Monday, May 31, 2010

क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---विश्व तम्बाकू रहित दिवस पर एक रचना ----

लोकोपयोगी व्याखानमाला के उद्घाटन पर बाएं से --डॉ एन के अग्रवाल - अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षिक , डॉ पी कालरा -प्रधानाचार्य यू सी एम् एस , श्री जयदेव सारंगी --स्पेशल सेक्रेटरी , डॉ भट्टाचार्जी --निदेशक स्वास्थ्य सेवाएँ , और डॉ एस द्विवेदी --विभाग अध्यक्ष काय चिकित्सा



क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---

आज विश्व भर में विश्व तम्बाकू रहित दिवस मनाया जा रहा है। क्यों न जो लोग धूम्रपान करते हैं , आज के दिन प्रण करें कि आज के बाद वो कभी धूम्रपान नही करेंगे। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ प्रदूषण पर तो नियंत्रण किया जा रहा है, वहीं धूम्रपान पर अभी तक विशेष प्रभाव नही पड़ा है।
तम्बाकू और धूम्रपान से सम्बंधित कुछ तथ्य :-

* सबसे पहले कोलंबस ने १४९२ में दक्षिण अमेरिका के निवासियों को धूम्रपान करते देखा था।
*भारत में इसका सेवन १६ वीं शताब्दी में शुरू हुआ।

*विश्व में ११० करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं।
*विश्व में प्रतिवर्ष ५०,००० करोड़ सिग्रेट और ८००० करोड़ बीडियाँ फूंकी जाती हैं।
*धूम्रपान से हर ८ सेकंड में एक व्यक्ति की म्रत्यु हो जाती है।
* ५० लाख लोग हर साल अकाल काल के गाल में समां
जाते हैं।
*सिग्रेट के धुएं में ४००० से अधिक हानिकारक तत्व और ४० से अधिक कैंसर उत्त्पन करने वाले पदार्थ होते हैं।

*भारत में ४०% पुरूष और ३% महिलायें धूम्रपान करती हैं।
*भारत में मुहँ का कैंसर विश्व में सबसे अधिक पाया जाता है और ९०% तम्बाकू चबाने से होता है।

धूम्रपान और तम्बाकू से होने वाली हानियाँ :-


*हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, कोलेस्ट्रोल का बढ़ना, तोंद निकलना, मधुमेह , गुर्दों पर दुष्प्रभाव ।
*स्वास रोग _ टी बी , दमा, फेफडों का कैंसर ,गले का कैंसर आदि।
* पान मसाला और गुटखा खाने से मुहँ में सफ़ेद दाग, और कैं
सर होने की अत्याधिक संभावना बढ़ जाती है।

श्रोतागण

लोग धूम्रपान करते क्यों हैं?
कहते हैं पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए । वैसे तो ये बात शराब के लिए कही गई है लेकिन बीड़ी सिग्रेट पर भी उतनी ही लागू होती है । लोग कैसी कैसी हालातों में भी धूम्रपान करते हैं और क्या क्या बहाने बनाते हैं , ज़रा देखिये इस हास्य -व्यंग कविता में ।


अस्पताल के प्रांगण में
पी डी के आँगन में
जेठ की धूप में जले, पेड़ तले
कुछ लोग आराम कर रहे थे ।
करना मना है , फिर भी मजे से धूम्रपान कर रहे थे ।

एक बूढ़े संग बैठा उसका ज़वान बेटा था
बूढा बेंच पर इत्मीनान से लेटा था ।
साँस भले ही धोंकनी सी चल रही थी
मूंह में फिर भी बीड़ी जल रही थी ।

बेटा भी बार बार पान थूक रहा था
बैठा बैठा वो भी सिग्रेट फूंक रहा था ।


एक बूढा तो बैठा बैठा भी हांफ रहा था
साथ बैठी बुढिया को जोर जोर से डांट रहा था ।
हांफते हांफते डांटते डांटते जैसे ही उसको खांसी आई
उसने भी जेब से निकाल, तुरंत बीड़ी सुलगाई।

मैंने कहा बाबा , अस्पताल में बीड़ी पी रहे हो
चालान कट जायेगा
वो बोला बेटा , गर बीड़ी नहीं पी
तो मेरा तो दम ही घुट जायेगा ।

