Saturday, July 25, 2009

अचार बनाम आचार--

आज सुबह अखबार पढ़ते हुए पत्नी अचानक बोली, अजी सुनते हो, मैं सोच रही हूँ की मैं भी बड़ी गाड़ी ले लूं. ये देखिये दो साल पुरानी कार ४ लाख में मिल रही है. मैंने कहा प्रिय, ४ लाख! ये मोडल तो नया ही ३ लाख में मिलता है. वो बोली चिंता क्यों करते हैं, २ लाख किकबैक में वापस मिल जायेंगे और वो अपनी जेब में ही तो आयेंगे. आजकल कार हो या ज़हाज़, खरीद फरोख्त करने का यही तरीका है.


अभी पिछले दिनों छुटियाँ बिताकर आये तो पत्नी बोली, अजी गज़ब हो गया. अचार का डिब्बा खुला रह गया, इसलिए सारा अचार भृष्ट हो गया. मैंने कहा भाग्यवान, ये अपने देश का अचार कुछ ऐसा ही है. विदेश में घूमकर एक बात तो साफ़ हो गयी है की हमारा देश दो बातों में सारे विश्व से आगे है. यानि यहाँ दो चीजों की भरमार है , एक जनसँख्या अपार, और दूसरा  भ्रष्ट आचार यानि भ्रष्टाचार. अब देश के अधिकाँश परिवारों की तरह भ्रष्टाचार की भी अनेक संतानें हैं, जैसे रिसू (रिश्वतखोरी), बेनी (बेईमानी ), हैरी (हेरा- फेरी), छोटू (घोटला ), और अब तो विदेशी नाम भी रखे जाने लगे हैं जैसे किस (किक्बैक्स).




अब बढती जनसँख्या को तो हम रोक नहीं सकते, क्योंकि हमारा सामाजिक और राजनितिक ढांचा इस प्रकार का है. और रोकना चाहिए भी नहीं. क्योंकि रोकने की कोशिश की तो अपना भी वही हाल होगा जो आज चीन के संघाई शहर में हो रहा है. यानि काम करने लायक युवक ही नहीं रहे. बुजुर्गों की भरमार हो गई है.

लेकिन भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास तो कर सकते हैं.


कहते हैं की भगवान् के घर में देर है अंधेर नहीं. इसलिए इन्साफ तो मिलता है लेकिन देर से. भगवान् की तरह कानून के घर में भी यही हाल है. अब बुरे कर्म का नतीजा तो बुरा ही होता है. लेकिन इन्साफ के दोनों घरों में देर लगने से इन्साफ मिले भी तो उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता. काश की इन्साफ तुंरत मिले तो न सिर्फ अपराधी बल्कि दूसरों को भी इसका अहसास हो सकता है.

मुझे तो तरस आता है उन लोगों पर जो कुकर्म करते हुए एक पल भी नहीं झिझकते. तरस आता है उनकी अज्ञानता पर जो नहीं जानते की इसका नतीजा क्या होगा. और जो जानते हुए भी बुरे काम करते हैं, तो उनको सजा मिलना तो न्यायसंगत ही है. लेकिन जो रंगे  हाथों पकडा जाता है, उसकी हालत क्या होती है, इसी बारे में चंद पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :




छुपाकर अपने ही हाथों में चेहरा
नज़र यूँ ज़माने से चुराई होगी.


कालिख कहाँ थी मां की कोख में
तेरे कर्मों ने ही लगाईं होगी.


दर्द से कितना सिसका होगा आइना
जब सूरत असली दिखाई होगी.


घूसखोरों की एक दिन यारों
इसी तरहां गलियों में रुसवाई होगी.


अभी सब्र के घूँट पी "तारीफ"
कभी शरीफों की भी सुनवाई होगी

Wednesday, July 22, 2009

सीधे दिल से ---

९ जुलाई की शाम एक अलबेली शाम थी. उस दिन मेरा मिलने का प्रोग्राम था उन सज्जन से जिन्हें अब तक मैंने इन्टरनेट पर ही देखा और पढ़ा था. श्री समीर लाल जी न सिर्फ हिंदी ब्लॉग जगत के एक जाने माने ब्लोगर हैं बल्कि हर नए ब्लोगर को हमेशा प्रोत्साहन देते रहे हैं जिनमे से एक मैं भी हूँ. इसलिए ऐसे व्यक्ति के प्रति उत्सुकता उत्तपन होना तो स्वाभाविक था. अतै जिस समय मैं टोरंटो जाने का प्रोग्राम बना रहा था, उसी समय ये ये विचार मन में आया की मुझे उनसे ज़रूर मिलना चाहिए .



