Friday, December 28, 2012

2012 -- ब्लॉगिंग की राह में मज़बूर हो गए --- हिंदी ब्लॉगिंग का कच्चा (चर्चा) चिट्ठा !


ब्लॉगिंग शुरू किये हुए चार साल पूरे होने को आये. एक जनवरी २००९ को ब्लॉग बनाकर पहली पोस्ट नव वर्ष की शुभकामनाओं पर डाली थी . देखते देखते , पोस्ट लिखते लिखते , टिप्पणियों का इंतजार करते करते और टिपियाते हुए कब चार साल गुजर गए , पता ही नहीं चला. इस बीच जीवन की उपलब्धियों में ब्लॉगर नाम का शब्द भी जुड़ गया. इन चार सालों में मानव प्रवृति और मानसिकता के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला. लेकिन कुछ समय से ब्लॉगिंग में काफी परिवर्तन देखने को मिल रहा है. हालाँकि यह बदलाव हर ३-४ साल में होना स्वाभाविक ही लगता है. तथापि, समय के साथ फेसबुक जैसी सोशल साइट्स का लोकप्रिय होना, ब्लॉगिंग के लिए घातक सिद्ध हो रहा है. लेकिन सिर्फ फेसबुक को दोष देना ही सही नहीं है. और भी ग़म हैं ज़माने में , जो ब्लॉगिंग में बाधा पहुंचाते हैं .

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए :

ब्लॉगिंग को सबसे बड़ा धक्का लगा डॉ अमर कुमार  की असामयिक मृत्यु से. उनकी टिप्पणियों का कोई तोड़ नहीं होता था. हमारा तो अभी परिचय ही हुआ था की तभी वे इस दुनिया को छोड़ कर चले गए. उनकी कमी ब्लॉगजगत में कभी पूरी नहीं हो पायेगी. कुछ समय पहले श्री चंदर मोलेश्वर प्रसाद जी को भी काल ने हमसे छीन लिया . हिंदी का एक ज्ञाता विद्वान हमसे हमेशा के लिया छिन गया. उधर ब्लॉगिंग के तकनीकि स्तंभ माने जाने वाले और हर दिल अज़ीज़ श्री पाबला जी को पुत्र शोक होने से जैसे ब्लॉगिंग की रीढ़ ही टूट गई . हालाँकि फिर भी पाबला जी बड़ी हिम्मत से मौजूद हैं ब्लॉगिंग में.   

हम तो हैं परदेश में , देश में निकला होगा चाँद : 

कुछ मित्र ऐसे हैं जो स्वदेश की गलियां तो छोड़ गए लेकिन ब्लॉगिंग के जरिये देश की माटी से हमेशा जुड़े रहे . लेकिन फिर दुनियादारी में ऐसे फंसे की ब्लॉगिंग भूल गए . इनमे सबसे ज्यादा जो नाम याद आता है वह है अदा जी का. कनाडा के ओटवा ( हिन्दुस्तानी में ओटावा ) शहर में रहने वाली अदा जी ( मञ्जूषा ) ने हमेशा धुआंधार और बेबाक ब्लॉगिंग की . लेकिन फिर शायद फिल्म निर्माण के कार्य में ऐसी फंसी की ब्लॉग से गायब ही हो गईं. उधर ब्लॉगिंग के नंबर एक माने जाने वाले और नए ब्लॉगर्स का सदा प्रोत्साहन करने वाले श्री समीर लाल जी की उड़न तश्तरी की उड़ान में अचानक काफी कमी आ गई . एक समय था जब हर पोस्ट पर १०० से ज्यादा टिप्पणियां सिर्फ उन्ही के ब्लॉग पर आती थी. अब कहीं नहीं आती. कहीं ये टिप्पणियां ही तो नहीं जो ब्लॉगिंग में इंधन का काम करती हैं. इनके अलावा दीपक मशाल की जब से शादी हुई है , तबसे उन्होंने लगभग ब्लॉगिंग छोड़ दी है. आखिर शादी है ही ऐसी चीज़ की बस नमक तेल लकड़ी याद रहती है. हालाँकि यु एस में इनका प्रयोग शायद ही होता हो. और भी कई दोस्त हैं जिनका उत्साह कम हो गया है. जब से हम दुबई होकर आए हैं , तब से दुबई वाले श्री दिगंबर नासवा जी अचानक गायब हो गए .हम तो हैरान थे , पर फिर पता चला नासवा जी की माताजी नहीं रही। विदेश में रहकर अपनों से बिछुड़ने का दर्द और भी ज्यादा महसूस होता है। ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली बबली उर्फ़ उमा चक्रवर्ती चार पंक्तियों में सदा किसी को ढूंढती रहती थी . शायद उनको वो मिल गया और नाता जोड़ लिया , इसलिए ब्लॉगिंग से नाता तोड़ लिया.जर्मनी में रह रहे राज भाटिया जी को क्या शिकायत है ब्लॉग से , यह तो पता नहीं चला लेकिन फेसबुक पर जर्मनी के फोटो दिखाकर हमें खुश करते रहते हैं. 

छोड़ आए हम वो गलियां  :

अब देश में भी ब्लॉगिंग के चाँद लुप्त होते जा रहे हैं . एक बार हमने श्री चन्द्र मोहन गुप्त की लापता होने की खबर ब्लॉग पर डाली थी . तब पता चला था की ट्रांसफर होने की वज़ह से ब्लॉगिंग से दूर हो गए हैं . एक दो बार छुट्टियों में पोस्ट लिखने के बाद उन्होंने तौबा कर ली और शायद अपने काम में ही व्यस्त हो गए.     

नोयडा के खुशदीप सहगल ने हमारे साथ ही ब्लॉगिंग शुरू की थी और प्रतिदिन एक पोस्ट नियमित रूप से लिखते थे . उनका जुनून देखकर कई बार हमने उन्हें टोका भी, लेकिन जुनून कहाँ ख़त्म होता है. फिर एक दिन अचानक वो जुनून ख़त्म हो गया . जब बच्चों के बोर्ड के एग्जाम पास हों तो यही सही भी लगता है. आखिर , ब्लॉगिंग ही तो जिंदगी नहीं. दिल्ली के अनेक ब्लॉगर ऐसे हैं जो या तो सामूहिक ब्लॉग्स चलाते थे , या स्वयं ही ब्लॉग्स का समूह चलाते थे . लेकिन अब सब बंद हो चुका . हमें तो सामूहिक ब्लॉग्स का औचित्य ही समझ नहीं आया. और एक दो से ज्यादा ब्लॉग्स का भी . अविनाश वाचस्पति जी अस्वस्थ रहते हैं , ब्लॉगिंग छोड़ अब फेसबुक के स्वामी बन गए हैं . अजय कुमार झा का ब्लॉगिंग जोश ठंडा पड़ गया है,  लेकिन फेसबुक पर सारा आक्रोश निकाल रहे हैं .  ( भाई अभी एक भयंकर रोग से निज़ात पाकर स्वस्थ हुए हैं . उन्हें स्वस्थ और दीर्घायु के लिए शुभकामनायें ). राजीव तनेजा ने एक बार हमारे जन्मदिन पर हमारे ब्लॉग की सारी पोस्ट्स पर टिप्पणियां देकर एक कीर्तिमान सा स्थापित कर दिया था. लेकिन हम उनके गज भर लम्बे हास्य व्यंग पर हमेशा उन्हें टोकते रहते थे . उन्होंने तंग आकर ब्लॉग पर लिखना ही छोड़ दिया और अब फेसबुक पर दो दो लाइना लिख कर चिढाते रहते हैं .
इंजिनियर सतीश सक्सेना जी के गीत हमेशा लोकप्रिय रहे . लेकिन अब उनकी तान और गान भी कम ही सुनाई देती है. आखिर पारिवारिक जिम्मेदारी तो सर्वप्रथम होनी ही चाहिए।  