डॉ ने कहा है -
सुबह शाम पार्क की सैर किया करो
खड़े होकर लम्बी लम्बी साँस लिया करो ।
लम्बे लम्बे कश लेकर वही काम कर रहा हूँ ।
खड़ा खड़ा थक गया था , लेटकर आराम कर रहा हूँ ।

मैंने बेटे से कहा --भाई तुम तो युवा शक्ति के चीते हो
फिर भला सिग्रेट क्यों पीते हो ?
वो बोला बाबा की बीमारी से डर रहा हूँ
सिग्रेट पीकर टेंशन कम कर रहा हूँ ।

मैंने कहा भैये -टेंशन के चक्कर में मत पालो हाइपर्तेन्शन
वर्ना समय से पहले ही लेनी पड़ जाएगी फैमिली पेंशन ।



एक बोला मुझे तो बीडी बिलकुल भी नहीं भाती है
पर क्या करूँ इसके बिना टॉयलेट ही नहीं आती है ।

दूसरा बोला सर मैं तो रात में पीता हूँ जब पत्नी और सास सो जाती है
एक दो सिगरेट पी लेता हूँ तो गैस पास हो जाती है ।

एक युवक गोल गोल हवा में धुएं के छल्ले बना रहा था
वो लड़का होने की ख़ुशी में खुशियाँ मना रहा था ।

कुछ लोग ग़म में पीते हैं , कुछ पीकर ख़ुशी मनाते हैं ।
कुछ लोग दम भर पीते हैं , फिर दमे से छटपटाते हैं ।
उड़ाकर बीडी सिगरेट के धुएं का ज़हर
अपनी और पूरे परिवार की जिंदगी , दांव पर लगाते हैं ।

ये धूम्रपान की आदत , आसानी से कहाँ जा पाती है
पहले सिग्रेट हम पीते हैं , फिर सिग्रेट हमें खा जाती है ।



दोस्तों धूम्रपान छोड़ने के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।
जरा सोचिये , बड़े बड़े शहरों में जहाँ बहुत सा धुआं हम पहले ही साँस के साथ खींचते हैं, फ़िर भला सिग्रेट के धुएं की कहाँ जरूरत रह जाती है। एक बार छोड़ कर देखिये , आप कितना परिवर्तन महसूस करेंगे अपनी जिंदगी में।


Friday, May 28, 2010

कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है ---

हमारा देश एक विशाल देश है। यहाँ जितनी विविधताएँ और अनेकतायें देखने को मिलती हैं , उतनी शायद कहीं और नहीं मिलेंगी। उत्तर में हिमालय पर्वत श्रंखला , दक्षिण में कन्याकुमारी में मिलते तीन तीन सागर , पश्चिम में सूखा रेगिस्तान और पूर्व में सबसे अधिक बारिस वाला क्षेत्र

इसीलिए हमारा देश पर्यटकों के लिए स्वर्ग समान है

लेकिन यही हाल आम जिंदगी में भी देखने को मिलता है ।
फर्क बस इतना है कि इस विविधता से स्वर्ग के साथ नर्क के भी यहाँ होने का अहसास होता है

कहीं जगमगाते शहर हैं , तो कहीं अँधेरे में डूबे झोंपड़ पट्टी वाले सूखे से गाँव ।
शहरों में भी ऊंची ऊंची आलीशान कोठियों की छाया में बसी झोंपड़ियाँ ।
कुछ इतने अमीर कि पूरा शहर खरीद लें , कुछ इतने गरीब कि एक रोटी भी नसीब नहीं ।
कहीं डिस्को पर थिरकते नौजवान , तो कहीं ३५ की उम्र में बूढ़े लगने वाले खों खों करते बीमार ।
कहीं मंदिर, मस्जिद , गुरूद्वारे और गिरिजाघर में भक्तजन तो कहीं छोटी छोटी कोठरियों में देह व्यापार करती बालाएं।
कोई मदर टेरेसा , महात्मा गाँधी , या विनोबा भावे सा सच्चा समाज सेवक , तो कोई देश को घुन और दीमक की तरह चट कर जाने वाला भृष्ट देशद्रोही ।

ये सब यहाँ एक साथ नज़र आते हैं ।

इनमे से ज्यादातर मानव निर्मित कुंठाएं हैं । हालाँकि , कुछ प्रकृति की भी देन हैं । यह जानकर आश्चर्य होता है कि कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है

अब इस नीचे वाले चित्र को ही देखिये । एक ही पेड़ का आधा भाग हरा , और आधा सूखा । यह तो ऐसा हो गया जैसे दो भाइयों में एक अमीर और दूसरा गरीब । यानि प्रकृति में भी दोहरे मांप दंड !


