Wednesday, August 22, 2012

सावन भादों की फुहार और तरह तरह के बुखार --


सावन में सावन की फुहारें हमेशा सभी को लुभाती रही हैं . लेकिन इस वर्ष सावन में न सावन की काली घटा ही देखने को मिली , न सावन की फुहारें . हालाँकि इसकी कमी भादों में आकर दूर हो गई . इस वर्ष भादों भी दो महीने तक रहेगा . शायद इसीलिए अब खूब बारिस हो रही है .

काली घटा छाए, मोरा जिया ललचाये
ऐसे में कहीं कोई मिल जाए , हाए ---

सावन में यह गाना किसी नवयुवती के अधरों पर स्वत: ही आ जाता है . लेकिन कोई मिला हो या न मिला हो , इस मौसम में कुछ और मिलने वाले बिन बुलाये मेहमान की तरह आ मिलते हैं और दुःख देकर चले जाते हैं . ऐसे ही बिन बुलाये मेहमान हैं वाइरस और मच्छर जो इस मौसम में तरह तरह की बीमारियाँ लेकर आते हैं . और नतीजा होता है -- बुखार .

इस मौसम में बुखार के कारण :

१) वाइरल फीवर :

सबसे मुख्य और आम कारण है -- वाइरल बुखार . अक्सर इसमें पहले जुकाम और गला ख़राब होता है , साथ में बुखार आ जाता है . यह आम तौर पर ३-४ दिन में ठीक हो जाता है . लेकिन कभी कभी सेकंडरी इन्फेक्शन होने से ज्यादा दिन भी लग सकते हैं . विशेषकर डायबिटीज में यह सम्भावना ज्यादा रहती है . वाइरल फीवर बिना जुकाम और गला ख़राब के भी हो सकता है जिसमे सर दर्द और बदन दर्द होता है . यह ज्वर अक्सर १- ७ दिन में उतर जाता है .

उपचार : बुखार के लिए सर्वोत्तम है -- पेरासिटामोल की गोली जो वयस्कों में एक गोली हर ४-६ घंटे में ली जा सकती है . साथ ही तेज बुखार होने पर हाइड्रोथेरपी की जा सकती है . इसका तरीका यहाँ देखा जा सकता है . इसके अतिरिक्त जुकाम के लिए एंटीहिस्टामिनिक ली जा सकती है . सेलाइन गार्ग्ल्स करने से गले में आराम आएगा . यदि खांसी ज्यादा हो जाए तो एंटीबायोटिक्स देनी पड़ेंगी .

२) मलेरिया : इस मौसम में मच्छरों की भरमार होने से सबसे ज्यादा खतरा रहता है मलेरिया होने का . हालाँकि मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा चुका है . लेकिन इस वर्ष फिर से मलेरिया के काफी रोगी देखने में आ रहे हैं .
मलेरिया में बुखार जाड़े के साथ आता है यानि जब बुखार बढ़ने लगता है तब रोगी को ठण्ड लगती है और कंपकपी आने लगती है . अक्सर बुखार एक या दो दिन में उतरकर फिर चढ़ता है . ऐसे में तुरंत मलेरिया के लिए खून की जाँच करानी चाहिए .

३) डेंगू : मच्छरों की एक दूसरी किस्म से होता है डेंगू, जिसमे बुखार के साथ सर दर्द और आँखों के पीछे दर्द होता है और शरीर में लाल दाने उभर आते हैं जिसे रैश कहते हैं . यह प्लेटलेट्स कम होने से होता है . ज्यादा कम होने पर रक्त रिसाव भी हो सकता है .

४) चिकनगुन्या : यह भी डेंगू की तरह मच्छर के काटने से ही होता है . लेकिन इस बुखार में जोड़ों में दर्द ज्यादा होता है जो महीनों तक भी रह सकता है .

