Tuesday, August 30, 2011

उसका ग़म देखा तो , मैं अपना ग़म भूल गया --




हेयर कटिंग सैलून की
आरामदेह कुर्सी पर
बैठा ,
मैं ईर्ष्या रहा था
बाजु में बैठे युवक की
लहलहाती ,
ज़ुल्फ़ों को देखकर ।

तभी
हमारा केश खज़ाना देख,
दूसरी ओर बैठे
एक हम उम्र के चेहरे पर ,
वही भाव उभर आए ।

उसका ग़म देखा तो ,
मैं अपना ग़म भूल गया ।

नोट : फोटो भाई राजेन्द्र स्वर्णकार ने संवार कर दी है .




Saturday, August 27, 2011

रिश्तों कीं कीच ---

आज मूढ़ लाईट करने के लिए थोडा कुछ हल्का फुल्का हो जाए --

डॉक्टर मानसिक रोगी से : तुम पागल कैसे हुए ?

रोगी : मैंने एक विधवा से शादी कर ली ---- उसकी ज़वान बेटी से मेरे बाप ने शादी कर ली ----तो मेरी वो बेटी मेरी मां बन गई ---- उनके घर बेटी हुई तो वो मेरी बहन हुई ----मगर मैं उसकी नानी का शौहर था , इसलिए वो मेरी नवासी भी हुई ----इसी तरह मेरा बेटा अपनी दादी का भाई बन गया और मैं अपने बेटे का भांजा और मेरा बाप मेरा दामाद बन गया और मेरा बेटा अपने दादा का साला बन गया और ----और ----

डॉक्टर : करदे साले मुझे भी पागल करदे

नोट : कृपया इसे बस हास्य के रूप में ही लेंचिकित्सा क्षेत्र में आजकल इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता




Thursday, August 25, 2011

बहुमुखी प्रतिभा के धनि , डॉ अमर कुमार --एक संस्मरण .

डॉ अमर कुमार से मेरा परिचय अप्रैल २०११ में हुआ . उससे पहले न कभी टिप्पणियों का आदान प्रदान हुआ , न मुझे उनकी कोई पोस्ट पढने का अवसर मिला . बस एक बार आरम्भ में उनकी एक टिप्पणी आई थी जब मैंने दिल्ली दर्शन पर एक पोस्ट लिखी थी .
लेकिन इस वर्ष हमारी वैवाहिक वर्षगांठ पर ये सिलसिला शुरू हुआ और फिर लगभग हर पोस्ट पर डॉ साहब की दिलचस्प और हैरतंगेज़ टिप्पणियां पढ़कर हम आनंदविभोर होते रहे . तभी हमने जाना -डॉ अमर डॉक्टर होने के साथ साथ कितने प्रतीभाशाली व्यक्ति थे .

डॉ अमर को श्रधांजलि देते हुए प्रस्तुत हैं उनकी दी गई कुछ चुनिन्दा टिप्पणियों के अंश जो उनकी बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्तित्त्व को बखूबी दर्शाते हैं .

उनकी आखिरी टिप्पणी १९-७-२०११ की इस पोस्ट पर मिली --

मैं आपसे फिल्म के टिकेट पर खर्च किये गए पैसे में से २५ % के रिफंड की मांग करता हूँ --मिस्टर आमिर खान

( फिल्म डेल्ही बेली की समीक्षा )
डा० अमर कुमार said...

केवल 25% ?
आप बड़े रहमदिल हैं, डॉ दराल !
ताज़्ज़ुब तो यह है कि, पिंक चड्डी वाले श्रीराम सेना का खून इस पर नहीं उबला... शिवसेना भी चुप रह गयी... क्या सँस्कृति के ठेकेदार भी बिकाऊ हैं ? अभिनेता के तौर पर आमिर मुझे अच्छा लगता है.. पर निर्माता के रूप में मैं उसे स्वीकार नहीं कर पाता, वह बड़ी सफाई से अपनी पत्नी किरन राव के योगदान को डकार जाता है ।

कुल मिला कर मामला... " भोली सूरत दिल के खोटे... नाम बड़े और दरशन छोटे.. ट्रॅन ट्रॅनन, ट्रॅन ट्रॅनन, ट्रॅन ट्रॅनन " वाला है ।
खैर मैंनें इसे डाउनलोड करके निर्विकार भाव से देखा, लुत्फ़ न आया और अपने बेटे को कहा कि जा तू भी देख आ.. ताकि यह पता रहे भाषा की सैंक्टिटी ( Sanctity ) बनाये रखने में कौन से स्लैंग नहीं बोलने चाहिये ।


और हाँ, आपकी पिछली पोस्ट बहुत ही अच्छी थी,

टिप्पणी देने से चूक गया.. लेकिन दूँगा ज़रूर !

