Thursday, August 26, 2010

ठूठी वाला डॉक्टर --

वो सफ़ेद कुर्ता पहने ,
और धोती बांधे
पैरों में सेंडल ,
कांधे पर झोला टांगे
रोज ठंडे पानी से नहाकर
आता दस कोस साईकल चलाकर ।

खांसी नज़ला , दर्द बुखार ,
उलटी दस्त की दवा लेकर ,
टेटनस का टीका देकर
चोट पर बीटाडीन की पट्टी बाँध
दर्द से आराम दिलाता था ।
कहीं जन्म हो या मृत्यु ,
या शादी का जश्न
पहुँचता सबसे पहले
परिवारों के आपसी झगडे
बिना फीस निपटाता था ।

सब बुलाते उसे डागदर बाबु बुलाकर
पर एक दिन आकर
एंटी क्वेकरी स्क्वाड ने
उसे गिरफ्तार करा दिया ।
झोला छाप डॉक्टर का
उसे खिताब दिला दिया ।

अब गाँव के मरीज़ दस कोस दूर
शहर जाते हैं,
इलाज़ कराते हैं
ठूठी वाले डॉक्टर के नर्सिंग होम में,
जिसके रोम रोम में
बसा है पैसा,
कहते हैं उसके जैसा
नहीं कोई लुटेरा,
नकली दवा का डेरा
मृत शरीर को वेंटिलेटर लगाकर
आई सी यू में लिटाता है ,
यह ठूठी वाला डॉक्टर कहलाता है ।

डिग्री है पर नहीं लाइसेंस
अल्ट्रा साउंड मशीन का
पर इस मिस्टर हसीन का
हाथ नहीं कांपता,
जब वह जांचता
अजन्मे बच्चे का लिंग,
यह दुराचार का किंग
थैली लेकर हर सप्ताह
मंत्री के घर , भेंट चढ़ाता है
यह शहर में पढ़ा लिखा
ठूठी वाला डॉक्टर कहलाता है ।

यहाँ कोई डॉक्टर , इंजीनियर
बाबू या मिनिस्टर
नहीं टांगता थैला।
मन का मैला
यह सफेदपोश
रखता है बड़ा बक्सा,
उसको बोध नहीं इसका
कि जब दुनिया से खिसका
तो न चपरासी न मजदूर,
न कुली ही मिल पायेगा
फिर इतना भारी बक्सा
अरे मूर्ख क्या तू खुद उठा पायेगा ।

झोला छाप कौन है , वो ईमान की डिग्री वाला झोला धारी
या ठूठी वाला , बड़े बक्से का मालिक ,ये शहरी खद्दरधारी ?

Friday, August 20, 2010

फिल्म मुग़ल-ए-आज़म की स्वर्ण जयंती पर एक विशेष लेख --

पिछले दिनों टी वी पर आज तक की सबसे सफल फिल्म--- शोले के ३५ साल पूरे होने पर विशेष कार्यक्रम दिखाए जा रहे थे । अचानक ध्यान आया कि अभी अभी एक और प्रसिद्ध और शोले से पहले तक नंबर एक रही फिल्म की गोल्डन जुबली पूरी हुई है , यानि पूरे पचास साल ।

जी है मैं बात कर रहा हूँ फिल्म मुग़ल-ए-आज़म की जो अगस्त १९६० को रिलीज हुई थी ।

के अब्बास द्वारा निर्देशित यह फिल्म १.५ करोड़ में बन कर तैयार हुई थी और शोले से पहले तक हिंदी फिल्म जगत की सबसे बहुचर्चित और कामयाब फिल्म मानी जाती रही है ।

इस फिल्म की विशेषता थी --
पृथ्वीराज कपूर और मधुबाला की अदाकारी
मधुबाला और दिलीप कुमार की प्रेम जोड़ी
के आसिफ का शानदार निर्देशन
फिल्म के लिए बनाया गया शीशमहल का सैट
युद्ध का बड़े पैमाने पर चित्रण , हाथी घोड़े , कॉस्टयूम , आभूषण और हथियार आदि ।

लेकिन शायद सबसे ज्यादा मुख्य आकर्षण रहा मधुबाला का डांस --जब प्यार किया तो डरना क्या --गाने पर ।

