Friday, September 30, 2011

झोला छाप ही नहीं , सड़क छाप डॉक्टर भी होते हैं ---

यह तो हम सभी जानते हैं कि जिनके पास मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं होती, लेकिन फिर भी मेडिकल प्रैक्टिस करते हैं , उन्हें झोला छाप डॉक्टर कहते हैं । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके पास न तो डिग्री होती है , न वे प्रैक्टिस करते हैं , फिर भी लोगों का इलाज करते हैं ।

आपने जगह जगह सड़क किनारे टेंट लगा देखा होगा , जिस पर लिखा होगा ----खानदानी सफाखाना ।
या फिर --पहलवान --हड्डी जोड़ तोड़ इलाज ।
या बसों में दवा बेचते भिखारी जैसे लोग ।
और तो और , यदि आप मनाली जैसे हिल स्टेशन पर घूमने जाएँ तो झोला टांगे कोई चरसी सा दिखने वाला व्यक्ति आकर कहेगा --साब थोड़ी सी दूँ --एक बार इस्तेमाल कर के देखिये !

इन्हें सड़क छाप डॉक्टर कह सकते हैं ।

आइये मिलते हैं , कुछ ऐसे ही सड़क छाप डॉक्टरों से :

दृश्य १ :

करीब बीस साल पहले की बात है । मैं बस में बैठा चंडीगढ़ की ओर जा रहा था । अम्बाला के पास बस एक ढाबे पर रुकी तो चलने से पहले बस में एक ऐसा ही व्यक्ति घुस आया और लगा अपनी सुनाने ।
साहेबान , ज़रा ध्यान दीजिये --क्या आपके दांत में कीड़ा है --डॉक्टर की फीस देकर तंग आ चुके हैं --कोई फायदा नहीं हो रहा --घबराइए नहीं --हमारे पास इसका इलाज है ।
एक आदमी से बोला --क्या आपके दांत में कीड़ा लगा है ?
आदमी बोला -जी हाँ ।
साहेबान देखिये , अभी आपके सामने इनके दांत का कीड़ा बाहर आता है एक मिनट में ।
उसके बाद उसने एक छोटी सी शीशी निकाली, उसमे से एक तिल्ली पर द्रव की एक बूँद लगाई और व्यक्ति के मूंह में लगा दिया । थोड़ी देर बाद उसने मूंह खोलने के लिए कहा और ये लो तिल्ली पर एक छोटा सा तिनका जैसा लगा था जिसे दिखाकर बोला --लीजिये साहेबान कीड़ा बाहर आ गया । न कोई ऑपरेशन , न कोई चीर फाड़ और कीड़ा बाहर ।
यदि आप के या आप के किसी रिश्तेदार के दांत में कीड़ा लगा हो तो एक शीशी ले जाइये --कीमत मात्र पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी दस शीशियाँ बिक गई । पचास रूपये संभाल वह चुपचाप नीचे उतर कर गायब हो गया ।

दृश्य २ :

एक छोटे से कस्बे में सड़क पर एक कोने में एक जगह लोगों की भीड़ लगी थी । गोल दायरे में खड़े लोगों के बीच एक मदारी सा व्यक्ति तमाशा दिखा रहा था । फर्क बस इतना था की उसके पास जमूरा नहीं था , बल्कि खुद ही तमाशा दिखाने में लगा था ।
पहले उसने एक कटोरी में पानी लिया । फिर उसमे थोडा लाल रंग मिला दिया । फिर बोला --

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --आपकी आँखें दुखनी आई हों तो आप डॉक्टर के पास जाते हैं । डॉक्टर अपनी फीस ले लेता है लेकिन आपको कोई आराम नहीं आता । आप निराश हो जाते हैं । फिर डॉक्टर बदलते हैं --फिर फीस . फिर कोई आराम नहीं ।

लेकिन निराश न होइये --हमारे पास ऐसा इलाज है जो आँख की हर लाली को मिटा देगा ।
इसके बाद उसने कटोरी के पानी में दो चार बूँद किसी द्रव की डाली --और ये लो , पानी का रंग साफ हो गया ।