( यह पोस्ट भूत प्रेतों के बारे में थी )
अफ़सोस , उसके बाद डॉ साहब गंभीर रूप से बीमार हो गए और यह वादा अधूरा ही रह गया .

नेशनल डॉक्टर्स डे पर डॉक्टर्स को मिला सम्मान -

भाई डॉ. दराल साहब,
हम तो आपको उसी दिन बधाई दे चुके हैं,
आप भी हमको विश किये थे, आज फिर अपनी बधाई दोहरा रहा हूँ.. ताकि लोग यह न समझें कि डॉक्टर अमर कुमार इस पोस्ट पर अनुपस्थित हैं, और ’समझो लाल’ लोग अपनी समझ इसी में खपा डालेंगे । तो.... इस प्रकार हमलोग किसी तरह डॉक्टर्स डे मना लिये ।
मुला ई पब्लिकिया इस दिन का ध्यान ही कब रखती है ? मैं पहले हर वर्ष डॉक्टर्स डे पर एक पोस्ट लिखा करता था, बाद में बन्द कर दिया... कारण ? मुझे यह बोध होने लगा कि मैं क्यों हर वर्ष क्यों याद दिलाऊँ.. कि देवियों और सज्जनों आज हमारा भी दिन आया है... आओ, आओ हमें बधाई दो ! जो सज्जन 9 दिन बाद पोस्ट लिखे जाने का उलाहना दे रहें हैं, वह कृपया नोट कर लें ।

आखिरी पंक्ति से लगता है वे कितने ध्यान से सबकी टिप्पणियां भी पढ़ते थे .

न जाने किस भेष में नारायण मिल जाये---

(समलैंगिक संबंधों पर एक पोस्ट )

निश्चय ही यह एक मनोविकृति है,
पश्चिम में लीक से अलग दिखने के लिये लोग कुछ भी अपना लेते हैं ।
भारत में इसे असमय ही मान्यता दे दी है...स्वतँत्रता के अधिकार का बहुत गलत तरीके से पैरोकारी की जा रही है ।
जैसा कि होता आया है.. कि भारतीय युवा तर्कहीन अँधानुकरण में माहिर हैं, चाहे वह घिसी जीन्स हो या लिव-इन के चोंचले... उनके लिये यह सभी हैपेनिंग थिंग और इट्स हॉट जैसे ज़ुमलों से परिभाषित हो लेते हैं ।
सच कहा आपने.. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि एक दिन मेरा ही लड़का किसी चिकणे को सामने खड़ा करके आशीर्वाद का तलबगार हो !
आखिरी पंक्ति क्या कोई और लिख सकता था ?

डॉक्टर साहब , गैस सर में चढ़ जाती है --

( चिकित्सीय भ्रांतियों पर लेख )

सर जी,
पिछले 25 वर्षों से अपनी प्रैक्टिस में मैंने इन भ्रान्तियों को इन मूढ़ों के दिमाग से झाड़-पोंछने का बीड़ा उठा रखा है.... इसके लिये मुझे उनसे जिरह करनी पड़ती है.... और वह टूट जाते हैं । फिर भी कुछ मुझे झक्की समझ कर वाक-आउट कर जाते थे और जो कन्विन्स हो गये.. वह आज तक मुरीद हैं । सवाल यह है कि.. ग्रामीण परिवेश और अर्धशिक्षित / अशिक्षित जनता के मनोमष्तिष्क में यह बातें कैसे इतने गहरे पैठीं.. जिसे क्वैक अपनी मर्ज़ीनुसार पोस रहे हैं ?
एक चिकित्सक की व्यथा को सही उजागर किया है .

@ जानकारीपरक लेख,
लगे हाथ स्व-चिकित्सा ( Self Medication ) और दर्द-निवारक गोलियों के दुष्प्रभावों के प्रति आगाह कर देते, तो लेख अपने पूरे रूप में आ जाता !

बाई दॅ वे.. मुझे तो बुढ़ापे की परिभाषा में इतना ही पता था कि जब व्यक्ति का दिमाग घुटनों में उतर आये.. तो समझो गया काम से ...

सतीश जी..
आशा करते रहने से अच्छा तो यह कि कम से कम घर बैठे मानसिक मॉर्निंग वाक कर ही लिया करें... वैसे असली मार्निंग वाक में भी एक से एक ( वास्तविक ) आशायें मिलती हैं :) घर से तो निकलिये !

सतीश जी को यह सलाह अवश्य पसंद आई होगी .

