Wednesday, March 31, 2010

मीना कुमारी --एक खूबसूरत अदाकारा --आज उनकी पुण्य तिथि है --

आज वितीय वर्ष का क्लोजिंग डे है। इत्तेफाक देखिये , आज ही 5० और ६० के दशक की मशहूर अदाकारा ट्रेजिडी क्वीन मरहूम मीना कुमारी जी की भी पुण्यतिथि है।आज का लेख उन्ही की याद में समर्पित है।


अभी कुछ दिन पहले फिल्म पाकीज़ा देखने का इतेफाक हुआ शोले के बाद यदि कोई फिल्म है जिसे मैं बार बार देख सकता हूँ तो वो है -पाकीज़ा। इस फिल्म की विशेषता ये है की ये मीना कुमारी जी की आखिरी फिल्म थी जो उनके देहांत से कुछ ही समय पहले रिलीज़ हुई थी , लेकिन उनके मरणोपरांत हिट हुई थी। आज ३८ साल बाद भी जब भी मैं इस फिल्म को देखता हूँ तो एक सपनों की दुनिया में खो सा जाता हूँ। ऐसा जादू है इस फिल्म में ।


कहानी :

मीना कुमारी --साहिब जान की भूमिका में
इस
फिल्म की कहानी एक तवाइफ़ --साहिब जान की कहानी है , जो लखनऊ के एक कोठे पर नृत्य करती है। साहिब जान दरअसल एक रईसजादे की बेटी है और इत्तेफाकन उसी के भतीजे से बेपनाह मोहब्बत करने लगती है।

लेकिन उसकी बदनामी उसका पीछा नहीं छोडती और एक दिन ऐसा आता है की साहिब जान को अपने ही प्रेमी की शादी में नृत्य करने जाना पड़ता है।

फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत जानदार है और ट्रेजिडी मिश्रित सुखांत है।

फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं --

१) ग़ज़लें और गीत ।

२) संवाद ।

३) कमाल अमरोही का निर्देशन और पिक्चराइज़ेशन ।

४) मीना कुमारी की अदाकारी ।

ग़ज़ल और गीत :

जहाँ उमराव जान में आशा भोंसले की गाई गज़लें आज भी मन को लुभाती हैं , वहीँ इस फिल्म में लता मंगेशकर की गाई गज़लें दिल को छू जाती हैं ।

१) इन्ही लोगों ने , इन्ही लोगों ने ---इन्ही लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा ---हो जी हो , दुपट्टा मेरा ---

) थाडे रहियो -- बांके यार रे ---थाडे रहियो --- इस गाने पर मीना कुमारी का नृत्य --कत्थक --गज़ब का है।


) चलते चलते --यूँ ही कोई --मिल गया था --सरे राह चलते चलते -- इस गाने में फिल्म का सार है। ज़रा सोचिये एक अजनबी जिसे देखा तक नहीं --लेकिन दिल में ऐसा बस गया कि जब भी ट्रेन की सीटी बजती , साहिब जान के दिल में भी घंटियाँ बजने लगती । कितना दर्द होता है , एक अनजाने इंतज़ार में ।


४) मौसम है आशिकाना --अ दिल --कहीं से उनको --ऐसे में --ढूंढ लाना --मौसम है आशिकाना ---

यह गाना बहुत ही रोमांटिक वातावरण में फिल्माया गया है । साहिब जान इत्तेफाक से उसी जगह पहुँच जाती है , जहाँ वो अनजान प्रेमी --राज कुमार --का कैम्प है। किसी निशानी से उसको पहचान उसका इंतजार करती है और गाती है।


५) चलो दिलदार चलो --चाँद के पार चलो -- हम हैं तैयार चलो ---ओ --ओ -ओ ---

ये युगल गीत तब आता है जब कैम्प में दोनों की पहली बार मुलाकात होती है । ज़ाहिर है मोहब्बत की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी। इस गाने को जितनी बार भी सुनेंगे , हर बार एक नशा सा छा जायेगा ।


६) आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे --तीरे नज़र देखेंगे --जख्मे जिगर देखेंगे --

इस ग़ज़ल के बोल सुनकर आप दांतों तले उंगलियाँ दबा लेंगे।

हो ओ , आप तो आंख , मिलाते हुए शरमाते हैं
आप तो दिल के , धड़कने से भी डर जाते हैं --


हो ओ , प्यार करना दिले नादाँ , बुरा होता है
सुनते आये हैं के ये ख्वाब , बुरा होता है ---

और आखिरी पंक्तियाँ तो सचमुच जानलेवा हैं --


जानलेवा है मोहब्बत का समां आज की रात
शमा हो जाएगी , जल जल कर धुआं , आज की रात
आज की रात --बसेंगे तो सहर देखेंगे --
आज की रात --बसेंगे तो --सहर देखेंगे ---

इसके बाद मीना कुमारी ने जो नृत्य किया है , वह अपने आप में एक मिसाल है , अदाकारी की।


कुछ अविस्मर्णीय संवाद और द्रश्य :


१) साहिब जान ट्रेन से कहीं जा रही है । बर्थ पर लेटकर पढ़ते पढ़ते नींद आ जाती है । मेहंदी लगे पांव , ट्रेन की गति के साथ हौले हौले हिल रहे हैं। तभी राजकुमार डिब्बे में घुस जाते हैं , सारा द्रश्य देखकर अवाक् रह जाते हैं। एक पन्ने पर कुछ लिखकर किताब में रख देते हैं । बाद में वो पढ़ती है , लिखा था ---

इत्तेफाकन आप के कम्पार्टमेंट में चला आया । आपके पैर देखे --बहुत हसीं हैं ये --इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा --मैले हो जायेंगे ।

उफ़ ! हकीकत और हालात का ऐसा विरोधाभास पहले कहीं नहीं देखा।


२) साहिब जान , राजकुमार के टेंट में लेटी है। आज उनसे पहली मुलाकात है । राजकुमार आता है --मीना कुमारी आँख बंद कर लेटी है । राजकुमार खड़ा खड़ा देख रहा है --मीना मन ही मन कह रही है --

वो खड़े खड़े मुझे देख रहे हैं --और मैं तो उन्हें देख भी नहीं सकती --उफ़ ये सजा क्यों दे रहे हैं --ये भी नहीं देखते कि हम साँस भी नहीं ले पा रहे हैं --सांस तेज़ी से चलने लगती है

३) साहिब जान एक नवाब के साथ डेट पर --खूबसूरत झील में आलिशान शिकारा --नवाब साहिब जान को गाने के लिए कहते हैं --वो गाती है --
आज की शाम , वो आये हैं ज़रा देर के बाद
आज की शाम , ज़रा देर के बाद आई है --

तभी हाथियों का एक झुण्ड हमला कर देता है --नवाब मारा जाता है । यहाँ इस द्रश्य को इतनी खूबसूरती से फिल्माया गया है कि , नवाब की तहजीब और तमीज देखकर हैरानी होती है , और कहीं न कहीं उसके किरदार से सहानुभूति सी होने लगती है।

४) साहिब जान अपने कोठे पर है । संगमरमर के चिकने फर्श पर वो लेटी है , गोलाकार बने तरण ताल के किनारे --बाल खुले हुए --पानी में तैरते हुए --एक किताब पढ़ रही है । इस द्रश्य को देखकर मन बाग़ बाग़ हो जाता है।

५) सलीम खान ( राज कुमार ) की शादी तय हो गई है । साहिब जान को नृत्य के लिए बुलाया गया है। वो ऐसा जमकर नाचती है कि पैर लहू लुहान हो जाते हैं। तभी उसकी अमी जान बोलती है --शहाबुद्दीन , देख आज तेरी आबरू --- जिस खून पर तेरे पाँव पड़े हैं वो खून तेरी ही बेटी का है।

