Wednesday, September 26, 2012

जहाँ सूखे में भी बहार है -- दुबई ...



वर्षों पहले हम मित्रों ने एक ख्वाब बुना था -- बाल बच्चों समेत विदेश यात्रा पर जाने का . ख्वाब पूरा हुआ पूरे ३२ साल बाद जब तीन मित्रों को इक्कट्ठा कर पाए और कार्यक्रम बना पाए, हालाँकि अब बाल तो सभी के कम ही बचे थे . जैसे ही ऑफिस से अनुमति आई , हमने टिकेट कटाई , वीज़ा की अर्जी लगाई, हबीब सैलून से कटिंग कराई और भाई चल दिए दुबई . विमान से नीचे का नज़ारा ऐसा दिख रहा था जैसे रेगिस्तान में जगह जगह घर बने हों , कोई पेड़ नज़र नहीं आया . लेकिन शहर में पहुंचते ही भूल से गए की पेड़ों की भी ज़रुरत होती है .

ठहरने के लिए बढ़िया होटल था -- दुबई में चार / पांच सितारा होटल्स की भरमार है . आखिर , उनकी सारी कमाई टूरिज्म से जो होती है .

होटल की लॉबी से बाहर सड़क नज़र आ रही है .

दुबई जाने के लिए आसानी से पॅकेज टूर मिल जाते हैं जो हवाई टिकेट के साथ खाने , ठहरने और घुमाने का पूरा प्रबंध खुद कर देते हैं . इसी में शामिल होता है -- दुबई धोव क्रूज . रात में रंग बिरंगी नाव में बैठकर शहर के बीचों बीच बनाई गई नदी में सैर करते हुए , रात में शहर की खूबसूरती देखने जैसी होती है . बोट में ही ऐ सी हॉल में संगीत के साथ बुफे डिनर परोसा जाता है . बाद में एक जादूगर ने भी अपने जौहर दिखाकर सबका मन मोह लिया .


दुबई रात में .


अगले दिन सिटी टूर में दिन के समय उसी स्थान पर . नदी के पार ऊंची ऊंची बिल्डिंग्स एक से एक अलग डिजाइन में दिखाई देती हैं .
यहाँ से निकल कर बस पहुंची मीना बाज़ार -- जहाँ दुबई की सबसे बड़ी और शायद उचित दामों वाली मार्केट है . लेकिन हम तो यहाँ रुके म्युज़ियम में जहाँ अंडर ग्राउंड ऐ सी म्यूजियम सचमुच अम्युजिंग लगी .
यहाँ से आगे बस पहुँच गई जुमैरा रोड पर जो दुबई के वेस्ट कोस्ट ( पश्चिमी घाट ) के साथ साथ चलती हुई सारजाह तक जाती है .


इसी सड़क पर बनी है यह दुबई की सबसे बड़ी मस्जिद . दुबई में करीब ५०० मस्जिदें हैं . एक आश्चर्य्ज़नक बात यह थी -- यहाँ लगभग सभी बिल्डिंग्स बाहर से गोल्डन ब्राउन या केमल कलर में नज़र आई . खाली पड़ी जगहों पर रेत भी इसी रंग का होता है . लेकिन यह रेत भारी होता है , इसलिए धूल बिल्कुल नहीं उडती. इसीलिए वहां कपडे भी मैले नहीं होते . ज़ाहिर है , दुबई की वायु में प्रदुषण न के बराबर है .


जुमैरा रोड पर चलते हुए दायें हाथ की ओर समुद्र है -- अरब महासागर . समुद्र और सड़क के बीच बस १०० मीटर की दूरी है . लेकिन इस भूमि पर सड़क और समुद्र के बीच अनेक होटल्स , मस्जिदें और निजी बंगले हैं . यु ऐ ई के शासक शेखों के भी आलिशान बंगले यहीं बने हैं , हालाँकि शासन तो अबू धाबी से होता है . सागर किनारे बना है -- यह सात सितारा होटल , बुर्ज़ अल अरब . इसकी चोटी पर बायीं तरफ जो डिस्क सी नज़र आ रही है , वह हेलीपेड है . यहाँ एक टेनिस कोर्ट भी है जहाँ इवान लेंडल जैसे टेनिस प्लेयर मैच खेल चुके हैं . दायीं तरफ एक गैलरी नुमा रेस्तरां बार है जहाँ से दुबई की कोस्ट लाइन का खूबसूरत नज़ारा देख सकते हैं . लेकिन कीमत मत पूछिए .