मुफ्त दो घूँट पिला दे तेरे सदके वाली---

( ऊटी हवाई यात्रा पर एक हास्य -व्यंग लेख )

इस तरियों पब्लक को ललचा रैये हो, डाकटर !
वो क्या कहवें हैं, होसटेस.. इनकी वैराइटी केह तरिंयो चेक की तैने.. जरा मन्नें बी बता दे.. तेरे को गुरु मानूँगा !

आपने याद दिलाया तो याद आया कि ... ऊटी पहले हो आया !
यह भी याद आया कि एक बार दुबारा भी जाना है ।
वैसे कोडाईकैनाल मुझे अधिक हनीमूनिंग एहसास देता है ।
शान्त तो खैर है ही । एक बार मेरी गारँटी पर हो आइये ।

अलग अलग भाषाओँ में मजाक करना उनकी एक खूबसूरत विशेषता थी .
अहाहा हा.... बाज़ार गरम है..
फिर छिड़ी यार…बात ऽ ऽ मूँछों की ..ऽ …ऽ
भाई डॉ.दराल साहब मूँछों का ही तो ज़माल है.. इसे मँदी में कहाँ लपेट लिया ।
अपने यहाँ मूँछों के दम पर ही तो अपने देश में मँदी उतना नहीं फैल पायी । नेताओं को क्या फ़र्क पड़ता है.. उनकी मूँछ ज़रूरत के हिसाब पार्टी बदला करती है ।

इस विषय पर उन्होंने भी लिखा था .


एक पौराणिक आख्यान भले ही कोरी गप्प हो, पर वार्तालाप का सार कुत्ते की महत्ता को सादर स्वीकार करता है ।
यदि किसी को स्मरण हो तो धर्मराज युधिष्ठिर के साथ एक श्वान को ही सशरीर स्वर्ग जाने की आज्ञा मिली ।
धरमिन्दर पाजी को बाइज़्ज़त बरी किया जाता है, उनके द्वारा खून पिये जाने के साक्ष्य उपल्ब्ध नहीं हैं ।
वैसे भी उन्होंने इन्सान का खून पीने की बजाय कुत्तों का शुद्ध पवित्र रक्त पीना चाहा, क्या हर्ज़ है ?
कारण चाहे जो भी हो, मैं स्वयँ मनुष्यों से अधिक कुत्तों के बीच अधिक सहज रह पाता हूँ ।
कुत्तों के प्रति समर्पित इस आलेख के लिये डॉ. दराल धन्यवाद के पात्र हैं ।
मैं तो उनके सात्विक सहिष्णु गुणों के कारण गधों का भी अनन्य भक्त हूँ

ज़ाहिर है उन्हें कुत्तों से बहुत प्यार था . सही रूप में एनीमल लवर थे .

बातों बातों में सटीक सँदेश !
मैं स्वयँ ही बाबा और रजनी के परवान चढ़ते प्यार के साइड एफ़ेक्ट में आकर आधा जबड़ा कुर्बान कर आया । :-(
एक पहलू और भी... आपकी पोस्ट के बहकावे में आकर लोगों ने कहीं तम्बाकू से तौबा कर ली.. तो घटते राजस्व का क्या होगा... नशा-उन्मूलन के विज्ञापनों पर होने वाले व्यय में घपले कैसे होंगे... इतने बड़े एक्साइज़ अमले का क्या होगा.. जिन्हें अतिकतम वसूली का टारगेट दिया जाता है । क्या इन सब हानियों से राजकोष में लगने वले सेंध की पूर्ति सदाचार माफ़िया करेगा ? :-)

अपनी गलती को स्वीकार करने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए . हालाँकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी .

पहले मुर्गी पैदा हुई या अंडा ?

( बढती आबादी पर एक हास्य व्यंग कविता )

ज़वाब नहीं आपका,
बातों में फँसा कर परिवार नियोजन का सँदेश पकड़ा दिया !
यहाँ ब्लॉगर पर 65% बुढ़वों का आना जाना है, जो अपने बच्चों से नाती पोते की उम्मीद पाले बैठे हैं ।

यहाँ उनके विनोदी स्वाभाव की साफ झलक मिलती है .


आईला.... फालतू पोस्ट पर 30 टिप्पणी !
मैं कहता न था कि शराफ़त का ज़माना न रहा ।
ज़माना भौकालियों का है, जो बोले सो निढाल... जय श्री भौकाल !

टिप्पणियों में उनकी बेबाकी हमेशा झलकती थी . बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात कह जाते थे .

