख्याल आया और हमने इनका इस्तेमाल पोहा बनाकर करना शुरू कर दिया। अब यह हमारी पसंददीदा डिश बन गई है।

ब्रेड पोहा बनाने के लिए सामग्री : 

* ब्रेड के बचे खुचे पीस , जितने सूखे होंगे उतना ही अच्छा होगा। इसके लिए ज़रूरी है कि आप बचे हुए ब्रेड पीस को  फ्रिज में स्टोर करते रहें वर्ना फंगस लग जाएगी।
* एक बड़ा टमाटर , बड़े टुकड़ों में कटा हुआ , एक प्याज़ भी बड़े टुकड़ों में कटा हुआ , हरी मिर्च कटी हुई
* मसाले -- साबुत धनिया, धनिया पाउडर , गर्म मसाला, अमचूर, नमक -- सब आधी चम्मच।
* हरा धनिया कटा हुआ , एक निम्बू , टोमेटो सॉस
* एक कप दूध।

बनाने की विधि : 

* एक सॉस पेन में एक चम्मच कुकिंग ऑयल डालकर गर्म करिए। इसमें सबसे पहले साबुत धनिया डालकर भूरा होने तक पकाइए।
* अब इसमें कटे हुए प्याज़, टमाटर, हरी मिर्च डालकर मिलाइये और थोड़ा सा पकाकर एक बड़ा चम्मच दूध डालकर हिलाइए।
* अब इसमें बाकि सभी मसाले मिलाकर थोडा और पकाइए। अमचूर की वज़ह से दूध फट जायेगा लेकिन हिलाते रहिये।
* अब ब्रेड के टुकड़े करके सारी ब्रेड इसमें डाल दीजिये और धीरे धीरे करके दूध ब्रेड पर इस तरह डालिए कि सारे टुकड़े दूध में भीग जाएँ। लेकिन ध्यान रखिये कि दूध ज्यादा न हो वर्ना खिचड़ी बन जाएगी। अच्छी तरह से मिलाइये ताकि सारे टुकड़ों पर दूध और मसाले अच्छी तरह से मिल जाएँ।
* जब दूध सूख जाये तो उतार लीजिये। प्लेट में डालकर इस पर  हरा धनिया , नीम्बू और स्वादनुसार टोमेटो सॉस डालकर मिलाइए।






इस तरह ब्रेड पोहा तैयार है। इसका स्वाद दूध और मसालों के अनुपात और पकाने पर बहुत निर्भर करेगा। लेकिन आपको पसंद आएगा , ऐसा विश्वास है।

इसे कहते हैं -- आम के आम , और गुठलियों के दाम।  

इसका महत्त्व आपको मेरी एक कविता की चंद अंतिम पंक्तियों में नज़र आएगा :

एब्स डाइटिंग जिम ट्रेडमिल , ये सब अमीरों के चोचले हैं ,
जो वैभव सम्पन्नता पूर्ण, ऐशो आराम की दुनिया में पले हैं।

वर्ना सच तो यही है कि ---

जहाँ कुपोषण के शिकार हों, करोड़ों बच्चे और नर नारी ,
वहां एब्स तो क्या , हड्डी पसली भी खुद ही उभर आती हैं सारी।

ये लोग कैसे हैं , जो रात भर ट्रेडमिल पर पसीना बहाते हैं ,
फिर खाने से कतराते हैं , ताकि पेट बाहर न आये।

कुछ लोग ऐसे हैं जो दिन भर पसीना बहाते हैं ,
ताकि जब शाम ढले तो पेट में कुछ तो जाये।

अगली बार जब आप किसी दावत में जाएँ
और प्लेट भर कर नाना प्रकार के व्यंजन खाएं।

तो छोड़ने से पहले एक बार एक बात अवश्य सोच लें,
कि अभी अभी जो आपने आधा प्लेट खाना छोड़ा है।

शायद उसी समय देश के किसी कोने में ,
क़र्ज़ में डूबे एक किसान ने , भूख से दम तोड़ा है।

नोट : इसे पढ़कर यदि एक भी व्यक्ति ने जूठा छोड़ने की आदत छोड़ दी तो समझिएगा , प्रयास सफल रहा। 





Wednesday, February 20, 2013

जब ऐसा हो या वैसा हो -- तो हाल कैसा हो !