कमाल अमरोही :
और मीना कुमारी की शादी १९५२ में हुई थी . यह फिल्म कमाल अमरोही द्वारा १९५८ में प्लान की गई थी जब वो दोनों पति पत्नी थे । फिल्म की आधी शूटिंग १९६४ में हुई , लेकिन तभी उनका तलाक हो गया । इसलिए फिल्म रुक गई। फिर १९६९ में सुनील दत्त और नर्गिस जी की पहल पर दोनों ने फिर शादी कर ली। फिल्म बनकर तैयार हुई १९७२ में और रिलीज़ हुई फरवरी १९७२ को
कहते हैं की कमाल अमरोही ने यकीन दिलाया मीना कुमारी को कि वो उम्र के प्रभाव को कुछ इस तरह छुपा देंगे कि देखने वालों को पता ही नहीं चलेगा । हालाँकि कुछ द्रश्यों में उम्र का अंतर साफ़ नज़र आता है।

मीना कुमारी :
इनका असली नाम था -महज़बीं बानो --गरीब परिवार में पैदा हुई, अगस्त १९३२ को --दो बड़ी बहने थी --१९३९ में फिल्मो में काम करना शुरू कर दिया --मीना कुमारी को ट्रेजिडी क्वीन के नाम से जाना जाता था ।


इस सूरत पर भला कौन न्योछावर हो जाये
पाकीज़ा में कमाल अमरोही ने इन्हें बेहतरीन तरीके से पेश किया है। गोल चेहरा , सुन्दर होंठ , खूबसूरत आँखें , लम्बी नाक , और उसपर लम्बे काले घुंघराले बाल --मीना कुमारी की खूबसूरती देखने लायक थी। उनकी आवाज़ में नेजल टोन से ग़मगीन द्रश्यों में जैसे जान सी आ जाती थी।

एक बात बहुत कम लोग जानते हैं --उनकी बाएं हाथ कि एक उंगली ( छोटी उंगली ) कट गई थी , जिसे वो बहुत खूबसूरती से छुपा लेती थी । इस फिल्म में दोनों द्रश्य हैं , यानि उंगली समेत और बिना उंगली के ।

लेकिन ट्रेजिडी क्वीन कहलाने वाली इस अदाकारा का जीवन अपने आप में एक बड़ी ट्रेजिडी बन कर रह गया । तलाक के बाद , वो बेहद शराब पीने लगी । जिसका असर उनके जिगर पर बहुत बुरा पड़ा और उन्हें सिरोसिस हो गया । ३१ मार्च १९७२ को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा , मात्र ३९ वर्ष की आयु में ।

मीना कुमारी जी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं , लेकिन उनके द्वारा निभाए गए किरदार आज भी हमारे दिल में उनकी याद ताज़ा बनाये हुए हैं।

हम इस बेहतरीन अदाकारा को उनकी पुण्य तिथि पर श्रधा सुमन अर्पित करते हैं


Friday, March 26, 2010

मलाई वो खा रहे हैं , हम तो खाली उंगलियाँ चाट रहे हैं --

पिछली पोस्ट में मैंने एक बेहद गंभीर मुद्दे को एक पहेली के रूप में उठाया था । इस पर कुछ बड़ी दिलचस्प टिप्पणियां पढने को मिली। श्री जी के अवधिया जी , मिहिरभोज जी , ऍम वर्मा जी , अंतर सोहिल , ललित शर्मा जी , डॉ मनोज मिस्र जी , डॉ महेश सिन्हा जी , चंदर सोनी, और श्री सतीश सक्सेना जी की टिप्पणियां पढ़कर स्वत्त : चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।

हमारे अप्रवासी मित्रों ने शिकायत की कि उन्हें क्यों दूर रखा गया इस पहेली से । आदरणीय अदा जी , राज भाटिया जी , नीरज रोहिला जी, दिगंबर नासवा जी, और शिखा वार्ष्णे जी और समीर लाल जी को तो पता ही है कि असलियत क्या है।