अरे डॉक्टर साहेब.. किसने आपको उल्टी अँग्रेज़ी पढ़ा दी,
मैन इज़ ए सोशल एनिमल ! असलियत में... मैन इज़ असोशल एनिमल ।
Man is asocial animal ( :not social: as a: rejecting or lacking the capacity for social interaction सौजन्य: मेरियम ऑक्सफ़ोर्ड कॉलेज़ियेट डिक्शनरी 11वाँ सँस्करण )

ज़ाहिर है , उनके पास ज्ञान का विशाल भण्डार था .


दोहरी मानसिकता पर आपकी बात सही है,
यह सँस्कारों का सँक्रमण काल है ऎसे Transit Phase में सब कुछ गड्ड-मड्ड होना स्वाभाविक है, क्योंकि हम स्वयँ ही सही तरीके से अपने सँस्कार नहीं सँजो पा रहे हैं । चाहते हैं कि बच्चा ( लड़का या लड़की ) आधुनिक बने, अँकल को गुड मॉर्निंग बोले, व ताऊ के पैर छुये । बर्थ-डे पर केक कटवायेंगे, ब्याह में परँपरागत चोंगा व नकली मुकुट पहने... बाहर अँग्रेज़ी बोले ( आँटी को ऎपॅल दे दो ) और घर में कुकीज़ को गुलगुला बोले । स्वयँ तो सँयोगिता या रुक्मिणी हरण की कथायें सुना कर झूमें.. और ऎसे सम्बन्धों को मान्यता भी न दें । बड़ा लोचा है भाई दराल, किससे शिकायत करें । यह परिवर्तन लाज़िमी है.. इसलिये हमें अपने आप को आने वाली पीढ़ी के हाथों समर्पित कर देना चाहिये... शाँति इसी में है । भाभी वाला किस्सा आपकी हाज़िरज़वाबी का नमूना है.. मैं मुरीद हुआ !

इस लेख पर अपनी सहमती जताकर डॉ साहब ने हमें भी पास कर दिया .

फुलगेंदवा न मारो...
लागत करेज़वा में चोट

डाक्टर साहेब जनाब, अपना तो हाल यह है कि,
किबला इस मतले पर गौर फ़रमायें...
पायी हुई दुनिया तो सँभाली नहीं जाती
खोयी हुई दुनिया के निशाँ ढूँढ़ रहे हैं

हम ज़रा रोमांटिक हुए तो डॉ अमर ने भी फुलझड़ी छोड़ दी .

जाटों की सरलता निष्कपटता और यारबाजी का मैं कायल हूँ ताऊ लोगों के बहुत से असली किस्से हैं, मेरे पास ( सहेज़ रखा है कि कभी पोस्ट लिखूँगा )... खैर आज तो एक चुटकुला साझा करना चाहूँगा !
एक बर एक कैदी नै फांसी की सजा मिली !
उसनै इक सिपाही लेकै फाँसी को जाण लागरया था ।
उस दिन मौसम बी घणा ख़राब होरया था.. गरमी भाई गरमी ।
रास्ते मै कैदी सिपाही तै बोल्या ; देख भाई भगवान की करणी , .... मनै आज के दिन बी कितणी तकलीफ दे रया से
सुरजा बोल्या ; अ मेरे यार तू तो जमा ऐ माडा मन कर रया से ,( बेकार में मन खराब कर रहा है )
.. मनै देख इसे ऐ खराब मौसम मै मनै उल्टा बी आणा से ( मुझे देख मुझे इसी गरमी में वापस भी आना है )

हास्य में भी उनकी हाज़िर ज़वाबी कमाल की थी .

चल एक चटाई और लगा भाई के लिए ---

( हमारी वैवाहिक वर्षगांठ पर लिख एक हास्य लेख )

आईईऽऽऽऽ७ सच्ची !
आज डॉक्टर साहेबाइन ने डाक्टेर साहब का बैंड बजवा दिया था ?
बधाईयाँ.. लेयो जी । थोड़ा मिट्ठा सिट्ठा बी हो जाता तो...
निर्मला जी ये न सुनना पड़ता कि डाक्टर वैसे बडे कंजूस होते हैं।

अवसर की गरिमा को बनाये हुए भी हास्य का ज़वाब हास्य से देकर उन्होंने अपनी हास्य प्रतिभा का परिचय दिया .


दिल वालों की हुआ करती थी,दिल्ली
दिलजलों को जलाया करती थी दिल्ली
अब नेताओं का सपना है, चलो दिल्ली

वाकई दिल्ली अब बहुत बेगाना लगता है !