इसके अलावा इस फिल्म के कुछ मधुर गाने हैं :

* बेकस पे करम कीजिये , सरकारे मदीना --
* जब रात है ऐसी मतवाली , फिर सुबह का आलम क्या होगा --
* मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे --
* मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये --
* तेरी महफ़िल में किस्मत आजमाकर हम भी देखेंगे --
* जिंदाबाद , जिंदाबाद , ऐ मुहब्बत जिंदाबाद --

मधुबाला :

हिंदी फिल्मों की सबसे खूबसूरत अभिनेत्री । उनके बाद अगर कोई उनके जैसी थोड़ी सी भी दिखी तो वो माधुरी दीक्षित थी ।

इस रूप को देखकर तो यही गाना याद आता है :

नव कल्पना , नव रूप से , रचना रची जब नार की
सत्यम शिवम् सुन्दरम से , शोभा बढ़ी संसार की ।


बेशक उपरवाले ने उन्हें बड़ी फुर्सत में बनाया होगा

जीवन परिचय :



मधुबाला का जन्म १४ फ़रवरी १९३३ को दिल्ली में ए पश्तून मुस्लिम परिवार में हुआ । उनका बचपन का नाम था --मुमताज़ ज़हां बेग़म दहलवी जो अपने मात पिता की पांचवीं संतान थी ।
महज़ ९ साल की उम्र में १९४२ में उन्हें फिल्म बसंत में काम करने का अवसर मिला ।

उन्होंने कुल मिलकर ७० फिल्मों में काम किया
उनके एक टॉम बॉय के रूप में ज्यादा सराहा गया

उनके कुछ गाने तो आज भी दिल को छू जाते हैं :
* फिल्म महल --१९४९ --आएगा , आएगा , आएगा आने वाला --इस गाने से लता जी का नाम हिंदी फिल्म जगत में चमका था
* फिल्म हावड़ा ब्रिज --आइये मेहरबान ---बहुत ही शोख अदाकारी थी
* फिल्म चलती का नाम गाड़ी --इक लड़की भीगी भागी सी ---किशोर कुमार के साथ जोड़ी बड़ी अच्छी लगी थी
* लेकिन सबसे ज्यादा कमाल का रहा --जब प्यार किया तो डरना क्या


इस चेहरे को देखियेबड़ा सा चेहरा , उसपर नाक और मस्तक एकदम चेहरे के अनुपात में , मोटी मोटी हिरनी जैसी आँखें , फुल लिप्स --लम्बे घने काले घुंघराले बाल --कहीं भी तो कोई कमी नहीं

लेकिन शायद उपरवाले को भी इस चाँद में दाग लगाने से रहा नहीं गयाउनके दिल में एक ऐसा छेद छोड़ दिया , जो अंत में उनके लिए जानलेवा साबित हुआ

मुग़ले आज़म १९५० में बननी शुरू हुई थी और १९६० में रिलीज हुई । जिस वक्त यह फिल्म बन रही थी , उस वक्त मधुबाला की हालत काफी बिगड़ चुकी थी ।

मधुबाला ने अपने फ़िल्मी जीवन में कई अभिनेताओं के साथ काम किया । दिलीप कुमार के साथ उनका रोमांस कई साल तक चला ।लेकिन उनके पिता ने लालच में आकर दोनों की शादी नहीं होने दी

आखिर उन्होंने १९६० में पहले से शादी शुदा किशोर कुमार से शादी कर ली

लेकिन सबकी चहेती इस अदाकारा को पति का प्यार मिल पाया , बच्चों काक्योंकि फिल्म पूरी होते होते उनकी हालत काफी बिगड़ चुकी थी
इलाज के लिए इंग्लैण्ड गई , पर डॉक्टरों ने ऑप्रेशन करने से मना कर दियाक्योंकि इसमें उनकी जान जाने की पूरी सम्भावना थी

आखिर २३ फ़रवरी १९६९ को , गुमनामी के अँधेरे में , बिल्कुल अकेले , उन्होंने यह निष्ठुर संसार छोड़ दिया