श्री अविनाश जी, गोदियाल जी और जे सी जी का ज़वाब तो एकदम सटीक था और दिलचस्प भी।

मैं श्री संजय भास्कर , कृष्ण मुरारी प्रसादजी , बबली जी, डॉ अजित गुप्ता जी, और डॉ रूप चाँद शास्त्री जी, काज़ल कुमार जी , खुशदीप सहगल और रचना दीक्षित जी का भी आभारी हूँ जिन्होंने अपने विचार प्रकट किये इस मुद्दे पर।

एक आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई डॉ अनुराग की टिपण्णी प्राप्त कर। पहली बार उनको अपने ब्लॉग पर पाकर हम तो धन्य हो गए।
अब जानिए पहेली का ज़वाब :
आपने सही पहचाना , फोटो में हम ही हैं। ये फोटो कनाडा के क्यूबेक शहर में लिए गया था । कार हमारे मित्र डॉ वर्मा की है । पेट्रोल भी उन्होंने ही भरा । हम तो खाली फोटो खिंचवा रहे हैं।

जी हाँ, जैसा आप में कई मित्रों ने कहा , वहां गैस स्टेशन पर कोई अटेंडेंट नहीं होता । बस क्रेडिट कार्ड डालो , राशी पंच करो , गैस (पेट्रोल) भरो और चल दो।
अब यह नहीं पता कि किसी के पास कार्ड न हो तो ?
अब ज़रा सोचिये यदि ये सिस्टम यहाँ भी जाये तो क्या होगायहाँ तो लोग टी ऍम मशीन को ही उठा ले जाते हैं

आइये अब बात करते हैं असली मुद्दे की। विषय था -डॉक्टरों द्वारा विदेश पलायन।

पलायन : बेहतर विकल्प के लिए प्रस्थान

अब यह भले ही गाँव से शहर की ओर हो या गरीब प्रदेश से महानगर की ओर या फिर विकासशील देश से विकसित देश की ओर।
पलायन मजदूर का हो या डॉक्टर , इंजिनियर का --मकसद सबका एक ही है । बेहतर विकल्प
और इसमें बुराई भी क्या है । भाई अगर पलायन न हुआ होता तो क्या आज यह विकास हुआ होता । मनुष्य आज भी स्टोन एज की तरह गुफाओं में रह रहा होता।

लेकिन डॉक्टरों के पलायन की बात में थोडा फर्क है । प्रस्तुत हैं कुछ तथ्य मेडिकल प्रोफेशन के बारे में :

डॉक्टरों को क्रीम ऑफ़ सोसाइटी कहा जाता है । हो भी क्यों नहीं --सबसे कठिन परीक्षा पास करके दाखिला मिलता है , मेडिकल कॉलिज में ।
शिक्षा अवधि भी ५ साल । फिर एक साल इंटर्नशिप । तीन साल पोस्ट ग्रेजुएशन । तीन साल सीनियर रेजीडेंसी । तब कहीं जाकर स्पेस्लिस्ट बनते हैं। सुपर स्पेस्लिस्ट बनने के लिए और दो साल की पढ़ाई।

यानि एक जेनेरल फिजिशियन २५ में , स्पेस्लिस्ट ३० में और सुपर स्पेस्लिस्ट ३५ साल की आयु में जाकर बनता है। उसके बाद भी पढ़ाई कभी ख़त्म नहीं होती क्योंकि सबसे ज्यादा जल्दी बदलाव मेडिकल नोलेज में ही आता है।

रिटर्न : डॉक्टर बनकर सरकारी नौकरी १० % से भी कम को मिलती है । बाकी को प्राइवेट प्रैक्टिस ही करनी पड़ती है । लेकिन उसके लिए २०-३० लाख कहाँ से आयेंगे ।

छोटे मोटे नर्सिंग होम आर ऍम ओ का काम तो देते हैं लेकिन सैलरी बस १०-१५०००

अपनी क्लिनिक खोलो तो मुकाबला होता है आर ऍम पी से या नीम हकीमों से ।
कुछ ही डॉक्टर हैं जो अच्छा खासा कमा पाते हैं।

