Thursday, December 31, 2009

वर्ष का अंतिम दिवस और मेरे ब्लॉग की पहली वर्षगाँठ .

आज वर्ष २००९ का अंतिम दिवस
ये वर्ष भी गुजर गया, इक झोंके की तरह।
लेकिन अच्छा रहा, पिछले वर्षों की भांति।

२००७ गुजरा, हँसते-हंसाते , इतिश्री हुई दिल्ली हंसोड़ दंगल के साथ।

२००८ , कवियों की संगत में गुज़रा। और हम भी बन गए छोटे मोटे कवि।

२००९ में शुरू की ब्लोगिंग। और आज एक साल पूरा हो गया , ब्लोगिंग को।

लेकिन ये सब , अपना काम छोड़कर नहीं
अब २०१० क्या लेकर आ रहा है, ये तो वक्त ही बताएगा।


ब्लोगिंग जगत में करीब १०,००० ब्लोगर्स हैं, लेकिन सिर्फ १०० के करीब ही सक्रीय और जाने माने ब्लोगर्स हैं। ऐसा ब्लोगवाणी पर देख कर लगता है।
क्योंकि दस में से एक दो को ही एक दो से ज्यादा टिप्पणियां मिलती हैं। कुछ को तो एक भी नहीं।

यह हिंदी ब्लोगिंग के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं

हालाँकि आरम्भ में हमारा भी यही हाल था। प्रारंभिक पोस्ट्स पर एक या दो या फिर एक भी नहीं।
छै महीने लग गए, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में। और ये जुलाई के बाद ही संभव हो सका की टिप्पणियों की संख्या में दहाई का आंकड़ा पार होने लगा।

और इसके लिए मैं आभारी हूँ आप सब का , विशेष तौर पर वो जो शुरू से ही मेरे साथ हैं, और वो भी जो अभी हाल में ही जुड़े हैं। यहाँ मैं कुछ नाम विशेष रूप से लेना चाहूँगा ।

मेरे ब्लॉग पर सबसे पहले आकर और नियमित रूप से जुड़े रहने वालों में हैं, क्रम से ---
संगीता पूरी जी जो सबसे पहले आई और आज तक अपना समर्थन दे रही हैं।
डॉक्टर श्याम सखा श्याम , जो तीस साल से बहुत सुन्दर कवितायेँ लिखते आ रहे हैं।
श्री डी के मुफलिस जी, जिनकी खूबसूरत शायरी के हम कायल हैं।
श्री चंदर मोहन गुप्ता जी, जिन्होंने हर कदम पर मेरा साहस बढाया।
श्री समीर लाल जी, पहले और अकेले मित्र जिनसे मैं व्यक्तिगत तौर पर मिला, वो भी घर से १५,००० किलोमीटर दूर एजेक्स, कनाडा में। सही मायने में मेरी पहचान , समीर लाल जी से मिलने के बाद ही बनी।
समीर
भाई ने सभी नए ब्लोगर्स का हमेशा उत्साह वर्धन किया है, मेरा भी
हरकीरत हीर जी, जिनकी रचनाएँ तो बेहतरीन होती ही हैं, उनकी टिप्पणियां भी बहुत आत्मीयता से भरपूर होती हैं।
अलबेला खत्री जी, भले ही मंच पर व्यस्त रहते हों, लेकिन ब्लोगिंग के लिए वक्त निकाल ही लेते हैं, और उनकी टिपण्णी पढ़कर उनके कला श्रेष्ठ होने का आभास होता है।
बबली जी, सुशीला पूरी जी, श्यामल सुमन जी , अमिताभ श्रीवास्तव जी और प्रेम फरुखाबादी जी का भी अक्सर सहयोग मिलता रहता है।

अगस्त में साथ मिला --खुशदीप सहगल का , जिन्होंने ब्लॉग तो मेरे साथ ही बनाया था, लेकिन सक्रीय ब्लोगिंग शुरू की अगस्त में । और जाने कब एक अटूट रिश्ता बन गया , ब्लोगर बंधू का। खुशदीप ने इतना सम्मान दिया की हमें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होने लगा एक ब्लोगर के रूप में।
आज
वो ब्लॉग जगत के सबसे तेज़ी से चमकते सितारे हैं