डॉ अमर कुमार के यूँ अकस्मात चले जाने से ब्लॉगजगत सूना सूना सा हो गया हैउनकी बेबाक टिप्पणियां , जिनमे सच का बोल बाला होता था , कटाक्ष भी होता था , लेकिन बात दिल तक असर करती थीहर विषय पर उनका ज्ञान , गहरी सोच , भाषा की विविधता , हास्य का पुट , और जहाँ मौका मिला वहां आइना दिखाती उनकी दिलचस्प टिप्पणियां ब्लोगर्स को विस्मित कर देती थी

हिंदी ब्लोगिंग अब पहले जैसी नहीं रह पायेगीक्या कोई उन जैसे विद्वान की कमी पूरी कर सकता है ?
डॉ अमर को शत शत नमन

नोट : पोस्ट लम्बी ज़रूर हैलेकिन मेरी लिए यह एक संग्रहणीय धरोहर है



Wednesday, August 24, 2011

अत्यंत दुखद समाचार --डॉ अमर कुमार नहीं रहे .

अत्यंत दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि ब्लॉगजगत के वरिष्ठ और सबके प्रिय ब्लोगर डॉ अमर कुमार जी का कल शाम को निधन हो गया है । एक लम्बी बीमारी से बहादुरी से लड़ने के बाद अचानक उनकी तबियत बिगड़ी और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया न जा सका ।

अंतिम संस्कार आज सुबह ९ बजे राय बरेली में किया जायेगा ।

इस दुःख की घडी में सारा ब्लॉग जगत शोक संतप्त परिवार के साथ है ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वे दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में जगह दें और परिवार को इस क्षति को सहन करने की ताकत दे ।

Monday, August 22, 2011

क्या आपको अन्ना कहलाने का हक़ है ? जन्माष्टमी विशेष --

आज सारे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना लहर चल रही है
जहाँ भी देखो --अन्ना ही अन्ना । मैं भी अन्ना --तू भी अन्ना । अन्ना टोपी -अन्ना टी शर्ट --यहाँ तक कि अन्ना टैटू भी --जैसे एक फैशन सा बन गया है ।

कौन है यह अन्ना ? यह अन्ना क्या है ?

अन्ना कोई व्यक्ति नहीं , यह एक सोच है --विचार है , एक प्रणाली है , व्यवहार है

बेशक भ्रष्टाचार के विरुद्ध वर्षों से दबी भावनाएं बाहर आ रही हैं । आम आदमी जो स्वयं को निसहाय महसूस करता है , आज सड़कों पर निकल आया है अपना रोष प्रकट करने ।

लोगों के विशाल जुलूस में चेहरे नज़र आते हैं --छात्रों के , युवाओं के , गृहणियों के , महंगाई से त्रस्त आम कामकाजी लोगों के , छोटे मोटे व्यवसायिक लोगों के

समर्थन में आगे आ रहे हैं --स्कूली बच्चे , मुंबई के डिब्बावाले , किन्नर -सभी वर्ग के लोग ।

उनके चेहरे पर वर्षों की यातना नज़र आती है , शोषण नज़र आता है और कूट कूट कर भरा हुआ रोष नज़र आता है

रोष प्रणाली की असंवेदनशीलता पर , अपने असहाय होने का , वर्षों तक शोषित होने का
अन्ना के रूप में सबको एक मसीहा नज़र आता है । इसीलिए आज हज़ारों की तादाद में लोग सड़कों पर निकल पड़े हैं, घर का आराम छोड़कर ।

लेकिन साथ ही कुछ सवाल भी उठते हैं । हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार है कहाँ
देश में ? समाज में ? या स्वयं अपने अन्दर ?

क्या एक टोपी पहनने से आप अन्ना बन सकते हैं ?

क्या आपको अन्ना कहलाने का हक़ है यदि :

* कोई काम बिना रिश्वत लिए नहीं करते ?
* सरकारी नौकर हैं लेकिन हर काम में कमीशन चाहते हैं ?
* डॉक्टर हैं लेकिन बिल बढ़ाने के लिए गैर ज़रूरी टेस्ट करवाते हैं ?
* वकील या ज़ज़ हैं और झूठ को सच कर देते हैं ?
* अध्यापक हैं लेकिन विधालय में कम और घर पर ट्यूशन ज्यादा पढ़ाते हैं ?
* व्यापारी हैं पर हर चीज़ में मिलावट करते हैं ?
* ठेकेदार हैं लेकिन घटिया माल लगाकर सबकी जान खतरे में डालते हैं ?
* पुजारी हैं लेकिन बुरी नज़र डालते हैं ?
* समाज सेवक हैं लेकिन दान की राशि से सबसे पहले अपना घर भरते हैं ?
* भक्त हैं , मंदिर में पूजा करते हैं , फिर कुकर्म करते हैं ?