अरब महासागर में बुड्ढा महामस्ती . यहाँ पानी काफी गर्म था . वैसे भी दुबई में दिन में अगस्त में तापमान ४० डिग्री के करीब होता है और धूप बहुत तेज़ होती है .



अल बुर्ज़ से थोडा आगे बना है -- विश्व का प्रथम कृत्रिम मानव निर्मित टापू -- पाम आईलेंड जुमैरा. पाम यहाँ का राष्ट्रीय वृक्ष है . पाम की शक्ल में बना यह आईलेंड सड़क से करीब ६-७ किलोमीटर दूर तक जाता है जिसके दोनों ओर शुरू में बहु मंजिला आवासीय इमारतें बनी हैं जिनमे विश्व के जाने माने और सेलेब्रिटी लोगों के अपार्टमेन्ट हैं . एक अपार्टमेन्ट की कीमत -- छोडिये क्या करेंगे जानकर , दिल में दर्द होने लगेगा . शाहरुख़ खान ने भी खरीदा है लेकिन ९९ वर्ष की लीज़ पर . यानि स्वामित्त्व तो उनका ही रहेगा . अपार्टमेंट्स के बाद पाम की लीव्स के रूप में शाखाएं सी बनी हैं जिनपर व्यक्तिगत घर बने हैं -- एक तरफ सड़क , दूसरी तरफ स्वयं की प्राइवेट बीच -- हर घर के लिए . अब तक रस्क होने लगा था . आखिर में जाकर बना है यह सात सितारा होटल -- एटलानटिस .

आर्च के ऊपर छै सुइट्स बने हैं जिनका किराया है -- २५००० डॉलर प्रतिदिन . ,यह अलग बात है , हर सुइट में अपना स्वयं का स्विमिंग पूल , सौना आदि बने हैं . इस होटल में खाना खायेंगे तो आपको खर्च करने पड़ेंगे -- ६०० दिरहम यानि करीब १०,००० रूपये प्रति व्यक्ति . लेकिन आप यहाँ से पूरे पाम आईलेंड को आसमान से देख सकते हैं.
पाम आईलेंड से निकलकर पहुंचते हैं दुबई के नए क्षेत्र में जहाँ गगन चुम्बी इमारतें देखकर सर घूमने लगता है .


यह है , विश्व की सबसे ऊंची बिल्डिंग -- बुर्ज़ खलीफा . इसकी १२४ वीं मंजिल तक आप जा सकते हैं .


यह फोटो हमारे गाइड ने लगभग सड़क पर लेटकर खींचा था .

सिटी टूर के बाद अगले दिन हमने दुबई की मेट्रो की सवारी की . यहाँ की मेट्रो बहुत बढ़िया है और १६ दिरहम में सारे दिन का पास मिल जाता है . मेट्रो में बैठकर शहर की अच्छी घुमाई हो जाती है , विशेषकर खूबसूरत इमारतें देखकर मन रेगिस्तान में भी बाग़ बाग़ हो जाता है .

दिन में धूप बहुत तेज़ थी . लेकिन इस भेष में काफी राहत मिली . वैसे भी वहां के मूल निवासियों में पुरुष सफ़ेद रंग का लम्बा सा कुर्ता पहनते हैं एक पीस में, और महिलाएं पूरी तरह से बुर्के में ढंकी रहती हैं . शायद यह उन्हें वहां की तेज़ धूप से सुरक्षित रखता है .

एक शानदार मॉल में घूमकर जब थक गए तो वापस आ गए , दुबई मॉल में जहाँ से बुर्ज़ खलीफा के लिए एंट्री होती है . ( टिकेट १०० दिरहम मात्र )  

एक के बाद एक कई गेट्स से होते हुए हम गुजरे इन शानदार गलियारों से .

लेकिन लिफ्ट में घुसते ही एक मिनट में ही हम खड़े थे विश्व की सबसे ऊंची ईमारत की १२४ वीं मंजिल पर बने दर्शक दीर्घा में .
बर्ड्स आई व्यू ऑफ़ दुबई -- बुर्ज़ खलीफा से .


