Sunday, July 29, 2012

क्या हो , जब आना चाहे और आ ना पाए --- एक समस्या जो पुरुषों में कॉमन है !

इन्सान पर तरह तरह के प्रैशर होते हैं -- बचपन से लेकर बुढ़ापे तक . बचपन में पढाई का प्रैशर , ज़वानी में ज़वानी का , किसी को अत्यधिक काम का प्रैशर , किसी को काम न मिलने का। किसी को कमाई का प्रैशर , किसी को कमाई को छुपाने का , किसी को ब्लड प्रैशर , किसी को दिमागी प्रैशर। 

लेकिन कुछ प्रैशर ऐसे भी ओते हैं जो आए तो मुसीबत ,न आए तो मुसीबत। 

सुबह सुबह एक दिन जब अस्पताल पहुंचा तो देखा , कहीं से कराहने की आवाज़ आ रही थी। ध्यान से देखने पर पता चला -- एक वृद्ध गेट के सामने झाड़ियों में बैठा था और कराह रहा था। उसकी स्थिति और परिस्थिति देखकर हम समझ गए -- यह भी प्रैशर में है।  लेकिन प्रैशर था कि कम ही नहीं हो रहा था। बेचारा दर्द के मारे कराह रहा था। 

ज़रा सोचिये , आपको अचानक शौच या मूत्र आ जाए और आप कर ही न पायें। यूँ तो प्रकृति ने इन्हें थामे रखने के लिए उपयुक्त प्रबंध किये हैं लेकिन एक सीमा के बाद थामे रखना असंभव हो जाता है। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी होती है जब आप करना तो चाहते हैं, उपयुक्त स्थान भी मिल जाता है , लेकिन फिर भी मूत्र वित्सर्जन नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति अक्सर पुरुषों के साथ आती है। 

क्या कारण होते हैं इस स्थिति के ?

अक्सर मूत्र या मूत्र नली में संक्रमण से ऐसी स्थिति आती है जब जलन की वज़ह से मूत्र वित्सर्जन में दिक्कत आती है। लेकिन वृद्ध पुरुषों में एक विशेष स्थिति होती है जिसे हम कहते हैं --प्रोस्टेट एनलार्जमेंट। यानि प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब में रुकावट पैदा होने लगती है जो अक्सर ५५-६० की उम्र से ऊपर के लोगों को होती है। 

चित्र गूगल से साभार

प्रोस्टेट :

यह पुरुषों के शरीर में मूत्र नली के साथ एक ग्रंथि होती है जिससे एक विशेष श्राव निकलता है जिससे मूत्र मार्ग गीला रहता है। वीर्य का करीब २० % भाग प्रोस्टेट में बनता है। प्रोस्टेट वीर्य को स्टोर करके भी रखता है। लेकिन समय के साथ इसका साइज़ बढ़ता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब यह पेशाब में रुकावट पैदा करने लगता है। इसे बी एच पी कहते हैं -- बिनाइन हाइपरप्लेजिया ऑफ़ प्रोस्टेट। यह बढती उम्र के साथ अवश्यम्भावी है। लगभग आधे मर्दों को ५० वर्ष की आयु तक पहुँचने पर यह समस्या आ सकती है। समय के साथ प्रोस्टेट का साइज़ बढ़ता जाता है। ७० -८० की उम्र तक इसमें कैंसर बनने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। इसमें कैंसर बनने की सम्भावना उम्र के साथ बढती रहती है। ८० वर्ष की आयु के ८० % लोगों को प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है। हालाँकि यह बहुत धीरे धीरे होता है , इसलिए पता भी नहीं चलता। अक्सर यह पोस्ट मॉर्टम पर ही पता चलता है। लेकिन कभी कभी यह तेजी से भी बढ़ सकता है जो खतरनाक हो सकता है। 

बी एच पी के लक्षण :

प्रोस्टेट बढ़ जाने से पेशाब करने में दिक्कत होने लगती है। जहाँ पहले आपको पेशाब करने में २-३ मिनट्स लगते थे , अब यह समय बढ़ने लगता है। पेशाब की धार भी पतली और एक से ज्यादा हो सकती है। लेकिन सबसे मुख्य लक्षण है -- पेशाब की शुरुआत होने में देरी -- यानि आप करना तो चाहते हैं लेकिन पेशाब हो ही नहीं रहा , जैसा इस वृद्ध के साथ हो रहा था। ऐसे में यदि प्रैशर ज्यादा हो या ब्लैडर फुल हो तो दर्द के मारे जान सी निकल जाती है। 
फ़ुल ब्लैडर में रुकावट होने पर एक इमरजेंसी की स्थिति बन जाती है। ऐसे में अक्सर मरीज़ को अस्पताल आना पड़ता है। 
अन्य लक्षण हैं -- पेशाब बार बार आना , अचानक प्रैशर बन जाना , रात में बार बार पेशाब के लिए उठना, जलन होना आदि।  

यदि पेशाब रुक जाए तो क्या करें ?

यूरिनल में रिलैक्स होकर बैठने या खड़े होने की कोशिश करें। अक्सर बहते पानी की आवाज़ से मदद मिलती है। पेट के निचले हिस्से पर गर्म कपड़ा रखने से भी पेशाब आने में सहायता मिलती है। 
इमरजेंसी होने पर तो अस्पताल जाना ही पड़ेगा। 
अस्पताल में पहले कैथिटर डालकर पेशाब निकाला जाता है। लेकिन कभी कभी कैथिटर भी नहीं घुस पाता। ऐसे में सीधे ब्लैडर में सूई डालकर प्रैशर कम किया जाता है। लम्बे समय के लिए कैथिटर डालकर छोड़ दिया जाता है। बेशक रोगी के लिए अत्यंत कष्टदायक स्थिति होती है। 

उपचार :

प्रोस्टेट का साइज़ पढने पर इसका ऑपरेशन आवश्यक हो जाता है। इसके लिए आजकल कई तकनीक हैं जिसमे चीर फाड़ नहीं करनी पड़ती। हालाँकि अत्यधिक बढ़ने पर ओपन ऑपरेशन ज़रूरी हो सकता है। 