यह चित्र मैंने १९९४ में लिया था । इसमें दूर क्षितिज के पास समुद्र का पानी नज़र आ रहा है । बीच में घनी हरियाली । और यह पेड़ एक पहाड़ी पर था । यहाँ देश विदेश से रोज सैंकड़ों पर्यटक घूमने आते हैं । यह स्थान समुद्र के बीच में है ।

क्या आप बता सकते हैं इस जगह का नाम ? और इस वृक्ष की ऐसी दशा क्यों है ?

Tuesday, May 25, 2010

सोमवार की एक शाम --ललित शर्मा जी के नाम ---

रविवार का दिनछुट्टी का दिन काम से आराम का दिनआराम --यदि नसीब हो सके तो
अक्सर इस मृत्युलोक में मनुष्य जीवन की दिनचर्या में इस कदर फंसा रहता है , कि आराम सिर्फ ख्वाबों ख्यालों में ही रह जाता है। इसी रविवार अविनाश जी ने एक ब्लोगर मिलन का कार्यक्रम रखा हुआ था। जाने का मन तो हमारा भी था । लेकिन मौसम , माहौल , समय , स्थान , सब ने मिलकर मूड को इस कदर हिलाया कि फिर अपनी जगह पर टिक ही नहीं पायाबहुत कोशिश की मगर वो नहीं माना

हमने तो मार्केट जाकर लाल टी शर्ट भी खरीदने की सोची , लेकिन पता चला कि सब की सब बिक चुकी थी
खैर
ललित भाई को तो हमने पहले ही बता दिया था कि भई अगर रविवार को नहीं मिल पाए तो सोमवार को निश्चित ही मुलाकात होगी।

सोमवार दोपहर को फोन किया तो पता चला कि ज़नाब राजीव तनेजा जी के साथ हैं और लंच कर रहे हैं । लगे हाथ हमने उन्हें रात्रि भोज के लिए आमन्त्रित कर लिया जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । समय तय हुआ शाम के ८ बजे , सिविल सर्विसिज ऑफिसर्स क्लब क्योंकि श्रीमती संजू तनेजा भी आ रही थी , सो हमने भी श्रीमती जी को मना लिया चलने के लिये




अब हम तो निश्चित समय पर पहुँच गए लेकिन पता चला कि हमारे मेहमान तो अभी घर से ही बोल रहे थे । वो तो भला हो सोमवार का क्योंकि क्लब में गिने चुने लोग ही थे । सप्ताह के पहले दिन , सप्ताहांत के तूफ़ान के बाद की शांति थी इसलिए हम भी आराम से गोष्ठी कक्ष में पसर गए और टी वी ओन कर लिया । कहते हैं , हर बुराई में अच्छाई होती है । उनको देर होने से श्रीमती जी ने अपनी पसंद के सारे सीरियल्स क्लब के विशालकाय टी वी स्क्रीन पर आराम से देख लिए ।

इसी बीच सवा नौ बजे ललित जी का फोन आया कि वो पहुँचने ही वाले हैं


चित्र में बाएं से --राजीव तनेजा , यशवंत मेहता , ललित शर्मा , श्रीमती संजू तनेजा और डॉ रेखा दराल

हम भी स्वागत में जाकर गेट पर खड़े हो गए । कार से उतरकर ललित जी इतनी आत्मीयता से औपचारिकतापूर्ण मिले कि पहली बार हमें अपने बुजुर्ग होने का अहसास सा हुआ । ललित जी सिल्क का कुर्ता पायजामा पहने किसी रियासत के राजकुमार जैसे लग रहे थे ।