विशेष सावधानी की बातें :

मलेरिया को छोड़कर , सभी तरह के वाइरल फीवर सेल्फ लिमिटिंग होते हैं यानि स्वत: ठीक हो जाते हैं . दवा सिर्फ लक्षणों के आधार पर दी जाती है . लेकिन डॉक्टर की सलाह लेना अनिवार्य होता है क्योंकि स्वयं इलाज़ करने से कहीं चूक हो सकती है जो खतरनाक भी हो सकती है . हालाँकि कुछ बातों का विशेष ध्यान आवश्यक होता है
जैसे --
* वाइरल फीवर में एस्प्रिन कभी नहीं लेनी चाहिए . सबसे उपयुक्त पेरासिटामोल है .
* शरीर में पानी की कमी न हो , इसलिए द्रव पदार्थों जैसे सादा पानी , दूध , चाय आदि का सेवन करते रहना चाहिए
* हल्का खाना लेना भी ज़रूरी है ताकि कमज़ोरी न हो और पोषण मिलता रहे .
* अक्सर एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता नहीं होती . लेकिन यदि गला ज्यादा खराब हो जाए , या गले में दर्द होने लगे तो डॉक्टर की सलाह पर उचित दवा लेनी चाहिए .
* अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक्स लेने से बचना चाहिए . ये न सिर्फ हानिकारक हो सकती है , बल्कि रेजिस्टेंस भी पैदा हो सकता है जिससे भविष्य में इसकी उपयोगिता ख़त्म हो सकती है .

एक दिलचस्प बात :

अक्सर देखा गया है -- वाइरल फीवर एक डॉक्टर की रेप्युटेशन बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है . इसकी वज़ह है इसका १-७ दिन में स्वत: ठीक हो जाना . लेकिन क्योंकि कोई नहीं जानता , बुखार एक दिन में उतरेगा या ७ दिन में , इसलिए यह कहना मुश्किल होता है की कब उतरेगा . ऐसे में जब एक रोगी एक डॉक्टर से ६ दिनों तक इलाज़ कराकर बुखार न उतरने से दुखी हो जाता है , तब वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास चला जाता है . फिर उस का बुखार एक दिन में उतर जाता है . रोगी समझता है बुखार उस डॉक्टर की दवा से उतरा है . बस समझिये वह रोगी उस डॉक्टर का भक्त बन गया जबकि बुखार उतरने में उस डॉक्टर का कोई रोल था ही नहीं .

हालाँकि यह बात सिर्फ डॉक्टर ही समझता है . आप भी समझ लेंगे तो और भी अच्छा रहेगा .


Friday, August 17, 2012

स्वतंत्रता दिवस पर काले बादल और पतंगों की उड़ान ---


सामूहिक आवास का सबसे बड़ा लाभ यह है , प्रत्येक अवसर पर चाहे वह कोई धार्मिक त्यौहार हो या राष्ट्रीय पर्व , सब मिल जुल कर मनाते हैं . इस बार भी हमारी सोसायटी की प्रबंधन समिति ने धूम धाम से स्वतंत्रता दिवस मनाने का आयोजन किया . हालाँकि सुबह से ही आसमान में बादल छाए हुए थे और बारिस आने की सम्भावना थी . लेकिन हुआ ठीक इसके विपरीत . ध्वजारोहण के बाद जब सांस्कृतिक कार्यक्रम आरम्भ हुआ तब इतनी चिलचिलाती धूप निकल आई की ऐ सी में रहने वाले लोगो का बैठना मुश्किल हो गया . लेकिन यह देखकर ख़ुशी हुई की एक भी व्यक्ति अपनी सीट छोड़कर नहीं उठा . हमने भी अवसर अनुसार कुछ इधर उधर की और फिर एक हास्य कविता सुनाकर लोगों का मनोरंजन किया .


शाम को छत पर जाकर पतंगबाजी देखने का मन किया तो हम पहुँच गए अपनी छत पर . काले बादलों की छटा देखकर तबियत खुश हो गई .


आसमान में पतंगें और पक्षी --एक साथ उड़ रहे थे, मानो पक्षी भी पतंगों से होड़ लगा रहे हों .