आजकल सबसे पहले दवाओं से उपचार करते हैं जिनके परिणाम काफी अच्छे हैं और सर्जरी को टाला जा सकता है।
बिना सर्जरी किये भी कई तकनीक हैं जिनसे प्रोस्टेट को जला दिया जाता है जिनमे प्रमुख हैं -- लेज़र , ऊष्मा या विकिरण द्वारा प्रोस्टेट का इलाज। 

ट्रांस युरेथ्रल रिसेक्शन ऑफ़ प्रोस्टेट में पेशाब के रास्ते नली डालकर प्रोस्टेट को खुरच कर निकाल दिया जाता है। 

लेकिन साइज़ ज्यादा बड़ा होने या कैंसर होने पर ओपन सर्जरी की ज़रुरत पड़ सकती है। 

प्रोस्टेट कैंसर :

इसकी जाँच के लिए ५० से ऊपर के सभी पुरुषों को पी एस ऐ ( PSA ) की रक्त जाँच करानी चाहिए , विशेषकर यदि कोई लक्षण हों। बढ़ा हुआ पी एस ऐ कैंसर की सम्भावना को उजागर करता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। 

कैसे बचें :

प्रोस्टेट कैंसर अमेरिका और यूरोप में बहुतायत में पाया जाता है जहाँ यह दूसरे नंबर पर आता है , फेफड़ों के कैंसर के बाद। इसमें रैड मीट और अत्यधिक शराब के सेवन का रोल होता है , साथ ही जेनेटिक कारण भी होता है। शुक्र है , एसिया और हमारे देश में यह विरला ही होता है। इसका एक कारण शाकाहारी भोजन और सादा जीवन हो सकता है। 

एक दिलचस्प पहलु :

ऐसा माना गया है , नियमित रूप से इजेकुलेशन करते रहने से प्रोस्टेट कैंसर होने की सम्भावना काफी कम हो जाती है। हालाँकि अनेक पार्टनर्स के साथ सम्भोग करने से सम्भावना बढती है। इसलिए एक विवाहित पुरुष के लिए ज़रूरी है , गीतानुसार ब्रह्मचर्य का पालन करना यानि संबंधों में नैतिक ईमानदारी बरतना। 
यह अलग बात है , एक उम्र के बाद पति पत्नी में भी यौन सम्बन्ध धीरे धीरे कम हो जाते हैं। लेकिन यह तो आप पर ही निर्भर करता है , आप अपने आप को कितना ज़वान या बूढा समझते हैं !


Wednesday, July 25, 2012

मूंह से निकली बात , कमान से निकला तीर और सर के उड़े बाल -- कभी वापस नहीं आते ?



जैसे किसान को अपनी लहलहाती फसल को देख कर और पिता को अपने ज़वान होते बेटे को देख कर आनंद आता है, वैसे ही एक पुरुष के सर पर काली जुल्फों की छटा देख कर आनंद आता है .
कॉलिज के दिनों में जब अपनी बुल्लेट पर बिना हेलमेट के बैठकर धड़ धड़ करते हुए मोटरसाईकल दौड़ाते थे , तब सर सर करती हवा सर के बालों के साथ अठखेलियाँ करती तो खुद को किसी फिल्म स्टार से कम नहीं समझते--- एक रास्ता है जिंदगी , जो थम गए तो कुछ नहीं .

फिर धीरे धीरे सर पर बालों की आबादी ऐसे कम होती गई जैसे देश में ईमानदार लोगों की . जहाँ पहले दिन में बस तीन बार बालों में कंघी करते थे , अब हर तीस मिनट बाद करनी पड़ती है . अब तो कंघी करते समय बच्चे भी हँसते हुए कहते हैं -- पापा , सर पर चार तो बाल हैं , और आधे घंटे से लगे हुए हैं कंघी करने में . ऐसे में हम तो यही कहते हैं -- बेटा , प्रेसियस चाइल्ड की देखभाल ज्यादा करनी पड़ती है .

लेकिन हर बार जब हेयर कटिंग के लिए जाते हैं तो हज्ज़ाम को यही कहना पड़ता है -- भाई बस थोड़े से यहाँ वहां काटने हैं . वो भी मुस्कराता हुआ कहता है -- बाबूजी , समझ गया . लेकिन जल्दी ही उसकी मुस्कराहट ,झुंझलाहट में बदल जाती है क्योंकि जिस काम को वह दो मिनट का काम समझ रहा था , उसमे उसे आधा घंटा लग जाता है . कभी यहाँ से , कभी वहां से काटते काटते अक्सर हमारे बाल थोड़े से ही रह जाते हैं . घर जाते हैं तो यही सुनना पड़ता है -- पट्ठे बना दिए पट्ठे ने .

इस बार जैसे ही हम कुर्सी पर बैठे बाल कटवाने के लिए , बायीं ओर की कुर्सी पर बैठा एक ख़ुदा का बंद शुरू हो गया अपने मोबाईल पर जोर जोर से गप्पें मारने . लगता है हम हिन्दुस्तानियों को बात बात पर शोर मचाने की बड़ी ख़राब आदत है . सारे समय उसकी चपड़ चपड़ सुनते रहे . अंत में उसने मोबाईल पर एक सन्देश पढ़कर सबको खबर दी -- यहाँ भूकंप आया है . अब तक हम गर्दन घुमाने की हालत में आ चुके थे . घूम कर उसे देखा तो पाया की एक २४ -२५ साल का काला कलूटा , भारी भरकम राक्षस सा दिखने वाला लड़का फेस पैक लगाये बैठा था . उसे देख कर मन हुआ की कहूँ -- भूकंप नहीं भाई , यह तो आपने अपना पैर ज़मीन पर पटका है . लेकिन उसका डील डौल , चेहरे पर झलकती क्रूरता और मानसिक दिवालिया देख कर हमने अपने सेन्स ऑफ़ ह्यूमर पर नियंत्रण रखना ही सही समझा .