आदरणीय निर्मला कपिला जी अस्वस्थ और अजित गुप्ता जी व्यस्त रहने के कारण अब ब्लॉगिंग से दूर हो गई हैं, हालाँकि अजित जी  ने फिर से समय निकालना शुरू कर दिया है। हरकीरत हीर जी की पोस्ट कितनी भी दर्दीली हो लेकिन उनकी टिप्पणियां हमेशा चुटकीली होती थी. लेकिन अब न पोस्ट आती है,  न टिपण्णी .  
दानिश ( डी के मुफलिस ) की शानदार ग़ज़लें अब पढने को नहीं मिलती.

हमने पहली पोस्ट ३ जनवरी २००९ को लिखी थी जिसपर बस एक टिप्पणी आई थी-- अनुरागी अनुराग ने भी नव वर्ष पर उसी दिन कविता लिखी थी जो उनकी सिर्फ तीसरी पोस्ट थी. उसके बाद न अनुराग दिखे , न उनका राग. यह भी एक रहस्य बन कर रह गया. हमें ब्लॉगिंग में लेकर आए श्री अशोक चक्रधर जी . लेकिन हमें इस चक्कर में फंसा कर उन्होंने अपनी चकल्लस ही बंद कर दी। अन्य कवि मित्रों में राजेश चेतन जी , अलबेला जी , योगेन्द्र मोदगिल जी ने मंच के आगे ब्लॉगिंग को तुच्छ समझ त्याग दिया। भई ब्लॉगिंग से रोजी रोटी तो नहीं चल सकती ना.

याद किया दिल ने कहाँ हो तुम :

हम लगभग १०० से ज्यादा मित्रों को फोलो करते हैं , पढ़ते हैं और टिप्पणी का भोग लगाने का प्रयास भी करते हैं . लेकिन जब पोस्ट ही न आए तो हम कहाँ जाएँ टिपियाने. सुलभ सतरंगी रंग बिरंगी दुनिया के इंद्रजाल में पैर ज़माने की कोशिश में लगे हैं , सुनीता शर्मा जी ने लगता है इमोशंस पर ज्यादा कंट्रोल कर लिया है . इसलिए अब कभी कभी ही विदित करती हैं।  ताऊ रामपुरिया के ब्लॉग पर पढ़ा था -- यहाँ सब ज्ञानी हैं , यहाँ ज्ञान मत बाँटिये. हमने उनकी एक न सुनी तो उन्होंने ही सुनाना बंद कर दिया. मुफलिस जी की तर्ज़ पर सब खूब झूमते थे , लेकिन उन्होंने तर्ज़ बयां करना ही बंद कर दिया. अजय कुमार अपनी गठरी लेकर जाने कहाँ खो गए . राजेश उत्साही का उत्साह भी ठंडा पड़ गया लगता है. ज्योति मिश्रा की P: D: आदि हमें कभी समझ नहीं आती थी लेकिन अब वो ही नहीं आती. सुशील बाकलीवाल जी ने  रिकोर्ड तोड़ ब्लॉगिंग की और फिर अचानक सन्यास ले लिया . एम् वर्मा जी के ज़ज्बातों को कैसे ठेस लगी , यह समझ न आया. डॉ अनुराग अब दिल की बातें किसी को नहीं बताते, सीक्रेट रखते हैं. मिथलेश दुबे का बेबाक अंदाज़ शायद लोगों को हज़्म नहीं हुआ, इसलिए सलीम के साथ चुप हो गए. डॉ मनोज मिश्र को शायद ज्येष्ठ भ्राता ने कह दिया -- अपना काम करो भाई , क्यों समय व्यर्थ करते हो , उसके लिए मैं हूँ ना. :). शरद कोकस अब रात में ३-४ बजे नहीं उठते. शायद देर से उठने की आदत पड़ गई है. हमें लगा मासूम भाई को शायद समझ आ गया की ये दुनिया इतनी मासूम नहीं है. इसलिए लिखना बंद कर दिया। वो तो बाद में पता चला कि भाई तो बड़ी गंभीर बीमारी से निजात पाकर संभले हैं। खुदा उन्हें सलामत रखे। ऐसे नेक बन्दों की बहुत ज़रुरत है। डॉ मुकेश सिन्हा ने क्यों राजनीति छोड़ दी , यह बात समझ के परे है. 

व्यस्त हो गए हैं या अस्त व्यस्त -- यह बात तो मित्र लोग स्वयं ही बताएँगे :

पिट्सबर्ग में ठण्ड बढ़ गई लगती है , इसलिए अनुराग शर्मा जी अब कभी कभार ही लिखते हैं . अली सा ने पता नहीं क्यों,  कहानियों की सारी किताबें कबाड़ी को बेच दीं लगती हैं . अब बस फेसबुक पर संतोष त्रिवेदी जी को टिप्पणी का प्रसाद चढाते हैं. :) संजय भास्कर अब बाल बच्चों में व्यस्त हो गए हैं . राकेश कुमार जी के प्रवचन सुने हुए मुद्दतें हो गई .( उम्मीद करता हूँ , स्वास्थ्य सही है ) . दर्शन कौर जी के दर्शन अब दुर्लभ हो गए हैं. हालाँकि फेसबुक पर दर्शनों की झड़ी लगी रहती है. :). रोहित कुमार कभी कभी ही बिंदास मूड में आते हैं. कुश्वंश जी , वंदना अवस्थी दुबे , रश्मि रविजा, महेंद्र मिश्रा ने भी लिखना कम कर दिया है.
बीकानेर के भाई राजेन्द्र स्वर्णकार की पोस्ट हमेशा स्वर्ण की तरह ही चमकती है लेकिन आजकल सोने की तरह ही बहुत महंगे हो गए हैं :)  महफूज़ अली ने अब ब्लॉग पर डोले दिखाना बंद कर दिया है . लेकिन फेसबुक पर नापसंद लोगों का मूंह तोड़ने को तैयार रहते हैं . :)