हालात : एक डिस्पेंसरी में एक या दो डॉक्टर --मरीज़ ३००-४०० प्रतिदिन। अस्पताल में भी ६०००-८००० मरीज़ ओ पी डी में प्रतिदिन। एक रोगी को देखने के लिए समय सिर्फ १.५-२ मिनट।

प्रोफ़ेसर को भी वे सुविधाएँ नहीं जो एक मल्टी नॅशनल कंपनी में आम कार्यकर्ता को मिलती हैं

आबादी : भले ही हर साल ३५००० डॉक्टर बनते हैं लेकिन ११७ करोड़ आबादी वाले देश में प्रति एक लाख आबादी पर बस ५०-६० डॉक्टर की रेशो। जबकि विकसित देशों में यही अनुपात है २५०-३०० डॉक्टर प्रति एक लाख आबादी।
९० % डॉक्टर शहरों में जहाँ सिर्फ ३० % आबादी रहती है
गाँव में जाये भी तो कैसे --जहाँ कोई सुविधा नहीं , उसके अपने लिए , परिवार के लिए , बच्चों की शिक्षा के लिए ।

ऐसे में यदि हमारे डॉक्टर बाहर की हरियाली की ओर न देखें तो क्या करें ।

वहां : एक एक इंसान की कीमत। एक जेनेरल फिजिसियन की क्लिनिक में सभी आधुनिक सुविधाएँ। २०-३० रोगी प्रतिदिन --नियुक्त समय पर --मोटी कमाई ---एथिकल प्रैक्टिस --प्रोफेशनल संतुष्टि।

उस पर विकास की सभी आधुनिक सुविधाओं का उपभोग। सब को एक समान। कोई भीड़ भाड़ नहीं --नियमों का पालन करता यातायात --ओन लाइन सारे काम --कोई नटवर लाल नहीं।

कुछ पारिवारिक और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, लेकिन वे सभी के लिए बराबर हैं।

जी हाँ , कुछ ऐसा ही द्रश्य होता है विकसित देशों में ।
फिर क्यों न जो सामर्थ्य रखते हैं , वे पलायन न करें।

लेकिन जिम्मेदार कौन ? हमारी व्यवस्था ? मेडिकल प्रोफेशन की ओर सरकार की उदासीनता ? या फिर बढती हुई उपभोगता ?

कुछ भी हो , हम बेहतरीन डॉक्टर बनाकर विदेशों को सौंप रहे हैंमलाई वो खा रहे हैंहम तो खाली उंगलियाँ चाट रहे हैं
इस बारे में अप्रवासी भारतीय मित्रों कि राय जानना चाहूँगा। आपका स्वागत है।

Tuesday, March 23, 2010

ऐसा क्यों कि हमारे डॉक्टर देश छोड़ विदेश की ओर मूंह मोड़ रहे हैं---

भारत में करीब ३०० ऍम सी आई द्वारा स्वीकृति प्राप्त मेडिकल कॉलिज हैं , जिनमे से करीब ३५००० छात्र प्रति वर्ष मेडिकल डिग्री प्राप्त कर डॉक्टर बनते हैंहालाँकि डॉक्टरों की संख्या वांछित डॉक्टर पोपुलेशन रेशो के हिसाब से काफी कम हैफिर भी प्रति वर्ष पास होने वाले डॉक्टरों में से लगभग २०-२५ % अंततय: देश छोड़कर विकसित देशों की ओर कूच कर जाते हैं, एक सुनहरे भविष्य की कामना में

वैसे तो हमारे देश में भी अब सभी आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध हैंयहाँ तक कि अब विदेशों से भी रोगी यहाँ आते हैं इलाज़ करानेयानि मेडिकल टूरिस्म बढ़ने लगा हैहो भी क्यों नहीं , भारत में इलाज़ अमेरिका या कनाडा जैसे देशों के मुकाबले बहुत सस्ता जो पड़ता है

अब देखिये जितने रूपये में यहाँ हार्ट बाई पास सर्जरी हो जाती है , बाहर उतने डॉलर में होती है