साहेबान , कद्रदान . मेहरबान --एक बार तालियाँ हो जाएँ --हमारे इलाज की कोई काट नहीं --नकली साबित करने वाले को हज़ार रूपये का इनाम --और इस इलाज की कीमत --साहेबान कोई १०० रूपये नहीं --पचास भी नहीं --दस भी नहीं --ज़नाब इसकी कीमत है बस पांच रूपये --जी हाँ , सिर्फ पांच रूपये , पांच रूपये , पांच रूपये ।

देखते ही देखते उसकी बीस शीशियाँ बिक गई ।

उसके बाद उसने दूसरा तमाशा शुरू किया --

फिर एक कटोरी में पानी -- पानी में एक पाउडर सा डाला --थोड़ी देर में पानी जमकर जैली जैसा हो गया --एक युवक से कहा , इसे उल्टा करके देखो -- जितना मर्जी हिला लो , एक कतरा भी नहीं गिरेगा ---

हम बच्चे थे , कुछ समझ नहीं पाए ।

लेकिन देखते ही देखते उसकी सारी शीशियाँ बिक गई ।

नोट : सड़क छाप डॉक्टर ही नहीं होते , मरीज़ भी होते हैं ।


Tuesday, September 27, 2011

जब दिल की धड़कन बढ़ने लगे और रुकने का नाम ना ले ---

बचपन में गाँव में जब भी कोई बीमार होता तो वैद्ध को बुलाया जाता दूर से आता था , इसलिए आने पर बच्चों को साथ में दिखा दिया जाता । बच्चे के नाखून देखकर वैद्ध जी बड़ी शान से बताते --इसको खून की कमी है --इसके पेट में कीड़े हैं उसकी बात सोलह आने सच होती । वैसे भी गाँव के बच्चों में पेट में कीड़े अक्सर हो जाते हैं , खुले में सौच करने की वज़ह से ।

थोड़े बड़े हुए तो नाड़िया वैद्ध के बारे में जाना । बहुत पहुंचे हुए वैद --सिर्फ नाड़ी देखकर ही सारी बिमारियों का इलाज करने वाले । सोचकर ही हैरानी होती थी --यह ऐसे कैसे जान लेते हैं सब

डॉक्टर बने तो पता चला --नाड़ी देख कर क्या पता चलता है । और क्या नहीं ।

नाड़ी यानि पल्स --डॉक्टर आम तौर पर रेडियल पल्स का इस्तेमाल करते हैं , रोगी के रोग के बारे में जानने के लिए । इसे हाथ के अंगूठे से थोडा ऊपर उंगली से महसूस किया जाता है ।

नाड़ी से क्या पता चलता है ?

* नाड़ी की गति --सामान्य या तेज या धीमी .
* नाड़ी की नियमितता .
* वोल्यूम और पल्स प्रेशर .
* विशेष किस्म की पल्स .

गति :

फास्ट पल्स ( टेकिकार्डिया ) यानि नाड़ी का तेज चलना इसके मुख्य कारण होते हैं :

* बुखार --आम तौर पर एक डिग्री फारेन्हाईट तापमान बढ़ने से पल्स १० तक बढ़ जाती है ।
* खून की कमी --एनीमिया .
* हाईपरथायरायडिज्म --इसमें सोते हुए भी पल्स तेज चलती है ।
* नर्वसनेस , बेचैनी, डर
* हाई या लो बी पी
* डीहाईडरेशन ( शरीर में पानी की कमी )
* एक्सरसाइज
* सिगरेट और शराब का अत्यधिक सेवन
* विशेष हृदय रोग

स्लो पल्स के कारण :

* हाईपोथायरायडिज्म
* एथलीट्स
* कुछ दवाईयों का असर जैसे बीटा ब्लोकर्स
* हार्ट ब्लॉक तथा अन्य हृदय रोग
* पोइजनिंग
* टायफोइड ( मियादी बुखार )

इस तरह नाड़ी से मुख्य रूप से सिर्फ नाड़ी का तेज या धीमा होना ही जाना जा सकता है । यह जानकारी कुछ रोगों के निदान में सहायक सिद्ध होती है ।
लेकिन एक जनरल फिजिशियन इससे ज्यादा कुछ नहीं जान सकता । हालाँकि कार्डियोलोजिस्ट कुछ विशेष परिस्थितयों में हृदय रोग से सम्बंधित जानकारी जुटा सकते हैं ।