सैलून से बाहर निकले तो एक बार फिर वही लुटे लुटे से महसूस कर रहे थे . सोचा , आखिर कब तक ऐसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे . दिल ने कहा -- कुछ करते क्यों नहीं, कुछ लेते क्यों नहीं . लेकिन हमें ध्यान आया पिछली बार भी मन में ठान लिया था कुछ करने का और पहुँच गए थे अपने अस्पताल के त्वचा रोग विभाग के अध्यक्ष के पास किसी नुश्खे की तलाश में . लेकिन जब उनकी चमकती चाँद देखी, तो बिना कुछ कहे , करे और लिए ही वापस आ गए थे .
फिर याद आया नज़फगढ़ का नवाब -- वीरेन्द्र सहवाग . कैसे उन्होंने कुछ दिन टीम से बाहर रहने का फायदा उठाते हुए अपनी खोई हुई बहार वापस पा ली थी . लेकिन पत्नी जी ने बताया -- जानते हैं उनके पुनर्रोपित एक एक बाल की कीमत ७५० रूपये है . यह सुनकर हमारी तो लुटिया ही डूब गई . सोचा सब कुछ लुटा कर वापस भी आए तो क्या पाएंगे . हालाँकि श्रीमती जी अब भी जब कभी सुबह कंघी करने के बाद कंघी में दो बाल देख लेती हैं तो कहती हैं -- लो कर दिया ना सुबह सुबह १५०० /- का नुकसान .

रोज होते इस नुकसान की चिंता में घुले जा रहे हम इस बार दृढ निश्चय कर चुके थे कुछ करने का .
तभी हमें ध्यान आया , जब हम नए नए डॉक्टर बने थे तब हमारे एक साथी को दिल्ली के एक पौश इलाके में नई नई खुली एक क्लिनिक में ३०,००० रूपये मासिक सैलरी पर काम मिला था जबकि हमें मिलते थे मात्र २००० /-. उस क्लिनिक में किसी नई तकनीक से सर के उड़े बालों को दोबारा पाने की गारंटी दी जाती थी . खर्चा मात्र ६००० -१००००/ -. वह तो बाद में पता चला -- वह कोई जादुई इलाज नहीं बल्कि एक दवा थी जिसे घोलकर सर पर लगाया जाता था .


हालाँकि उस दवा का इस्तेमाल हम भी अनमने से कई बार कर चुके हैं . लेकिन शायद दिल से न करने की वज़ह से फायदा नहीं हुआ . यही सोचकर हम पहुँच गए केमिस्ट के पास और मांगी वो दवा . केमिस्ट ने पूछा -- २% या ५ & ? अब हमने यह तो सोचा ही नहीं था , सो पूछा -- दोनों में क्या फर्क है ? ज़वाब दिया पास खड़ी एक सुन्दर सी , नवयौवना ने -- अक्सर २ % को ही रिकोमेंड किया जाता है -- मैंने भी २ % ही इस्तेमाल किया है . ५ % वाली से चक्कर आ सकते हैं . उसकी भोली अदा पर मन ही मन मुस्कराते हुए हमने भी बड़े भोलेपन से उसका शुक्रिया अदा किया और पूछा -- कितना फायदा हुआ ? वो बोली -- जब तक लगाते रहो तब तक तो फायदा होता है . हमने भी २ % वाली एक शीशी खरीदी और सजा दिया अपने कमरे में .


अब रोज सुबह नहा धोकर जब श्रीमती जी इश्वर की स्तुति कर रही होती हैं , तब हम शीशी खोलकर अपने उजड़े चमन की सेवा सुश्रुवा में लगे होते हैं . साथ ही श्रीमती जी से भी अनुरोध करते हैं -- अपनी प्रार्थना के साथ , भगवान से दो चार बाल हमारे लिए भी मांग लें .

अब देखते हैं -- हमारी सेवा और श्रीमती की प्रार्थना कब और कितना रंग लाती है !






हालाँकि डरते भी हैं --कहीं ज्यादा रंग ले आई और ऐसे हो गए तो ! यह उसी दवा का साइड इफेक्ट है .

अंत में , पूर्व प्रकाशित एक क्षणिका :

हेयर कटिंग सैलून की
आरामदेह कुर्सी पर बैठा
मैं ईर्षा रहा था ,
बाजु में बैठे युवक की लहलहाती
ज़ुल्फों को देख कर .
तभी , हमारा केश खज़ाना देख
दूसरी ओर बैठे
एक हम उम्र के चेहरे पर
वही भाव उभर आए .
उसका ग़म देख कर , मैं अपना ग़म भूल गया !

नोट : दवा का नाम मुफ्त में नहीं बताया जायेगा . कीमत आप स्वयं निर्धारित कर लें .




Sunday, July 22, 2012

बहुत हुआ आराम , अब कुछ काम किया जाए ---


पिछली दो पोस्ट्स पर हंसने हंसाने की खूब बातें हुई. देखा जाए तो हँसना भी नसीब वालों को ही नसीब होता है . अक्सर हमने देखा है , किसी भी हास्य कवि सम्मेलन में आम श्रोता तो खूब खुलकर हँसते हुए , ठहाके लगाते हुए हास्य कविताओं का मज़ा लेते हैं , लेकिन आगे की पंक्तियों में बैठे विशिष्ठ अतिथि हंसने में अपनी तौहीन सी समझते हैं . बस मुस्करा कर रह जाते हैं . बेचारे कितने गरीब होते हैं . हालाँकि यही लोग रजनीश आश्रम में जिब्रिश करते हुए बिल्कुल नहीं शरमाते . कितनी अजीब बात है --

गाँव की उन्मुक्त हवा में किसानों के ठहाके गूंजते हैं ,
यहाँ हंसने के लिए भी लोग , लाफ्टर क्लब ढूंढते हैं !

बेशक , हंसने के लिए उचित स्थान , समय और वातावरण का होना अत्यंत आवश्यक है . गलत स्थान , समय और संगति में हँसना अभद्र भी साबित हो सकता है . इसलिए अक्सर दोस्तों में ही बैठकर ठहाके लगाने में आनंद आता है, या फिर समान स्तर के लोगों के समूह में. अक्सर हम गंभीरता का नकाब ओढ़े रहते हैं , विशेषकर बुद्धिजीवी लोग . कुछ लोगों को तो हर समय तनावग्रस्त रहते ही देखा जाता है . जाने कैसे जिंदगी जीते हैं लोग !

यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो आवश्यक है , जिंदगी के प्रति अपना रवैया बदलें . हर हाल में मुस्कराते हुए कठिनाइयों का सामना करें . दिन भर में कुछ पल ऐसे ज़रूर चुरा लें जब आप हंसने का बहाना ढूंढ सकें . खाने पीने और नित्य क्रियाक्रम में हंसने को भी शामिल कर लें. फिर देखिये ब्लड प्रेशर , ब्लड सुगर , सरदर्द , बदन दर्द और न जाने कितनी ही बीमारियाँ ख़त्म न सही , कम अवश्य हो जाएँगी .

अब प्रस्तुत है , एक रचना :

किसी दुखी मन का दर्द मिटाया जाए
चलो किसी रोते को हंसाया जाए !

गुजर न जाए सोते हुए ज़वानी
चलो किसी सोते को जगाया जाए !

बच गया है जो पेट भरने के बाद
चलो किसी भूखे को खिलाया जाए !

मिला जो नीर था ज़ाम की खातिर
चलो किसी प्यासे को पिलाया जाए !

जिसके हाथों हुआ था खूने ज़िगर
चलो उसी कातिल को बुलाया जाए !

बटोर कर बिखरे टुकड़े दिल के
चलो इसी महफ़िल में सजाया जाए !

इशारों पर जिनके नाचे हम ताउम्र
चलो उसी ज़ालिम को नचाया जाए !

रहें क्यों बेताब इश्को मोहब्बत में
चलो किसी के दिल में समाया जाए !

कब से बैठे हैं लैप में लैपटॉप लेकर
चलो अभी सुस्ती को भगाया जाए !

नहीं है देश ये ज़ागीर किसी की
चलो इन्ही भ्रष्टों को हटाया जाए !

अहम् घुल गया है दिल में 'तारीफ'
चलो अभी खुद को ही हराया जाए !


Thursday, July 19, 2012

चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए ---


यह पोस्ट कल प्रकाशित होनी थी . लेकिन अकस्मात काका -- राजेश खन्ना की मृत्यु का दुखद समाचार पढ़कर , उनके सम्मान में इसे स्थगित कर दिया था .

इस रविवार से हास्य का हमारा पसंदीदा कार्यक्रम आरंभ हुआ .हालाँकि इसे घर में बस हम ही देखते हैं . लेकिनपहले दिन मिमिकरी आर्टिस्ट ही नज़र आए. हालाँकि कल प्रसारित एपिसोड में हमारे ही एक युवा कवि मित्र दिल्ली के चिराग जैन ने हमारी ही स्टाइल में जोक्स सुनाकर खूब दिल बहलाया .

हास्य कवि वो कवि होते हैं जो पूर्ण रूप से न तो कविता करते हैं , न हास्य कलाकारों जैसी ड्रामेबाजी . बल्कि हास्य और कविता की मिली जुली प्रस्तुति करते हैं . अब पहले जैसे हास्य कवि तो नहीं रहे जैसे काका हाथरसी , हुल्लड़ मुरादाबादी , शैल चतुर्वेदी और ॐ प्रकाश आदित्य जी , जो महज़ अपनी हास्य कविताओं से खूब हंसाते थे , गुदगुदाते थे. आजकल के हास्य कवि चुटकलेबाज़ी का सहारा लेकर पहले हंसाते हैं , फिर कविता सुनाते हैं . उस पर कोई हँसे तो हंस ले वर्ना चुटकलों ने अपना काम तो कर ही दिया था .

वैसे कविता द्वारा हँसाना बड़ा मुश्किल और गंभीर काम है .

पिछली पोस्ट में आपने दूसरे कवियों की रचनाओं पर आधारित हास्य का मज़ा लिया . अब लीजिये , स्वरचित रचनाओं का आनंद . टिप्पणियों में कई मित्रों की शंका का समाधान करते हुए इतना बता देते हैं -- हमारे छात्र हमें बहुत पसंद करते हैं क्योंकि उनका इस तरह का मनोरंजन सिर्फ हम ही करते हैं . यहाँ यह भी जान लीजिये -- इस मामले में हम काका हाथरसी के अनुयायी हैं .

एक कविता जो होली पर लिखी थी , आप पढ़ भी चुके होंगे . लेकिन अब हमारी आवाज़ में :

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और अंत में -- पब्लिक डिमांड पर दोबारा एंट्री हुई -- एक और कविता के साथ -- नव वर्ष की शुभकामनायें .

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क्योंकि हम प्रोफेशनल कवि नहीं हैं , इसलिए मंच पर आने का अवसर तो कम ही मिलता है . लेकिन जब भी मिलता है , कोशिश यही रहती है -- लोगों को हंसाया जाए . क्योंकि हमारा मानना है -- जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव हटाते हैं, और जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव भगाते हैं .


आओ आज इक काम किया जाए
चलो किसी रोते हुए को हंसाया जाए !


Sunday, July 15, 2012

मिलकर ठुमके लगाओ , तो ग़ज़ल होती है -- कवियों की वाणी, हमारी जुबानी !


आज
रविवार १५ जुलाई से हास्य कार्यक्रम ग्रेट इंडियन लाफ्टर चेलेंज ५ शुरू हो रहा है . यह लाइफ ओ के चैनल परलाफ इंडिया लाफ के नाम से रात १० बजे दिखाया जायेगा . इत्तेफ़ाक से जब हमें पता चला तो हम भी पहुच गए ऑडिशन देने . हमें विश्वास दिलाया गया , आपको एक हफ्ते में ज़रूर बुलाएँगे . हफ्ते तो कई बीत गए लेकिन बुलावे का फोन नहीं आया . एक बार पहले भी ऐसा हो चुका है जब डायरेक्टर के साथ दो बार इंटरव्यू के बाद भी अंतत : बुलावा नहीं आया . आखिर यह मान कर ही दिल समझाना पड़ा -- यह आवश्यक नहीं , सफलता हर बार अवश्य मिले .