बाद में उन्होंने स्वीकारा कि किसी दिन वो छत्तीसगढ़ के सी ऍम भी हो सकते हैं

वैसे तो क्लब में थोडा बहुत ड्रेस कोड लागू होता है । लेकिन ललित भाई की मूंछे देखकर भला किस की हिम्मत हो सकती थी कि कोई कुछ कह सके । उलटे वेटर्स ने ललित जी का विशेष ध्यान रखा खातिरदारी में ।

उसके बाद --न ब्लोगिंग , न कोई मुद्दे, न राजनीति पर बात हुई ।
बस एक दूसरे को जानने , पहचानने और समझने की ही बात हुई

रेखा और संजू तो ऐसे बात कर रही थी जैसे बरसों से एक दूसरे को जानती हों

फैमिली लाउंज में बैठकर ऐसा लग रहा था जैसे एक ही परिवार के तीन भाई साथ बैठे होंबड़े भैया , सपत्निक और नौज़वान बेटा साथ में , सबसे छोटे जैसे नवविवाहित हों , और मूंछों वाले मंझले भैया जैसे बाल ब्रहमचारीएक सुखी परिवार

देर हो चुकी थी , इसलिए खाना पीना सब एक साथ ही हो रहा था ।
टीचर्स से भी मुलाकात हुई लाल परियां भी दिखाई दीं
सबसे अंत में हमीं उठे , घंटी बज चुकी थी क्योंकि ग्यारह बज चुके थे ।
बस एक कमी खल रही थी -- अविनाश , खुशदीप , अजय और वर्मा जी की लेकिन नियमानुसार केवल चार मित्र ही आमंत्रित किये जा सकते थे ।

लेकिन क्या हुआ , सोमवार तो फिर अनेक आयेंगे

फिर अगले महीने पाबला जी भी तो दिल्ली रहे हैं

Saturday, May 22, 2010

यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है ---

ब्लोगिंग में आजकल जो गहमा गहमी , वाद विवाद और आरोप प्रत्यारोप हो रहे हैं , उनसे अलग कुछ ऐसे मित्र ब्लोगर भी हैं जो सभी विवादों से दूर निर्विकार भाव से हिंदी सेवार्थ कार्य में लीन हैंऐसे ही एक मित्र हैं , मुंबई में रहने वाले श्री नीरज गोस्वामी जी , जो नियमित रूप से प्रसिद्ध शायरों , ग़ज़लकारों और कवियों की पुस्तकों और रचनाओं से परिचय कराते रहते हैं

हमारे देश में लगभग ७२ % लोग गावों में रहते हैंवहां ज्यादातर लोग गरीबी में वास करते हैंहालाँकि इसका मतलब यह नहीं कि गाँव में सभी गरीब और शहर में सिर्फ अमीर ही रहते हैं । कुल मिलाकर गाँव और शहरों में गरीबों की संख्या , अमीरों की संख्या से कहीं ज्यादा है।

मन हुआ कि इस अमीरी -गरीबी और गाँव -शहर के अंतर पर एक रचना लिखी जाये ।
मैंने ये विचार नीरज भाई के सामने रखा और उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर एक कविता बना डाली । गुस्ताखी करते हुए इस के साथ थोड़ी छेड़ छाड़ कर , आपके सन्मुख रख रहा हूँ ।

( ये = अमीर , वे /वो = गरीब , यहाँ = शहर , वहां =गाँव )

सूखी रोटी 'ये' भी खाते
सूखी रोटी 'वे ' भी खाते ।
डाइटिंग से 'ये' वज़न घटाते
भूखा रह वे दुबला जाते ।
इनको साइज़ जीरो का शौक
उनको बस सर्वाइवल का खौफ ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


मक्की सरसों जब 'वे' खाएं
गावों में बेबस कहलायें।
पर शहरों में चला के ऐसी
खाते 'ये' कह ' डेलिकेसी' ।
जई फसल जो ढोर हैं खाते
ओट मील ये कह उसे मंगाते

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


जिम में जा 'ये' एब्स बनाते
'वो' महनत से खुद गठ जाते।
कपडे फाड़ ये करते फैशन
उनको तन ढकने का टेंशन ।
पैदल चल वो काम पे जाएं
यहाँ पैदल चलना भी काम कहाए।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