मेहमानों सहित अड़ोसी पडोसी भी पहले से ही अपनी अपनी पतंगों का खज़ाना लेकर छत पर मौजूद थे .



एक अकेली पतंग बादलों के बीच मौज लेती हुई .



यह पक्षी भी जैसे अपने प्रियतम के पास पहुँचने की जल्दी में था .




बादलों के बीच सूर्य देवता भी अठखेलियाँ कर रहा था .



रंगों का पैंतरा बदल कर .


हमने कभी पतंग नहीं उड़ाई . लेकिन आज श्रीमती जी ने जैसे ठान ली थी --किसी भी कीमत पर पतंगबाजी ज़रूर करनी है .
छत पर अनेक पडोसी पतंगें लेकर लगे हुए थे , एक दूसरे की काटने में . ऐसे में श्रीमती जी को भी अवसर मिल गया एक पतंग को हाथ में लेने का . बचपन में हम तो कन्ने देकर और चरखी पकड़कर ही खुश हो लेते थे .



लेकिन आज मेडम के चेहरे पर ख़ुशी की झलक देखकर ही आनंदित हो रहे थे .



और फोटोग्राफी का भी आनंद लेते रहे .



आखिर अँधेरा होने लगा और लाइटें जल गई तो हम भी आ गए अपने आशियाने में , चाय का लुत्फ़ उठाने .

नोट : देश में हालात जो भी हों , लेकिन सामाजिक , धार्मिक और राष्ट्रीय पर्व मनाने से एक संतुष्टि तो मिलती है जो नीरस जीवन में रस घोलती है . यह लोगों के चेहरे पर झलकती संतुष्टि और ख़ुशी देखकर समझा जा सकता है . काश लोग आम जीवन में भी इसी निश्छलता से अपना फ़र्ज़ अदा करते हुए कर्म करते रहें .

Wednesday, August 15, 2012

स्वतंत्रता दिवस और हमारी ग़ुलामी की जंजीरें ---


एक कार्यक्रम में किसी ने हमसे पूछा -- सर आपका नाम क्या है ? नाम बताने पर उसने हैरान होते हुए कहा -- सर दराल तो कभी सुना नहीं, टी एस से क्या बनता है -- यही बता दीजिये . मैंने कहा भैया -- यदि जानना इतनी ही ज़रूरी है तो एक काम कीजिये -- इण्डिया गेट पर जाइये , अमर ज़वान ज्योति पर फूल चढ़ाइए , फिर इंडिया गेट के दक्षिण की ओर खड़े होकर दीवार पर लिखे शहीदों के नाम पढ़िए -- सबसे नीचे की पंक्ति में दायीं ओर हमारा नाम लिखा है , आपको पता चल जायेगा . इतना सुनते सुनते उसकी साँस फूल गई और वो बोला -- सर हमें नहीं पता था , इतनी मेहनत करनी पड़ेगी -- छोडिये हम टी एस दराल से ही काम चला लेते हैं . मैंने कहा , भैया --

पुष्प पथ पर चलना सीखो , तभी काटों भरी राह पर चल पाओगे
शहीदों को नमन करना सीखो , तभी अरुणांचल को बचा पाओगे !

एक समय था जब हमारे गाँव में लगभग हर घर से एक लड़का फ़ौज में भर्ती होता था . हमारे ही घर में एक दादा जी , ताऊ जी और कई चाचा आर्मी में रहे . सेना में रहते हमारे ताऊ जी ने बहुत से लड़कों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया था . स्वयं ताऊ जी ने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर १९७१ पाक युद्ध में हिस्सा लिया था जिस की कहानियां सुनकर हम हमेशा रोमांचित महसूस करते थे .

आज जहाँ एक ओर सरहदों पर एक बार फिर खतरा मंडरा रहा है, वहीँ दूसरी ओर देश के अन्दर भी भ्रष्टाचार रुपी दुश्मन घात लगाये बैठा है जिससे लड़ने के लिए कहीं अन्ना तो कहीं बाबा रामदेव अपने अपने हथियार इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन कामयाब नहीं हो रहे हैं . ऐसे में हमारी युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है . लेकिन यह देखकर अफ़सोस होता है , आजकल की युवा पीढ़ी को सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने में कोई रूचि नहीं दिखाई देती . ऐसे में एक सवाल उठता है -- क्या हमें भी अमेरिका की तरह नौज़वानों के लिए सेना सेवा अनिवार्य कर देनी चाहिए ?