तो है यहाँ इलाज़ काफी सस्ता

अब कोर्पोरेट होसपितल्स को देखें तो यहाँ काम करने वालों को भी सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं

फिर ऐसा क्यों कि हमारे डॉक्टर देश छोड़ विदेश की ओर मूंह मोड़ लेते हैं

सुनते आये हैं कि वहां जाकर बहुत संघर्ष करना पड़ता है , डॉक्टर के रूप में स्थापित होने के लिएआरम्भ में तो क्वालिफिकेशन मिलने तक जाने क्या क्या काम करने पड़ते हैं

अब ज़रा इन महाशय को ही देखियेये भारतीय डॉक्टर भला क्या कर रहे हैं ?


डॉक्टर इण्डिया --क्यूबेक कनाडा के एक गैस स्टेशन ( पेट्रोल पम्प ) पर कार में गैस ( पेट्रोल ) भरते हुए
अब ज़रा सोचिये और बताइये कि :
सवाल :
इस डॉक्टर को पेट्रोल पम्प पर कार में पेट्रोल भरने का काम क्यों करना पड़ा ?

आपके ओपशंस :
) क्या करते , मरते क्या करतेडॉक्टर का काम नहीं मिला तो पापी पेट के लिए यही सही
) डॉक्टरी धंधे में इतना पैसा नहीं मिलता कि घर का गुजारा हो सकेइसलिए पार्ट टाइम काम है भाई
) अरे कुछ नहीं , वहां पेट्रोल मुफ्त में मिलता हैइसलिए पेट्रोल भरो और भाग लो
) उपरोक्त में से कोई नहींमामला कुछ और ही है

तो भई , आपको बताना है , इस सवाल का सही ज़वाब
सही ज़वाब देने वाले को हमारी तरफ से एक साल के लिए मुफ्त इलाज़/सलाह

नोट : यह सवाल अप्रवासी भारतियों के लिए नहीं है



Saturday, March 20, 2010

हँसना जरुरी है ----

परिस्थितियोंवश पिछले एक सप्ताह से नेट से दूर रहना पड़ाइसलिए समय ही नहीं मिल पाया , लिखने और पढने काआज आपके सन्मुख पाया हूँ

नोट: ऐसा प्रतीत होता है कि आजकल के भाग दौड़ और तनावपूर्ण जीवन में लोग हँसना ही भूल गए हैं। तभी तो अधिकतर लोगों के माथे पर भ्रकुटी तनी हुई और चेहरा गंभीरग़मगीन नज़र आता है। विशेष रूप से व्यावासिक जीवन में जो जितना सफल होता है, वह उतना ही ज्यादा गंभीरता का मुखोटा ओढे रहता है। इसीलिए आजकल भारत जैसे विकासशील देश में भी हृदय रोग , मधुमेह उच्च रक्तचाप जैसी भयंकर बीमारियाँ पनपने लगी हैं।


हँसना स्वास्थ्य के लिए कितना लाभदायक है , यह बात हमारे धार्मिक गुरुओं के अलावा डॉक्टरों से बेहतर और कौन समझ सकता है। ठहाका लगाकर हँसना एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे न सिर्फ़ शरीर का प्रत्येक अंग आनंदविभोर होकर कम्पन करने लगता है, बल्कि दिमाग भी कुछ देर के लिए सभी अवांछित विचारों से शून्य हो जाता है। इसीलिए हंसने को एक अच्छा मैडिटेशन माना गया है।


लेकिन आज के युग में हँसना भी एक कृत्रिम प्रक्रिया बन गया है। ठहाका लगाकर हंसने के लिए आवश्यकता होती है एक सौहार्दपूर्ण वातावरण की , जो केवल व्यक्तिगत मित्रों के साथ ही उपलब्ध हो पाता है। और आज के स्वयम्भू समाज में अच्छे मित्र भला कहाँ मिल पाते हैं। इसीलिए आजकल खुलकर हँसना दुर्लभ होता जा रहा है।