हम से है ज़माना : 

इस बीच कई नए ब्लॉगर्स का प्रवेश हुआ जो इस विधा को ससम्मान आगे बढ़ा रहे हैं . उत्तरांचल की राजेश कुमारी जी , काजल कुमार के कार्टून्स , अनु जी के ड्रीम्स और एक्सप्रेशंस, प्रेरणा अर्गल की कल्पनाएँ , गोदियाल जी का अंधड़ , और द्विवेदी जी की अदालत अभी भी खूब चल रही है . संदीप पंवार का सफ़र जारी है, पल्लवी सक्सेना जी अपने अनुभव बखूबी बाँटती रहती हैं , अशोक सलूजा जी की यादें ,  रचना दीक्षित जी की सन्डे के सन्डे साप्ताहिक रचनाएँ , वंदना जी के अहसास , धीरेन्द्र जी की काव्यांजलि , संगीता स्वरुप जी के हाइकु और लघु कवितायेँ , रश्मि प्रभा जी की प्रभावशाली रचनाएँ अभी भी मन मोह रही हैं . वीरेन्द्र शर्मा ( वीरुभाई जी) के जानकारी पूर्ण स्वास्थ्य सम्बन्धी लेख एकदम ताज़ी जानकारी से परिपूर्ण होते हैं .काजल कुमार जी के ताज़ा और सटीक कार्टून हालात पर गहरी चोट करते हुए भी मनोरंजक होते हैं।  लेकिन  कुमार राधारमण जी जो पहले दिन में दो तीन लेख लिखते थे , अब दो तीन दिन में लिखते हैं . वाणी शर्मा जी की ज्ञानवाणी और नीरज गोस्वामी जी की पुस्तकों की खोज भी दिल लुभाती रही हैं. डॉ जाकिर अली रजनीश की वैज्ञानिक बातें काफी ज्ञानवर्धक रही .  अंजू चौधरी और शाहनवाज़ भी नियमित हैं . रमाकांत सिंह जी की एंट्री अभी हाल में ही हुई है. 

पंडित अरविन्द मिश्र जी का ट्रांसफर होने से ब्लॉग से दूरियां बढ़ गई हैं लेकिन फेसबुक पर हींग और फिटकरी दोनों लगाते रहते हैं। फिर रंग तो आएगा ही . :). संतोष त्रिवेदी जी तो फेसबुक और अख़बारों की सुर्ख़ियों में छाये रहते हैं, इसलिए ब्लॉग पर अब ज्यादा माथा पच्ची नहीं करते. लेकिन देवेन्द्र पाण्डेय जी एक बहादुर इन्सान की तरह डटे हुए हैं अपना कैमरा संभाल कर. शिखा वार्ष्णेय जी हमेशा की तरह ब्लॉग पर और अब फेसबुक पर भी नियमित रूप से सुन्दर लेखों के साथ नज़र आती रहती हैं. श्री रूप चंद शास्त्री जी भले ही सम्मान समारोह में आहत हुए हों , लेकिन पूरी श्रद्धा से ब्लॉगिंग में अपनी सेवा दे रहे हैं. शिवम् मिश्रा महापुरुषों की  विभिन्न तिथियों पर हमें याद दिलाना कभी नहीं भूलते. केवल राम का भी गंभीर लेखन जारी है चलते चलते.  शेर खान ब्लो ललित शर्मा ने छत्तीसगढ़ छान मारा और बड़े रोचक अंदाज़ में विस्तार से सारा हाल बयाँ करके महत्त्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं . शायद अकेले हैं जो ब्लॉग और फेसबुक , दोनों पर सक्रीय हैं. अत्यंत गुणवान और क्रातिकारी विचार रखने वाले श्री विजय माथुर जी के विचारों को लोग कम ही समझ पाते हैं. इसलिए वे अब ब्लॉग पर कम और फेसबुक पर ज्यादा नज़र आते हैं.      

न तुम हमें जानो , न हम तुम्हे जाने : 

आश्चर्य की बात है की इन चार सालों में हम कई धुरंधर माने जाने वाले ब्लॉगर्स से कभी रूबरू नहीं हो पाए. श्री ज्ञान दत्त पाण्डेय, अनूप शुक्ल जी , रवि रतलामी जी , अजित वडनेरकर , कविता वाचकनवी जी, सुमन , गिरिजेश राव  समेत कई ऐसे ब्लॉगर्स हैं जिनसे या तो कभी आदान प्रदान नहीं हुआ या न के बराबर . एक दो ब्लॉगर ऐसे भी रहे जिनसे ब्लॉग नाता टूट गया. ब्लॉग पर नाता बनाये रखने के लिए पारस्परिक सम्मान, विश्वास और समझ बूझ की आवश्यकता होती है.  डॉ दिव्या श्रीवास्तव के साथ ब्लॉग सम्बन्ध विच्छेद होना कभी कभी अखरता है.

विशेष

यहाँ दो नाम विशेष रूप से ज़ेहन में आते हैं . बंगलौर में रहने वाले रेलवे में काम करने वाले प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणी भले ही चंद शब्दों में सिमटी रहती है , लेकिन लगभग हर ब्लॉग पर नियमित रूप से और सबसे पहले हाज़िर होते हैं. कम शब्दों में पोस्ट का सार देना भी एक कला है. दूसरे ब्लॉगर हैं दिनेश 'रविकर' गुप्ता जी जिनके काका हाथरसी जैसे छक्के रुपी टिप्पणियां बहुत से ब्लॉग्स पर देखी जा सकती हैं. हर टिप्पणी में तुरंत एक कविता छाप देना भी एक अद्भुत गुण है. हालाँकि ब्लॉगिंग में इतना समय और ऊर्जा लगाना हैरत में डाल देता है. लेकिन आजकल उनकी अनुपस्थिति ही हैरान कर रही है।

एक और नाम जिनके बगैर पोस्ट अधूरी रहेगी , वो हैं श्री जे सी जोशी जी. सेवा निवृत इंजीनियर जे सी जी अब आध्यात्मिक अध्ययन में लगे हैं और इस लोक से बाहर परलोक का रहस्य समझने में संलग्न हैं. स्वयं कोई पोस्ट नहीं लिखते लेकिन कुछ चुनिन्दा ब्लॉग्स पर अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाकर ब्लॉग को रौशन करते हुए अपना योगदान देते हैं.लेकिन पिछली चार पोस्ट्स पर उनकी अनुपस्थिति चिंता में डाल रही है। अभी तक इ मेल का ज़वाब भी नहीं आया। आशा करता हूँ कि सकुशल होंगे।
 