जब विद्यालय परिसर में सफाई होने लगे, पानी का छिडकाव हो
और चूना लगाकर सजाया जाये तो समझो --- वी आई पी  विजिट का तनाव आने वाला है।

जब शहर की सडकें जगमगाने लगें , तारकोल का ताज़ा भराव हो
और फुटपाथ को तोड़कर दोबारा बनाया जाये तो समझो --- शहर में चुनाव आने वाला है।

जब सब्जियां भी मुर्गियां सी बिकने लगें , टमाटर के ऊंचे भाव हो
और मंडी से प्याज़ नदारद पाया जाये तो समझो--- सत्ता में बदलाव आने वाला है।

जब आपको आप के एस एम एस आने लगें , टोपी का पहनाव हो
और हाथ में तिरंगे की तरह  झाड़ू उठाया जाये तो समझो -- इंकलाब आने वाला है।

जब पत्नि बिना बात मुस्कराने लगे,  बदले बदले से हाव भाव हो
और आपको सर आँखों पर बिठाया जाये तो समझो--- कोई महंगा प्रस्ताव आने वाला है।

जब माटी की सोंधी सोंधी सुगंध आने लगे, पीपल की शीतल छाँव हो
और बांसुरी पर गडरिया प्रेम धुन सुनाता जाये तो समझो--- प्रीतम का गाँव आने वाला है।

जब मन बेचैन हो और काम से कतराने लगे, सीने में दर्द का घाव हो
और रह रह के बदन में झुरझुरी सी आ जाये तो समझो--  इश्किया ताव आने वाला है।

जब उठते बैठते घुटने कड़ कड़ करने लगें , गोलियों से लगाव हो
और आपको मेट्रो में बुजुर्गों की सीट पर बिठाया जाये तो समझो , बुढ़ापे का पड़ाव आने वाला है !

जब लड़के हाथ में हाथ डाल कर चलने लगें , बदन में बालियों का फैलाव हो
और बालों को इन्दरधनुषी रंगों से रंगा जाये तो समझो ,संस्कृति में बिखराव आने वाला है।



Friday, February 15, 2013

वेलेंटाइन डे पर रेड रोज और डोमिनोज का भोज -- क्या यही है प्रेम रोग !

वैलेंटाइन डे (II) : 



काल शाम पत्नी बोली पढ़कर अख़बार,
अज़ी बोलो कितना करते हो हमसे प्यार।

वेलेनटाइन डे पर आज के रोज़,
बताइये कितने देंगे हमको रोज।

एक का मतलब समझेंगे , देखते ही हुआ था प्यार।
तीन यानि करते थे,करते हो, करते रहोगे बेशुमार।

108 दिए बिना ही किया था शादी का इकरार,
अब बारह दे कर ही कर दो प्यार का इज़हार।

हमने कहा प्रिये , एक और एक सौ आठ ,
तो भूल जाओ, वो थी गुजरे वक्त की  बात।

बारह में बसा है,  बस हाल का हाल,
तीन में दिखते हैं प्रेम के तीनों काल।

डार्लिंग शौक से हमारे प्यार को आजमाओ ,
पर रोज बहुत महंगे हैं , इस बार तीन में ही काम चलाओ।

लेकिन वेलेंटाइन रोज का तो बहाना था,
पत्नि को हमसे आई लव यु बुलवाना था।

इसलिए पूरे बारह रोज ही ख़रीदवाए,
ये बात और है,कि उनके पैसे हमने उन्ही से दिलवाए । 

भला पत्नी के सामने भी कोई पर्स खोलता है ,
भई शादी के बाद कौन आई लव यू बोलता है !