टीचर्स कार्निवल के फोटो दिखा कर हमने वादा किया था , आपको अपनी क्लिप्स दिखाने का . क्लिप्स अब मिल चुकी हैं . भले ही सारे देश को हंसाने का अवसर नहीं मिला, अपने अस्पताल के छात्र और डॉक्टर्स ने खूब एन्जॉय किया . यहाँ आपको बता दें --यह कार्यक्रम बहुत मौज मस्ती भरा, चुलबुला , ताबड़ तोड़ और वाइब्रेंट होता है . इसलिए शायद आपको पहली नज़र में शॉक लग सकता है .
लीजिये , आप भी आनंद लीजिये . मौका और दस्तूर देख कर जो सही लगा , वही प्रस्तुत किया है .

1) इस क्लिप में प्रस्तुत हैं , कुछ चुनिन्दा बुजुर्ग कवियों की चंद पंक्तियाँ , अपने अंदाज़ में :



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२) हमारा काव्य सफ़र शुरू हुआ था काका हाथरसी की कवितायेँ सुनकर. उन्ही को समर्पित करते हुए, ये चार छंद :

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नोट : आज बस इतना ही . यदि झेलने में दिक्कत न हुई हो तो बताइयेगा , दो क्लिप्स अगली पोस्ट में लगा देंगे .


Thursday, July 12, 2012

फोटो खिंचवाना एक अदा है , लेकिन फोटो खींचना एक कला है --


फोटो खिंचवाने की अदा के बाद आइये अब जानते हैं , फोटो खींचने की कला के बारे में . यूँ तो हम कोई प्रोफेशनल फोटोग्राफर नहीं . लेकिन लोग कहते हैं , हम फोटो अच्छे खींचते हैं . अब आपने कहा और हमने मान लिया . इसलिए आपके साथ कुछ टिप्स शेयर करते हैं .

कैमरा :

अच्छा फोटो खींचने के लिए किसी प्रोफेशनल कैमरे की आवश्यकता नहीं होती . आजकल आम तौर पर छोटे छोटे डिजिटल कैमरे मार्केट में उपलब्ध हैं जो ५००० -१०,००० रूपये की रेंज में मिल जाते हैं . अच्छी फोटो का मेगा पिक्स़ल से कोई सम्बन्ध नहीं होता . मेगा पिक्स़ल बस फोटो का साइज़ तय करता है यानि आप कितना एनलार्जमेंट कर सकते हैं . हमारे मोबाइल के २ मेगा पिक्स़ल कैमरे से भी बढ़िया फोटो आते हैं . लेकिन कैमरे में लेंस कार्ल जीस का हो तो फोटो ज्यादा साफ आते हैं . ज्यादा ज़ूम का भी ज्यादा फायदा नहीं होता क्योंकि हाई ज़ूम पर बिना ट्राई पोड के फोटो खींचने पर शेक इफेक्ट की वज़ह से फोटो धुंधले नज़र आयेंगे .

सधा हुआ हाथ : अच्छी फोटो के लिए ज़रूरी है की फोटो खींचते समय हाथ स्थिर रहें . ज़रा सी हरकत भी फोटो को धुंधला कर सकती है . लेकिन यह अभ्यास से ही आता है .

प्रकाश :

फोटो लेते समय ध्यान रखें , सूरज आपके पीछे की ओर हो जिससे रौशनी सब्जेक्ट के ऊपर पड़े . अक्सर लोग फोटो लेते समय सूरज महाराज का ध्यान ही नहीं रखते .

सिमिट्री :

किसी भी सब्जेक्ट जैसे किसी भवन , मोनुमेंट या जगह की फोटो लेते समय फोटो फ्रेम की सिमिट्री जितनी सही होगी , फोटो देखने में उतना ही आनंद आएगा . अक्सर लोग सिमिट्री का ध्यान नहीं रखते , बस देखा और किल्क कर दिया . सब्जेक्ट के दायें , बाएं , ऊपर और नीचे --चारों ओर समान या एक अनुपात में स्थान रहना चाहिए . कहाँ कितना रिक्त स्थान रखना है , यह आपके अनुभव और पसंद पर निर्भर करता है .

फोरग्राउंड और बैकग्राउंड :


किसी प्राकृतिक द्रश्य जैसे झील का फोटो लेते समय फोरग्राउंड में पेड़ पौधे आदि लेने से द्रश्य की शोभा बहुत बढ़ जाती है . इसके बिना फोटो देख कर ऐसा लगेगा जैसे बिना नमक की दाल .

कलात्मक दृष्टि :

आम फोटो तो सभी खींच लेते हैं . फोटो में भी मॉडर्न आर्ट पैदा करना भी एक कला है . नए नए आइडियाज ट्राई करना में हर्ज़ भी क्या है .


स्पेशल इफेक्ट्स :

ज़रा सी कल्पना शक्ति का इस्तेमाल कर आप फोटो में स्पेशल इफेक्ट्स ला सकते हैं . पैवेलियन की इस तस्वीर को लेते समय एक सूखे पेड़ को बीच में लेने से फोटो की सुन्दरता में चार चाँद लग गए हैं . बिना इस पेड़ के फोटो बहुत ब्लैंड लगती .

आउटडोर यात्रा पर :

आसमान में छाये बादल फोटोग्राफर्स को हमेशा लुभाते हैं . इन्हें प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ ऐसे मिलाइये जैसे इनके बिना फोटो अधूरी सी लगे . लेकिन यहाँ भी सिमिट्री का सही होना ज़रूरी है .

आँखें खुली रखिये :

किसी अंजानी जगह पर विचरण करते समय सतर्क रह कर चहलकदमी करेंगे तो अनेक ऐसे द्रश्य देखने को मिल जायेंगे जिन्हें आप कैमरे में कैद करना चाहेंगे . यह टेढ़ा मेढ़ा पेड़ और उस पर बैठा बन्दर --यह द्रश्य पलक झपकते ही ओझल हो सकता है .

अवसर को हाथ से न जाने दें :

क्योंकि फोटो खींचने का ऐसा अवसर संयोगवश ही मिलता है .


सूर्योदय या सूर्यास्त :

फोटो देख कर कहना मुश्किल है , यह सूर्योदय की फोटो है या सूर्यास्त की . लेकिन यदि दिल से खींची जाए तो इफेक्ट एक जैसा ही आता है -- मनभावन .