सम्मान समारोह और ब्लॉगर मिलन  :

इस बीच दो बार ऐसा हुआ की ब्लॉगर्स के लिए विशेष सम्मान समारोह आयोजित किये गए. जैसा की ऐसे में अक्सर होता है , ये समारोह भी विवादित रहे. वैसे भी सभी को खुश करना बड़ा मुश्किल होता है. लेकिन हमारे लिए तो यह भी एक विडम्बना ही रही की इनके आयोजक और कर्ता धर्ता श्री रविन्द्र प्रभात जी से सपने में भी कभी मुलाकात / वार्तालाप नहीं हुई. हालाँकि अनेक ब्लॉगर्स से समय समय पर मुलाकातें होती रही जिनमे श्री समीर लाल जी , राज भाटिया जी , अरविन्द मिश्रा जी , वीरुभाई जी , ललित शर्मा जी , सतीश सक्सेना जी और खुशदीप सहगल से मुलाकात अन्तरंग रही. दिगंबर नासवा जी और पी सी रामपुरिया जी से एक शादी में मिलना सुखद रहा. वैसे फोन पर अनेक मित्रों से बात चीत होती ही रहती है. अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के श्री राहुल सिंह जी से फोन पर बात हुई लेकिन किसी कारणवश मुलाकात का अवसर न मिल सका.

और इस तरह पूर्ण हुआ यह ब्लॉग पुराण . इसमें शामिल किये गए नाम वे हैं जिन्हें हम जानते हैं . बेशक , और भी बहुत से ऐसे ब्लॉगर्स होंगे जिनका बड़ा नाम होगा,  लेकिन हम नहीं जानते. मित्रों में कुछ और नाम भी छूट गए होंगे , कृपया बिना बुरा माने स्वयं ही याद दिला दें.

नोट :  वर्ष की इस आखिरी पोस्ट को कृपया हास्य व्यंग के रूप में ही लें ,  भले ही इसमें सच्चाई दिखाई दे। 

Tuesday, December 25, 2012

जब दवा ही दर्द देने लगे तो बंद करना ही बेहतर होता है ---


यदि बुखार हो जाये तो हम तुरंत दवा लेने लगते हैं। लेकिन जब लम्बे समय तक दवा लेने के बाद भी बुखार न उतरे और सारे टेस्ट भी सामान्य आयें तो डॉक्टर सारी दवाएं बंद कर देते हैं और बुखार उतर जाता है। इसे हम ड्रग फीवर कहते हैं।

कुछ ऐसा ही हो रहा है गैंग रेप के विरुद्ध आन्दोलन में। गुंडागर्दी के विरुद्ध आक्रोश का प्रदर्शन करते करते कहीं न कहीं हम स्वयं ही पथ भ्रष्ट हो गए हैं।  राजपथ पर होने वाले दैनिक प्रदर्शन में अब असामाजिक तत्वों का प्रवेश हो चुका है। जो आन्दोलन एक पीड़ित को न्याय दिलाने और सुस्त प्रशासन को जगाने के लिए स्वत: आरम्भ हुआ था , अब एक  तमाशा बन कर रह गया है। मासूम भीड़ में भेड़िये भी घुस गए हैं। जिस अत्याचार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे हैं , वही स्वयं भी कर रहे हैं। बेशक गैंग रेप की इस घटना का मुख्य कारण दिल्ली की सड़कों पर सुरक्षा की कमी है, लेकिन क्या अकेली पुलिस को दोष देना सही है ? क्या हमें आत्म निरीक्षण नहीं करना चाहिए ?   

पिछले कुछ दिनों से अख़बारों ,  टी वी और फेसबुक आदि पर सब जगह पुलिस के अत्याचार दिखाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या पुलिस गलत कर रही है ? अंधाधुध दौड़ लगाती भीड़ को क्या राष्ट्रपति भवन में घुस जाने देना चाहिए था ? अगर नहीं रोका जाता  तो क्या हो सकता था , यह कल्पना मात्र ही कष्टदायक है। 
कारों के शीशे तोड़ना, बसों में आग लगाना , और पब्लिक प्रोपर्टी को हानि पहुंचाकर न्याय नहीं हासिल किया जा सकता। दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर की क्या गलती थी जो भीड़ ने पैरों तले रौंदकर उसकी जान ले ली ?  क्या यह वहशीपन नहीं है ? उसे कौन न्याय दिलाएगा ? कितनी ही लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ हो रही है , क्या नज़र नहीं आता  ? 

अब समय आ गया है , यह पागलपन बंद होना चाहिए। गैंग रेप की पीड़ित युवति अभी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। आवश्यकता है उसकी जिंदगी की दुआ मांगने की। जनता की दुआ में ताकत होती है। डॉक्टर अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में तोड़ फोड़ का खेल छोड़कर हमें सकारत्मक कार्य करते हुए शांति बनाये रखकर ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि इस बहादुर लड़की की जिंदगी बच जाये।  

आज क्रिसमस है। मैरी क्रिसमस तभी हो सकता है जब युवति की स्थिति में सुधार आये।  प्रार्थना कीजिये।  
     

Saturday, December 22, 2012

इन्सान बस एक ही डर से डरता है -- मौत का डर !


दिल्ली में हुई बलात्कार की जघन्य घटना से न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरा हिंदुस्तान आक्रोश में भर गया है। सडकों पर , गलियों में , न्यायालय के सामने यहाँ तक कि राष्ट्रपति भवन के आगे भी युवाओं ने जमकर प्रदर्शन किये हैं। फेसबुक पर, ब्लॉग्स पर , समाचार पत्रों  और टी वी चैनलों पर सभी जगह लोग एक जुट होकर इस घटना से इतने क्षुब्ध हैं कि अपराधियों के लिए सब मौत की सज़ा की फरियाद कर रहे हैं। भले ही कानून में फांसी की सज़ा रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर केसिज में ही देने का प्रावधान है। लेकिन इस घटना की गंभीरता को देखते हुए अपराधियों पर किसी तरह का रहम मानवता के विरुद्ध ही होगा। 

हालाँकि 6 में से 4 आरोपी युवक पकड़े जा चुके हैं, लेकिन इस समय सज़ा से ज्यादा अहम् दो बातें नज़र आती हैं। 
1) पीड़ित लड़की की चिकित्सा : डॉक्टरों के अनुसार बलात्कार की ऐसी वीभत्स घटना उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। पीड़ित लड़की की आंतें इस कद्र चोटिल हो गई थी कि उसे शल्य क्रिया द्वारा लगभग पूर्णतया निकालना पड़ा। हालाँकि रोगी ने ग़ज़ब का साहस दिखाया है और वह दृढ इच्छा शक्ति से इस विकट समस्या का सामना कर रही है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि बिना क्षुद्र आंत्र ( स्मॉल इंटेसटाइन ) के कोई भी व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं गुजार सकता। चिकित्सकों के अनुसार इसका स्थायी उपचार आंत्र प्रत्यारोपण ही हो सकता है। बेशक यह उपचार साधारण नहीं है। कहा नहीं जा सकता कि यह संभव भी होगा या नहीं। फ़िलहाल तो सारे देशवासियों की दुआएं इस बाला के साथ हैं। 

2) इस तरह की घटनाओं को कैसे रोक जाये ? 