हमने तो मौके की नज़ाकत थी परखी जांची,
पर पत्नि की फरमाईश थी अभी और बाकि।

बोली वेलेंटाइन डे पर बेलन नहीं उठाऊंगी,
सोच लिया आज रात खाना नहीं बनाऊँगी। 

अब या तो डोमिनोज का पिज़्ज़ा खिलाओ , 
या फिर घर चलकर खुद ही खाना बनाओ !

हारकर एक हाथ में डबलरोटी, और एक हाथ में रोज,
पकड़कर पिटे आशिक से , हम चल दिए डोमिनोज ।

वहां देखा एक हम उम्र युगल बैठे पिज़्ज़ा खा रहे थे
हम उन्हें और वो हमें,  देख देख कर शरमा रहे थे।

उधर एक युवा कन्या हमें देख मुस्कराने लगी
आँखों आँखों में अपने बॉय फ्रेंड को समझाने लगी।

हम भी जहाँपनाह से खड़े खड़े फूल सूंघते रहे,
और अपने ५०० के नोट का खून होते देखते रहे।

घर जाकर फूल सजाये, और पिज़्ज़ा का भोग लगाया,
पर प्रेम रोग की जगह तुरंत निंद्रा रानी ने आ दबाया।

सुबह जब नींद खुली तो रोज देख ये हुआ अहसास,
वेलेंटाइन डे तो रोज़ है , जब तक साथ हैं अपने ख़ास।

Tuesday, February 12, 2013

दुनिया में कोई मनुष्य भगवान कैसे हो सकता है-- एक सवाल !


रविवार का दिन था। सुहानी धूप खिली थी। सोच ही रहे थे कि कई दिनों बाद खिली धूप का आनंद कैसे लिया जाये कि तभी साले साहब का फोन आया कि एक कार्यक्रम में जा रहे हैं। शायद हमें भी पसंद आये। कार्यक्रम क्योंकि घर के पास ही था , इसलिए बिना सोचे कि क्या है , हम निकल पड़े। कार्यक्रम स्थल पर गाड़ियों की लाइन लगी थी।  लोग तेजी से आ रहे थे। जगह जगह कुछ लोग आदर सहित सबका हाथ जोड़ कर स्वागत कर रहे थे। हमें भी कई बार लगा जैसे ये हमें जानते हैं , तभी इतना मुस्करा कर स्वागत कर रहे हैं। एक सज्जन तो डॉक्टर ही थे, सोचा ये तो अवश्य जानते होंगे। पंडाल में पहुँच कर हमें बड़े प्यार से रास्ता दिखाया गया। हमने साले साहब से पूछा कि यह सब क्या है। उन्होंने कहा , कुछ नहीं , बस चलिए मंच पर सजदा करना है। एक असमंजस्य की स्थिति में हम यंत्रवत से मंच से होकर आगे बढ़ गए। लोग लेटकर एक फोटो को दंडवत प्रणाम कर रहे थे। पता चला वो कोई गुरूजी थे , जिनके ये सब अनुयायी थे।




पंडाल में हजारों की संख्या में भक्तजन इकट्ठे हुए थे जो बड़ी श्रद्धा से हाथ जोड़कर बैठे सुन रहे थे , लेकिन प्रवचन देने वाला कोई नहीं था बल्कि एक सज्जन अपनी आप बीती सुनाते हुए  बता रहे थे कि किस तरह गुरूजी ने उन्हें जीवन दान दिया और उनकी कृपा से उनके सारे कष्ट दूर हो गए।

उसके बाद वही डॉक्टर जो हमें प्यार से मिला था, माइक पकड़ कर रोने लगा। पता चला , वह सारा कार्यक्रम उसी ने आयोजित किया था जो उन गुरूजी का परम भक्त था। पता नहीं वह कैसा डॉक्टर था लेकिन एक बात निश्चित थी कि वह तथाकथित गुरूजी पर बहुत विश्वास रखता था। बल्कि यूँ कहिये वहां जितने भी लोग थे , वे सभी गुरूजी पर पूर्ण विश्वास रखने वाले प्रतीत हो रहे थे।