अब आप ही सोचिये कि एक वैद्ध जो अक्सर अंगूठा छाप या दो चार क्लास पास होता था , उसे नाड़ी देख कर क्या पता चलता होगा

लेकिन हमारी जनता भी इतनी भोली रही है कि बस
वैद्ध जी ने कहा और हमने मान लिया । हालाँकि उपचार में विश्वास भी बहुत काम आता है लेकिन उसके लिए भी कोई तो आधार होना चाहिए ।
विशेष :

अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं कि --दिल धड़कने लगा । अब यह किसी सुंदरी को देख कर हो या किसी भयंकर दृश्य को देख कर । लेकिन अचानक दिल की धड़कन महसूस होने लगती है । वैसे तो दिल तब तक धड़कता है जब तक साँस है । लेकिन साँस की तरह दिल की धड़कन का भी तभी पता चलता है , जब यह अचानक तेज हो जाये । इसे पैल्पिटेशन ( palpitation) कहते हैं ।

यदि यह लगातार रहे और अपने आप ठीक हो तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह किसी गंभीर रोग का लक्षण हो सकता है


Friday, September 23, 2011

भरोसा एक पल का नहीं , मंसूबे जिंदगी भर के ....


शाम का धुंधलका , आसमान में उमड़ आए काले बादलों से असमय होता अँधेरा--बाज़ार में शाम की खरीदारी करती महिलाओं की चहल पहल --घर में बच्चे खेलने की फ़िराक में होमवर्क निपटाने की जल्दी में --काम के बोझ का मारा बेचारा बाबु हाथ में ब्रीफकेस लिए कमर झुकाए घर की ओर प्रस्थान करता हुआ --रोजमर्रा की जिंदगी का एक और दिन समाप्ति की ओर।

तभी एक जोरदार आवाज़ , गडगडाहट के साथ --छत के पंखे हिलने लगे , दीवार पर टंगी तस्वीरें गिर कर टूट गई --और धड़ाम , कोई दीवार गिरने की आवाज़ --लोग घरों से बाहर निकल सड़क पर आ गए --किसी ने पीछे मुड़कर देखा , घर की छत गिर गई थी --कुछ समय पहले जहाँ बैठा था , वहां सीमेंट का एक बड़ा टुकड़ा टूट कर बिखर गया था --कुछ पल का ही फासला था जिन्दगी और मौत के बीच।

आस पास सभी जगह तबाही का आलम -अचानक बिजली भी गुम --घुप्प अंधकार --

चारों ओर हाहाकार , कोलाहल , चीत्कार --किसी को कुछ पता नहीं क्या करें , कहाँ जाएँ --तन पर स्वेटर से ठंडी हवा के झोंकों से कुछ तो राहत--लेकिन तभी आसमान में छाये बदल भी फट पड़े --मूसलाधार बारिस में भीगकर स्वेटर भी बेकार --ठंडी हवा बदन को चीरती हुई ज्यों सैंकड़ों सूइयां एक साथ चुभती हुई --कंपकपाते बच्चे को दामन में समेट कर ठण्ड से बचाने का निसफल प्रयास करती माँ-- हृदय विदारक दृश्य।

यह दृश्य किसी हॉरर फिल्म का नहीं , बल्कि सिक्किम में आए भूकंप से होने वाली तबाही का है , जिसमे सैंकड़ों लोग मृत और घायल और हज़ारों बेघर हो गए।

यह मंज़र अब धीरे धीरे सामने आ रहा है , सड़क मार्ग और संचार साधन खुलने पर।

यहाँ दिल्ली में बहुमंजलीय ईमारत के अपने आरामदायक अपार्टमेन्ट में बैठा एक ब्लोगर जुटा है ब्लॉग पर धड़ाधड टिप्पणियां करने में --ब्लॉगजगत में गहमागहमी छाई हुई है --तर्क वितर्क , आरोप प्रत्यारोप , बनते बिगड़ते आभासी रिश्ते --ब्लॉगजगत जैसे बौखला सा गया है---

अचानक अहसास होता है --दिल्ली भी हाई सीस्मिक ज़ोन में है --यदि यही तबाही यहाँ भी हुई होती तो ! !