उधर इस बार अन्ना के साथ भी युवा वर्ग कम ही नज़र आया .
क्या भ्रष्टाचार से लड़ने का ज़ज्बा ख़त्म हो गया ?

आज भले ही हमें स्वतंत्र हुए ६५ वर्ष हो गए लेकिन अभी भी देश आंतरिक गुलामियों में जकड़ा पड़ा है . आतंकवाद , भ्रष्टाचार , रिश्वतखोरी , भाई भतीजावाद , बढ़ते अपराध , घटते प्राकृतिक संसाधन , और मानवीय मूल्यों की अवमानना -- ऐसे अनेक दैत्य मूंह बाये खड़े हैं जिनसे निपटना अभी बाकि है .

लेकिन देखने में यही आता है , नई पीढ़ी के युवाओं की सोच इस कद्र स्वकेंद्रित हो चुकी है की उन्हें अपने स्वार्थ के आगे समाज और देश का भला कहीं नज़र ही नहीं आता . सड़कों पर बढ़ते अपराध और लॉलेसनेस इस बात का प्रमाण है . विशेषकर रोड रेज़ हमारी धन सम्पन्नता और असहिष्णुता का मिला जुला परिणाम है . हालाँकि इसमें कानून का ढीलापन भी सहायक सिद्ध होता है .

यदि हमें सचमुच अपने देश से प्रेम है और हम अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखना चाहते हैं तो हमारे युवा वर्ग को सोचना होगा , अनुशासित होना होगा और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अलगाववादी, आतंकवादी, अवसरवादी और भ्रष्ट ताकतों से जूझना होगा . तभी आन्तरिक व्यवस्था को सुधारा जा सकता है .

वर्ना अपने अपने घरों में बैठे हम सब ६५ वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों के खून से सींच कर उपलब्ध हुई स्वतंत्रता का आनंद तो ले ही रहे हैं .
लेकिन कब तक ?

स्वतंत्रता दिवस की ६५ वीं वर्षगांठ पर सभी मित्रों को बधाई और शुभकामनायें .

Saturday, August 11, 2012

श्याम की बंसी पुकारे किसका नाम ---


देश विदेश में श्री कृष्ण जी का जन्मदिन जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है . श्री कृष्ण द्वापर में अवतरित हुए थे . कहते हैं , जिस दिन उन्होंने मानव देह का परित्याग किया , उसी दिन से कलियुग का प्रारंभ हुआ . गीतानुसार इसे करीब ५००० वर्ष पूर्व माना जाता है . हालाँकि प्रजापति ब्रह्मा कुमारियों के अनुसार सारी सृष्टि का काल ही ५००० वर्ष है यानि १२५० वर्ष के चार युग मिलाकर हर ५००० वर्ष में नई सृष्टि की रचना होती है . यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो ईसा पूर्व कुछ ही हज़ार वर्ष का इतिहास प्रमाणिक रूप
में उपलब्ध है .

सच्चाई कुछ भी हो , लेकिन जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन पर सारे देश में खूब रौनक रहती है . स्कूलों , कॉलोनियों और मंदिरों में भक्तिपूर्ण वातावरण सबके दिल ओ दिमाग पर छा जाता है . बचपन में जब गाँव में रहते थे , हर जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते थे . दिन में तरह तरह के पकवान बनाये जाते लेकिन हम बस देखते ही रह जाते क्योंकि खाने को तो रात बारह बजे ही मिलते थे . दि
न में शाम के समय दूध के साथ फलाहार अवश्य होता था . लेकिन रात होते ही नींद आ जाती और नींद में ही उठाकर भोजन कराया जाता . तब तक भूख भी ख़त्म हो जाती . अगले दिन उठने पर याद नहीं आता, रात में खाना कब खाया था .