नोट : ब्लॉगजगत में कई अच्छे फोटोग्राफर हैं जैसे देवेन्द्र पाण्डे जी , सतीश सक्सेना जी , संदीप पंवार और नीरज जाट . हाल में ही श्री इन्द्रानील भट्टाचार्जी के फोटो देखकर बहुत आनंद आया . अब आपके सुन्दर फोटोज का इंतजार रहेगा .

Sunday, July 8, 2012

फोटो खींचना ही नहीं , खिंचवाना भी एक कला है ---


फोटोग्राफी एक कला है , यह तो हम सब जानते हैं . यानि फोटो खींचना एक कला है . लेकिन हम यह मानते हैं , फोटो खिंचवाना भी एक कला है . ऐसा देखा गया है , हमारे देश में अधिकांश लोग कैमरा कौन्सियस या शाई होते हैं . कैमरे के सामने आते ही उनके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आते हैं जैसे किसी ने पीट कर बिठा दिया हो . जबकि विदेशों में विशेषकर विकसित देशों में लोग फोटो खिंचवाते समय न सिर्फ बिल्कुल सहज महसूस करते हैं , बल्कि ऐसा पोज बनाते हैं जिसे देख कर देखने वाला भी प्रसन्न हो जाता है .

शायद ऐसा इसलिए है , हमारे यहाँ कुछ वर्ष पहले तक कैमरा रखना एक लग्जरी होता था . कभी कोई फॉर्म भरते वक्त स्टूडियो में जाकर फोटो खिंचवाते थे , जहाँ खींचे गए फोटो में चेहरे भावहीन दिखाई देते थे . इसीलिए अक्सर लोगों को फोटो खिंचवाने का अनुभव बहुत कम ही होता था . यदि गौर से देखें तो , उस समय के क्रिकेटर्स भी अधिकतर शर्मीले ही नज़र आते थे . मोहम्मद अजहरुद्दीन जब तक क्रिकेट खेलते रहे , कैमरा कौन्सियस ही रहे . अब एम् पी बनकर थोडा सुधार हुआ है . हालाँकि , अब कुछ वर्षों से मोबाइल कैमरे आने से युवा पीढ़ी के लोग सहज रूप से फोटो खिंचवाते हैं , जबकि पुरानी पीढ़ी के लोग अभी भी कैमरे के सामने तनावग्रस्त हो जाते हैं .

जब हमने पहली बार फोटो खिंचवाया :

प्राथमिक शिक्षा गाँव से पूरी कर छठी कक्षा में जब दिल्ली शहर आया , तब कक्षा का सामूहिक फोटो खींचा जाना था . निश्चित दिन और समय पर समस्त कक्षा एक स्थान पर एकत्त्रित हो गई . सबको पंक्तियों में खड़ा कर दिया गया . फोटोग्राफर ने सबको साँस लेकर रोकने के लिए कहा जैसे एक्स रे खींचते समय कहा जाता है . वह हमारा प्रथम अवसर था फोटो खिंचवाने का . हमने एक लम्बा साँस लिया और रोक लिया . सावधान की मुद्रा में साँस रोक कर खड़े रहे . लेकिन फोटोग्राफर ने फोटो उतारने में देर लगा दी . इसलिए वह साँस बेकार गया . एक बार फिर यह प्रक्रिया दोहराई गई. इस बार ठान लिया था , साँस को टूटने नहीं देंगे . गाल फूलकर गुब्बारे की तरह हो गए , लेकिन हमने फूंक निकलने नहीं दी . लेकिन यह वार भी खाली गया . आखिर तीसरी बार सफलता मिली और हमें बताया गया , फोटो हो गया .

लेकिन अफ़सोस , वह फोटो आज तक नहीं मिला है .

जब हमने पहली बार फोटो खींचा :

हमारे हाथ कैमरा पहली बार तब आया जब हमारे ताऊ जी फ़ौज से रिटायर हुए और उन्हें एक आग्फा क्लिक थ्री कैमरा गिफ्ट में मिला . गर्मियों की छुट्टियों में किसी तरह एक फिल्म रोल का इंतज़ाम किया गया . खानदान के सारे भाई बहन नहा धोकर तैयार हो गए फोटो खिंचवाने के लिए . हम सबसे बड़े थे . इसलिए कैमरा हमारे ही हाथ में आया . कैमरे में रील डाली और हम तैयार हो गए फोटो उतारने के लिए . लेकिन यह क्या , फोटो खिंची ही नहीं . सोचा , शायद रील ठीक से फिट नहीं हुई . इसलिए दोबारा ठीक से डालने का विचार बनाया . विज्ञानं के छात्र होने के नाते यह जानते थे , रील को रौशनी में एक्सपोज नहीं करते . इसलिए घर की बैठक के सारे खिड़की दरवाजे बंद कर हमने बड़े ध्यान से कैमरा खोला , रील बाहर निकाली और फिर संभाल कर दोबारा डाल दी .
फिर शुरू हुआ , फोटो सेशन , हमारी जिंदगी की पहली फोटोग्राफी .

हिसाब लगाकर सबके फोटो खींचे गए . कैमरे से रील निकालकर रख दी गई . छुट्टियाँ ख़त्म होने पर जब शहर आए और रील को धुलवाया तो पाया , हम तो लुट चुके थे . फिल्म बिल्कुल साफ़ थी , एकदम स्पॉटलेस .

आज जब बच्चों को , युवाओं को डिजिटल कैमरे या मोबाईल कैमरे से फोटो खींचते देखता हूँ तो यही लगता है -- ज़माना कितना बदल गया है . हम अक्सर बच्चों को डांटते थे जब वो फोटो खींचने की जिद करते थे , यह कह कर -- एक फोटो खराब हो जाएगी . अब न फोटो ख़राब होती है , न रील पर खर्च करना पड़ता है . यहाँ तक की प्रिंट बनाने की भी ज़रुरत नहीं होती . पेन ड्राईव में डाला और लगा दिया कंप्यूटर या सीधे टी वी में . जिसे चाहा पोस्ट कर दिया ई मेल से , फेसबुक में या ब्लॉग पर .