ऊंची ऊंची बिल्डिंग्स में रहने वाले कहाँ जायेंगे भागकर --मौत से भी भागकर कोई बचा है !
फिर ख्याल आता है ---

भरोसा एक पल का नहीं , मंसूबे बनाने बैठे हैं उम्र भर के ।
जो पल अभी है , उसे यूँ ही बर्बाद कर रहे हैं , फालतू की बातों में।


इसलिए आईये प्रण करें --आज से ही ब्लोगिंग में कोई ईर्ष्या द्वेष वाली बात नहीं करेंगे ।

नोट : ब्लोगिंग में सद्भावना बनाये रखने के लिए आप सब का सहयोग अपेक्षित है ।



Tuesday, September 20, 2011

ये मन ये पागल मन मेरा ---

ब्लॉगर्स मीट वीकली में प्रेरणा अर्गल जी की चर्चा में मिले इस लिंक से निम्न पंक्तियाँ ली गई हैं :

आज आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि आदमी को अच्छा इंसान बनना चाहिए और उसे अच्छे काम करने चाहिएं लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि इंसान बनने के लिए कौन कौन से अच्छे काम करने ज़रूरी हैं ?
तो वह बता नहीं पाएगा।
यही हाल खान-पान , यौन संबंध और अंतिम संस्कार का है।
- डा. अनवर जमाल

पिछली पोस्ट पर पिट्सबर्ग वाले श्री अनुराग शर्मा की टिपण्णी पढ़कर यही लगा कि ब्लोगिंग में कितनी ताकत है . अनुराग जी ने मेरी एक साल पहले गीता ज्ञान पर लिखी पोस्ट पढ़ी और पसंद की . इस बहाने हम भी एक बार फिर स्वयं के ब्लॉग पर पुरानी पोस्ट पर गए और दोबारा सारी पोस्ट पढ़ी . सचमुच कितना ज्ञान भरा है गीता में .

कहते हैं , मनुष्य यदि इन्सान भी बन जाये तो यह एक उपलब्धि है .
गीता के सतरहवें अध्याय में जो बातें कही गई हैं , वह इन्सान को भी देवता बना सकती हैं , यदि आप इनका पालन करने लगें तो . यह अध्याय मेरा भी मनपसंद अध्याय है .

लीजिये आप भी एक बार फिर पढ़िए . वैसे भी ऐसी बातों को बार बार पढने /दोहराने की ज़रुरत होती है .


अध्याय १७ : त्रिविध योग

गीतानुसार मनुष्य की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है --सात्विक , राजसी और तामसी । आइये देखते हैं कैसे उत्तपन्न होती है यह प्रवृत्ति।

कर्म करने से ही मनुष्य की प्रवृत्ति का पता चलता है

गीतानुसार --पूजा करने की श्रद्धा , आहार , यज्ञ , तप और दान --मनुष्य की प्रवृत्ति दर्शाते हैं । ये सब तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी।

पूजा करने की श्रद्धा :

सात्विक : एक ही भगवान को सर्वव्यापी मान कर श्रद्धा रखते हैं ।
राजसी : देवी देवताओं की पूजा करते हैं ।
तामसी : शरीर को कष्ट देकर , भूत प्रेतों की पूजा करते हैं ।


आहार :

सात्विक : जिसके खाने से देवता अमर हो जाते हैं मनुष्य में बल पुरुषार्थ आये आरोग्यता , प्रीति उपजे दाल,चावल , कोमल फुल्के , घृत से चोपड़े हुए , नर्म आहार

राजसी : खट्टा , मीठा , सलुना , अति तत्ता , जिसे खाने से मुख जले ,रोग उपजे , दुःख देवे

तामसी
: बासी , बेस्वाद , दुर्गन्ध युक्त , किसी का
जूठा भोजन .