मधुबाला महज़ ३६ साल की उम्र में हमें विदा कर गईइसलिए उनके सभी फोटो ज़वानी की चरम सीमा पर लिए गए ही उपलब्ध हैं
कम से कम काल की मार उनके चेहरे पर तो कभी नहीं दिखाई देगी

Monday, August 16, 2010

आंत्रशोध पर शोध का परिणाम ---ओ आर एस --दस्तों की रामबाण दवा --

सावन का महीना , यानि बरसात के दिनचारों ओर पानी ही पानीफिर भी पीने के पानी की किल्लतक्योंकि पीने के लिए तो साफ पानी चाहिए

विश्व में बीमारियों का सबसे बड़ा कारण है --सुरक्षित पीने के पानी की कमी , साफ़ सफाई की कमी और गंदगी का साम्राज्य
इन सबसे मुख्य तौर पर होने वाली बीमारी है --दस्त , आंत्रशोध या डायरिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व भर में प्रति वर्ष १८ लाख लोग इस रोग के शिकार होकर अकाल ही काल के ग्रास बन जाते हैं । इस रोग का ८८ % कारण है --साफ़ पानी की कमी ।

बच्चों में आंत्रशोध विशेष रूप से घातक साबित होता है

आइये देखते हैं , असुरक्षित पानी के पीने से क्या क्या रोग हो सकते हैं ।

खाने पीने में खराबी से मुख्य रूप से चार तरह के संक्रमण हो सकते हैं । इस तरह होने वाले संक्रमण के माध्यम को ओरोफीकल रूट कहते हैं । यानि रोगों के कीटाणु मल में विसर्जित होते हैं , फिर खाने पीने में साफ़ सफाई न होने से मूंह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं ।

ये चार संक्रमण हैं : परोटोजोअल , पैरासिटिक , बैक्टीरियल और वाइरल इन्फेक्शन

परोटोजोअल इन्फेक्शन : अमिबायासिस , जीआरडिअसिस ( Amoebiasis, giardiasis)
पैरासिटिक इन्फेक्शन : पेट में कीड़े --राउंडवोर्म , हुकवोर्म , पिनवोर्म , tapeworm, hydatid cyst।
बैक्टीरियल इन्फेक्शन : कॉलरा (हैजा ) , डायरिया (दस्त ) , डायजेन्ट्री ( खूनी दस्त ) ।
टॉयफोय्ड फीवर ( मियादी बुखार ) , फ़ूड पॉयजनिंग ( बोटुलिज्म )
वाइरल इन्फेक्शन : दस्त , Hepatitis A , पोलिओ

ओरोफीकल रूट से होने वाली बीमारियों में सबसे कॉमन है --दस्त यानि लूज मोशंस ।

दस्त के मुख्य कारण --

बैक्टीरियल : मुख्य रूप से गर्मियों में होते हैं ।
वाइरल : सर्दियों में ज्यादा होते हैं । बच्चों में भीं वाइरल दस्त ज्यादा होते हैं ।

वाटरी डायरिया यानि पानी वाले दस्त -- ई-कोलाई इन्फेक्शन , कॉलरा , वाइरल इन्फेक्शन , जिआर्डिया इन्फेक्शन ।
डाईजेन्ट्री यानि खूनी दस्त ----शिगेला , सालमोनेला इन्फेक्शन , अमीबिक इन्फेक्शन ।

दस्त होने पर सबसे ज्यादा खतरा होता है , dehydration से , यानि शरीर में पानी की कमी होना । इसके साथ साल्ट की भी कमी हो सकती है ।

दस्त का उपचार :

आम तौर पर दस्त के लिए किसी दवा की ज़रुरत नहीं होती ।
लेकिन सबसे ज़रूरी है --पानी की कमी को पूरा करना ।
इसके लिए ज़रूरी है पानी पिलाना ।

जीवन रक्षक घोल या आर एस :

यह दस्तों में रामबाण बनकर आया है । १९८० के बाद ओ आर एस की खोज और उपयोग से चिकित्सा जगत में जैसे एक क्रांति सी आ गई है । इसके सेवन से न सिर्फ दस्तों के इलाज़ में खर्च में भारी कमी आई है बल्कि इलाज़ आसान भी हो गया है ।

ओ आर एस के पैकेट कई नामों से उपलब्ध है जैसे --इलेक्ट्रौल , peditrol ---

इसे कैसे प्रयोग करें ?