वो हँसते हैं लगा ठहाके
ये हंसने को क्लब हैं जाते ।
वो पीपल की छाँव में रहते
दुःख पाकर भी गाँव में रहते ।
होती क्या जाने पुरवाई
'ये' ऐ सी में रहते भाई ।

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है

वो किसान जो अन्न उगाये
क़र्ज़ में खुद ही फंस जाये।
बीच में जब लाला आए
उसी अन्न से धन कमाए।
फिर बी पी डायबिटीज हो जाए
खाना कुछ भी खा ना पाए

ये भी हैं मजबूर, वे भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


दोनों ही बस ये चाहें
'वो' से हम 'ये' हो जाएँ
'ये' से हम 'वो' हो जाएँ।
लेकिन न ये वो बन पायें
न ही वो ये बन पायें
जो जैसे हैं , वैसे रह जाएं ।

ये भी हैं मजबूर, वो भी हैं मजबूर ।
यहाँ हैल्थ की मजबूरी है , वहां वैल्थ की मजबूरी है।


यह प्रयास कैसा लगा , बताइयेगा ज़रूर।


Wednesday, May 19, 2010

अपनेपन की मिठास का अहसास आदमी को तभी होता है जब आदमी अपनों से दूर होता है---

कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अपनेपन की मिठास का अहसास आदमी को तभी होता है जब आदमी अपनों से दूर होता है दिल्ली जैसे बड़े शहर में जहाँ पडोसी पडोसी से बात करने में दिलचस्पी नहीं रखता , वहीँ घर से बाहर निकलते ही मनुष्य का स्वरुप बदल जाता है । वही पडोसी जो घर के बाहर हेलो कहने में भी शर्माता है , यदि बाहर कहीं मिल जाये तो देख कर मुस्कराता अवश्य है । यदि किसी दूसरे शहर में मुलाकात हो जाये तो फिर प्रेम प्रदर्शन देखने लायक होता है ।

शायद यही हम हिन्दुस्तानियों की खूबी है हम भले ही आपस में मन मुटाव रखें , जात पात , धर्म या प्रान्त के नाम पर लड़ते रहें , लेकिन देश से बाहर निकलकर सब एक हो जाते हैं ।

एक अपनेपन का अहसास निखर कर बाहर जाता है

कुछ इसी तरह का अनुभव हमें हुआ , अपनी गत वर्ष की कनाडा यात्रा में ।

हुआ यूँ कि हम एल्गोन्क़ुईन के जंगल में तीन दिनों की कैम्पिंग ख़त्म कर टोरोंटो लौट रहे थे । उन दिनों बारिस बार बार आ रही थी । कैम्प से निकलते ही फिर काले बादलों की घटा छा गई। लम्बी काली घुमावदार सड़क के दोनों ओर घने जंगल के बीच से निकलते हुए मौसम बड़ा रहस्यमयी लगने लगा था।

दो घंटे ड्राइव करने के बाद , रिम झिम होती बारिस और सुहाने मौसम में बड़ा मन हुआ कि कहीं चाय पी जाये । ऐसे में तो चाय पकौड़े अपने आप ख्यालों में समा जाते हैं । लेकिन वहां जंगल में भला कहाँ चाय मिल सकती थी । खैर तभी सड़क किनारे कुछ मकान दिखाई देने लगे । हम समझ गए कि अब जंगल से बाहर आने वाले हैं । शायद कोई तो ढाबा या रेस्ट्रां मिल जाये । तभी एक ढाबा मिल ही गया ।

हमारी छै में से तीन गाड़ियाँ पहले ही दूर निकल चुकी थी । शेष बची तीन गाड़ियाँ मुड ली ढाबे की ओर ।
अभी हम नीचे उतर ही रहे थे कि ढाबे का मालिक बाहर निकल आया । शायद उसने हमें अन्दर से देख लिया था ।
हमें देख कर वो समझ गया था कि हम हिन्दुस्तानी हो सकते हैं । और जब उतर कर हमने हिंदी में चपड़ चपड़ करनी शुरू की तो उसे यकीन ही हो गया ।