इन्सान में अपराधिक प्रवृति भिन्न भिन्न होती है। कुछ लोग मूल रूप से ही अपराधिक प्रवृति के होते हैं। इन लोगों को कभी सुधारा नहीं जा सकता। न ही इन्हें सज़ा का खौफ होता है। ऐसे लोग पृथ्वी पर एक बोझ होते हैं। इनके साथ किसी भी तरह का मानवीय व्यवहार सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति अन्याय होगा। ऐसे लोगों को इंसानों के बीच रहने का कोई हक़ नहीं होना चाहिए। ये सजाए मौत के असली हक़दार होते हैं। 
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सपने में भी अपराध करने की नहीं सोच सकते। हालाँकि सात्विक प्रवृति के ऐसे संत आदमी आजकल विरले ही होते जा रहे हैं। इनसे समाज को कोई डर नहीं होता और वे सदा समाज के हितार्थ ही कार्य करते हैं। 
लेकिन एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो अपराधिक प्रवृति का न होते हुए भी विपरीत परिस्थितियों में अपराधी बन सकता है। ये जनसाधारण वर्ग के वे लोग हैं जो तामसी और राजसी प्रवृति के बीच हिचकोले खाते रहते हैं। ऐसे लोगों को अपराधी बनने से सिर्फ एक ही कारक बचाता है -- कानून का डर। जब इन्सान को कानून का डर नहीं रहता , तब उसकी तामसी प्रवृति जाग्रत हो जाती है जो अवसर मिलने पर मनुष्य को अपराध की ओर ले जाती है।  ऐसे में अति आवश्यक है कि हमारी कानून व्यवस्था मज़बूत हो। एक ऐसी व्यवस्था हो जो ऐसे जघन्य अपराध होने से बचाए। साथ ही अपराध होने पर न्याय दिलाने में देर न लगाये। 

अपराध रोकने के लिए :
* सडकों पर पुलिस की गश्त बढाई जानी चाहिए।  पुलिस की मौजूदगी ही अक्सर अपराध कम करने में सक्षम रहती है। 
* पुलिसकर्मियों में अनुशासन , मानवीय संवेदना और कर्तव्य परायणता को बढ़ाना होगा। 
* पुलिसकर्मी भी इन्सान होते हैं। इसलिए उनके निजी हितों और सुविधाओं का भी ख्याल रखा जाना चाहिए ताकि वे अपना कार्य निडर होकर सुचारू रूप से कर सकें। 
* यातायात के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए। इसके लिए ट्रैफिक पुलिस में मेनपावर बढ़ानी आवश्यक है। 
* अपराधी को सज़ा दिलाने में न्यायिक प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए। 
अक्सर एक बलात्कार की पीड़ित महिला को न्याय मिलने में न सिर्फ देरी होती है बल्कि उसे बलात्कार से भी ज्यादा पीड़ा देने वाली प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसे रोकने के लिए हमारी न्याय प्रणाली को अतिरिक्त संवेदना पूर्ण होना चाहिए। फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट, इन केमरा सुनवाई , क्रॉस एग्जामिनेशन में संवेदना और सहानुभूति पूर्ण व्यवहार तथा पीड़ित पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक दबाव न होने देना ऐसे आवश्यक कदम हैं जिनसे न सिर्फ पीड़ित महिला को उचित न्याय मिलने की आशा रहेगी बल्कि उसके दर्द को थोडा कम किया जा सकेगा। 

सज़ा :
बलात्कार एक ऐसा अमानवीय अत्याचार है जो न सिर्फ एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार है बल्कि उसकी आत्मा को भी खंडित कर देता है। यह न सिर्फ भयंकर शारीरिक वेदना और पीड़ा देता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी स्थायी और अमिट दुष्प्रभाव छोड़ जाता है। इंसानियत के विरुद्ध इससे बड़ा और कोई अपराध नहीं हो सकता। इसलिए आवश्यक है कि बलात्कार के आरोपी पर अपराध सिद्ध होने पर सज़ा में कोई नर्मी न बर्ती जाये और उसे सख्त से सख्त सज़ा दी जाये। और फांसी से ज्यादा सख्त सज़ा और क्या हो सकती है। फांसी का तो नाम सुनकर ही बदन में सिरहन सी दौड़ जाती है। फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट द्वारा शीघ्र कार्यवाही पूर्ण कर जब दो चार अपराधियों को फांसी लगा दी जाएगी तो संभव है लोग ऐसा अपराध करने से डरने लगें। वर्ना दिल्ली की सड़कों पर यूँ ही ये खूंखार दरिन्दे बेख़ौफ़ घूमते रहेंगे अपने अगले शिकार की तलाश में। 
इन्सान बस एक ही डर से डरता है -- मौत का डर ! जब तक अपराधियों को मौत का डर दिखाई नहीं देगा , सड़कों पर इंसानियत यूँ ही बेमौत मरती रहेगी। 

Tuesday, December 18, 2012

यूँ आया ऊँट पहाड़ के नीचे ---


हम नास्तिक तो नहीं हैं लेकिन आर्य समाजी विचारधारा के रहते मूर्ति पूजा में बिल्कुल विश्वास नहीं रखते। ऐसे में जब किसी ऐसे कार्यक्रम के लिए निमंत्रण आ जाता है जिसमे मूर्ति पूजा होती है तब हमारे लिए बड़ी मुश्किल पैदा हो जाती है। अक्सर या तो हम जाने से बचने के बहाने ढूंढते हैं या फिर अनमने भाव से जाकर अपनी उपस्थिति लगाते हैं। हालाँकि ऐसा करते समय थोडा अपराध बोध भी रहता है, विशेषकर अन्य श्रद्धालुओं को देखकर। यह भी जानते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी काम बेमानी ही होता है। 

लेकिन कहते हैं , सारी खुदाई एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ। यानि जब ऐसे कार्यक्रम का आयोजन  स्वयं साले साहब ने किया हो तो मना कैसे किया जा सकता है। ऐसा ही हुआ इस शनिवार को जब हमारे साले साहब ने अपनी सोसायटी के चार अन्य लोगों के साथ मिलकर माता की चौकी का आयोजन किया। इसमें उनकी सोसायटी के लोगों के अलावा इन पांचों के रिश्तेदार भी सम्मिलित होने थे। इसलिए अपना बचना असंभव था।   