यज्ञ :

सात्विक
: शास्त्र की विधि से , फल की कामना रहित , यह यज्ञ करना मुझे योग्य है , यह समझ कर किया गया यज्ञ सात्विक कहलाता है

राजसी
: फल की वांछा करते हुए , भला कहाने को , दिखावा करने को किया गया यज्ञ

तामसी
: बिना शास्त्र की विधि , बिना श्रद्धा के , अपवित्र मन से किया गया यज्ञ

दान :

सात्विक : बिना फल की आशा , उत्तम ब्राह्मण को विधिवत किया गया दान

राजसी : फल की वांछा करे , अयोग्य ब्राह्मण को दान करे

तामसी : आप भोजन प्राप्त कर दान करे , क्रोध या गाली देकर दान करे ,मलेच्छ को दान करे

तप :

सात्विक : प्रीति से तपस्या करे , फल कुछ वांछे नहीं , इश्वर अविनाशी में समर्पण करे

राजसी
: दिखावे के लिए , अपने भले के लिए तप करे , अपनी मानता करावे

तामसी
: अज्ञान को लिए तप करे , शरीर को कष्ट पहुंचाए , किसी के बुरे के लिए तप करे


यहाँ तप चार प्रकार के बताये गए हैं --देह , मन , वचन और श्वास का तप।

देह का तप : किसी जीव को कष्ट पहुंचाए
स्नान कर शरीर को स्वच्छ रखे , दन्त मंजन करे
गुरु का सम्मान , मात पिता की सेवा करे
ब्रह्मचर्य का पालन करे

ब्रह्मचर्य : यदि गृहस्थ हो तो परायी स्त्री को छुए यदि साधु सन्यासी होतो स्त्री को मन चितवे भी नहीं

मन का तप : प्रसन्नचित रहे मन को शुद्ध रखे भगवान में ध्यान लगावे

वचन का तप : सत्य बोलना मधुर वाणी --हाँ भाई जी , भक्त जी , प्रभुजी , मित्र जी आदि कह कर बुलावे
गायत्री पाठ करे अवतारों के चरित्र पढ़े

श्वास तप : भगवान को स्मरण करे भगवान के नाम का जाप करे


इस तरह मनुष्य के सभी कर्म तीन प्रकार के होते हैं --सात्विक , राजसी और तामसी
इन्ही कर्मों का लेखा जोखा बताता है कि आप सात्विक हैं , राजसी हैं या तामसी प्रवृत्ति के मनुष्य हैं

यह
मन बड़ा चलायमान होता हैबार बार तामसी प्रवृति की ओर जाने के लिए बेचैन रहता हैइसे काबू में रखने की कोशिश करते रहना चाहिए



नोट :
ईश्वर और अल्लाह , पूजा और इबादत , गीता और कुरान --ये नाम भले ही अलग हों , लेकिन इनका अर्थ एक ही है . ये रास्ता दिखाते हैं मनुष्य को इन्सान बनने का .



Friday, September 16, 2011

छोटी सी है जिंदगी --- प्यार करें या तकरार ?

आजकल टी वी पर हमारे मन पसंद कार्यक्रम --कौन बनेगा करोडपति -- की पांचवीं कड़ी चल रही हैपसंद इसलिए कि इसमें जनता के साथ साथ हमें भी अपनी औकात टेस्ट करने का अवसर मिल जाता हैकभी कभी तो लगता है कि यदि हम हौट सीट पर पहुँच गए होते तो पता नहीं कुछ जीत भी पाते या नहीं

वैसे पांच बार में भी हम आज तक यह नहीं जान पाए कि वहां जाने के लिए क्या करना पड़ता हैलेकिन सोचता हूँ यदि गलती से पहुँच भी जाएँ तो क्या होगाज्यादातर लोग .२० लाख से लेकर १२.५० लाख तक जीतते हैंअमिताभ जी जब पूछेंगे --इतने रुपयों का आप क्या करेंगे ? तो क्या ज़वाब दूंगा ? अब यह सवाल तो अपने लिए बड़ा कठिन होगा

मुफ्त में मिले इन पैसों का क्य़ा करूँगा ? अभी तक तो ज़वाब नहीं सूझा इसका
वैसे भी यदि आपकी सांसारिक ज़रूरतें पूरी हो जाएँ तो और क्या चाहिए आपको !