एक और दृश्य -- यहाँ शाम के समय फव्वारे चलते हैं जिन्हें देखने हजारों लोग इक्कट्ठे हो जाते हैं .


टॉप पर लगी यह ऐ टी एम् मशीन नोट नहीं सोने के सिक्के निकालती है , दिरहम के बदले .

बुर्ज़ से उतरकर दुबई मॉल में घूमते हुए पहली बार भारी भीड़ मिली . बेशक यह दुबई का सबसे लोकप्रिय मॉल है जहाँ सभी तरह के लोग मौज मस्ती करते हुए नज़र आते हैं . यहीं पर बना है इनडोर इक्वेरियम . विशालकाय इक्वेरियम में नीचे एक टनल बनी है, और ऊपर बोटिंग कर सकते हैं . लेकिन टिकेट ८०-११० दिरहम .


मॉल के बाहर शाम को हर आधे घंटे में म्यूजिकल फाउन्टेन शो होता है जो फ्री है . हालाँकि यह हमारे दिल्ली में बने अक्षरधाम में होने वाले शो के आगे कुछ भी नहीं था .


आखिरी दिन हमने तपती धूप में बीच का मज़ा भी लिया . समुद्र में नहाने का अपना ही मज़ा है . लेकिन यहाँ नहाने और कपडे बदलने की सुविधा देखकर मन प्रसन्न हो गया .

और इस तरह पूरा हुआ हमारा दुबई दर्शन . अगली पोस्ट में दुबई से हमने क्या सीखा , यह बताएँगे . फिर इसके बाद डेजर्ट सफ़ारी का आनंद लेना न भूलें .

Monday, September 24, 2012

सोच , सच और देश का दिल -- दिल्ली .



पिछली पोस्ट में हमने आपसे एक सवाल पूछा था --

एक काली अँधेरी बरसाती रात में आप अपनी कार में कहीं जा रहे हैं . तूफ़ान जोरों पर है . अचानक एक बस स्टॉप पर आप देखते हैं -- वहां बस तीन लोग खड़े हैं . 

१. एक बूढी औरत जो इतनी बीमार दिख रही है जैसे अभी दम निकल जायेगा . 
२. एक पुराना दोस्त जिसने कभी एक हादसे में आपकी जान बचाई थी .  
३. एक खूबसूरत लड़की --आपके ख्वाबों की मल्लिका , जिससे आप शादी करना चाहते हैं . 

ऐसे में आप किसे लिफ्ट देंगे ? आपकी गाड़ी में बस एक ही व्यक्ति बैठ सकता है . 

दरअसल यह सवाल एक बार एक पोस्ट को भरने के लिए सभी आवेदकों से पूछा गया था  . 200 लोगों में से जिसका चयन किया गया , उसका ज़वाब था --
मैं अपनी गाड़ी की चाबी अपने दोस्त को दे दूंगा और उसे बूढी महिला को अस्पताल ले जाने के लिए कहूँगा . मैं स्वयं अपनी महबूबा के साथ रूककर बस का इंतजार करूँगा . 

अब देखा जाए तो इस सवाल में ज़वाब देने के लिए सिर्फ तीन ही विकल्प दिए गए थे जबकि आम तौर पर चार विकल्प दिए जाते हैं . यहाँ चौथा विकल्प छुपा हुआ था जिसका उपयोग सिर्फ एक ही उम्मीदवार ने किया . 

पिछली पोस्ट में सबसे पहले सही ज़वाब दिया -- देवेन्द्र पाण्डेय जी ने . शाहनवाज़ और प्रवीण पाण्डेय ने भी इसी ज़वाब से अपनी सहमति जताई . महिला ब्लॉगर्स ने तो अपना पल्लू झाड लिया यह कह कर कि उन्हें इस विषय से क्या लेना  देना . हमेशा की तरह अरविन्द जी और अली जी ने खूब मस्ती दिखाई . 