उसने हमसे पूछा कि क्या हम इण्डिया से हैं । हमने बताया कि हम दिल्ली से आये हैं , बाकि सभी यहीं टोरोंटो में रहते हैं । यह सुनकर वह बड़ा खुश हुआ , क्योंकि वह भी भारतीय ही था ।
हमने भी सोचा कि चलो किसी हिन्दुस्तानी ढाबे वाले का ही भला किया जाये , वहां खा पीकर

और ऑर्डर दे दिया ढेर सारा --कॉफ़ी , कोल्ड ड्रिंक्स और स्नैक्स आदि

रेस्ट्रां के अंदर का दृश्य

खा पीकर जब हम चलने लगे और बिल पूछा तो वो कहने लगा --अजी बिल केदा , तुसी साडे पिंड तों हो , साडे बराहा हो जीअसी तुहानू बिल देवांगे ? ना जी ना , सानु कुछ नहीं चाहिदा

हमने उससे बहुत कहा कि भाई ऐसा तो अच्छा नहीं लगता । आपने हमें इतने प्यार से खिलाया पिलाया , यही बहुत है , पैसे तो लेने ही चाहिए । लेकिन वो नहीं माना और चलते चलते सब बच्चों को चोकलेट भी दे दीं ।

अब ऐसे में शायद यही उपयुक्त रहता कि हम उसे कोई उपहार देते जातेलेकिन जंगल से लौट रहे थे , ऐसे में भला हमारे पास क्या उपहार हो सकता था

इसलिए गर्म जोशी से हाथ मिलाकर ,सबने खूबसूरत मुस्कान देकर अपने अन्जान हिन्दुस्तानी दोस्त से विदा ली

आज भी मैं जब सोचता हूँ , तो उस हिन्दुस्तानी का अपने देश और देशवासियों के प्रति प्यार देखकर नतमस्तक हो जाता हूँ

Saturday, May 15, 2010

क्या हिंदी ब्लोगिंग का पतन शुरू हो गया है ?

पिछली पोस्ट पर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामाजिक विषय पर आप सभी मित्रों के विस्तृत और निष्पक्ष विचार पढ़कर पोस्ट के सफल होने का आभास हुआ। इसके लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं । यूँ तो किसी भी बात पर सभी का एकमत होना संभव नहीं , तथापि, काफी हद तक सहमति नज़र आई। इसका निष्कर्ष पोस्ट की टिप्पणियों के अंत में देख सकते हैं ।

लेकिन यह देखकर मन बड़ा दुखी हो रहा है कि हिंदी ब्लोगिंग आज किस दिशा में जा रही है । कुछ ब्लोगर बंधु काम की बातें छोड़ अवांछित और वाहियात किस्म की बातों में उलझे हुए हैं । ऐसे में अनेक सवाल उठते हैं जेहन में ।

क्या एक दूसरे पर छींटाकशी करना ही ब्लोगिंग रह गया है ?

क्या ब्लोगर्स के पास लिखने को कुछ नहीं रह गया है ?

क्या हिंदी ब्लोगिंग का पतन शुरू हो गया है ?

आप सुशिक्षित हैं ।
आपके पास कंप्यूटर है , उसपर काम करना भी आता है । ज़ाहिर है आप गरीब तो नहीं हैं । देश में ३८ % लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं , जिनके पास न तो पर्याप्त मात्र में खाने को है , न ही शिक्षित हैं , और न स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं ।
आप तो कुछ ही भाग्यशाली लोगों में से हैं , जिन्हें ये सब सुख सुविधाएँ नसीब हुई है

फिर अच्छा अच्छा क्यों नहीं लिखते ?