क्या सिर्फ हमारे नेता या आला अफसर ही भ्रष्ट हैं ?
यहाँ आत्म निरीक्षण की ज़रुरत है

जन्माष्टमी विशेष :

आज श्री कृष्ण जी का जन्मदिन है
श्री कृष्ण--- जिनका जीवन ही संसार के लिए एक वरदान रहा ।
जिन्होंने माखन चोर के रूप में वात्सल्य , गोपियों और राधा संग रास लीला कर प्रेम बरसा कर , मित्र के रूप में सुदामा से दोस्ती निभाकर , और अर्जुन के सारथी के रूप में विश्व को गीता का ज्ञान देकर मृत्युलोक वासियों का मार्गदर्शन किया है ।

आइये उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए निस्वार्थ भावना से अपना कर्म करते हुए आज हम सही रूप में अन्ना बनने का प्रयास करें

ईशांक दराल

आज जहाँ सारा देश कान्हा का जन्मदिन मना रहा हैवहीँ परिवार में सबसे बड़े पुत्र और एक समय आस पड़ोस में दसियों लड़कियों में अकेले लड़के होने के नाते सभी आंटियों और दीदियों द्वारा प्यार से कान्हा कहलाये जाने वाले हमारे सुपुत्र का भी आज जन्मदिन है

ईशांक जो इंजीनियरिंग का फ़ाइनल वर्ष का छात्र है , आज २१ वर्ष का हो गया है


Tuesday, August 16, 2011

टॉप ऑफ़ दा वर्ल्ड --लेह लद्दाख

क्या कभी आपका टॉप ऑफ़ दा वर्ल्ड जाने का मन किया है ? एवेरेस्ट पर पहुंचना तो सबके बस की बात नहीं । लेकिन एक और जगह है जहाँ जाकर आपको यही फीलिंग आएगी । जी हाँ --लेह-लद्दाख

इस वर्ष बड़ा मन था वहां जाने का । लेकिन एयर इण्डिया की हड़ताल ने सब गड़बड़ कर दिया । खैर हम तो न जा सके लेकिन हमारा छोटा सा कैमरा ज़रूर लेह की सैर कर आया ।

आइये हमारे साथ आप भी घर बैठे लेह लद्दाख की सैर करिए ।

लेह वैली :










इंडस रिवर और जंस्कार रिवर :






पैन्गोंग लेक --ऊँचाई १४००० फीट समुद्र तल से ऊपर

इसका ठंडा पानी इतना साफ है कि गहराई का पता ही नहीं चलता । तल में पड़े पत्थर बहुत साफ दिखते हैं ।





लेह और आस पास के क्षेत्रों में बहुत सी मोनास्ट्रिज हैं ।




विश्व की सबसे ऊंची मोट्रेबल रोड --खड़दोंगला पास ( १८००० + फीट ) से होकर नुब्रा वैली ( १०००० फीट) तक पहुंचा जा सकता है ।

विश्व का सबसे ऊंचा केफे



बेशक यह अपने आप में एक अनूठा अनुभव होगा ।
लेकिन यहाँ जाने से पहले कुछ प्लानिंग बहुत आवश्यक है ।

सावधानियां :

लेह की ऊँचाई १४०००-१५००० फीट होने के कारण यहाँ हवा का दबाव काफी कम होता है । इसलिए यहाँ ऑक्सिजन की कमी की वज़ह से आपको आरम्भ में काफी परेशानी हो सकती है ।
इसलिए यहाँ ऐकलेमेटाईजेशन करना बहुत ज़रूरी है ।

यदि आप सीधे विमान द्वारा लेह पहुँचते हैं तो आपको पहले दिन निम्न शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है :

* High Altitude sickness :

८००० फीट की ऊँचाई के बाद बहुत से लोगों की तबियत बिगड़ जाती है ।
सर दर्द , भूख न लगना , नींद न आना , मिचली , उलटी और थकावट --ये इसके लक्षण हैं ।
यह लक्षण आम तौर पर १-२ दिन में ठीक हो जाते हैं । इसलिए पहले दिन पूर्ण आराम करना चाहिए ।

* Acute Cerebral Edema :

इसमें मष्तिष्क में सूजन आने से सर में तेज दर्द जो दवा से ठीक नहीं होता , चक्कर आना , और बेहोशी हो सकती है ।

* Acute Pulmonary Edema :

इसमें फेफड़ों में पानी आने से खांसी , साँस फूलना , छाती में दर्द और बुखार हो सकता है ।