सोच का दायरा : 

अक्सर देखने में आता है कि हम अपनी सोच का दायरा बड़ा सीमित रखते हैं . इसलिए जो नज़र आता है , बस उसे ही देख पाते हैं और सही निर्णय तक नहीं पहुँच पाते . आवश्यकता है , सीमित दायरे से निकल कर सोच को विस्तार देने की . जो अदृश्य है , उसे देख पाने की क्षमता ही हमें एक अच्छा मैनेज़र बना सकती है . आखिर , अच्छी जिंदगी जीने के लिए एक अच्छा मैनेज़र बनना भी आवश्यक है . 
आजकल हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं . 

अब कुछ और बातें जो पोस्ट से निकल कर आई : 

* कहते हैं -- अपनी घडी , गाड़ी और बीबी दूसरे के हाथ में नहीं सौंपनी चाहिए क्योंकि दूसरे के हाथ में गई और बिगड़ी . कहावत पुरानी है . आजकल घडी और गाड़ी सब के पास होती है , इसलिए मांगने की ज़रुरत ही नहीं होती . लेकिन बीबी तो नॉन ट्रांस्फेरेबल ही ठीक है . 
* सड़क पर एक अकेली हसीना को लिफ्ट मांगते देख कर शायद ही कोई निष्ठुर होगा जो लिफ्ट देने से मना  करेगा .  लेकिन ज़रा संभल के भाई -- दिल्ली में इस तरह लिफ्ट देना बहुत महंगा पड़ सकता है . आपके दिलफेंक शौक की वज़ह से आपको अपनी खून पसीने की कमाई से हाथ धोना पड़ सकता है . मुफ्त में पाया काला धन भी लुट जाए तो भी दुःख तो होगा ही . 
* दिल्ली जैसे शहर में अकेली महिला का सुनसान अँधेरी जगह पर खड़ा होना एक गुनाह जैसा है . ऐसे में शरीफ़ से शरीफ़ आदमी भी अपनी शराफ़त छोड़ने को लालायित हो जाता है . सच सचमुच बड़ा भयानक होता है . 
* भगवान से प्रार्थना कीजिये कि दिल्ली की सडकों पर कभी असहाय स्थिति में न आना पड़े . वर्ना दिल्लीवालों से तो किसी सहायता की उम्मीद मत रखियेगा . तमाशा देखने वाले एक मिनट में इक्कट्ठे हो जायेंगे , मदद करने वाला कोई नहीं मिलेगा . 
*  काश कि दिल्ली भी दुबई जैसी हो सकती -- इस बारे में अगली पोस्ट का इंतजार कीजिये . 

Friday, September 21, 2012

काम के बोझ तले दबे हों तो इस तरह दबाव कम कीजिये -- इस सवाल का ज़वाब दीजिये .


एक मित्र की ई मेल ने न सिर्फ सोचने पर मज़बूर कर दिया बल्कि ज्ञान चक्षु भी खोल दिए . एक सवाल -- लीजिये आप भी पढ़िए और बढ़िया ज़वाब देने की कोशिश कीजिये : 

एक काली अँधेरी बरसाती रात में आप अपनी कार में कहीं जा रहे हैं . तूफ़ान जोरों पर है . अचानक एक बस स्टॉप पर आप देखते हैं -- वहां बस तीन लोग खड़े हैं . 

१. एक बूढी औरत जो इतनी बीमार दिख रही है जैसे अभी दम निकल जायेगा . 
२. एक पुराना दोस्त जिसने कभी एक हादसे में आपकी जान बचाई थी .  
३. एक खूबसूरत लड़की --आपके ख्वाबों की मल्लिका , जिससे आप शादी करना चाहते हैं . 

ऐसे में आप किसे लिफ्ट देंगे ? आपकी गाड़ी में बस एक ही व्यक्ति बैठ सकता है . 

क्या बूढी औरत को अस्पताल ले जायेंगे , ताकि उसकी जान बच जाये ? 
या मित्र के अहसान का बदला चुकता करेंगे ? 
या फिर स्वीटहार्ट को लिफ्ट देंगे ताकि मन पसंद साथी के साथ जीवन भर का साथ पक्का हो जाये ? 

सोच समझ कर ज़वाब दीजियेगा -- ऐसे में आप क्या करेंगे . 