एक पैकेट को एक लीटर पानी में घोल कर रख लें । आवश्यकतानुसार पिलाते रहें । एक बार बनाया गया घोल २४ घंटे तक रह सकता है ।

घर में भी आर एस बनाया जा सकता है :

एक लीटर पानी में एक चाय की चम्मच नमक , आठ चम्मच चीनी और एक निम्बू मिलाएं । घोल तैयार है ।
दूसरा तरीका है --एक लीटर पानी में एक चुटकी नमक , एक मुट्ठी चीनी और निम्बू मिलाकर भी घोल तैयार किया जा सकता है ।

छोटे बच्चों को कटोरी चम्मच से पिलाना चाहिए ।

एक दस्त के बाद आधे कप से एक कप तक घोल पिलाना चाहिए ।

dehydration के लक्षण : अत्याधिक पानी की कमी होने पर आँखें धंस जाती हैं । मूंह सूख जाता है । त्वचा का लचीलापन ख़त्म हो जाता है । पेशाब भी कम हो जाता है । बी पी कम हो जाता है ।
इस हालत में डॉक्टर को ज़रूर दिखा लेना चाहिए ।

दस्तों में क्या एंटीबायटिक देना चाहिए ?

सिर्फ खूनी दस्तों में ही इस दवा की ज़रुरत है । वाटरी डायरिया सिर्फ ओ आर एस से ही ठीक हो जाता है ।

दस्तों में क्या खाना चाहिए ?

दही , चावल , केला , खिचड़ी यहाँ तक कि सब तरह का खाना खाया जा सकता है । ज्यादा मिर्च और मीठा नहीं खाना चाहिए । सब के तरह के तरल पदार्थ जैसे लस्सी , मट्ठा , निम्बू पानी , नारियल पानी आदि लेते रहने से पानी की कमी नहीं होगी । लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स और ज्यादा मीठा शरबत नहीं लेना चाहिए ।

अब तो आप समझ ही गए होंगे कि स्वास्थ्य के लिए साफ सफाई और साफ खाना पानी की कितनी ज़रुरत है

नोट : यह संयोग की बात है या मेरा सौभाग्य कि आर एस पर शोध कार्य करने पर १९८३ में मुझे गोल्ड मेडल मिला था

Sunday, August 15, 2010

अभी तो देश को आजाद कराना है --

आज हम स्वतंत्रता की ६३ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं । बेशक इस आज़ादी के लिए हम सब बधाई के पात्र हैं । साथ ही कर्ज़दार हैं उन स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के , जिन्होंने हमारे आज के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया ।

अब अंग्रेजों की ग़ुलामी से तो
हम आज़ाद हो गए , लेकिन आज भी अनेक जंजीरें हैं जो हमें जकड़े हुए हैं
क्या हम इनसे आज़ाद हो पाए हैं ?

पिछले साल आज ही के दिन लिखी ये पंक्तियाँ क्या बदल पाई हैं ?

अभी देश को आजाद कराना है --


मंहगाई ,प्रदुषण और भृष्टाचार से ,
युवाओं के बदलते आचार व्यवहार से।

आतंकवाद और अलागवाद से,
सीमाओं के विवाद से।

जात पात के झगडों से,
धर्म के लफडों से।

बेहिसाब बढती आबादी से,
पर्यावरण की बर्बादी से।

अभी तो आज़ादी दिलानी है ---

गरीबों को कुपोषण से,
शरीफों को शोषण से

भूखों को भूख से,
घूसखोरों को घूस से

गंगा-यमुना को गंदगी से,
बाल मजदूरों को बंदगी से।


जब तक हम इनसे निज़ात नहीं पाएंगे , तब तक असली मायने में आज़ाद नहीं कहलायेंगे ।

Thursday, August 12, 2010

आखिर क्यों हो गई दिल से लिखी पोस्ट स्वाहा ---

हमारे दादाजी घुड़सवारी के बड़े शौक़ीन थे एक दिन उन्होंने एक शानदार घोड़ी खरीदी । देखने वालों में से किसी ने कहा --बड़ी किस्मत वाली घोड़ी है । देखना नौ महीने के अन्दर आपको पोता मिलेगा । वैसा ही हुआ --ठीक नौ महीने बाद मेरा जन्म हुआ । खानदान में अपनी पीढ़ी की सबसे बड़ी संतान