देखिये ये कैसी विडम्बना है कि---


वहां गाँव की उन्मुक्त हवा में , किसानों के ठहाके गूंजते हैं ,
यहाँ शहर में लोग हंसने के लिए भी, कलब ढूँढ़ते हैं।


आजकल शहरों में जगह जगह लाफ्टर कलब बन गए हैं ,जहाँ लाफ्टर मैडिटेशन कराया जाता है। लेकिन मुझे तो लगता है कि इस तरह की कृत्रिम हँसी सिर्फ़ मन बहलाने का एक साधन मात्र है। वास्तविक हँसी तो नदारद होती है। जरा गौर कीजिये , एक पार्क में २०-३० लोगों का समूह , एक घेरे में खड़े होकर , झुककर ऊपर उठते हैं , हाथ उठाते हैं, और मुहँ से जोरदार आवाज निकलते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे लाफ्टर मैडिटेशन नहीं, बल्कि बाबा रामदेव का बताया हुआ कब्ज़ दूर करने का आसन कर रहे हों। उसमे आवाज तो होती है, मगर हँसी नही होती।

मित्रो, हंसने के लिए स्वाभाविक होना अति आवश्यक है , साथ ही जिंदगी के प्रति अपना रवैया बदलना भी जरुरी है। जीवन की छोटी छोटी बातों से , घटनाओं से, कुछ न कुछ हास्य निकल आता है, जिसे फ़ौरन पकड़ लेना चाहिए और उसे हँसी में तब्दील कर देना चाहिए। ऐसा करके न सोर्फ़ आप हंस सकते हैं बल्कि दूसरों को भी हंसा सकते हैं। याद रखिये जो लोग हँसते हैं , वो अपना तनाव हटाते हैं, लेकिन जो हंसाते हैं वो दूसरों के तनाव भगाते हैं। यानी हँसाना एक परोपकारिक कार्य है। तो क्या आप यह सवोप्कार एव्म परोपकार नही करना चाहेंगे?

जिंदगी का मंत्र --

हर हाल में जिंदगी का साथ निभाते चले जाओ,
किंतु हर ग़म , हर फ़िक्र को , धुएँ में नही ,हँसी में उडाते जाओ।

आप पिछली बार दिल खोलकर कब हँसे थे , जरा सोचियेगा जरूर!


Thursday, March 11, 2010

विश्व गुर्दा दिवस पर जानिए , किडनी फेलियर के बारे में ---

डॉ पी कालरा --प्रिंसिपल , यू सी ऍम अस

अख़बारों की सुर्ख़ियों में किडनी कांड के बाऱे में तो आपने सुना ही होगाकभी कभी गलत तरीके से किया गया सही काम भी एक काण्ड बन जाता है

आज विश्व गुर्दा दिवस ( वर्ल्ड किडनी डे ) है।

आइये जाने , कैसे रोका जा सकता है , किडनी फेल होने को ताकि फिर कोई नकली डॉक्टर किडनी कांड करके पूरे चिकित्सा जगत को बदनाम न करे ।

हमारे शरीर में दो गुर्दे होते हैं , एक गुर्दे का वज़न औसतन महिलाओं में १३५ ग्राम और पुरुषों में १५० ग्राम के करीब होता है ।

गुर्दों का कार्य खून से विषैले और अवांछित पदार्थों को साफ़ कर मूत्र में वित्सर्जित करना होता है। इसके अतिरिक्त गुर्दे द्रव्यों का संतुलन , रक्तचाप का नियंत्रण , रक्त और विटामिन डी बनाने में भी सहायक होते हैं।

अब सोचिये , यदि यही गुर्दे फेल हो जाएँ , यानि काम करना बंद कर दें , तो क्या होगा।

गुर्दे फेल होने के लक्षण :

पैरों और मूंह पर सूजन

पेशाब की मात्रा में कमी

उलटी , सर दर्द, भूख गायब

खून की कमी

हड्डियाँ कमज़ोर

शरीर में खुजली

और अंत में ----जिंदगी की लड़ाई खत्म


क्यों होती हैं किडनी फेल ?