Wednesday, September 19, 2012

And they lived happily ever after -- यह कथन सुखांत कहानियों में ही देखने को मिलता है --


मनुष्य का बचपन जिंदगी से अन्जान होता है . युवावस्था नादान होती है . दोनों ही अवस्थाओं में मनुष्य दुखों की अनुभूति नहीं कर पाता . लेकिन एक उम्र के बाद जिंदगी के असली रूप सामने आने लगते हैं . वास्तव में , शादी के एक दो साल बाद ही चिंता और तनाव का दौर शुरू हो जाता है . किसी को जल्दी बच्चा होने का टेंशन , किसी को न होने का . यदि हो जाये तो दो साल बाद ही स्कूल में एडमिशन का टेंशन . पहले एक का , फिर दूसरे का . और इसी तरह बच्चों को पालते पालते, स्कूल से कॉलेज आने तक का सफ़र कब कट जाता है , पता ही नहीं चलता . आजकल कॉलेज में एडमिशन भी अक्सर शहर से बाहर ही होता है और नौकरी तो निश्चित ही किसी दूसरे शहर में ही मिलती है . यानि बच्चों के बड़े होते ही आप रह गए अकेले .

कुल मिलाकर यही लगता है -- आधुनिक मानव तभी तक सुख का आनंद ले पाता है जब तक बच्चे छोटे होते हैं . फिर एक ऐसा दौर भी आता है जब परिवार और निकट सम्बन्धियों में आने का कम और जाने का सिलसिला ज्यादा होने लगता है . हमारे देश में जहाँ अभी भी पारिवारिक सम्बन्ध बने हुए हैं , लोग एक दूसरे से जुड़े हैं -- वहां किसी भी परिवार में कोई संकट आने पर सभी का प्रभावित होना स्वाभाविक है . विशेषकर किसी की मृत्यु होने पर १३ दिन का शोक आपकी सारी सामान्य दैनिक प्रक्रिया को अस्त व्यस्त कर देता है . यदि आप ५० को पार कर गए हैं तो निश्चित ही यह अवसर अनचाहे ही यदा कदा आता ही रहता है और आप कुछ नहीं कर सकते .

अक्सर लोगों को यह कहते सुना है - अमुक काम हो जाए तो गंगा नहा आऊँ . यानि हम सोचते हैं , एक विशेष अवस्था के बाद सुख चैन की जिंदगी बिता पाएंगे . लेकिन यह एक भ्रम ही होता हैं . सच तो यह है -- इन्सान की जिंदगी में ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव हो ही नहीं सकता जिसके बाद आपका हमेशा सुखी रहना अवश्यम्भावी हो . इसलिए यह कथन --- and they lived happily ever after --- मात्र कहानियों में ही फिट बैठ सकता है .

इसीलिए इस सन्दर्भ में यह कहना कदाचित अनुचित नहीं होगा -- जो आज है , वही सर्वोपरि है . वर्तमान के हर पल का जी भर कर आनंद लेना चाहिए . क्योंकि कल कभी नहीं आता . और कोई नहीं जानता , कल क्या होने वाला है . यदि खुशियों को कल पर छोड़ा तो शायद यह अवसर कभी हाथ न आए .

Friday, September 14, 2012

जिंदगी , जो अपने वश में नहीं ---


पिछली पोस्ट में हमने अपने अति व्यस्त होने की बात कहते हुए कहा था -- अब शायद ब्लॉगिंग के लिए समय न मिल सके . लेकिन लगभग सभी मित्रों ने यही कहा -- ब्लॉगिंग छोड़ना मुश्किल ही नहीं , लगभग नामुमकिन है . हमने भी वादा किया था की कम से कम दुबई सैर की कहानी तो अवश्य सुनायेंगे . पोस्ट डाल भी दी थी -- तभी हमारिवानी पर जाते ही श्री पाबला जी के बेटे की असामयिक मृत्यु का अत्यंत दुखद समाचार पढ़कर मन दुःख से भर गया और तुरंत पोस्ट को हटा दिया .