इस तरह पूरे खानदान के करीब १५ भाईयों के ३० बच्चों के हम जन्मजात ताऊ बन गए

११ अगस्त को हमारा जन्मदिन था । १० तारीख शाम को श्री पाबला जी का फोन आया --पहली बार फोन पर बात हुई । पहचानने का सवाल ही नहीं था । हम भी हैरान थे कि एक दिन पहले भला कौन हो सकता है बधाई देने वाला । और जब यही बात पाबला जी ने भी कही तो हम फ़ौरन ताड़ गए कि ऐसा व्यक्ति तो एक ही हो सकता है । और इस तरह हुई शुरुआत बधाई संदेशों की ।

हमने भी इस अवसर पर एक पोस्ट लिख डाली और सुबह के लिए सड्युल कर दी ।

अब देखिये इत्तेफाक पर इत्तेफाक

* १० अगस्त को ही मालूम पड़ा कि हमारीवाणी पर वायरस अटैक हुआ है ।
* उसी दिन हमने अपने हिंदी प्रेम को आगे बढ़ाते हुए फायर फोक्स का हिंदी वर्जन डाउन लोड कर लिया ।
* ११ अगस्त को ब्लोगिंग में पहचान बनने के बाद प्रथम जन्मदिन
* इसी दिन पोस्ट प्रकाशित । सोचा इस बार ब्लॉग दोस्तों के साथ ही मनाएंगे जन्मदिन ।

लेकिन फिर शुरू हुआ निराशाओं का दौर ।

पहली बार ऐसा हुआ कि पोस्ट पब्लिश होने के साढ़े तीन घंटे बाद पहली टिपण्णी आई -श्री रजनीश परिहार जी की। हालाँकि इस बीच श्री समीर लाल जी और ललित जी की इ-मेल आ चुकी थी ।

हमें लगा कि शायद हमारीवाणी का असर हमारे ब्लॉग पर भी पड़ गया है

इसी बीच इत्तेफ्क से अक्षिता पाखी की पोस्ट पर ध्यान गया और जाना कि कुछ प्रोब्लम है । लेकिन वहां श्री पाबला जी की जन्मदिन विशेष पोस्ट छपी थी --आज डॉ टी एस दराल का जन्मदिन है

लेकिन यह क्या , यहाँ तो टिप्पणियों की भरमार नज़र आ रही थी । सभी जाने माने ब्लोगर साथियों ने हमें अपनी बधाई और शुभकामनायें भेजी हुई थी । लेकिन इन दोस्तों में से सिर्फ खुशदीप सहगल और गोदियाल जी ने हमारी पोस्ट पढ़ी और बधाई दी । शाम को डॉ सिन्हा जी की भी टिप्पणी आई ।

अब यह तो और भी मिस्ट्री बन गई कि यह क्या हुआ कि एक तरफ तो ४२ बधाई सन्देश और दूसरी तरफ हमारे ब्लॉग पर मात्र पुराने दोस्तों ने बधाई सन्देश भेजे ।

खैर बधाइयाँ तो मिल ही चुकी थी ।

लेकिन मिस्ट्री के चक्कर में दिल से लिखी गई एक पोस्ट स्वाहा हो गई

फिर भी इत्तेफाक यही ख़त्म नहीं हुआ ।

शाम को जन्मदिन मनाने का कार्क्रम तो था , बच्चों और विशेष मेहमानों के साथ ।
लेकिन ४ से ६ बजे तक इतनी बारिस हुई कि चारो ओर पानी भर गया । टी वी पर देखकर घर से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं हुई ।

और इस तरह हम घर में ही रहकर चाय के साथ पकौड़े खाते रहे

२५ साल पुरानी तमन्ना अब जाकर पूरी हुई --कि बाहर बारिस हो रही हो --हम हों वो हों और तीसरा कोई हो---बालकनी में बैठे हों --साथ में चाय पकौड़े --और हाथ में सिगरेट