इसी समय कई और वरिष्ठ और सम्मानीय बंधुओं से परिचय हुआ, जिनमे डॉ रूप चाँद शास्त्री मयंक जी, श्री नीरज गोस्वामी जी, और श्री शरद कोकास जी उल्लेखनीय हैं। युवाओं में मुरारी पारीक और सुनीता शर्मा जी ने अपना विश्वास व्यक्त किया , हमारे लेखन में।

सितम्बर में परम आदरणीया निर्मला कपिला जी, रचना दीक्षित जी, प्रसन्न चतुर्वेदी जी, श्री देवेंदर जी, डॉ अरविन्द मिश्रा जी, और श्री महेंदर मिस्र जी का आगमन हुआ हमारे ब्लॉग पर और ब्लॉग की इज्ज़त बढ़ गयी, आप सब के आने से ।

अक्तूबर में परिचय हुआ श्री पी सी गोदियाल जी , श्री अजय कुमार जी, भाई महफूज़ अली, अदा जी, दीपक मशाल , ऍम वर्मा जी, श्रीमती आशा जोगलेकर जी, पी अन सुब्रामनियम जी, पंडित किशोर जी, शमा जी, के के यादव जी से

इसी समय भीष्म पितामह के रूप में श्री जे सी साहब ने अपना योगदान देना शुरू किया और अपने अपार अनुभव से समय समय पर हमारी जानकारी बढाई , विशेष तौर पर जिंदगी के अन्भिग्य पहलुओं के बारे में।
नवम्बर में सामीप्य मिला श्री योगेन्द्र मोदगिल जी , श्री परमजीत बाली जी, श्री अजित वडनेरकर जी, सुलभ सतरंगी, श्याम कोरी उदय जी, और श्री श्रीश पाठक जी का

इसी समय वरिष्ठ एवम सम्मानीय ब्लोगर्स श्री सी ऍम प्रशाद जी, श्री दिगंबर नास्वा जी, और युवा ब्लोगर मिथलेश दूबे का प्रथम आगमन हुआ

अंत में जिनका बेसब्री से इंतज़ार रहा , उनके भी दर्शन हुए --ताऊ रामपुरिया, श्री पाबला जी, श्री राज भाटिया जी, श्री ललित शर्मा जी और ब्लोगर्स के ब्लोगर श्री अजय कुमार झा जी

मैं उपरोक्त सभी ब्लोगर साथियों का अहसानमंद रहूँगा जिनकी वज़ह से मैं आगामी वर्ष में भी अपना योगदान देने का साहस और शक्ति जुटा पा रहा हूँ।

मैं उन सभी साथियों का भी आभारी हूँ जो मुझे पढ़ते हैं, लेकिन समय के अभाव में टिपण्णी नहीं दे पाते।
कुछ नाम अनायास छूट गए होंगे, मैं उनसे माफ़ी मांगते हुए आगे भी सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ।

नव वर्ष के लिए संकल्प :

नव वर्ष में मेरा प्रयास रहेगा की कम से कम सप्ताह में एक , और ज्यादा से ज्यादा दो पोस्ट लिखूं।
कम ज्यादा
क्योंकि और भी ग़म हैं ज़माने में
ब्लोगिंग जिंदगी का एक हिस्सा है, लेकिन जिंदगी नहीं
याद रहे , घर में और भी लोग हैं, जिनके लिए आपका समय सुरक्षित रहना चाहिए

आप सब को नव वर्ष की हार्दिक बधाई अवम शुभकामनायें

Tuesday, December 29, 2009

थ्री इडियट्स --आल इज वैल, आल इज वैल।

सारे टी वी चैनल सारे दिन थ्री इडियट्स दिखाते रहेजी नहीं, आमिर खान वाली फिल्म नहीं, मैं बात कर रहा हूँ दिल्ली के कोटला मैदान की पिच के क्युरेतर्स की, जिन्हें टी वी वाले थ्री इडियट्स कहकर कोसते रहेअब भई, गलती ही इतनी भारी थी, सारे देश की नाक कटवा दी। उनको उनकी किये की सजा तो मिलनी ही चाहिए।

खैर, मैच तो देख सके , बट दी शो हैज टू गो ओन. इसलिए हमने प्रोग्राम बनाया, फिल्म थ्री इडियट्स देखने का