लेकिन जाकर एक बात बहुत अच्छी लगी कि पंडाल को बहुत सुन्दरता से सजाया गया था। मंच पर आसीन देवी देवताओं की मूर्तियाँ भी रंग बिरंगी रौशनी में बहुत भव्य लग रही थी।  संगीत की धुन पर गाने वाला कलाकार  बार बार माता को दिल खोलकर दान देने के लिए उकसा रहा था। उसका कहना था कि जो भक्त माता के चरणों में जितना ज्यादा अर्पित करेगा, माता उसकी झोली उतना ही भर देगी। माता सबकी मन्नत पूरी करती है।

बाहर गेट पर कुछ भिखारी भी दक्षिणा पाने की मन्नत मांग रहे थे। लेकिन भक्तजन तो स्वयं ही मांगने में व्यस्त थे, इसलिए उनकी तरफ किसी का ध्यान कैसे जा सकता था। हमें तो यह देखकर हैरानी हो रही थी कि करोड़ों के अपार्टमेंट में रहने वाले शायद अभी भी असंतुष्ट रहे होंगे जो मन्नत बची थी मांगने के लिए।

लेकिन कुछ पाने की चाह में कुछ देना तो पड़ता ही है। इसलिए सभी श्रद्धानुसार हाथ जोड़े माता के चरणों में धन राशि अर्पित किये जा रहे थे। क्योंकि मामला ससुराल का था , इसलिए जिंदगी में पहली बार हमने भी माता के चरणों में यथोचित भेंट चढ़ाई। आरती के बाद प्रसाद ग्रहण कर सबने भोजन की ओर  प्रस्थान किया।

धार्मिक कार्यक्रमों में अक्सर भोजन में होता है, पूरी , आलू की सब्जी, पेठे की सब्जी और रायता। पेठा यानि कद्दू यानि सीताफल तो हरियाणवी लोगों की मनपसंद सब्जी है। पहले हर शादी में यह सब्जी बनाई जाती थी। इसलिए हमें भी बचपन से बड़ी अच्छी लगती रही है। हालाँकि हमारी धर्मपत्नि घर में कभी नहीं खाती। लेकिन यहाँ तो वो भी चटकारे ले कर खा रही थी।

यह तो हम जानते हैं कि कद्दू / पेठा / सीताफल/ पम्पकिन एक  बहुयामी फल / सब्जी है। इसका इस्तेमाल सांभर में , सॉस बनाने के लिए , हलवा और मिठाई बनाने के लिए किया जाता है। विदेशों में भी तरह तरह के पकवान बनाने में उपयोग किया जाता है। लेकिन अक्सर शहर में लोगों को पेठे की सब्जी का नाम सुनकर नाक भों सिकोड़ते देखा है। परन्तु इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों में सब श्रधानुसार सेवन करते हैं।

हम यह भी जानते हैं कि पेठा एक सर्व गुण संपन्न आहार है :

* फैट और कॉलेस्ट्रोल न के बराबर होने से हृदय रोगियों के लिए बहुत उपयुक्त है।

* लो शुगर और हाई फाईबर होने से मधुमेह के रोगी भी आसानी से खा सकते हैं।

* लो सोडियम की वज़ह से बी पी के रोगियों के लिए भी उपयुक्त सब्जी है।

* इसमें मौजूद विटामिन्स और खनिज पदार्थ बच्चों और बड़ों सभी के लिए स्वास्थ्यवर्धक तत्व प्रदान करते हैं
*विटामिन ऐ की अत्यधिक मात्रा रतोंधी जैसे रोग से निजात दिलाती है।

* विटामिन सी और ई से रोग निरोधक शक्ति मिलती है।


अब ज़ेहन में सवाल यह उठता है कि:

* जब इस में इतने गुण हैं तो लोग खाने में क्यों शरमाते हैं !

* दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों में क्यों शौक और श्रद्धा से खाया जाता है ?

 * इस सब्जी को सीताफल क्यों कहते हैं ?


दूसरे सवाल का ज़वाब तो श्रीमती जी के पास भी नहीं था। ज़ाहिर है, जो सब करते हैं , हम भी वही आँख मूंदकर करने लगते हैं। लेकिन बात की तह तक पहुँचने की जिज्ञासा ने ही हमेशा मनुष्य का ज्ञानवर्धन किया है। ब्लॉगिंग का भी यही सार्थक उपयोग है कि हम इन सवालों का ज़वाब ढूंढें। क्या ख्याल है आपका !


Wednesday, December 12, 2012

मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देने --


शनिवार को एक बजे अस्पताल से निकला ही था कि एक फोन आया -- डॉ साहब , मैं आपके अस्पताल से ही बोल रहा हूँ। आप निकल गए क्या ? मैंने पूछा -- आप कौन बोल रहे हैं? वो बोले -- मैं आपके पिताजी का दोस्त बोल रहा हूँ। आपसे मिलना था। मैंने पूछा -- कोई काम था क्या ? बोले -- नहीं , बस आपसे मिलना था , क्या पांच मिनट के लिए आ सकते हैं ? मैं अस्पताल से करीब एक किलोमीटर दूर जा चुका था और ट्रैफिक भी बहुत था। इसलिए थोड़ी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। मैंने पूछा -- आप कहाँ रहते हैं ? उन्होंने बताया -- मैं आगरा में रहता हूँ। आपके पिताजी के निधन के बारे में पता चला तो आपसे मिलना चाहता हूँ। आप बस पांच मिनट के लिए आ सकें तो ! अब तक उनकी आवाज़ रुंध चुकी थी।

मैंने फ़ौरन गाड़ी मोड़ी और वापस आ गया। दुआ सलाम के बाद चाय पानी के साथ उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वो पिताजी के साथ उनके दफ्तर में काम करते थे। दोनों ने एक साथ आई सी एम् आर ज्वाइन किया , और एक साथ रिटायर हुए। बाद में एक साथ दोनों को मलेरिया रिसर्च सेंटर में काम करने का अवसर मिला। पिताजी से उनके विचार बहुत मिलते थे और दोनों गहरे दोस्त थे।

परिचय के बाद असली मुद्ददे पर आते हुए उन्होंने कहा -- मैं दफ्तर आया था अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र  देने। वहां पता चला कि दराल साहब नहीं रहे। वहां से मालूम कर आपके पुराने अस्पताल गया। किसी ने आपके पुराने ऑफिस का पता बताया और वहां पहुंचा तो आपकी जगह बैठे डॉक्टर ने बताया कि आप यहाँ मिलेंगे। दराल साहब जैसे आदमी नहीं रहे , यह सुनकर विश्वास नहीं हुआ। मैंने बताया कि विश्वास तो हमें भी नहीं होता कि ऐसे व्यक्तित्त्व वाला व्यक्ति भी संसार छोड़ कर जा सकता है। लेकिन क्या करें , दुनिया की रीति है , कोई अमर नहीं रह सकता।