टोरंटो पहुचने पर पता चला की उनका निवास तो हमसे बहुत करीब था. और बस बात हुई और मामला तय.



किसी अजनबी से मुलाकात मेरे लिए तो एक नयी बात थी. इसलिए मन में थोडा कोतुहल था. घर ढूँढने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई. उन्हें घर के द्वार पर ही इंतज़ार करते पाया. और सच मानिए, घर से पहले हमने घर के मालिक को पहचान लिया. और उन्हें पहचान कर लगा की सही घर पर आ चुके हैं.



कार से उतारते ही लाल साहब ऐसे गले मिले जैसे बरसों से बिछडे दो दोस्त मिल रहे हों. हमें भी ये बिलकुल नहीं लगा की हम पहली बार मिल रहे हैं. यही तो फायदा है आजकल की संचार सुविधाओं का की सब दूरियां ख़त्म हो गयी हैं, बसरते की दिलों में दूरियां न हों.

तो भाई, लाल साहब के शानदार और करीने से सजाये गए महमान कक्ष में कुछ पल औपचारिकताओं के बिताने के बाद हम उनके आरामदायक एवम खूबसूरत फॅमिली लाउंज में आसीन हो गए. उसके बाद जो बातों और कविताओं का दौर शुरू हुआ तो कब तीन घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला.



बातों बातों में पता चला की जिस बात पर हमारे यहाँ पति पत्नी में अक्सर झगडे होते हैं, उसी को लाल साहब खूब एन्जॉय करते हैं. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ टी वी पर प्राइम टाइम पर आने वाले सास बहु के सीरिअल्स की, जिसकी वजह से पति लोग ११ बजे से पहले घर आने से डरते हैं. लेकिन पति पत्नी प्रेम का एक अच्छा उदाहरण मैंने वहां देखा क्योंकि जिस वक्त मिसेज लाल सीरिअल देख रही होती है उस वक्त मिस्टर लाल अपने ब्लॉग पर बैठ जाते हैं और इस तरह दोनों साथ बैठकर एक दुसरे के सामीप्य का लुत्फ़ उठाते हैं. मैं समझता हूँ की ये सभी पति पत्नी के लिए एक अच्छा सबक है जिंदगी का भरपूर आनंद उठाने का विशेषकर जिनके बच्चे बड़े होकर अपने काम धंधे पर लग गए हों.



हमारी छोटी सी महफ़िल पूरे शबाब पर थी पर घर से फ़ोन से पता चला की रात के १२ बज चुके हैं. खैर अनमने भाव से सभी डिनर के लिए उठे क्यांकि सभी को बहुत आनंद आ रहा था. लेकिन डिनर भी तो अपने आप में एक अनुभव था . मिसेज लाल ने इतना स्वादिष्ट और लज़ीज़ खाना बनाया हुआ था की हम तो उंगलियाँ चाटते रह गए. घर से २०,००० किलोमीटर दूर शुद्ध शाकाहारी हिन्दुस्तानी खाना खाकर तृप्ति हो गयी. शायद यही हम भारतियों की खूबी है की हम कहीं भी रहें अपनी संस्कृति और परंपरा को नहीं भूलते.


लाल दंपत्ति से मिलकर यही लगा की हमारे अप्रवासी भारतीय मित्र कहीं न कहीं हम स्वदेश में रहने वालों से ज्यादा भारतीय हैं. शायद अपनेपन की क़द्र वही जानते हैं जो अपनों से दूर रहते हैं. यहाँ दिल्ली में रहकर हम कितने स्वकेंद्रित हो गए हैं, इसका अंदाजा आप मेरी एक कविता की इन चाँद पंक्तियों से लगा सकते हैं:



मेरी दिल्ली मेरी शान,


पर कैसी दिल्ली, कैसी शान


यहाँ पडोसी पडोसी अनजान


पर ऊपर सबकी जान पहचान


झूठी आन बान,


शान बने वी आई पी महमान


और तेरी गाड़ी मेरी गाड़ी से बड़ी कैसे,


सब इस बात से परेशान


फिर भी मेरी दिल्ली मेरी शान.