जब मैं ऍम बी बी एस के फाइनल इयर में था, तब हमारे कॉलिज में दिल्ली आई आई टी के एक प्रोफ़ेसर गुहा ने कॉलिज में एडमिशन लिया था , ऍम बी बी एस करने के लिएशायद ये देश का पहला केस था जब एक इंजिनियर-- डॉक्टर बन कर बाहर निकला और आज से करीब २० साल पहले उन्होंने दिल्ली के
आई आई ऍम एस में देश का पहला बायो-इंजीनियरिंग विभाग खोला

थ्री इडियट्स देखकर यही लगा की एक हिंदी फिल्म में पहली बार बायोइंजीनियरिंग नॉलेज का प्रयोग किया गया है

आरम्भ से ही ये फिल्म इतनी मजाकिया है की हँसते हँसते पेट में बल पड़ गएहँसते हँसते आखों में आंसू भी गए
औए एक बार जो आने शुरू हुए तो आते गए, आते गएरुकने का नाम ही नहीं

बाद में पता चला की जो एंटी सन लोशन हमने चेहरे पर लगा रखा था, वो शुरू में आए हंसी के आंसुओं में भीगकर हमारी आँखों में घुस गया था, और इरिटेट कर रहा थानतीजा, बिन बात के आंसू बहे जा रहे थे

खैर , फिल्म में बहुत इंटेलिजेंट कॉमेडी हैडायरेक्टर ने इंजीनियरिंग और मेडिकल छात्रों पर अच्छा व्यंग भी कसा हैकुछ बातें तो वास्तव में काबिले-गौर हैंजैसे ---

सक्सेस नहीं --एक्सीलेंस
ट्रेंड नहीं --- एजुकेताड
डिग्री नहीं ---हुनर होना चाहिए

फिल्म में सभी का अभिनय गज़ब का हैविशेष तैर पर आमिर खान और बोमन ईरानी का
करीना कपूर को देखकर तो यही लगा की जब वी मेट के बाद , उसको फिल्मो में शादी का मंडप छोड़कर भागने की मास्टरी हो गयी है

इस फिल्म में कुछ नयापन हैये आज की युवा पीढ़ी को बहुत पसंद आएगी

पहली बार एक हिंदी फिल्म में डिलीवरी का सीन कुछ ऐसे दिखाया गया है की अमेरिका या कनाडा के लेबर रूम्स की याद जाती है, जहाँ डिलीवरी के वक्त हसबेंड को लेबर रूम में बुलाया जाता है और वो पूरी डिलीवरी की वीडियो बनाकर बाद में सब मित्रों और सम्बन्धियों को दिखाते हैं

जी हाँ , ये सच है

और इसी सच का कुछ हिस्सा इस फिल्म में भी देखने को मिला, अलबत्ता अलग रूप में
डिलीवरी वाली सिकुएंस वैसे तो काफी हिलेरियस बन पड़ी है, लेकिन वास्तविक सच्चाई से थोडा दूर हैखासकर वो सीन जब पैदा होने के बाद बेबी रोता नहीं है, और आमिर खान उसे गोद में लेकर हिला रहा हैयहाँ डायरेक्टर थोडा मार खा गया

खैर, ओवर ऑल --आल इज वैल, आल इज वैल

इस फिल्म को नोट सो यंग लोगों को भी देखना चाहिएकम से कम ये सोचने के लिए तो मजबूर होंगे की ४४ साल का आमिर खान, इस फिल्म में २२ साल का युवक कैसे दिख रहा है
आखिर उसने कौन सी गोली खाई इसके लिए
हमें भी मिले तो हम दो खा लें , फिर नतीजा चाहे जो भी हो

Monday, December 28, 2009

कल फिर दिल के सारे अरमान पिच की भेंट चढ़ गए---बस हम बच गए।

कल फिर दिल्ली में एक क्रिकेट मैच था। कल फिर दिल की सोई हुई तमन्ना जाग उठी---सर्दियों की नर्म सुहानी धूप में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान में बैठकर भारत और श्रीलंका के बीच पांचवां एक दिवसीय क्रिकेट मैच देखने की। कल फिर दिल के सारे अरमान पिच की भेंट चढ़ गए
बस हम बच गए