हमारी सोसायटी के मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव हर साल धूम धाम से मनाया जाता है .

हमारी याद में शायद पहली बार ऐसा हुआ -- जब दिन भर जन्माष्टमी का आनंद लेने के बाद रात १२ बजे जब सबने भोग लगाया , तब हमने केक काटा, अपने जन्मदिन का . और खाया खिलाया -- हम पति पत्नी ने एक दूसरे को. इत्तेफाक से १० अगस्त को हमारे ससुर जी का जन्मदिन होता है ,जिसे हमने दिन में ही मना लिया था .

केक खाते समय पत्नी ने हमें कान्हा कह कर पुकारा तो हमने पत्नी से एक सवाल पूछा -- आप हमारी रुक्मणी हैं, या राधा , या मीरा -- या फिर ऑल इन वन ? क्या होना चाहिए उनका ज़वाब ?


Sunday, August 5, 2012

क्या लेकर आए हो , क्या लेकर जाओगे -- .


मनुष्य संसार में अकेला आता है -- खाली हाथ, और एक दिन अकेला ही चला जाता है -- खाली हाथ . लेकिन इस आने जाने के बीच करीब ७० साल में ( वर्तमान औसत आयु ) जीवन में अनेक पड़ावों से गुजरता है . बचपन गुजरने के बाद यौवन आता है , फिर शादी -- एक से दो , दो से चार होते हुए सांसारिक उपलब्धियों की लाइन सी लग जाती है . हर इन्सान की कोशिश रहती है , जीवन में सभी भौतिक सुविधाओं का भोग करते हुए , जिंदगी चैन और ऐशो आराम में गुजारने की .

कुछ गरीब पैदा होते हैं और गरीब ही मर जाते हैं . कुछ अमीर घर में पैदा होकर सभी सुख सुविधाओं को बचपन से ही हासिल कर लेते हैं . लेकिन एक बड़ा वर्ग होता है मध्यम वर्ग का , जिनके पास आरम्भ में सीमित संसाधन होते हैं , लेकिन आर्थिक उन्नत्ति करते हुए एक दिन सर्व सम्पन्नता प्राप्त कर लेते हैं . ऐसे ही एक परिवार में गाँव में पैदा होकर ( लेकिन अभाव में नहीं ) , जब शहर में आए तो स्वयं को दूसरों से आर्थिक रूप में कम भाग्यशाली पाया . लेकिन फिर धीरे धीरे आर्थिक विकास की सीढ़ी चढ़ते हुए इस मुकाम तक पहुँच ही गए जहाँ इन्सान सुखी होने के भ्रम में भ्रमित रहकर अपने भाग्य और उपलब्धि पर इतराता है .

कॉलिज के दिनों में गाने का बड़ा शौक था . एक बार समूह गान को लीड करते हुए पुरुस्कार भी मिला . हालाँकि गाना कभी सीखा नहीं , इसलिए गाना कभी नहीं आया . लेकिन शौक इस कद्र हावी था -- कॉलेज पास करते ही इन्टरनशिप में गाने पर प्रयोग करते हुए लता मंगेशकर के साथ अपने युगल गानों की रिकोर्डिंग कर डाली . उन दिनों में डब्बे जैसे टेप प्लेयर / रिकॉर्डर होते थे जिसमे केसेट प्ले होते थे . १९८० के दशक में गुलशन कुमार ने टी सीरिज के सस्ते टेप बनाकर संगीत की दुनिया में अपनी धाक जमाकर टी सीरिज कंपनी को आसमान की उचाईयों पर पहुँचा दिया था . कहीं से दो टेप रिकॉर्डर का इंतजाम किया और ३-४ मित्रों की मंडली बैठ गई गानों की रिकॉर्डिंग करने के लिए . एक मित्र टेप चलाता, दूसरा रिकॉर्डिंग वाला टेप ओंन करता और रफ़ी की जगह हम अपना राग अलापते . कुल मिलाकर नतीजा ग़ज़ब का रहा .