आप कवि हैं , कवितायेँ लिखिए
आप लेखक हैं , पत्रकार हैं , मुद्दों पर बात कीजिये
आप डॉक्टर , इंजीनियर या वकील हैं , जानकारी दीजिये
आप सेवा -निवृत हैं , अपने अनुभवों से सबको परिचित कराइये
हंसिये , हंसाइये , अपनी संवेदनशीलता से रुलाइये
मगर , इस तरह एक दूसरे को रुसवा कर दिलों में ज़हर तो मत फैलाइए

हिंदी ब्लोगिंग अभी शैशवकाल में है , इसे समय से पहले ही अंतिम सांस लेने से बचाइये

Tuesday, May 11, 2010

क्या एक ही गोत्र में विवाह मान्य होना चाहिए ? एक नज़र ---

पिछले कुछ समय से अचानक अख़बारों की सुर्ख़ियों में ओनर किलिंग पर एक सैलाब सा आ गया है। एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएँ घटित होने के कारण , सभी का सोचना आवश्यक है कि क्या सही है , क्या गलत । जिसे आप सही समझते हैं , क्या दूसरे उसे गलत कहते हैं । हालाँकि सभी का सोचने का तरीका अलग होता है ,लेकिन जिस कार्रवाई से पूरे समाज पर प्रभाव पड़ता हो , उसके बारे में विश्लेषण करना अति आवश्यक हो जाता है।

आज इसी बारे में विस्तार से बात करते हैं ।

इस तरह की घटनाओं में दो पहलु उजागर होते हैं :

) खाप द्वारा दी गई सजा --सजा- -मौत
) एक ही गोत्र में विवाह

खाप :

दिल्ली , हरियाणा , पश्चिमी उत्तर प्रदेश , राजस्थान और पंजाब --ये वो राज्य हैं जिन्हें जाट प्रबल क्षेत्र कहा जा सकता है । यहाँ जहाँ एक तरफ सरकारी पंचायत प्रणाली चलती रही है । वहीँ दूसरी तरफ गैर सरकारी लेकिन सामाजिक तौर पर सशक्त पंचायत यानि खाप का हमेशा ही दबदबा रहा है । यह एक संगठित और अनुशासित समाज की पहचान के रूप में जानी जाती रही है ।
खाप में सिर्फ जाट ही नहीं अपितु हरियाणा के अन्य निवासी भी जैसे ब्राह्मण , बनिया , राजपूत और यादव भी होते हैं ।

खाप का काम न सिर्फ सभी तरह के आपसी झगडे निपटाने का रहा है , बल्कि ऐसे नियम बनाने और लागू करने का भी रहा है , जिन्हें समाज के लिए सही और उपयोगी माना जाता है । इनमे बहुत से फैसले तो वास्तव में बड़े उपयोगी रहे हैं , जैसे दहेज़ विरोधी नियम , शादियों में खर्च को कम रखने के लिए प्रतिबंध इत्यादि

लेकिन देश के कानून को हाथ में लेने की तो किसी को भी अनुमति नहीं दी जा सकतीफिर चाहे वज़ह कोई भी क्यों हो

ओनर किलिंग एक हत्या है और इसे एक अन्य हत्या की ही तरह लेकर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए । इस विषय पर कानून क्या कहता है , यह तो श्री दिनेश राय द्विवेदी जी जैसे काबिल कानूनी सलाहकार ही बता सकते हैं।
हम तो यही कह सकते हैं कि किसी को भी किसी की जान लेने का कोई हक़ नहीं है

अब आते हैं दूसरे विषय पर --एक ही गोत्र में विवाह

उत्तरी भारत का जाट समाज , आर्यन के वंशज माने जाते हैं । सदियों से ये लोग एक सुसंगठित समाज के रूप में रहे हैं । खेती -बाड़ी करना इनका मुख्य पेशा रहा है । क्षत्रिय होने के नाते सुरक्षा बलों में भी कार्यरत रहे हैं ।

जाट समाज के कुछ नियम :

उत्तरी भारत के गावों में आम तौर पर एक गाँव में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं । एक गोत्र के लोग आस पास के कई गाँव में भी हो सकते हैं । लेकिन एक गोत्र के लोग आपस में भाई माने जाते हैं ।

इस तरह एक ही गोत्र के लड़के लड़की को भी भाई बहन माना जाता है

इसलिए न सिर्फ एक ही गाँव में , बल्कि उस गोत्र के किसी भी गाँव के लड़के लड़की आपस में शादी नहीं कर सकते ।
शादियों में भी यदि लड़की के गाँव में लड़के वालों के गोत्र से कोई लड़की ब्याही गई हो तो उसे सम्मानित किया जाता है । साथ ही दामाद को भी रूपये देकर सम्मानित करने की रिवाज़ है ।