लेकिन सच पूछिए तो हमें तो उनकी कहानियां सुनकर बड़ा अटपटा लग रहा था। यह भी समझ में आ रहा था कि मनुष्य की सायकोलोजी उसकी सोच को कितना प्रभावित करती है। यह साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि कैसे लोग सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करने लगते हैं और पक्की धारणा बना लेते हैं। 



हमने भी बैठकर ध्यान से लोगों को जांचा परखा। मंच पर मस्तक टेक कर जो भी सामने से गुजर रहे थे , सबके चेहरे अत्यंत गंभीर और चिंतित नज़र आ रहे थे। भृकुटियाँ तनी हुई, चेहरे पे हवाइयां उडी हुई , मानो मृत्यु को साक्षात् देख कर आ रहे हों। भगवान ( गुरूजी ) के दर्शन कर इतना परेशां लोगों को पहली बार देखा।


वहां का दृश्य देखकर टी वी वाले कृपालु महाराज याद आ गए। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जाने संसार में कितने कृपालु महाराज भरे पड़े हैं जो अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर हजारों लाखों लोगों को वशीभूत कर लेते हैं। वर्ना एक हार्ट अटैक के रोगी का इलाज़ डॉक्टर कर सकता है या गुरूजी, यह सोचने की बात है ! हालाँकि वहां मौजूद हजारों पढ़े लिखे धनाढ्य लोगो की श्रद्धा को देखकर हम तो अल्पसंख्यक ही महसूस कर रहे थे।


पंडाल के साथ में एक दूसरा पंडाल था जहाँ खाने पीने का पुख्ता इंतजाम किया गया था।





प्रवचन सुनने के बाद सभी शराफत से पंक्तिबद्ध खड़े थे। खाने के मामले में अनुशासन बहुत बढ़िया था। गुरूजी का प्रसाद समझ कर सबने इत्मिनान से कार्पेट पर बैठकर भोजन किया। 

अंत में यही लगा कि श्रद्धा होना या न होना अलग बात है , लेकिन दुनिया में कोई मनुष्य भगवान कैसे हो सकता है। हकीकत यही है कि हम सभी बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं। फिर भी न पाप कर्म करने से डरते हैं , न पाप को धोने में कोई कसर उठाते हैं। लेकिन यदि पाप कर्म किये ही न जाएँ तो धोने की ज़रुरत ही कहाँ रह जाती है।

शायद यही बात समझ नहीं आती आधुनिक मनुष्य को।


Friday, February 1, 2013

कहीं दीप जले कहीं दिल, एक ग़ज़ल ---


एक सुबह अस्पताल जाते हुए रास्ते में यह नज़ारा देखा तो फोटो ले लिया। यही ज़ेहन में आकर एक ग़ज़ल बन गई :



                                                           हर सू  हरियाली छाई  है ,
                                                           अपनी जाँ पे बन आई है। 


                                                           औरों की सजती, महफ़िल है, 
                                                           एक  हम  पर ही तनहाई  है। 



                                                              उनके रौशन चाँद सितारे,
                                                              अपने हिस्से  रुसवाई  है।  

                                                               धोखा मत  खा जाना यारो, 
                                                               तन उजला, मन पर काई है। 

                                                               छोड़ें या अपनायें किसको,  
                                                               एक है कूआँ,  एक खाई है । 




                                                              दूल्हा  दुल्हन ना बाराती,
                                                               क्यों बाजा ना शहनाई है। 

                                                               शूगर का रोगी है खुद वो 
                                                               जो  पेशे  से  हलवाई  है। 
                                                           
                                                              ना समझे ना माने दिल की, 
                                                               क्यों  ऐसा  वो  हरजाई  है। 

                                                               रक्त का रंग है एक, मानो तो 
                                                               सब  ही आपस  में  भाई  हैं।


                                                               दिल जीते जो 'तारीफ़ों' से,
                                                               तो  खुशियों की भरपाई है। 

नोट :  ग़ज़ल में मात्रिक क्रम है - 22  22 22 22