लेकिन एक बात देख कर थोडा दुःख सा होता है -- बहुत कम लोग फोटो सही तरीके से खींचते हैं . यदि फोटो खींचते समय कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो कैमरा कैसा भी हो , परिणाम बढ़िया ही आयेंगे .



कैसे खिंचवायें फोटो :

अच्छा फोटो खिंचवाने के लिए भी थोड़ा अभ्यास की ज़रुरत है . पहली बात -- कैमरे को देखकर अनदेखा कर देना चाहिए . यदि आपकी आँखें झपक जाती हों तो आप कैमरे की तरफ देखिये ही नहीं . चेहरे पर मुस्कान बनाये रखने की आदत डालिए . यह आदत आपके दैनिक जीवन में भी बहुत काम आएगी . सावधान की मुद्रा में मत खड़े होइए . ज़रा सोचिये , जब स्कूल में पी टी करते समय कभी सही से सावधान मुद्रा में खड़े नहीं हुए तो अब क्यों . यदि आपको मुस्कान बिखेरने में शर्म आती हो या कंजूसी महसूस होती हो तो फोटो खींचने से पहले एक बार-- चीज़-- बोलिए -- आपके चेहरे पर फोटो में स्वत : मुस्कान आ जाएगी . पोश्चर भी रिलेक्स्ड होना चाहिए . हाव भाव जितने स्वाभाविक होंगे , फोटो उतनी ही अच्छी आएगी .
बाकि तो फोटो खींचने वाले पर भी निर्भर करता है -- वह आपको हीरो बना देता है यां विलेन .

नोट : यदि यह लेख पढ़कर आपके आत्म विश्वास में वृद्धि हुई हो तो अगला लेख पढना मत भूलियेगा .
अगली पोस्ट में -- कैसे बने अच्छे फोटोग्राफर, इसी पर विचार करेंगे .

Thursday, July 5, 2012

जिंदगी वास्तव में जिन्दादिली का नाम है -- डॉक्टर्स भी क्या खूब जीया करते हैं !


इन्सान यदि काम ही काम करता रहे तो जीवन नीरस होने लगता है .यह बात डॉक्टर्स पर भी लागु होती है . इसीलिए अस्पताल के साथ जुड़े मेडिकल कॉलेज में हर वर्ष मार्च के महीने में एक फेस्टिवल मनाया जाता है . ३-४ दिन तक चलने वाले इस कल्चरल फेस्टिवल के अंतिम दिन एक विशेष कार्यक्रम रखा जाता है --टीचर्स कार्निवल . इस रंगारंग कार्यक्रम में कॉलेज और अस्पताल के शिक्षक और वरिष्ठ डॉक्टर्स मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं और दर्शक / श्रोता होते हैं छात्र . यह अपने आप में एक अद्भुत और निराला अनुभव होता है .


हम भी इस कार्यक्रम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं . पहले बैठकर संगीत , नृत्य और नाटकों का मज़ा लेते हैं . यहाँ -- एम् एस और प्रिंसिपल के साथ .
.


हॉल छात्रों और स्टाफ से खचाखच भरा होता है .

कार्यक्रम की शुरुआत में एक सुन्दर नवयौवना का मनमोहक नृत्य देखकर सब आत्म विभोर हो गए .


इन युवा डॉक्टर्स ने सुन्दर सालसा कर समां बांध दिया .



रेजिडेंट डॉक्टर्स द्वारा सामूहिक नृत्य .


भीड़ इतनी ज्यादा हो जाती है की खड़े होने को भी जगह मुश्किल से ही मिलती है .


नृत्य अब जोरों पर है .


गायनी डिपार्टमेंट की नाटिका हमेशा सबको मदहोश करने वाली होती है .


घूंघट में डॉक्टर्स ! अपनी सांस्कृतिक परंपरा का निर्वाह करते हुए .


लेकिन जल्दी ही पर्दा हट जाता है .


बच्चों के डॉक्टर्स ने किया भांगड़ा !


एक बार जो मस्ती छाई तो पूरा डिपार्टमेंट डांस करने लगा .


बारी तो हमारी भी आई , हास्य कविता सुनाने की . यह गंभीर मुद्रा इस बात की सूचक है की हास्य उत्पन्न करना एक बेहद गंभीर मामला है . साथ ही , यह तूफ़ान आने से पहले की शांति दर्शा रही है .
अब हमने क्या सुनाया --यह तो राज़ ही रह जायेगा क्योंकि अभी तक मूवी क्लिप्स नहीं बन पाए हैं .


Sunday, July 1, 2012

दुनिया में कंजूस आदमी सबसे दयालु इन्सान होता है -- क्या आप भी हैं




पूर्वी दिल्ली के एक शानदार मॉल की सबसे उपरी मंजिल पर खड़ा मैं देख रहा था नीचे की चहल पहल -- आते जाते , हँसते मुस्कराते , इठलाते चहकते --- युवा नर नारी , कोई हाथों में हाथ डाले , कोई कोने में खड़े होकर चिपियाते, फुसफुसाते ( कड्लिंग ), -- लेकिन सब खुश -- बाहर की दुनिया से बेखबर .

कितनी अजीब बात थी -- बाहर की दुनिया में कहीं पानी नहीं , कहीं बिजली -- पेट्रोल ज्यादा महंगा या सब्जियां -- गर्मी से परेशान काम पर जाते लोग या ट्यूशन के लिए जाते छात्र .
लेकिन यहाँ बस एक ही दृश्य -- सब खुश , मग्न , चिंतारहित, पूर्णतया मित्रवत .

कुछ पल के लिए खो सा गया अतीत की यादों में . याद आने लगा वो समय जब प्री मेडिकल में था -- एक रुपया प्रति सप्ताह जेब खर्च मिलता -- खर्च होता ही नहीं था . कहाँ किसे फुर्सत थी केन्टीन में बैठने की . सभी तो करियर बनाने में लगे रहते थे . लेकिन महीने के अंत में एक फिल्म ज़रूर देखते और पार्टी हो जाती .