हुआ यूँ की इस बार हमने ठान ली थी की दिल्ली वाला मैच देखकर ही रहेंगे। पिछले दस सालों से लगातार नाकामयाब कोशिश करते रहे थे।
इसलिए इस बार एक सप्ताह पहले ही छुट्टी लेकर बैठ गए , पास का जुगाड़ करने के लिए
पास इसलिए , क्योंकि पता चला की कोलकाता में एक भी टिकेट नहीं बेचीं गई। ८४००० सीटों की क्षमता वाले स्टेडियम में महज़ १०००० -२०००० टिकटें ही बेचीं जाती थी। लेकिन इस बार निर्माण कार्य की वज़ह से सिर्फ ४४००० सीटें ही उपलब्ध थी। इसलिए --नो टिकेट , ओनली पास
अब दिल्ली में तो ४०००० सीट्स ही सारी हैं। उसपर जाने कितने पोलितिशीयन्स, ब्यूरोक्रेट्स, वी आई पीज और क्लब मेम्बर्स ---सबको तो पास चाहिए।

फिर भी हिम्मत देखिये , डी डी सी की, टिकटों की बिक्री की घोषणा कर डाली

लेकिन हम भी तो दिल्ली वाले हैंपूरी जान लगा दी ,पास हासिल करने के लिए

सबसे पहले हमने अपने दिल्ली के बड़े बड़े मित्र अफसरों को फोन लगाया।
और जी, कैसे हैं आप ? क्या हाल चाल हैं ?
अब दिल्ली के अफसरान भी ऐसे वैसे थोड़े ही न हैं, अगर आप ६ महीने या साल भर बाद किसी को फोन करेंगे , तो
वो भी समझ जाते हैं की हाल के पीछे क्या चाल है। ज़रूर कोई काम होगा , वर्ना दिल्ली में भला कोई किसी को खामख्वाह फोन करता है।

तो भई, सबने अंगूठा दिखा दिया

अब हमें याद आई, अपने मित्र पत्रकार और मीडियाकर्मी ब्लोगर बंधुओं की।
सब छोटे बड़े पत्रकारों के ब्लोग्स पर दे टिपण्णी पर टिपण्णी। लेकिन खाली टिपण्णी देने से ही पास मिल जाता तो सारा स्टेडियम ब्लोगर्स से ही भरा होता।

मैंने तो खुशदीप भाई को भी बार बार उनके प्रिय टीचर्स से मुलाकात कराने का झांसा दिया। लेकिन खुशदीप ठहरे खुशदीप, वो कहाँ झांसे में आने वाले थे। नव वर्ष पर व्यस्त होने का झांसा देकर खुद पतली गली से निकल लिए

अफ़सोस, अपना कोई चाचा, मामा या फूफा न तो वी आई पी है, न ही क्रिकेट खेलता है। पास मिलता भी तो कैसे।
नज़फगढ़ का नवाब, वीरेंदर सहवाग भले ही हमारे गाँव के पास का हो। लेकिन उसने कोई ठेका थोडा ले रखा था , पूरे नज़फगढ़ विधान सभा क्षेत्र को पास दिलाने का।
ऊपर से विडम्बना ये की अपनी जान पहचान एक तरफ़ा है। यानि खाली मैं ही वीरू को जनता हूँ, वो मुझे कहाँ जानता है ।

खैर पास को भूलकर अब हमने टिकेट खरीदने की सोची। लेकिन सोचते ही रह गए। क्योंकि नेट पर बुकिंग का टाइम रात के बारह बजे तक का ही था। और ५०० वाली दो टिकटें १११० में मिल रही थीफ्री होम डिलीवरी के साथलेकिन हमें लगा की अगर डिलीवरी नहीं हुई तो हम क्या करेंगे। कहाँ घूमते फिरेंगे इमरजेंसी में।

खैर हमें सुरक्षा इसी में लगी की अगले दिन बैंक से टिकेट खरीदी जाये।
दस बजे बैंक पहुंचे तो पता चला की बैंक शिफ्ट हो गया है। फिर जिसने जो बताया , वहां जाकर ढूँढा , लेकिन बैंक कहीं नहीं मिला। थककर जब हम घर को मुड़े तो अचानक बैंक दिखाई दे गया।