इस तरह एक गोत्र की लड़कियां सभी बड़ों के लिए बेटियां होती हैं और छोटों के लिए बहने ।

आज भी यदि कहीं संयक्त परिवार देखने को मिलते हैं तो वो है हरियाणाऔर आज भी बड़े बूढों की बात को सम्मान मिलता है वहां

शादी :

शादी में सिर्फ लड़के लड़की का गोत्र ही नहीं बल्कि मां और दादी का भी गोत्र मिलाते हैं । यानि तीन पीढ़ियों में कोई भी गोत्र समान नहीं होना चाहिए , तभी शादी तय की जाती है ।

अब देखते हैं कि क्या यह सोच सही है :

सामाजिक तौर पर : यदि भाई बहनों में शादियाँ होने लगी तो सारा सामाजिक ढांचा ही चरमरा जायेगा । कुछ धर्मों या वर्गों में ऐसा संभव है लेकिन इस समाज के लोगों को यह स्वीकार्य नहीं है । क्या इस सोच को बदलना ज़रूरी है ?

कानूनी तौर पर : कानून भाई बहन में शादी की अनुमति नहीं देता । इसे इन्सेस्ट के रूप में गैर कानूनी माना गया है । हालाँकि यह रक्त संबंधों तक ही सीमित है। यानि सगे भाई बहन ।

वैज्ञानिक तौर पर : निकट सम्बन्धियों में शादी से इनब्रीडिंग होती है । इनब्रीडिंग से आगामी पीढ़ियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । इसलिए इसे वैज्ञानिक तौर भी पर अनुमति नहीं होती ।

एक गोत्र में शादी न करने के पीछे यही तीनों कारण साफ नज़र आते हैं । और शायद अपनी जगह सही भी लगते हैं ।
अब बात करते हैं प्रेम संबंधों की युवावस्था में प्रेम अनुभूति एक प्राकर्तिक प्रक्रिया है। लेकिन कच्ची उम्र में यह यौवन का होर्मोनल इफेक्ट (प्रभाव ) ज्यादा प्रतीत होता है । इसलिए बिना किसी सामाजिक अच्छाई बुराई के बारे में सोचे , प्रेम एक शारीरिक अनिवार्यता लगता है । एक बार आप संबंधों में फंस गए तो फिर भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ कर आपकी सम्पूर्ण विचार शक्ति क्षीण हो जाती है । और आप बन जाते है लैला मजनू , शीरी फरहाद जैसे प्यार में शहीद होने वाले अमर नौज़वान ।

अब कोई पूछे , क्या प्यार में जान देना ही बहादुरी हैअगर देश के सभी नौज़वान ऐसे ही प्यार में शहीद होने लगे तो दुश्मनों से कारगिल को कौन बचाएगा

किसी ने सही कहा है :

छोड़ दे सारी दुनिया , किसी के लिए
ये मुनासिब नहीं , आदमी के लिए ।

प्यार से भी ज़रूरी , कई काम हैं
प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए ।

ऐसा लगता है कि प्यार शब्द को आजकल मिडिया ने कुछ ज्यादा ही ग्लैमेराइज कर रखा है । और जीवन के अनुभवों से सम्पूर्ण सोच रखने वालों को प्यार के दुश्मन । कोई आपका मित्र आप के घर आकर यदि बेटियों से आँख लड़ाने लगता है तो क्या आप इसे सही करार देंगे ।

फिल्म-- दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे --में मध्यांतर के बाद जो घर में आँख मिचौली दिखाई गई थी वो सच में मुझे भी ज्यादा पसंद नहीं आई थी ।
ऐसा पंजाबी समाज में भले ही स्वीकार्य हो , लेकिन हरियाणा के कंजर्वेटिव परिवारों में इसे सहन नहीं किया जाता ।

आखिर कहीं तो एक सीमा निर्धारित करनी ही पड़ती है । यदि समाज में सामाजिक नियम ही ख़त्म हो जाएँ तो क्या फिर से हम आदि मानव की स्थिति में नहीं पहुँच जायेंगे ।


यह बात बच्चों , युवाओं और बड़ों -सभी पर लागू होती है

इस विषय पर आपके विचारों का स्वागत है