फिर मेडिकल कॉलेज में आ गए -- जेब खर्च बढ़कर दस रूपये प्रति सप्ताह हो गया . अब रोज एक चाय और समोसा हो जाता था . कभी कभार शाम को टहलते हुए पास की आई एन ऐ मार्केट में चले जाते , छोले बठूरे खाने . तीन रूपये में बड़े स्वादिष्ट छोले बठूरे मिलते थे . लेकिन अक्सर जेब में दस रूपये डालकर जाते और उस दुकान के सामने दो चक्कर लगाकर बस
चक्षु पान कर ही लौट आते . मन में विचार बना लिया था -- ऐसा करने से दृढ इच्छा शक्ति का विकास होता है .

अब कभी कभी लगता है -- इच्छा शक्ति कुछ ज्यादा ही दृढ हो गई है . खर्च करने का मन ही नहीं करता . बच्चे भी हँसते हैं और कंजूस कहने लगे हैं . सोचता हूँ , शायद सही ही कहते हैं . कहाँ गई वो खर्च करने की आदत ! फिर लगता है इसके लिए जिम्मेदार हालात हैं . वेतन सीधा बैंक में चला जाता है . सारे बिलों का भुगतान ओंनलाइन हो जाता है . श्रीमती जी सारी शौपिंग अपने क्रेडिट कार्ड से कर आती है और फिर उसका बिल हमारे कार्ड से भरने की नाकाम कोशिश करती हैं . अंतत : भुगतान तो चेक से हो ही जाता है .

अब देखा जाए तो कैश खर्च करने का अवसर ही नहीं मिलता . इसलिए अपनी तो आदत ही छूट गई है हाथ से पैसे देने की .
लेकिन यहाँ मॉल में आकर एक अलग ही दुनिया देखने को मिलती है . लोग दुकानों में कम , बाहर घूमते या बैठे ज्यादा नज़र आते हैं . सर्दी हो या गर्मी या आंधी आए या तूफ़ान -- मॉल के अन्दर तो सब ऐ सी ही होता है . इसलिए मौसम की मार नहीं झेलनी पड़ती . कोई यह भी नहीं पूछता --आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? या कर क्या रहे हैं ? ऐसा स्वछन्द वातावरण स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार मॉल कल्चर आने के बाद ही मिला है .

पिछले दस सालों में दिल्ली और देश की जैसे कायापलट ही हो गई है. एस्केलेटर या इलिवेटर पर खड़े होकर लगता ही नहीं हम भारत में हैं . चमचमाते फर्श और दीवारें , उम्दा साफ सफाई , टॉयलेट्स भी आधुनिक -- लगता है जैसे इम्पोर्टेड शब्द अब शब्दावली से ही हट गया हो .




इस बौलिंग ऐले को देख कर तीन साल पहले कनाडा यात्रा की याद आ गई जब पहली बार हमने वहां बौलिंग की थी . अब यहाँ ही यह सुविधा देख कर अत्यंत रोमांच हो रहा था .




साथ ही विशाल शीशे की खिड़की से बाहर मेट्रो लाइन पर जाती मेट्रो को देख कर तो जैसे स्वर्गिक आनंद की अनुभूति हो रही थी . सोच कर भी अजीब लग रहा था , यह वही क्षेत्र है जहाँ कुछ साल पहले गंदगी ही गंदगी दिखाई देती थी . लेकिन अब मेट्रो ने सब पलट कर रख दिया था .




लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित किया -- फ़ूड कोर्ट ने . इत्तेफ़ाकन इस मॉल में हमारा आना कम ही हुआ है . इसलिए सारा मॉल घूमकर देखने के बाद जब पहुंचे खाने की जगह तो वहां का नज़ारा देखकर हत्प्रध रह गए . पांच बजे भी लगभग सारी टेबल्स भरी थी . ९० % लोग हमारे बच्चों की उम्र के थे . लोग क्या , यूँ समझिये ब़ोय्ज, गर्ल्स , बॉय फ्रेंड , गर्ल फ्रेंड और कुछ खाली फ्रेंड्स -- सब मज़े से बैठे खाते पीते हुए गप्पें हांक रहे थे . कुछ तो होमवर्क और त्युसन भी वहीँ बैठकर पढ़ रहे थे . पति पत्नी तो कम ही दिखाई दिए . फिर भी , कोई किसी की तरफ नहीं देख रहा था --यह देखकर हमें भी अच्छा लगा वर्ना ताका झांकी से तो हमें भी परेशानी होती रही है .




अब बारी आई खाने की . शाम के पांच बजे ज्यादा कुछ तो नहीं खाया जा सकता था . अब हम अंग्रेज़ तो हैं नहीं , जो शाम होते ही रात का खाना खा लें ( सपर ) . काफी खोज बीन करने पर हमें पसंद आये --गोल गप्पे ( पानी पूरी ) . यूँ तो यह आइटम खाए हुए सालों हो चुके थे क्योंकि इन्हें खिलाने का विशेष तरीका हमें नहीं भाता . लेकिन यहाँ की बात कुछ और थी . यहाँ हाथ में ग्लव्ज पहनकर काम किया जा रहा था . हालाँकि जब प्लेट सामने आई तो पता चला -- गोल गप्पे खिलाने वाला भी हम में से ही किसी को बनना पड़ेगा . आखिर श्रीमती जी ने यह काम किया और हमने गोल गप्पे गपने का .

यहाँ आकर यही लगा --जब तक हम रूटीन लाइफ में उलझे रहते हैं , तब तक जीवन की रंगीनियों को भूले रहते हैं . अब जब यहाँ भी सब कुछ उपलब्ध है तो क्यों न इन सुविधाओं का फायदा उठाते हुए जीवन में रस घोलते हुए आनंद लिया जाए . आखिर , ज्यादा पैसा बचा कर भी क्या करना है . आज की युवा पीढ़ी से सीखते हुए कुछ मौज मस्ती पर भी खर्च करना चाहिए . वैसे भी एक दिन सब यहीं रह जाना है .

सारांश : जो व्यक्ति जितना ज्यादा कंजूस होता है , वह उतना ज्यादा दयालु होता है . क्योंकि वह अपना सब कुछ दूसरों के लिए छोड़ जाता है .