लेकिन खाली बैंक ही मिला, टिकटें नहींक्योंकि तब तक सारी बिक चुकी थी
वैसे भी बैंकों में टिकेट आती बाद में हैं, बिक पहले जाती हैं
जाने बैंकों को देते ही क्यों हैं। अरे हमें दे दिया होता, हम ही एक काउंटर खोल कर बैठ जाते और १०००-२००० टिकेट तो अकेले ही बेच देते।

अब तक तो इमरजेंसी डिक्लेयर हो चुकी थी। हमने सब घर वालों को काम पर लगा दिया, की जिसको भी जहाँ से भी टिकेट मिले, बस ले लें। लेकिन सभी तरफ से निराशा ही हाथ लगी।
आखिर में हमें वही करना पड़ा , जो हम नहीं चाहते थे। यानि स्टेडियम जाकर टिकेट का चक्कर चलाने का
स्टेडियम पहुंचे तो हजारों की भीड़ देखकर ही अपने तो सर्दियों में भी पसीने छूट गए। ऊपर से पता चला की एक भी टिकेट नहीं बची है। पब्लिक शोर मचा रही थी। पुलिस वाले डंडे बरसाने को तैयार थे। अचानक कुछ हिलता हुआ सा नज़र आया।
लोग सर पर पैर रखकर भागने लगे, हम भागे सर पर हाथ रखकर , ताकि डंडा पड़े

मैच देखने के सारे अरमान चकनाचूर हो गए।

हार कर यही सोचा --चलो एक बार फिर से टी वी पर ही मैच देखें , हम दोनों

लेकिन देखिये , किस्मत की बात , थोडा सा ही मैच होने के बाद, मैच रद्द करना पड़ा। खराब परिस्थितियों की वज़ह से।
पहले जिन भाई, भतीजों और भांजों से ईर्ष्या हो रही थी, उन्ही पर अब दया रही थी

अब इंतज़ार रहेगा, अगले मैच काफिर कोई तुकदम भिडायेंगे , पास के जुगाड़ के लिए

Saturday, December 26, 2009

दुनिया क्या कहेगी --क्या सोचेगी ----?? कुछ नहीं कहेगी, कुछ नहीं सोचेगी ---

शादियों के बारे में उठे दो सवाल :

१. क्या शादियों में फिजूलखर्ची और दिखावा जायज़ है ?
२. क्या बिना दान-दहेज़ के शादियाँ हो सकती हैं ?

करीब ५०० से ज्यादा मित्रों ने पढ़ा इन दो पोस्ट्स को और ६० दोस्तों ने अपने विचार खुल कर रखे।
मैं इसे ब्लॉग जगत की एक उपलब्धि समझता हूँइस के लिए आप सब बधाई के पात्र हैं

अब देखते है की निष्कर्ष क्या निकला ---

सभी मित्रों ने एकमत होकर कहा की शादियों में होने वाली फिजूलखर्ची को रोका जाना चाहिए
हाँ, ख़ुशी मनाने के लिए और रीति रिवाज़ और सामर्थ्य अनुसार उपहारों का आदान -प्रदान करना कोई अनुचित नहीं है

जायज़ बात है।

अब रहा दूसरा सवाल :

अधिकाँश मित्रों का विचार था की ---
) बेटे की शादी में दहेज़ लेना तो अपने हाथ में है, लेकिन बेटी की शादी में देना दूसरों पर निर्भर करता है
) कभी कभी पारिवारिक दबाव में आकर लेना देना करना पड़ता है
) अभी समाज में ऐसे साहसी व्यक्ति बहुत कम हैं, जो बिना दहेज़ के बच्चों की शादी कर सकें

उपरोक्त तीनों बातें सही हैं। लेकिन यहीं तो हम सब की भूमिका अहम हो जाती है। कैसे इस विचार धारा को बदलें।

मुझे ख़ुशी हुई ये देखकर की आज भी ऐसे लोग हैं, जो दान दहेज़ के विरोधी हैं आइये उन्हीं की जुबानी सुने :