जिस तरह चिकित्सा के क्षेत्र में नॉलेज बहुत जल्दी बदलती रहती है , उसी तरह इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में भी तकनीक बहुत जल्दी बदल जाती है . १९८० के दशक में टेप आए तो टू इन वन मिलने लगे . फिर वीडियो प्लेयर , वी सी आर --- फिर वॉकमेन --- सी डी प्लेयर -- थ्री इन वन आदि तरह तरह के म्यूजिक सिस्टम मिलने लगे . एक समय था जब लोग हाई आउट पुट म्यूजिक सिस्टम को जोर जोर से बजाते थे जिससे सारी बिल्डिंग हिलने लगती थी . ऐसे ही समय हमने भी एक म्यूजिक सिस्टम खरीदा बड़े शौक से , लेकिन उसके बाद फिर तकनीक इतनी तेजी से बदली -- देखते ही देखते संगीत माइक्रो चिप्स में घुसकर कंप्यूटर और मोबाइल फोन्स में ही आने लगा . अब किसी म्यूजिक सिस्टम की ज़रुरत ही नहीं रही . और बेकार हो गया हजारों रूपये की कीमत का हजारों वाट का म्यूजिक सिस्टम जिस पर सभी तरह की सीडी , टेप , केसेट और ऍफ़ एम् रेडियो आदि सुने जा सकते थे .

पिछले दस बारह सालों में जो सांसारिक खज़ाना हाथ लगा था , अब श्रीमती जी को पुराना लगने लगा था . पुराने आइटम्स से उन्हें उकताहट होने लगी , हालाँकि हमें तो अभी भी कोई शिकायत नहीं थी . लेकिन गृह स्वामिनी ने फरमाइश की और हमने मान ली . वैसे भी समय के साथ जब घर बदल जाते हैं , घरवाले बदल जाते हैं तो भला इन निर्जीव सामान की क्या बिसात .



वैसे भी पिछले दस पंद्रह सालों में ड्राइंग रूम बदल गया लेकिन ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाते हुए ये साजो सामान अभी तक विराजमान थे . अब शुरू हुआ इन्हें बेचने का अभियान जो शुरू होने से पहले ही नाकाम हो गया क्योंकि पता चला -- आजकल पुराने सामान के कोई खरीदार ही नहीं मिलते . एक ज़माना था जब अक्सर विदेशी राजनयिक ट्रांफर होने पर घर का सारा सामान बेच कर जाते थे जिनकी बाकायदा सेल लगती थी . इम्पोर्टेड सामान के लालच में सारा सामान फटाफट बिक जाता था . एक दो बार हम भी इस तरह की सेल देखने तो गए लेकिन खरीद कुछ नहीं पाए .

हमने भी अख़बार में आए सभी इस्तेहारों पर फोन कर बेचने की इच्छा ज़ाहिर की लेकिन एक भी जगह से एक भी ग्राहक नहीं आया . गोतिये की यह वॉल केबिनेट जो बड़ी खूबसूरत दिखती थी , अब किसी के काम की नहीं थी . लेकिन हमारा भी खून पसीने का पैसा लगा था , इसलिए हमने भी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए इसके नट बोल्ट खोले और इसे वन इन टू बना दिया -- साइड के कॉलम्स को खोलकर अलग अलग किया , बीच के पैनल्स अलग किये और बन गए दो खूबसूरत कॉर्नर्स, जिन्हें सजा दिया दो बेडरूम्स में .

२९ इंच का टी वी दे दिया अपनी कामवाली बाई को , एक महीने की पगार के बदले . लगभग मुफ्त में पाकर बाई धन्य हो गई . उसके चेहरे पर झलकती ख़ुशी को देखकर दिल खुश हो गया . और समझ आया -- जो वस्तु आपके लिए बेकार हो चुकी है , वह किसी और की अपार ख़ुशी का माध्यम बन सकती है .