ये सब बीमारियाँ ऑक्सिजन की कमी से होती हैं ।
ऐसे में पानी पीते रहना चाहिए और आराम करना चाहिए ।
कोई भी थकावट का काम न करें । धीरे धीरे अपने आप ठीक हो जायेगा ।
कभी कभी ऑक्सिजन लेने की ज़रुरत भी पड़ सकती है । इसलिए अधिकतर होटल वाले ही होटल में ऑक्सिजन के सिलिंडर रखते हैं ।

लेकिन रोग ज्यादा बढ़ने पर एक ही इलाज बचता है --फ़ौरन कम ऊँचाई के स्थान के लिए प्रस्थान । ऐसे में वहां मौजूद थल सेना ही काम आती है ।

लेह जाने से पहले यदि एसिटाजोलामाइड गोली १२५ मिलीग्राम एक बार दो दिन पहले से लेना शरु कर दें , तो इन रोगों से बचा जा सकता है । लेकिन यह एक डाईयुरेटिक दवा है जिसे पेशाब ज्यादा आएगा । इसलिए पानी पीते रहना ज़रूरी है । इसे बिना डॉक्टर की सलाह के न लें ।

लेह जाने के लिए बेहतर विकल्प :

सड़क मार्ग -- सड़क मार्ग से मनाली या श्रीनगर से जाया जा सकता है । इसमें दो दिन लगते हैं और रस्ते में एक जगह रुकना पड़ता है । लेकिन धीरे धीरे ऊँचाई बढ़ने से तबियत ख़राब होने की नौबत नहीं आती ।

लेह जाने के लिए सबसे बढ़िया समय है --सितम्बर माह । लेकिन प्रति व्यक्ति खर्च आता है सब मिलाकर लगभग २०००० रूपये । यहाँ आप पॅकेज लेकर ही जा सकते हैं । जून के महीने में यही आपको मिलेगा २५०००-३०००० रूपये में ।

सौदा महंगा है , लेकिन निसंदेह एक बार हिम्मत करने लायक है ।
शुभकामनायें ।

नोट : यदि रंगों की कमी खले तो यहाँ देखना न भूलें ।





Thursday, August 11, 2011

उम्र पचपन की , दिल बचपन का --

बचपन गाँव में गुजरा . फिर शहर में रहने लगे तो छुटियाँ गाँव में ही बीतती . उन दिनों में भी गाँव में अपना फार्म हाउस था --जी हाँ दादाजी ने गाँव से बाहर दो बीघा खेत में मकान बनाया था . गाँव के पनघट में जब पानी सूख गया तो आधे गाँव द्वारा हमारे फार्म हाउस में लगे हैण्ड पम्प का पानी ही पीने के लिए प्रयोग किया जाने लगा .


गर्मियों की छुट्टियों में पानी लेने आई रंग बिरंगी पोशाक धारण किये पनिहारियों को निहारना निर्मल आनंद की अनुभूति प्रदान करता था .

गाँव की औरतें वैसे जैसे भी रहें , लेकिन पानी भरने जाते समय अपनी सबसे बढ़िया ड्रेस पहन कर आती थी .नई नवेली दुल्हन के तो क्या कहने . घूंघट समेत वस्त्रों से भले ही सारा शरीर ढका हो , लेकिन सिर्फ हाथों को ही देखकर अंदाज़ा हो जाता था कि फलाने की बहु कितनी सुन्दर है .

अब यह हमारी मजबूरी थी कि हमारे घर में हमारे लिए तो बस चाचियाँ , ताइयां और दादियाँ ही थी --बहु कोई नहीं थी .होती भी कैसे --सारे भाई बहनों में सबसे बड़े , खानदान के सबसे बड़े चिराग हमी तो थे .

उसपर ऐसे शर्मीले कि हमारे शर्मीलेपन पर शर्म भी शर्मशार हो जाए .

फिर एक दिन अचानक बड़े हो गए . शहर में रहने लगे . गाँव पूर्ण रूप से छूट गया . शर्माना भी थोडा कम हुआ . जाने कैसे मंच से दोस्ती हो गई . डॉक्टर होने के साथ साथ कब लाफ्टर चैम्पियन , हास्य कवि , और मंच संचालक बन गए , पता ही नहीं चला ।

लेकिन आज भी जब कभी गाँव की किसी चाची या ताई से मुलाकात होती है और वो प्यार से सर पर हाथ रख कर पुचकारती है , तो उसी तरह शर्माकर बच्चा सा महसूस करता हूँ ।

आज उम्र भले ही पचपन की हो गई हो , लेकिन दिल में कहीं कहीं एक बच्चा अभी भी जिन्दा है