फिर काफी देर तक घर परिवार की बातें चलती रही। 82 वर्ष की आयु में भी वे दिल्ली एक शादी में आये थे। आगरा में पति पत्नी अकेले रहते हैं। बेटे बेटी सब अपनी गृहस्थी में व्यस्त अलग अलग शहरों में रहते हैं। उनका स्टेमिना देखकर लगा कि पुराने लोगों का स्वास्थ्य नई पीढ़ी के मुकाबले कितना बेहतर होता है। सभी प्रकार के व्यसनों से दूर रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करना ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।

अंत में विदा लेते हुए उन्होंने कहा -- आप से मिल लिया , ऐसा लगा जैसे मैं दराल साहब से ही मिल लिया। उनके मित्र प्रेम के आगे मैं तो नतमस्तक था। और पिताजी की मृत्यु के दो साल बाद उनके करीबी दोस्त से मिलकर मुझे लगा जैसे साक्षात पिताजी ही भेष बदलकर सामने आ खड़े हुए हों , मुझे गर्व से एम् एस की कुर्सी पर बैठे हुए देखने के लिए। यदि जीवित होते तो वे भी आज 82 वर्ष के होते। 


Wednesday, December 5, 2012

लेडी हार्डिंग में ताऊ


मेडिकल कॉलेज में हमारे बैच में सिर्फ लड़के थे , लड़की एक भी नहीं थी. अक्सर हम सबको यह बेइंसाफी सी लगती. ऐसे में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज जो गर्ल्स कॉलेज था, हमारे बीच बहुत लोकप्रिय था. आज भी लेडी हार्डिंग का नाम आते ही सभी के चेहरे पर एक रौनक सी आ जाती है. प्रस्तुत है, इसी विषय पर एक हास्य कविता : 

एक हरियाणवी ताऊ का छोरा, जब टॉप कर गया
रिजल्ट देख कर ताऊ का दिल,  गर्व से भर गया .

उसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिन याद गए
जो दिल के सोए बरसों पुराने अरमान जगा गए .

बोला , अब तो काली कम्बली वाले को भेंट चढाऊंगा ,
और सोच लिया , छोरे को लेडी हार्डिंग में ही पढ़ाऊंगा .

ताऊ ने अपनी हीरो साईकलएल एच की ओर दौड़ाई .
परन्तु गेट पर ही एक सुन्दर सी कन्या से जा टकराई .

लड़की ने अपनी बिखरी किताबें टटोली 
फिर शरमाई सकुचाई सी धीरे से बोली .

ताऊ गेट देख कर नहीं पार सकते थे
कम से कम एक घंटी तो मार सकते थे .

ताऊ बोला सॉरी ,पर छोरी ईब के तेरी आरती उतारूँ .
अरै बावली, पूरी साइकिल मार दी, ईब घंटी अलग तै मारु .

लड़की यूँ तो लेडी हार्डिंग की छात्रा थी
पर वो भी पूरी हरियाणवी पात्रा थी .

बोली, शर्म नहीं आती बुड्ढे, कब्र में लटके हैं पैर,   
और करने चले हैं साईकल पर सी पी की सैर.

ताऊ बोला, दो चार को तो अब भी चक्कर दे सकता हूँ .
मैं तो मल्लिका सहरावत से भी टक्कर ले सकता हूँ .

रिसेप्शन पर जाकर बोला, ये फॉर्म भरवाना है
लड़के को एम् बी बी एस में दाखिल करवाना है .

रिसेप्शनिस्ट बोली ताऊ ये फॉर्म नहीं भर सकते
ये तो गर्ल्स कॉलेज है ,यहाँ लड़के नहीं पढ़ सकते.

ताऊ बोला -- 
जब यु सी एम् एस में लड़कियां पढ़ सकती हैं
तो फिर एल एच में लड़कों पर क्यों सख्ती है .

माना के म्हारे हरियाणे में लड़कियों का अभाव है
लेकिन यहाँ तो सरासर लड़कों के साथ भेद भाव है .

अब तो मैं 52 गावों के खाप की पंचायत बुलाऊंगा
और यहीं खटोला बिछाकर अन्ना सा धरना लगाऊंगा .

लड़की ने समझाया , ताऊ
लड़के को यु सी एम् एस में भर्ती करा दे ,उसका भी बहुत नाम है .
हॉस्टल , केन्टीन , प्लेग्राउंड, लाइब्रेरी, सबका बढ़िया इंतजाम है .

ताऊ बोला पता है बेटी , वहां पढाई तो अच्छी करवाते हैं
लेकिन दीक्षांत समारोह अभी भी, उधार की जगह करवाते हैं .

आखिर ताऊ ने छोरा यु सी एम् एस में भर्ती करवाया
लेकिन जाते जाते छोरे को अच्छी तरह से समझाया .

बेटा एम् बी बी एस तो तू यु सी एम् एस से कर लेना
लेकिन एम् डी तो शर्तिया,  लेडी हार्डिंग से ही करना .

बेशक पढाई में यु सी एम् एस का नहीं कोई सानी है
लेकिन डॉक्टर बहु तो मैंने लेडी हार्डिंग से ही लानी है .

छोरा बोला बापू , बहु डॉक्टर हो या इन्जीनियर 
प्रेम विवाह हो या आयोजित, कोई फर्क नहीं पड़ना।
पर एक विनती है आपसे, दहेज़ मांगकर मेरी
और मेरी उच्च शिक्षा का, बेडा गर्क नहीं करना।  

नोट : यु सी एम् एस = यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसिज
         एल एच एम् सी = लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज , दिल्ली . 

Sunday, December 2, 2012

दिल्ली के चांदनी चौक में --एक खाद्य यात्रा---



पुरानी दिल्ली का दिल है --चांदनी चौक  सही मायने में देसी डाउन टाउन  मुग़लों और अंग्रेजों के ज़माने में चांदनी चौक ने बहुत उतार चढाव देखे हैं  वर्तमान में यह क्षेत्र दिल्ली का ट्रेडिंग का सबसे बड़ा गढ़ है  विशेषकर कपड़ों के मामले में , यहाँ के कटरे बहुत मशहूर हैं 

लेकिन एक चीज़ जो और मशहूर है , वह है यहाँ का खाना 
कई साल से बड़ा मन था कि एक बार यहाँ घूमकर यहाँ के खाने का मज़ा लिया जाए  आखिर अवसर मिल ही गया जब हम चांदनी चौक के कुलिनरी टूर पर निकल पड़े 