लेकिन अभी भी म्यूजिक सिस्टम बचा था जिसे देने का हमारा मन बिल्कुल नहीं था . हमारे लिए यह हमारी संगीत साधना का यंत्र था जिसे हमें असीम प्रेम सा था . लेकिन काफी समय से इस्तेमाल नहीं हो पाया था , इसलिए डिस्युज होकर इसके सारे अस्थि पंजर जाम हो चुके थे . करीब एक महीना यूँ ही पड़ा रहा असमंजस की स्थिति में . सोचा इसे ठीक कराकर इस्तेमाल किया जाए . लेकिन अब तो सुनने की फुर्सत ही कहाँ होती है . खाली समय में टी वी और नेट पर ही समय गुजर जाता है . इस बीच इसकी भी खरीददार मिल गई -- हमारी कामवाली बाई की विवाहित बेटी . एक दिन चुपके से पत्नी ने बुला लिया , तभी हमें पता चला . लेकिन सोचा न था --कभी ऐसे भी मोल भाव करना पड़ेगा . उसे अगले दिन आने के लिए कहकर हमने अपने पुराने मेकेनिक को फोन किया जिसने एक दो बार टी और म्यूजिक सिस्टम की सर्विस की थी . उसने बताया -- सर अब इन्हें कोई नहीं खरीदता . मैंने स्वयं भी १४-१५ सेट कबाड़ी को बेचे हैं ३०० -३०० रूपये में . कोई एक हज़ार दे दे तो गनीमत समझना .

अब तक हमारा विवेक जाग उठा था . दिल ने कहा -- क्यों मोह माया के जाल में उलझे हो मूर्ख . उठो , जागो -- देखो दुनिया में क्या क्या है , और क्या क्या नहीं है . क्या लेकर आये थे जो साथ लेकर जाओगे . इन बच्चों के चेहरों को देखो -- कितनी आस के साथ आए हैं , जेब में थोड़े से पैसे डालकर -- सिस्टम खरीदने . पैसे का लालच तो यूँ भी कभी नहीं रहा , लेकिन गाढ़ी कमाई के सामान को फेंकना भी मंज़ूर नहीं रहा .

लेकिन यह अवसर कुछ और था . हमारे लिए मृत पड़े सामान से किसी को अपार खुशियाँ मिल सकती थी . बस इसी विचार से हमने निर्णय लिया और बच्चों को बुलाकर सोंप दिया अपना प्यारा म्यूजिक सिस्टम जो कभी हमने बड़े अरमान से खरीदा था -- बिल्कुल मुफ्त . लेकिन देने से पहले उसकी आरती उतारी और यह फोटो खींच लिया यादगार के लिए .

आज खाली पड़ी खिड़की को देखकर एक अजीब सी संतुष्टि महसूस हो रही है . चलो फिर किसी के चेहरे पर मुस्कराहट तो देखने को मिली .


Thursday, August 2, 2012

राखी हो, कलाई हो,पर जब बांधने वाला कोई नहीं न हो --


रक्षाबंधन एक ऐसा त्यौहार है, जिस दिन दफ्तर और अस्पताल सभी खाली पड़े होते हैं , लेकिन बसें और मेट्रो भरी होती हैं . ज़ाहिर है , महिलाएं राखी बांधने के लिए और पुरुष राखी बंधवाने के लिए छुट्टी कर लेते हैं . लेकिन कुछ हमारे जैसे भी होते हैं जो इस दिन कभी छुट्टी नहीं करते . कारण-- न कोई बुआ थी न कोई सगी बहन . हालाँकि चचेरी बुआ और बहनों के रहते कभी राखी पर बहन की कमी महसूस नहीं हुई . समय से पहले ही राखियाँ डाक या कुरियर द्वारा पहुँच जाती हैं . फिर बच्चों के साथ बैठकर हंसी ख़ुशी राखी का त्यौहार मना लिया जाता है .