लेकिन शायद सभी इतने भाग्यशाली नहीं होते

कार्यक्रम को देखता हूँ तो अजीब सा महसूस होता हैइस बार चयनित लोगों में सभी अलग अलग वर्ग के लोग हैंकोई गृहणी है , कोई छात्र . कोई मजदूर , कोई मध्यम वर्गीय सरकारी नौकर
सबके लिए सबसे बड़ी ख़ुशी यही है कि वो यहाँ तक पहुंचे , अमिताभ बच्चन के दर्शन हो गए और उनके साथ बैठकर बातें करने का अवसर मिला

साथ ही कुछ लाख रूपये भी मिल गए जो निश्चित ही उनके बड़े काम आयेंगे

एक बंगाली शादीशुदा महिला ने बताया कि उसके पति को अभी काम नहीं मिला हैवह १०००/- महीना कमाती हैअपने लिए एक घर बनाना चाहती है जिसके लिए लाख काफी रहेंगेवह १२.५० लाख जीत कर गई
कोई छात्र --जो आगे पढना चाहता है
गृहणियां तो बच्चन जी से मिलकर इतनी खुश होती हैं जैसे उन्हें सारा जहाँ मिल गया
कई तो कहते हैं कि उन्हें अमिताभ बच्चन के दर्शन हो गए , जीवन तर गया

किसी ने कहा --सर आप यह प्रोग्राम जारी रखेंआपसे मिलकर एक आम आदमी को भी सेलेब्रिटी होने का अहसास होता है
ज़ाहिर है , बहुतों की जिंदगी में ख़ुशी घोल रहा है यह प्रोग्राम

इसलिए हम तो इस प्रोग्राम को देखकर ही आनंदित होते रहते हैं और दुआ करते हैं कि यह प्रोग्राम यूँ ही ज़रूरतमंद लोगों की जिंदगी में खुशियों का प्रकाश फैलाता रहे

इधर सरकार काला धन देश में लाने के लिए एक बार फिर एमनेस्टी स्कीम लागु करने जा रही हैयानि थोडा सा टैक्स दो और काले को सफ़ेद कर लो । कोई सजा नहीं , कोई पूछ ताछ नहीं। यहाँ भी सभी खुश ही खुश

सोचता हूँ --दो चार लाख रूपये काला धन अपने पास भी होता तो मज़ा जाता

लेकिन फिर सोचता हूँ --क्या हो जाता , पत्नी जी तो फिर भी डिनर में दो चपातियाँ ही देती खाने के लिए

इधर ब्लॉगजगत का हाल भी कुछ ऐसा ही है

ब्लोगर्स में लगभग सभी लोग ऐसे हैं जिनमे लेखन की प्रतिभा है लेकिन अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त साधन नहीं मिलता
किसी को कविता लिखने का शौक है लेकिन प्रकाशित नहीं होती
कोई कवि है लेकिन श्रोता नहीं मिलते क्योंकि मंच पर आने का अवसर नहीं मिलता

जिनको मंच पर आने का अवसर मिलने लगता है , वह ब्लोगिंग के लिए समय नहीं निकाल पाता

बुजुर्गों को अक्सर अकेलापन बहुत सताता है लेकिन ब्लोगिंग के ज़रिये अच्छा टाईम पास हो जाता है
गृहणियों को काम से छुट्टी मिलने के बाद ब्लॉग पर अपना हुनर दिखाने का सुनहरा अवसर मिलता है

सभी तो खुश हैं यहाँ ब्लोगिंग के बहाने

सही मायने में ब्लोगर डोट कॉम ब्लोगर्स के लिए के बी सी के अमिताभ बच्चन का काम कर रहा है
ऐसे में सब ब्लोगर्स का फ़र्ज़ बनता है कि सब मिलकर ब्लोगिंग में सद्भावना और सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाये रखें

विचारों में मतभेद हो सकता है , लेकिन पारस्परिक सम्मान का ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है
आखिर यह जिंदगी बड़ी छोटी सी होती है

डॉ अमर कुमार के यूँ अकस्मात असमय चले जाने से सारे ब्लॉगजगत को धक्का लगा हैआज हम ब्लोगिंग में उनके योगदान को याद कर प्रेरणा ही प्राप्त कर सकते हैं

लेकिन एक कटु सत्य यह भी है कि कल फिर कोई और जायेगाकौन और कब --यह किसी को पता नहीं होता

उसके बाद ब्लॉगजगत में रह जाएँगी बस यादें --आपके लेखों और टिप्पणियों की

फिर काहे का झगडा, काहे की लड़ाई !

इसलिए क्यों हम ऐसी छाप छोड़कर जाएँ कि लोग याद करते समय आपके बारे में सिर्फ अच्छा और अच्छा ही बोलें