यहाँ आने के लिए वैसे तो मेट्रो सबसे बढ़िया तरीका है लेकिन हमें तो अपनी गाड़ी में चलने की आदत पड़ी है  कारों के लिए पार्किंग भी मेट्रो स्टेशन के साथ ही बनी है 

लेकिन अन्दर घुसते ही टिकेट वाले ने बताया कि टिकेट ले लो परन्तु जगह  मिलने पर पैसे वापस नहीं होंगे 

अन्दर देखा तो यह नज़ारा था 


अभी हम लौटने ही वाले थे , लेकिन बेसमेंट में किसी तरह पार्किंग मिल ही गई 


पार्किंग से बाहर निकलते ही यह शिव मंदिर आता है 


मंदिर के पास वाली पतली सी गली से होकर हम पहुंचे चांदनी चौक की सड़क पर  इसी गली के नुक्कड़ पर यह दुकान नटराज -- १९४० से लोगों को भल्ला और टिक्की खिलाकर लुभाती रही है  एक प्लेट ३०-३५ रूपये 
दुकान के नाम पर मुश्किल से तीन फुट चौड़ी और आठ फुट लम्बी जगह है ,लेकिन खाने के लिए बहुत मारा मारी रहती है 


चांदनी चौक में चप्पे चप्पे पर खोंमचे वाले खाने का सामान लेकर बैठे मिलेंगे  कमाल की बात यह है कि सब पर ग्राहक मिल जायेंगे चटकारे लेते हुए 


सामने यह मिठाई की दुकान २०० साल से भी ज्यादा पुरानी है 


मीना बाज़ार --यहाँ साड़ियों की सेल हमेशा लगी रहती है  यहाँ कदम कदम पर आपको साड़ियों के दलाल मिलेंगे जो आपको बहुत लुभायेंगे साड़ी देखने के लिए 

नटराज पर दही भल्ला और आलू की टिक्की का स्वाद लेकर हम चल पड़े दायीं ओर 

सबसे पहले आता है एक चौक जहाँ यह कट पीस की दुकान बहुत मशहूर है  यहाँ सब तरह के शर्ट पेंट के कट पीस अच्छे दाम पर मिल जाते हैं 


यहीं से शुरू होती है --नई सड़क  पुरानी दिल्ली की यह नई सड़क इतनी नई भी नहीं लगती  इस पर आगे जाकर किताबों की बहुत सी दुकाने हैं  हमने भी मेडिकल की सभी पुस्तकें यहीं से खरीदी थी 


इसी बीच एक गली आती है जिसका नाम है --परांठे वाली गली  यह नई सड़क और गुरुद्वारा शीशगंज के बीच पड़ती है 
इसका प्रवेश मुश्किल से  फुट का होगा  दोनों तरफ दुकाने और अत्यंत भीड़ भाड़ --घुसना भी बड़ी हिम्मत का काम है  


लेकिन गली के अन्दर कई दुकाने हैं जो बीसियों तरह के परांठे वाजिद दाम पर खिलाते हैं 
आलू परांठा से लेकर काजू और बादाम तथा खुरचन के परांठे ३० रूपये से लेकर ५० रूपये तक मिलते हैं  एक प्लेट में कम से कम दो परांठे लेने पड़ते हैं 

ये परांठे एक छोटी सी कड़ाही में बनाये जाते हैं , डीप फ्राई करके  थाली में मिलती हैं --आलू की सूखी सब्जी , आलू की तरी वाली भाजी , सीताफल की मीठी सब्जी , चटनी , अचार और हरी मिर्च 
बेशक , स्वाद बेमिसाल होता है 


थोडा आगे चलने पर आती है --गली बल्ली मारान  यहीं पर ग़ालिब की हवेली है जिसे पब्लिक के लिए खोला गया है  सोमवार को बंद रहती है  ( इसे यहाँ देख सकते हैं ) 

चांदनी चौक के पश्चिमी छोर पर बनी है --फतेहपुरी मस्जिद 
यहाँ से दायें मुड़ने पर बहुत सी खाने की दुकाने हैं जो लोकल नमकीन और कचौड़ी आदि बेचते हैं  साथ ही यहाँ ड्राई फ्रूट्स और खोया भी बहुत बिकता है 


यह सैनी दी हट्टी है --यहाँ आपको मिलेगा रबड़ी फलूदा --५० रूपये में पूरा गिलास भरकर  इतनी क्रीमी रबड़ी मैंने कभी नहीं खाई जितनी यहाँ मिली  साथ ही छोले बठुरे खाकर और लस्सी पीकर पेट पर हाथ फिराने में बड़ा मज़ा आएगा 

यहाँ से हमारी वापसी हुई  वापसी में फिर नई सड़क के चौक पर पहुंचेजहाँ है --टाउन हॉल  यहाँ कुछ समय पहले तक दिल्ली नगर निगम के ऑफिस और निगम पार्षदों की असेम्बली होती थी  अब शिफ्ट होकर नगर निगम के नए भवन सिविक सेंटर में चले गए हैं 

अब यह हेरिटेज भवन खाली पड़ा नष्ट हो रहा है 

यह मूर्ती स्वामी श्रधानंद की है 
इसके सामने हज़ारों कबूतर दाना चुग्गा करते हैं 


पूर्व की ओर आगे बढ़ने पर आता है --फव्वारा  इसके पीछे जो भवन नज़र  रहा है वहां कभी सिनेमा हाल होता था  लेकिन अब यह जगह गुरुद्वारा शीशगंज प्रबंधन के अंतर्गत है 



ऐतिहासिक गुरुद्वारा --शीशगंज । इसके बारे में सब जानते ही होंगे।  


और आगे जाने पर यह जलेबी वाला भी एक नुक्कड़ पर बैठा है 
लेकिन देसी घी की बनी इनकी जलेबी ३०० रूपये किलो मिलती हैं और हमेशा भीड़ लगी रहती है 
इसका मालिक बैठा बैठा यंत्रवत ऐसे नोट बटोर रहा था जैसे बटोरते बटोरते बोर हो गया हो 


इसी के सामने सड़क खचाखच भरी हुई  दूर दिखाई दे रहा है --लाल किला 

और इस तरह पूरा हुआ , हमारा कुलिनरी टूर चांदनी चौक का 
( यह टूर हमने पिछले साल इन्ही दिनों में किया था। लेकिन पोस्ट का नंबर अभी आ सका। खाने पीने के रेट अब निश्चित ही बढ़ गए होंगे। )


 नोट : चांदनी चौक में इतनी भीड़ होती है कि सड़क और यहाँ की गलियों में आदमी कंधे से कन्धा मिलाकर चलते हैं  अपनी जेब का धयान रखिये  बेहतर है जेब में पर्स ही  रखें  घर जाकर दो गोली मेट्रोनिडाजोलऔर एक नोरफ्लोक्सासिन अवश्य खा लें यदि पेट में जगह बाकि हो तो