सोच ही रहे थे की इस भयंकर त्रासदी पर पाबला जी को फोन कर कहें भी तो क्या कहें . बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटा पाया उन्हें फोन मिलाने की . लेकिन इस बीच एक और दुखद दुर्घटना ने हिला कर रख दिया . १० सितम्बर को हमारी चचेरी बहन का इकलौता २७ वर्षीय बेटा एक सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल जाने के बाद दम तोड़ दिया . दो छोटे छोटे बच्चों को छोड़कर परिवार को बिलखता छोड़ दिया और सारी जिम्मेदारी बहन पर आ पड़ी .
इस हादसे से उन्हें भी एंजाइना होने लगा तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा . हालाँकि , अब ठीक हैं .

सब कुछ देख कर कभी कभी लगता है -- कभी कभी जिंदगी अपने आप में कितनी कष्टदायक भी हो सकती है . जब तक सब ठीक चल रहा है , तब तक ठीक . वर्ना कब क्या हो जाए , किसी को कुछ नहीं पता . फिर जाने क्यों हम लोग स्वयं को खुदा समझने लगते हैं .

सच पूछा जाए तो मृत्यु से ज्यादा जिन्दगी से डर लगता है .

Thursday, September 6, 2012

टेढ़े मेढ़े रास्ते और मंजिल अभी दूर -- एक नए सफ़र पर .


अपनी पिछली पोस्ट पर श्री अरविन्द मिश्र जी ने ब्लॉगिंग से ब्रह्मचर्य रखने की बात कही थी . इस पर हमने टिपियाया -- लगता है आप और हम -- हम उम्र हैं . अब मिश्र जी कुछ समझे या नहीं , नहीं जानते लेकिन तात्पर्य यही था -- अब हमारा भी ब्लॉग ब्रह्मचर्य पालन करने का वक्त आ गया है .

एक दिन एक कोर्ट में एक डॉक्टर की हैसियत से बयान देते हुए डिफेन्स के वकील ने क्रॉस एक्सामिनेशन करते हुए अचानक सवाल किया -- डॉक्टर साहब , सुना है आप कवि भी हैं . हमने कहा -- वकील साहब , एक मुद्दत के बाद आप पहले इन्सान मिले हैं जिन्होंने हमें कवि भी कहा . वर्ना आजकल तो लोग कवि ही कहने लगे हैं , ये तो भूल से गए हैं की हम डॉक्टर भी हैं . जब से कवियों की संगति में रहने लगे हैं , तब से एक विसंगति उत्पन्न हो गई है -- हमारे डॉक्टर मित्र तो हमें कवि समझने लगे हैं , कवि मित्र हमें डॉक्टर समझते हैं , लेकिन हमारे अस्पताल के जो मरीज़ हैं , वे हमें ना डॉक्टर समझते हैं , न कवि . वैसे भी हमने देखा है -- एक सरकारी डॉक्टर को मरीज़ डॉक्टर समझते ही नहीं . अब देखिये एक दिन ओ पी डी में बैठ एक महिला को चेक किया और दवा लिख कर हमने कहा -- आप दवा खरीद लेंगी ? महिला बोली -- जी दवा खरीदनी होती तो आप के पास क्यों आते ! डॉक्टर के पास न जाते !

पिछले कुछ वर्षों से प्रशानिक कार्य करते हुए पब्लिक से बहुत रूबरू होना पड़ा . इस चक्कर में पब्लिक स्पीकिंग करना सीख गए -- मंच पर आने लगे -- कविता करने लगे -- आखिर एक दिन दिल्ली के लाफ्टर चेम्पियन का ख़िताब ही जीत लिया . फिर ब्लॉगिंग शुरू हो गई . लेकिन अब लगता है -- सब छूट जायेगा . सरकार ने हमारे सर पर ताज रखने का विचार बना लिया है . दिल्ली के एक बड़े नवनिर्मित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की देख रेख हमें सौंप दी है . अब दिन रात मेहनत कर हमें इसे चलाना है . अब कांटे चुभें या कीलें , हमने भी ताज सर पर रखना स्वीकार कर ही लिया है .

ज़ाहिर है , इसलिए अब ब्लॉगिंग के लिए समय शायद ही मिल सके . लेकिन अभी दुबई की सैर करवानी बाकि है , जो हम अवश्य कराएँगे .