श्री संजय बेगाणी : मेरी शादी बिना दहेज के हुई थी॥

घुघूती बासूती: मेरे अपने विवाह में दहेज नहीं देने दिया गया। यदि दहेज देने की बात होती तो मैं विवाह ही नहीं करती।
श्री राज भाटिय़ा: मेरी शादी आज से करीब २२ ,२३ साल पहले हुयी, बिना दहेज के,अब बेटो की शादी जब भी हुयी ओर भारतीया लडकी से हुयी तो बिना दहेज के बिना दिखावे के होगी। धन्यवाद

श्री सी ऍम प्रशाद : गर्व से कह सकता हूं कि ४० वर्ष पूर्व मैंने अपनी बिरादरी की लड़की से बिना दहेज शादी की।

श्रीमती आशा जोगलेकर : मेरी अपनी शादी में (४४ साल पहले)भी कोई दहेज नही लिया गया और हमने भी अपने बेटों की शादी में दहेज नही लिया । बेटी थी नही होती तब शायद उसको भी यही सिखाते ।

श्री नीरज गोस्वामी : दहेज़ एक अभिशाप है...कल भी था और आज भी है...पैंतीस साल पहले मात्र सवा रुँपये वो भी पंडित के बहुत अनुनय विनय के बाद लिए जाने पर,पर शादी हुई थी हमारी...दोनों बेटों की शादी में जब कुछ भी लेने से मना कर दिया तो वधु पक्ष वाले सन्नाटे में आ गए...बोले बिरादरी में हमारी इज्ज़त क्या रहेगी...बेटी यूँ ही विदा कर दी..लेकिन हम अपनी बात पर अड़े रहे...

श्री जे सी साहब : मेरे '६५ सन में होने वाले विवाह में मैं केवल ७ सदस्यों कि बारात ले कर गया था, जिसमें मैं और एक पंडितजी भी शामिल थे

श्री सुलभ सतरंगी : इनकी अभी शादी नहीं हुई, लेकिन दहेज़ के विरोधी हैं।

मैं उपरोक्त सभी ब्लोगर मित्रों को बधाई देता हूँ और आभार प्रकट करता हूँ, एक मिसाल कायम करने के लिए

अब मैं आता हूँ अपने मूल प्रश्न पर।

क्या हम अपनी या अपने बच्चों की शादी बिना दान -दहेज़ के कर सकते हैं ?

मेरा ज़वाब था ---जी नहीं। लेकिन क्यों और कैसे ?

इत्तेफाक से इस क्यों और कैसे की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया
आइये मैं इस बारे में विस्तार से वर्णन करता हूँ।

शादी बेटे के हो या बेटी की --दान भी ज़रूरी है , और दहेज़ भी

दान :

भारतीय संस्कृति के अनुसार शादी में बेटी का पिता कन्या दान करता है। हालाँकि कन्या यानि बेटी कोई दान में देने वाली चीज़ नहीं है। लेकिन यह भी सत्य है की शादी के बाद बेटी , पिता का घर छोड़ , हमेशा के लिए दूसरे घर चली जाती है।

दहेज़ : जी हाँ, शादी में दहेज़ भी ज़रूरी है। लेकिन ये दहेज़ होना चाहिए --लड़की की शिक्षा और संस्कार

सोना, चांदी, कार, बंगला, रुपया -पैसा, ये सब क्षणिक उपलब्धियां है। किसी के दिए से जिंदगी नहीं गुजर सकती।
जिंदगी में वही काम आता है, जो पति पत्नी मिलकर कमाते है और सोच समझ कर मिलकर खर्च करते हैं।

२५ साल पहले १३ अप्रैल १९८४ को हमारी शादी हुई थी। मैंने यही दो मांगे रखी थी :
दान में लड़की का हाथ , और दहेज़ में उच्च शिक्षा और संस्कार
और कैश के रूप में मात्र एक रुपया -- शगुन के रूप में।
आज मैं जिस भी मुकाम पर हूँ , इन्ही दोनों की वज़ह से।

दुनिया क्या कहेगी ?
दुनिया क्या सोचेगी ?

मेरी कनाडा यात्रा से मैंने यही सीखा की ---दुनिया कुछ नहीं कहती, दुनिया कुछ नहीं सोचती आपके बारे में
यह आपका अपना ही वहम और विचारों की अनिश्चितताएं होती है , जो आपको विवेकहीन बनाती हैं