शायद यही जिन्दादिली का अहसास कराता रहता है

Monday, August 8, 2011

यदि (घर की) बॉस सताए , तो किसे बताएं --

पिछली पोस्ट में हमने कहा --यदि बॉस सताए तो हमें बताएं।
बहुत से ब्लोगर बंधुओं ने पूछा कि पुरुषों के लिए सुरक्षा
के क्या उपाय हैं। सवाल भी जायज़ है क्योंकि शोषण तो पुरुषों का भी हो सकता है , बल्कि यूँ कहिये होता है । अब देखा जाए तो पुरुषों का उत्पीड़न तो घर से ही शुरू हो जाता है । शायद ही कोई पुरुष हो जो पत्नी का सताया हुआ न हो ।

ऐसी ही एक दास्तान सुनाते हैं , एक हास्य कविता के माध्यम से ।
अब इसमें कहीं आपको अपना ही स्वरुप नज़र आये तो हैरान मत होइए :

पांच सौ का नोट
Link
एक बात मुझे हरदम सताती है
मेरी पत्नी मुझसे ज्यादा कमाती है,
लेकिन जब भी अवसर पाती है
मेरी जेब साफ़ कर जाती है।

बीबियों की ये पुरानी आदत है
ऐसा बड़े बूढ़े बताते हैं ,
और मेरी तरह लाखों नौज़वान
रोज पत्नी के हाथों लुट जाते हैं ।

पर मैं अपनी जेब में रखता हूँ
पांच सौ का एक नोट और थोड़े छुट्टे ,
और कोशिश करता हूँ कि
सप्ताहांत तक भी ये नोट , न टूटे ।

लेकिन जब भी कोई दूध वाला
पेपर या केबल वाला , घंटी बजाता है ,
मेरा वो पांच सौ का नोट ,
बीबी की बदौलत , सौ में बदल जाता है ।

इस पर भी पत्नी मुझे समझती है
घर की मुर्गी दाल बराबर ,
और ऊपर से मुझे समझाती है
प्यार से ये बात बताकर ।

कि शाकाहारी भोजन में
दाल भी ज़रूरी है ,
क्योंकि प्रोटीन की मात्रा
तो इसी में पूरी है ।

यह सुनकर मैं अपना
सर खुजलाता हूँ ,
और दिल बहलाने के लिए
कविता लिखने बैठ जाता हूँ ।

एक दिन मैंने पत्नी से कहा
डाइटिंग वाइटिंग छोडो , थोडा वेट बढाओ ,
वो बोली खुद की सोचो
कद्दू जैसे दिखते हो, अपना पेट घटाओ ।

मैंने कहा, सरकारी नौकर का पेट कहाँ
पेट तो नेताओं का होता है ,
धरा पर नेता ही एकमात्र प्राणी है
जो भर पेट खाता है , फिर भी भूखा होता है ।

पत्नी बोली, क्यों बोर करते हो
सोने दो , मुझे नींद आ रही है ,
मैंने कहा , प्रिय सो जाओ
मुझे भी कविता याद आ रही है ।

वो चौंकी तो मैंने कहा
मैंने कविता लिखी है , ज़रा सुन लो ,
चाहो तो बदले में
तुम भी थोड़े बहुत पैसे धुन लो ।

वो झट से बोली ,
पांच सौ दोगे तो सुन लेंगे,
मैंने कहा रहने दो
हम कोई सस्ता कस्टमर ढूढ़ लेंगे ।

और देखिये आज
फ्री में आपको सुना रहा हूँ ,
और साथ ही
पूरे पांच सौ बचा रहा हूँ ।

वैसे अब मैं भी पत्नी रूप को
कुछ कुछ समझने लगा हूँ ,
और जेब में पांच सौ के बजाय
सौ सौ के ही नोट रखने लगा हूँ ।

एक जगह लिखा था
यदि पत्नी सताए तो हमें बताएं ,
हमने सोचा
चलो इन्हें भी आजमायें ।

जाकर देखा तो पत्नी पीड़ितों की
लम्बी कतार लगी थी ,
मैं ये सोचकर वापस आ गया
उस शायर ने सही बात कही थी

दुनिया में कितना ग़म है ,
और मेरा ग़म कितना कम है ।

इसीलिए कहता हूँ
हर हाल में मुस्कराते चले जाओ ,
और ग़म हर फ़िक्र को
धुएं में नहीं , हंसी में उड़ाते जाओ ।

नोट : यहाँ यह बात साफ़ करनी ज़रूरी है कि पांच सौ का नोट रखना पड़ता है गाड़ी में तेल डलवाने के लिए और छुट्टे चाय के लिएलेकिन चाय पीने के लिए नहीं बल्कि चाय पानी के लिए
यह अलग बात है कि आज तक कभी खर्च करने की ज़रुरत नहीं पड़ी ।