बस सिगरेट के ज़हर को छोड़ और सब साथ था

इस तरह मनाया हमने जन्मदिन ।

अब इसमें भी कोई ग्रहों का चक्र था या नहीं , यह तो संगीता पुरी जी ही बता सकती हैं


नोट : शाम को ललित शर्मा जी , राजीव तनेजा जी और यशवंत मेहता के साथ ठहाके लगाकर जन्मदिन का कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ

आप की बधाई और शुभकामनाओं के लिए सभी नए और पुराने मित्रों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ

अब एक सवाल :
* यदि आप किसी से प्यार करते हैं तो बोलिए आई लव यू
* कभी कभी प्यार करने वाला आई लव यू बोल नहीं पाता
* लेकिन यदि आप प्यार एक से करें और आई लव यू किसी दूसरे को बोलें तो ---

आपके ज़वाब का इंतजार रहेगा

अभी अभी पता चला है एक नए विश्व कीर्तिमान के बारे मेंइस पर वार्ता अगली पोस्ट में


Wednesday, August 11, 2010

कभी कभी सोचता हूँ ---क्या पाया डॉक्टर बनकर----जन्मदिन विशेष ---

मेडिकल कॉलिज का पहला दिन गेट पर ही सीनियर्स ने पकड़ लिया एक बोला --डॉक्टर क्यों बनना चाहता है ? जी , देश के मरीजों की सेवा करना चाहता हूँ एक जोरदार ठहाका इसे देखो ये मरीजों की सेवा करना चाहता है हा हा हा !

आज सोचता हूँ कि बचपन या लड़कपन भी कितना नादान होता है आज व्यवसायिकता और उपभोगता के इस दौर में , भला कौन देश की सेवा कर रहा है

डॉक्टर्स प्राइवेट सेक्टर में हों या सरकारी , या फिर निजी प्रैक्टिस ---जिसे देखो पैसा कमाने की होड़ में व्यस्त है

दिल्ली का मानसून उमस भरे दिन सुबह सुबह भी उमस इतनी कि हिलते ही पसीना आने लगता है अस्पताल पहुँचते ही नज़र आता है ये कॉरिडोर


तूफ़ान से पहले और तूफ़ान के बाद की शांति

इस कॉरिडोर से होकर प्रतिदिन ६००० मरीज़ और उनके इतने ही रिश्तेदार , इलाज़ के लिए इधर से उधर होते हैं

कॉरिडोर मरीजों से खचा खच रा हुआ मरीजों के पसीने की दुर्गन्ध , अस्पताल की हवा में मिलकर एक अजीब सी गंध छोडती हुई-- खों खों करते रोगी ---- कोई थूक रहा है ---कोई बच्चे को कोने में बिठाकर सू सू करा रहा है एक बुढिया को उसका बेटा हाथो में उठाकर हड्डी रोग विभाग ले जा रहा है एक पढ़ा लिखा व्यक्ति स्ट्रेचर के लिए मारा मारा फिर रहा है

मैं भीड़ में से रास्ता बनाने की कोशिश करता हुआ -- एक हाथ सामने लोगों को हटाते हुए --दूसरा हाथ पीछे पेंट की पॉकेट पर --जेब कतरों से पर्स को बचाते हुए --किसी तरह सांस रोककर , इस गलियारे से निकल पाता हूँ आखिर अपने कमरे में पहुँच कर ही साँस लेता हूँ

सेंट्रली एयर कंडीशंड रूम में आकर थोड़ी राहत मिलती है

फिर शुरू होता है मरीजों का सिलसिला --जितने मरीज़ अपनी स्पेशलिटी के देखता हूँ , उनसे ज्यादा दूसरों के देखे हुए देखता हूँ पी डी इंचाज हूँ --किसी की कोई भी शिकायत हो , मेरे पास ही आता है , निवारण के लिए


कभी कभी सोचता हूँ ---क्या पाया डॉक्टर बनकर

किसी एम् एन सी में काम करने वाला एक ग्रेजुअट भी कितने साफ़ वातावरण में काम करता है

सूटेड बूटेड -- सेंटेड -- लंच मीटिंग --डिनर मीटिंग --कभी फाइव स्टार होटल में --कभी विदेश में बाहर के संसार में कितना ग्लैमर है --- चमक धमक है ---- ऐशो आराम है