विदेश में रहकर भी श्री समीर लाल पूर्ण रूप से शुद्ध भारतीय हैं. यहाँ घटित होने वाली सभी घटनाओं से वे भली भांति परिचित रहते हैं. उनकी भारतीयता और देश प्रेम देखकर तो नतमस्तक होने का दिल चाहता है. उनको शत शत प्रणाम.



सम्बंधित लेख कृपया यहाँ भी देखें:


उड़नतश्तरी.ब्लागस्पाट.कॉम १३ जुलाई



नोट: की की त्रुटी मेरी नहीं कंप्यूटर की है.

Friday, July 17, 2009

कौन कहता है दुनिया में दोस्त नहीं मिलते--

पिछले दिनों कनाडा भ्रमण पर जाने का सुअवसर मिला. और एक बरसों पुराना ख्वाब जो हम कुछ दोस्तों ने मिलकर देखा था, आंशिक रूप से पूर्ण हुआ. हुआ यूँ की कनाडा में रह रहे हमारे एक मित्र ने जब हमें कनाडा भ्रमण के लिए आमंत्रित किया तो हमने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया. यूँ तो आमंत्रण करीब २५ साल पुराना था, लेकिन स्वीकार करने में इतना वक्त लग गया क्योंकि अपनी माली हालत तो उस शायर जैसी रही जिसने ये लिखा --


मुफ्त दो घूँट पिला दे तेरे सदके वाली ,
भला हम ग़रीबों से कहीं दाम दिए जाते हैं.


वो तो भला हो हमारी सरकार का, जिसने ४०% एरियर देकर साथ ही ये विश्वाश भी दिया की ६०% भी जल्दी ही मिल जायेगा. तो भाई हमने तो इसी भरोसे पर अपनी टिकेट कटवा ली. और पहुँच गए टोरंटो.


मुझे अपने कॉलेज के दिनों का एक गाना याद आता है --


आते जाते खूबसूरत, आवारों सड़कों पे,
कभी कभी इत्तेफाक से,
कितने अनजान लोग मिल जाते हैं ,
उनमे से कुछ लोग भूल जाते हैं,
कुछ याद रह जाते हैं.


डॉ विनोद वर्मा के साथ टोरंटो में
भाई अपनी कहानी भी कुछ ऐसी ही है. मेडिकल  कालिज में दाखिले से लेकर डॉक्टर बनने तक का ६ साल का सफ़र इतना लम्बा होता है की इस दौरान सामान विचारधारा वाले लोग उम्र भर के लिए करीब आ जाते हैं. हमारे शौक भी कुछ ऐसे ही थे जैसे की फोटोग्राफी, संगीत, सैर सपाटा, और दोस्तों के साथ महफिल जमाना.
 
 
 
                                         जैसा देश, वैसा भेष

और एक बरसे के बाद फिर से महफिल जमी, और साथ में थे कुछ नए दोस्त भी जिनसे मुलाकात वहीँ पर हुई और पलक झपकते ही बरसों पुराने दोस्तों जैसी प्रेम डोर जुड़ गयी.
 
 
     हमारे साथ अनिल, संजय, विनोद, और पीछे   प्रदीप और राज

इन दोस्तों के साथ बिताये गए ये २० दिन यूँ तो जैसे २० लम्हों में गुजर गए लेकिन अगले २० साल तक भी एक एक पल याद आयेंगे.


                                          एक शानदार पल

कौन कहता है इस दुनिया में दोस्त नहीं मिलते,
गर दिल के द्वार हों खुले, तो अजनबी भी दोस्त बन जाते हैं.
 











अगले भाग में--


हिंदी ब्लोगिंग के जाने माने और पुरस्कृत ब्लॉगर श्री समीर लाल से अजेक्स में हुई एक यादगार मुलाकात.



डॉ विनोद वर्मा

Friday, July 3, 2009

canada se --

चल दिए--
आसमां से-- बादलों के ऊपर --ये जमीं है या आसमां-- लो भाई पहुँच गए ---