लेकिन इस वर्ष दोनों बच्चे बाहर होने की वज़ह से घर में रह गए हम दोनों -- पति पत्नी . पहली बार महसूस हुआ -- राखी किससे बंधवायेंगे ! श्रीमती जी तो सुबह सुबह पूर्ण रूप से भ्राता स्नेहमयी होकर तैयार हो चुकी थी . वैसे भी उनसे कहा भी नहीं जा सकता था .
डर था -- कहीं उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो हम तो बेवक्त ही मारे जायेंगे .
लेकिन परेशानी तो वास्तविक थी -- राखी कैसे बांधी जाएगी . पत्नी जी ने सुझाव दिया -- पड़ोसन से बंधवा लीजिये . हमने कहा -- भाग्यवान रिश्ता बनाना तो आसान हो

ता है , परन्तु निभाना मुश्किल .
वैसे भी पड़ोसन को भाभी जी तो कहा जा सकता है , बहन नहीं .
फिर याद आया -- अस्पताल में सिस्टर्स की भरमार होती है . लेकिन उनका हाल भी हाथी के दांतों जैसा होता है -- खाने के और, दिखाने के और . बैंक में कुछ काम था --सोचा वहीँ किसी से अनुरोध कर लेंगे . लेकिन फिर ध्यान आया -- आज के दिन किसी भी दफ्तर में कोई भी महिला दिखाई ही कहाँ देती है . आखिर , यही लगा --इस बार राखी तो खुद ही बांधनी पड़ेगी .

ऐसे में हमें याद आया -- डॉक्टर बनने के बाद हमारे सामने दो विकल्प थे . या तो हम फिजिसियन बनते , या सर्जन . लेकिन चीर फाड़ में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही , इसलिए सर्जन बनने का सवाल ही नहीं था . लेकिन यदि सर्जन होते तो सर्जिकल नॉट बनाना तो अवश्य आता. फिर किसी के सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती और राखी बांधने में अपनी ही दक्षता काम आ जाती .

अब हमें लगा -- भगवान भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद स्वयं करते हैं . सोचा कुछ भी हो जाए , राखी तो स्वयं ही बांधनी है . हमने श्रीमती जी से ही अनुरोध किया -- सर्जिकल नॉट सिखाने के लिए . उनका तो यह रोज का ही काम है . उन्होंने बड़े सहज भाव से दो सेकण्ड में बांध कर दिखा दिया . हमने भी सोचा --
करत करत अभ्यास के , जड़मति होत सुजान . इसलिए लग गए अभ्यास करने . आधे घंटे की मेहनत के बाद आखिर बांधना आ ही गया .




फिर तैयार होकर , राखी बांधकर हमने श्रीमती जी के हाथ का बना हलुआ प्रसाद के रूप में चखा . शाम को टी वी पर समाचारों में नकली घी और खोये से बनी मिठाइयों के बारे में देखकर तय कर लिया था -- कोई मिठाई नहीं खरीदी जाएगी . इसलिए कड़ाह प्रसाद ही बेस्ट ऑप्शन लगा .
और इस तरह रक्षाबंधन का त्यौहार मनाकर हम पहुँच गए , खाली पड़े अस्पताल में खाली बैठने के लिए .

लेकिन कलाई सूनी नहीं थी .

पश्चिमी सभ्यता और हमारी संस्कृति में यही सबसे बड़ा अंतर है . हमारे पर्व सामाजिक और पारिवारिक गठबंधन को द्रढ़ता प्रदान करते हैं . भाई बहन बचपन में कितने ही लड़ते रहे हों , बड़े होकर रिश्ते की मिठास को कभी नहीं भूलते . प्रेम और विश्वास की एक मज़बूत डोर से बंधे रहते हैं . अपनी अपनी जिंदगी में कितना ही संघर्षरत क्यों न हों , ख़ुशी और ग़म के अवसर पर सदा साथ रहते हैं . यही पारस्परिक स्नेह और सम्मान हमें पश्चिमी देशों से अलग बनाता है .

माना, विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है
अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है .
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है
वह केवल अपना हिन्दुस्तान है !

सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं .

नोट : इस अवसर पर एक पल उनके लिए भी सोचें जिनका दुनिया में कोई नहीं होता .