यहाँ तो पढ़े लिखे साफ सुथरे व्यक्ति से मिले हुए मुद्दतें हो जाती हैं

यहाँ सरकारी अस्पताल में वही आते हैं , जो गरीबी रेखा के पड़ोसी हैं
उनका दुःख दर्द सुनकर किसी का भी कलेजा हिल सकता है



बाहर बारिस हो रही है आज थोड़ी फुर्सत लगती है यादों का एक कारवां सा उमड़ने लगता है , मन में

याद आता है वो बुजुर्ग जो रिक्शा चलाता था , एक दिन किसी ने रिक्शा ही चुरा लिया मालिक ३००० मांग रहा था दमे का रोगी , भला कहाँ से लाता एस्थलिन इन्हेलर के लिए ही पैसे नहीं थे उसके पास उसे मिल गया , अब हर महीने आता है , साइन कराने के लिए

एक ८० वर्ष का बुजुर्ग -- उन्हें पता चला कि डॉक्टर साहब लाफ्टर शो में जीत कर आये हैं -- २० चुटकले लिख कर ले आये --पचास साल पुराने --साथ में एक पेन भी गिफ्ट---कार्डियोलोजिस्ट को दिखाना था अभी दो वर्ष से नहीं आये हैं , कहीं --- ओह नो

एक बुजुर्ग , ६० -६५ के लेकिन हलके फुल्के --वज़न इंडियन रेफरेंस विमेन से भी कम लेकिन बड़े फुर्तीले साइन कराने के लिए आते --इतना आशीर्वाद देकर जाते कि दिल खुश हो जाता कई महीने से दिखाई नहीं दिए तो चिंता सी हुई लेकिन फिर एक दिन आये --अच्छा लगा , कुशल पाकर

एक रिटायर्ड सज्जन --हमेशा कोई कोई , किसी किसी की शिकायत लेकर आते अक्सर झगडा कर के ही जाते शायद घर से नाखुश थे बच्चे परवाह नहीं करते --बीबी थी नहीं प्रोब्लम तो समझ आती लेकिन क्या कर सकते थे एक बार सचमुच डांटना ही पड़ा --तब से अब तक नहीं आये हैं पहले दिख जाते थे , अब कई महीने से दिखाई भी नहीं दिए --- वक्त किसी के लिए कहाँ रुकता है

एक अधेड़ उम्र की महिला---विधवा -- डायबिटिक --उसका ४० साल का मेंटली रिटारडेड लड़का --वह भी डायबिटिक ---दवाएं सारी मिलती नहीं --- उन्हें देखकर धरती पर ही नर्क का अहसास होता ---मन मसोसकर रह जाना पड़ता ---भगवान ऐसी जिंदगी किसी को ने दे ---अभी डेढ़-दो साल से नज़र नहीं आई शायद मुक्ति ---?

अक्सर एस्थमा के रोगी आते हैं --इन्हेलर लेने के लिए नियमानुसार मिल नहीं सकता था बड़ा दुःख होता था देखकर कि सांस नहीं रहा लेकिन हम होते हुए भी दे नहीं सकते

बड़ी कोशिशों के बाद , आखिर कामयाबी मिली ---अब सबको उपलब्ध है

बड़ी
संतुष्टि मिलती है चेहरे के भाव देखकर --जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो

जी हाँ , सरकारी अस्पताल में रोगी को दवा मिल जाये तो खज़ाना ही मिल जाता है

उनके चेहरे पर संतोष और राहत के मिले जुले भाव देखकर, हमें भी सुकून का अनुभव होता है

कहते हैं पैसा तो हाथ का मैल है निश्चित ही दो रोटी लायक तो सरकार हमें देती ही है

अब इस उम्र में और कितनी रोटियां चाहिए खाने को

परन्तु जाने क्यों , यह बात सबको समझ नहीं आती

सामने घड़ी तीन का समय दिखा रही है मीटिंग का समय हो गया है
दीवार पर हिप्पोक्रेटिक ओथ फ्रेम में ज़ड़ी लगी है

मैं एक नज़र उस पर डालता हूँ --और मीटिंग के लिए निकल पड़ता हूँ --अस्पताल की तीसरी मंजिल की ओर