Saturday, September 1, 2012

तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे --


यह भी एक इत्तेफाक की ही बात है , जब देश विदेश के जाने माने ख्याति प्राप्त ब्लॉगर अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में भाग लेने नवाबों की नगरी लखनऊ की ओर प्रस्थान कर रहे थे , ठीक उसी समय हम देश को छोड़ विदेश की ओर कूच कर रहे थे . ३० अगस्त को वापस आने पर सम्मेलन की झलकियाँ देखी और कुछ लेख पढ़े तो अपेक्षित प्रतिक्रियाएं ही देखने पढने को मिली . कुछ प्रतिष्ठित और अनुभवी ब्लॉगर्स में जम कर विचारों का द्वंद्ध पढने को मिला . लेकिन सम्मेलन की तस्वीरों में अरविन्द मिश्र जी और शिखा जी को मंच पर आसीन देख कर अत्यंत प्रसन्नता हुई .

यह भी इत्तेफाक की ही बात है , जब इस समारोह की घोषणा हुई , ठीक उसी समय हमारा भी दुबई जाने का कार्यक्रम बना था . आखिर , हम मित्रों का वर्षों पुराना सपना पूरा हो रहा था , बाल बच्चों समेत विदेश भ्रमण का . लेकिन इस बारे में विस्तार से बात बाद में . अभी तो नेट पर हो रही ब्लॉग चर्चा पढ़कर कुछ बातें करने का मन कर रहा है .

एक हिंदी फिल्म में अनुपम खेर ने नेगेटिव रोल प्ले करते हुए संवाद बोला था --- " ये खून भी साला बड़ी अज़ीब चीज़ है . अपना निकलता है तो दर्द होता है . लेकिन जब किसी और का निकलता है तो राम कसम बड़ा मज़ा आता है ." कुछ ऐसा ही माहौल पुरुस्कारों को लेकर ब्लॉग जगत में दिखाई दे रहा है . यह मानवीय प्रवृति ही है -- जब स्वयं को पुरुस्कार मिलता है तो बड़ी ख़ुशी होती है . लेकिन जब लेकिन जब स्वयं को नहीं मिलता और किसी दूसरे को मिलता है तो ईर्ष्या सी होती है .
ऐसे ही एक पुरुस्कार वितरण समारोह में किसी ने कहा था -- जिन्हें मिला है वे ज्यादा खुश न हों और जिन्हें नहीं मिला वे निराश न हों . क्योंकि --
" जब मैं खुश होता हूँ तो मेरा दिल कहता है -- बेटा ज्यादा खुश मत हो , क्योंकि जब वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे . और जब मैं दुखी होता हूँ तो मेरा दिल कहता है -- ज्यादा दुखी मत हो , क्योंकि जब वो दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे . "

इसलिए वे ब्लॉगर जिन्हें बेस्ट ब्लॉगर्स की सूची में जगह नहीं मिली , कदापि यह न सोचें , की वे इस श्रेणी में आ गए हैं जिन्हे एक हरियाणवी कहावत में फिट होना पड़े -- " गीतां में गाईये , ना रोजां में रोईये . "

सब के विचार पढ़कर कुछ सवाल मन में उठ रहे हैं ---

आखिर ऐसे सम्मान समारोह का आयोजन करने की सचमुच कोई आवश्यकता है ?
जो कार्य अनेक विवादों को जन्म दे , क्या उसे करना सही है ?
क्या किसी को हक़ है की वो दूसरों को सार्वजानिक रूप से योग्यता की तराजू में तोलें ?

हालाँकि कोई भी समारोह आयोजित करना एक बहुत कठिन कार्य होता है जिसमे आयोजकों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है. इसके बावजूद सभी को खुश कर पाना लगभग असंभव होता है . ऐसे में मन मुटाव की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक है . व्यक्तिगत तौर पर मैं इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ -- सम्मान देने के लिए चयन प्रक्रिया को छोड़कर, समय समय पर विभिन्न लोगों या संस्थाओं द्वारा ब्लॉगर मिलन आयोजित कर उपस्थित सभी ब्लॉगर्स को सम्मानित कर नए ब्लॉगर्स में एक नई चेतना का प्रवाह करना चाहिए. बेशक इसके लिए धन की आवश्यकता होगी , लेकिन जिनमे धन एकत्रित करने की सामर्थ्य है , वे ऐसा अवश्य कर सकते हैं .