इसके मुख्य कारण है : डायबिटीज, हाइपर्तेन्शन (उच्च रक्त चाप ), गुर्दे में सूजन , पथरी
इसके अतिरिक्त गुर्दों के पैदाइशी या अनुवांशिक रोग , तथा कुछ दर्द निवारक दवाएं भी किडनी फेल होने का कारण बन सकती हैं।

किडनी फेल होने का पता कैसे चले ?

किडनी फेल होने का पता आपको चल ही नहीं पायेगा जब तक आप डॉक्टर के पास जांच नहीं करवाएंगे ।
जांच :

पेशाब की जांच ---पेशाब में प्रोटीन का आना

रक्त में यूरिया और क्रिएतिनिन का सामान्य से ज्यादा होना

पेशाब में लाल रक्त कोशिकाएं और पस सेल्स

हिमोग्लोबिन की कमी

रक्त में कैल्सियम , पोटासियम और फोस्फोरस की जांच

अल्ट्रासोनिक जांच ।

मूल रूप से किडनी फेल होने का पता बढे हुए यूरिया और क्रिएतिनिन से चलता है ।
पेशाब में अत्यधिक प्रोटीन का आना अच्छा लक्षण नहीं है।
एक बार किडनी फेल होने लगे तो क्या इलाज है ?

तीन विकल्प :

१) दवाइयों से इलाज़ , और परहेज़ ---इससे रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है । डॉक्टर की सलाह लें।

) डायलिसिस ---यदि सीरम क्रिएतिनिन - से ऊपर चला जाता है , तो बिना डायलिसिस के काम नहीं चलता । यह दो प्रकार का होता है।

हिमोदायलिसिस : मशीन द्वारा खून की सफाई । सप्ताह में २-३ बार । खर्चा -२५०००-३०००० प्रति माह।

पेरिटोनियल डायलिसिस : इसे रोगी घर में ही स्वयं कर सकता है । लेकिन दिन में ३-४ बार करना पड़ता है।

) किडनी ट्रांसप्लांट : सबसे बढ़िया , लेकिन महंगा इलाज़। सरकारी अस्पताल में एक लाख और प्राइवेट में ३-४ लाख का खर्चा । लेकिन दवाइयाँ फिर भी खानी पड़ेंगी।

किडनी डोनर कोई भी हो सकता है लेकिन निकट सम्बन्धी ही सर्वोत्तम रहता है। वैसे डोनर कोई भी हो सकता है , यहाँ तक की मृत व्यक्ति भी , एक निश्चित समय अवधि में ।
किडनी फेल होने से बचाव कैसे किया जाये ?

डायबिटीज और बी पी का पूरा इलाज़ ।

नियमित रूप से डाक्टरी चेकअप और रक्त की जांच ।

खाने में नमक , चर्बी और प्रोटीन की मात्रा कम रखें।

धूम्रपान न करें।

नियमित व्यायाम करें। वज़न को कम रखें।

दर्द निवारक गोलियां बिना डाक्टरी सलाह के न लें।


याद रखिये , आरम्भ में किडनी फेलियर का इलाज़ सस्ता , शर्तिया और टिकाऊ है । देर होने पर महंगा , कष्टदायक और सीमित होगा।

आज विश्व गुर्दा दिवस के उपलक्ष में हमारे अस्पताल में एक लोकुप्योगी व्याख्यान का आयोजन किया गया । डॉ पी कालरा , प्रिंसिपल -यू सी ऍम एस ने बहुत ही सरल शब्दों में पब्लिक को इस महत्त्वपूर्ण विषय पर उपयोगी जानकारी दी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता मेडिकल सुपेरिन्तेंदेंट डॉ यू सी वर्मा ने की।

इस अवसर पर डॉ श्रीधर द्विवेदी द्वारा संकलित एक लोक पुस्तिका का भी विमोचन किया गया ।

नोट : उपरोक्त जानकरी साभार सौजन्य से --डॉ ओ पी कालरा एवम डॉ श्रीधर द्विवेदी।